
जीवनसाथी -2 भाग -73
पंखुड़ी के घर पधारे नए मेहमान सभी के माथे पर प्रश्न चिह्न दे गए !
वहाँ मौजूद हर कोई विस्मय से एक दूसरे को देखने लगा कि ये अचानक क्या हो गया !
शेखर के माता पिता अपनी जगह पर खड़े हो गए !
“जी क्षमा चाहेंगे, हम लोग गलती से गलत घर आ गए, लगता है !”
शेखर के पिता की बात सुन पंखुड़ी की माँ और उसके पिता से एकाएक कुछ कहा नहीं गया ! अभी कुछ देर पहले तक जिन लोगों से इतनी आत्मीयता से बातचीत हो रही थी कि लग रहा था वह भावी रिश्तेदार बनने वाले हैं…
उन्हीं के साथ अब अचानक से एक औपचारिकता बीच में आ गई थी !
पंखुड़ी के माता पिता की स्थिति सबसे अधिक पसोपेश वाली हो गयी थी…
क्या करें और क्या ना करें की स्थिति से आगे बढ़कर उन्होंने नए आये आगंतुकों को भी सम्मान के साथ
अंदर लाया और उन्हें भी बैठने के लिए कह दिया…
पिया रिदान के साथ ही शेखर और पंखुड़ी भी चुप से खड़े रह गए…
पंखुड़ी ने पिया की तरफ देखा, उसे समझ नहीं आ रहा था कि अचानक वो क्या करें ?
शेखर के पिता ने पंखुड़ी के माता पिता के सामने अपने हाथ जोड़ दिये..
“चलिए कोई बात नहीं तिवारी जी ! जो हुआ सो हुआ, आपसे मिल कर हमें भी अच्छा लगा ! अब हम भी जाते हैं, और आप लोग भी अपने मेहमानो का सत्कार कीजिये ! हम अब यहाँ बैठ कर आप की तकलीफ को और बढ़ाना नहीं चाहते !”
शेखर के पिता की समझदारी भरी बात पंखुड़ी के पिता के ह्रदय से ग्लानि के बादल उड़ा लें गयी…
“अरे इसमें कैसी तकलीफ ? बल्कि मुझे कहना चाहिए कि आप जैसे अच्छे परिवार से मिल कर मुझे भी अच्छा लगा !”
पंखुड़ी के पिता ने भी उनके सामने हाथ जोड़ दिये और शेखर रिदान की तरफ वहाँ से बाहर चलने का इशारा कर उसके माता पिता बाहर निकल गए !
शेखर ने एक नजर पंखुड़ी पर डाली और सब के सामने हाथ जोड़ कर वहाँ से बाहर चला गया !
पंखुड़ी के माता पिता नए मेहमानो के स्वागत में लग गए….
उन लोगों के साथ आया लड़का बड़ी आस से कभी पिया तो कभी पंखुड़ी को देख रहा था !
अबकी बार जैसे ही उसकी नज़र पिया पर पड़ी पिया ने अपने खुद पर ऊँगली रख ना में हिला कर पंखुड़ी पर ऊँगली रख दी और लड़का झेंप कर दूसरी तरफ देखने लगा…
पंखुड़ी शेखर के जाने के बाद खुले दरवाज़े की तरफ देख रही थीं कि उसकी माँ ने जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया..
आस का एक और दरवाज़ा मूंद गया !!
पंखुड़ी अपना सा मुँह लेकर बैठ गयी…
एक बार फिर दोनों परिवारों के बीच वही सारी औपचारिक बातचीत शुरू हो गयी….!
लड़की को क्या-क्या बनाना आता है ?लड़के की पढ़ाई क्या है? उसका पैकेज कितना है, ? नाते रिश्तेदार कहां कहां बसे हुए हैं? गांव घर कैसा है ?कुल देवी देवता कौन हैं ?आगे रिश्तेदारों में कितने लोग हैं? जाति बिरादरी कौन सा है ? हाथी घोड़े पालकी सवार हर एक पर चर्चा चल निकली !
पंखुड़ी के पिता उन लोगों को शेखर के माता पिता के आ जाने से पैदा हुई गलतफहमी के बारे में बताने लगे और वो लोग हॅंस कर बात को टालने की कोशिश करने लगे…
लड़का चाय का कप पकडे कनखियों से पंखुड़ी को घूरने से बाज नहीं आ रहा था और पंखुड़ी का अब वहाँ बैठे बैठे सर दर्द करने लगा था…
उसका मन कर रहा था कि वो उन लोगों से कह दें कि वो इस लड़के को नहीं बल्कि इसके पहले आये लड़के से शादी करना चाहती है… !
लेकिन पंखुड़ी चुप बैठी थीं…
उसी वक्त दरवाज़े पर फिर से दस्तक हुई…
पंखुड़ी की माँ दरवाज़ा खोलने चली गयी…
उन्होंने दरवाज़ा खोला और सामने खड़े आदमी को देख अचकचा कर सवाल कर लिया…
” क्या हुआ बेटा ? कुछ छूट गया था क्या ?”
अपनी माँ का ये सवाल सुन कौन आया है ये जानने पंखुड़ी भी दरवाज़े की तरफ मुड़ गयी और शेखर मुस्कुरा कर अंदर दाखिल हो गया…
“जी आंटी जी, कुछ छूट गया था… !”
वो दरवाज़े में एक तरफ से होते हुए अंदर दाखिल हो गया और अंदर आ कर उसने वहाँ मौजूद लोगों के सामने हाथ जोड़ लिए..
“माफ़ी चाहता हूँ मैं आप सब के रंग में भंग डालने चला आया | लेकिन अगर आज मैं यहाँ अपने दिल की बात नहीं बोल पाया तो ज़िंदगी भर पछताता रह जाऊंगा | और अब मैं अपनी ज़िंदगी मे पछताना नहीं चाहता |
पंखुड़ी अपनी आंखें फाड़े उसे देख रही थीं कि तभी शेखर पंखुड़ी के सामने पहुँच गया..
“पंखुड़ी ! मैं तुम्हें कैसा लगता हूँ ? बिना किसी दबाव के जवाब देना ! “
“अच्छे लगते हैं आप !” पंखुड़ी ने धीमी लेकिन बुलंद आवाज़ में कहा..
“और मुझे, तुम बहुत अच्छी लगती हो !”
शेखर ने पंखुड़ी के पिता की तरफ देखते हुए वापस अपने हाथ जोड़ लिए..
“अंकल !! मुझे आपकी बेटी बहुत पसंद है और मैं उसी से शादी करना चाहता हूँ ! आज इत्तेफाक से हुआ ये वाकया कि हम लोग गलती से आपके घर पहुँच गए और हम सब कि मुलाकात हो गयी ये मुझे ईश्वर का इशारा सा लग रहा है !
बाकी लम्बी चौड़ी बातें बनाना तो मुझे नहीं आता, लेकिन बस इतना ही कहना चाहूंगा की जोड़ियाँ ऊपर से बन कर आती है और मुझे ऐसा लगता है कि मेरी भी जोड़ी पंखुड़ी के साथ ही शायद बन कर आई है !
अगर आपमें से किसी को भी ऐतराज़ है तो मैं आप लोगों की हर शंका का समाधान करने को तैयार हूँ ! “
शेखर ने मुड़ कर अपने पिता की तरफ देखा, उन्होंने पलकें झपक कर अपना आश्वासन दें दिया ! उसकी माँ भी मुस्कुरा रही थीं…
“दरअसल हम उस दूसरे परिवार से मिलने गए ही नहीं ! आपके घर से निकलते ही हमारे बेटे ने अपनी मन की बात हम से कह दी और आपस में विचार विमर्श कर यहीं वापस लौट आये !”
शेखर के पिता की बात सुन पंखुड़ी के पिता ने अपनी धर्मपत्नी की तरफ देखा और फिर सामने बैठे मेहमानों की तरफ देखने लगे…
अब उन मेहमानो की स्थिति अजीब सी हो गयी थीं.. ना उठ कर जाते ही बन रहा था और ना बैठते ही बन रहा था !
शेखर ने ही पंखुड़ी की तरफ देख वापस कहना शुरू किया..
“डॉक्टर पंखुड़ी अगर आपको मैं शादी के लिए पसंद हूँ, तो हम सब मिल कर शादी की तैयारियां शुरू करते हैं और अगर नापसंद हूँ तो मैं पहले आपको मनाने की तैयारी शुरू कर दूंगा !”
पंखुड़ी ने शेखर का अजीबोगरीब प्रपोज़ल सुना और हॅंस पड़ी..
” कलेक्टर साहब आप मुझे पसंद है… शादी के लिए भी और आपके संग गृहस्थी बसाने के लिए भी !”
शेखर ने मुस्कुरा कर अपने घर वालों को देखा और उनका आशीर्वाद लेने चला गया…
सब एक दूसरे की तरफ देख रहे थे… नए आये मेहमान भी टुकुर टुकुर शेखर और पंखुड़ी को देख रहे थे कि पिया ने मिठाई की प्लेट उठा कर सबके सामने परोस दी…
“बधाई हो अंकल ! अब इतना क्या सोचना, अगर शेखर जी का परिवार ही बस आपसे मिलने आया होता तब तो आप लोग इस रिश्ते से खुश होते ना, फिर अभी क्या हो गया ! इन्हें भी दिक़्क़त नहीं होगी ! क्योंकि जैसे शेखर जी के परिवार वाले गलती से यहाँ आ गए, ये सब उस दूसरे परिवार के सदस्यों से भी तो मिलने जा सकते हैं ना….
नहीं मैं सिर्फ एक सलाह दें रही हूँ.. जानती हूँ सलाह मानने लायक नहीं है, लेकिन देने में मेरा क्या जाता है !”
पिया मिठाई की प्लेट लिए उस नए परिवार की तरफ भी बढ़ गयी.. उन लोगों ने मिठाई का टुकड़ा उठाया और शेखर और पंखुड़ी को बधाई देते वहाँ से बाहर निकल गए…
“देखिये अगर आज ये लोग समय से आ गए होते तो कभी इतना बड़ा ब्लंडर नहीं होता… लेकिन ये होना ज़रूरी भी था, वरना हमारी प्यारी सी पाखी को उसका सही हमसफर कैसे मिलता भला ?”
सारे लोग हंसी ख़ुशी के माहौल में पाखी और शेखर की शादी की तैयारियों पर चर्चा करने लगे…
पंखुड़ी को एक तरफ बुला कर पिया ने अपने जाने की बात कहीं और घर के लिए निकल गयी !!
पिया घर पहुंची तब तक समर घर नहीं आया था ! पिया जैसे ही घर पहुंची वो सबसे पहले शोवन से मिलने उसके कमरे में चली गयी.. वो बैठ कर कुछ खेल रहा था.. शोवन को देखते ही पिया को याद आ गया कि आज समर उसे लेने अस्पताल आने वाला था,क्योंकि वहाँ से उन दोनों को शोवन की स्कूल यूनिफॉर्म और किताबें लेने जाना था…
उसने अपने सर पर अपना हाथ मार लिया..
“क्या हुआ आंटी ?”
शोवन ने भोलेपन में पूछ लिया..
“गज़ब सियापा हो गया शोवी ! आज तुम्हारी यूनिफॉर्म लेने जाना था और मैं बिना मंत्री जी को बतायें ही पंखुड़ी के घर निकल गयी !”
“तो अब ?”
“अब क्या ? उन्हें मुझे फ़ोन तो करना ही चाहिए.. जाने क्यों नहीं किया ?”
उसने अपने पर्स से फ़ोन निकाल कर देखा, उसका फ़ोन बंद हो चुका था.. !
“ओह्ह शिट !! अगर उसने फ़ोन किया भी होगा तो मुझे पता कैसे चलता.. ? ” पिया ने तुरंत चार्जिंग पर फ़ोन को लगाया और शोवन के लिए सूप बनवाने रसोई में चली गयी…
समर अपने वक्त पर निकल कर पिया को फ़ोन मिलाता हुआ उसके अस्पताल के लिए निकल गया था…
अस्पताल में पहुँचने पर उसने रिसेप्शन में पिया के बारे में बिना पूछताछ किये ही उसके केबिन का रुख कर लिया !
काश समर ने रुक कर पूछ ही लिया होता !!
पिया का फ़ोन लगातार बंद आ रहा था.. उसके केबिन में अंदर घुसते हुए भी समर ने पिया का फ़ोन लगाया और फिर बेधड़क अंदर चला आया..
अंदर कोई नहीं था… पिया की टेबल पर रखी समर की फोटो बहुत खूबसूरत लग रही थीं.. उस तस्वीर को देख कर समर के होंठो पर मुस्कान चली आई और वो उस तस्वीर को करीब से देखने उसके पास चला आया…
तस्वीर को उठा कर देखने के बाद उसने उसे अपने स्थान पर रख दिया और तभी उसकी नज़र वहीँ फड़फड़ाते एक कागज़ पर चली गयी… उसने उठा कर सरसरी तौर पर उस कागज़ को पढ़ लिया…
समर जैसे जैसे उस कागज़ को पढता गया उसके माथे पर बल पड़ते गए…
पंखुड़ी ने उससे पूछ कर ही डीएनए टेस्ट करवाया था लेकिन उसे नहीं मालूम था की उस सब के पीछे पिया थीं…
अगर पिया को उस पर भरोसा नहीं था तो खुद मुहँ खोल कर भी तो बोल सकती थीं, उसके सामने इतनी लम्बी चौड़ी प्रेम और विश्वास पर बातें बनाने वाली लड़की ने उससे बिना पूछे अपनी सहेली की मदद लेकर ये जो काम किया था उससे समर अंदर तक टूट कर रह गया…
पीड़ा से उसने अपनी आंखें पल भर को बंद कर ली… उस कागज़ को अपनी जेब में डाल वो तेज़ कदमो से बाहर निकल गया…
****
बाँसुरी अब इतना तो समझ ही चुकी थीं कि उसके हाथ पाँव मारने से कुछ होना जाना नहीं है, इसलिए उसने भी खुद को परिस्थितियों के हवाले कर दिया था…
उसकी अब सारिका से बातचीत होने लगी थीं… सारिका अक्सर उसके लिए नीचे बगीचे से फ़ूल लें आती थीं… कभी सारिका बाँसुरी के बालों में तेल डाल देती तो कभी उसके घने बालों का रिट्रो स्टाइल जुड़ा बांध कर उसमे मोती टांक देती…
सारिका का बाँसुरी से मन ही नहीं भरता था ! उसे अपनी इन रानी साहिबा से बहुत प्यार हो गया था.. इतने दिनों में भी बाँसुरी को वहाँ सारिका के अलावा किसी के दर्शन नहीं मिले थे.. हाँ उसे आभास ज़रूर था कि उसके कमरे के बाहर और भी लोग है लेकिन उसने कभी किसी को देखा नहीं था…
उसका कमरा भी कहने भर को कमरा था, बाकी तो वो महल का एक बड़ा हिस्सा सा ही था…
कमरे के बाहर बड़ी सी बालकनी में बाँसुरी ने एक तरफ कुछ लकड़ियों को जोड़ जाड कर मंदिर की शक्ल दें दी थीं, एक छोटे से गोल पत्थर को वहाँ रख वो सुबह शाम पूजा करने लगी थीं…
उसे ऐसे पूजा करते हफ्ता भी नहीं बीता होगा कि एक सुबह सारिका एक बड़ी सी ट्रॉली के साथ अंदर दाखिल हुई और बाँसुरी की सवालिया आँखों का जवाब देने उस ट्रॉली पर ढंका कपडा हटा दिया…
मंदिर में स्थापित करने के लिए लाये गए भगवानो की मूर्तियां देख बाँसुरी की आंखें ख़ुशी से चमक उठी…
उसने सारिका के साथ मिल कर अपने मंदिर को ख़ूब सजा लिया था…
*****
शाम के वक्त एक डील करने के बाद खाली बैठा सुनील आपने ऑफ़िस में मोबाइल पर बाँसुरी की तस्वीर देख रहा था….
अचानक वो अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और अपने ड्राइवर को लेकर उसी पहाड़ी वाले घर की तरफ निकल गया जहाँ उसके एक आदमी ने बाँसुरी के देखें जाने की खबर दी थीं….
उसके अंदर एक अजब सी बेचैनी घर करने लगी थीं… अब उसे किसी भी कीमत पर बाँसुरी को हासिल करना था…
शाम का धुंधलका गहराता जा रहा था, और उसकी गाड़ी पहाड़ी के पार उस घर के पिछले हिस्से के सामने पहुँच चुकी थीं…
पिछले गेट पर खड़े गार्ड्स को देख वो चौंक गया कि आखिर इस सुनसान में ऐसा कौन वीआईपी रह रहा जिसके लिए इतनी चाकचौबंद व्यवस्था की गयी हैं…
बगीचे में इधर से उधर घूमते जर्मन शेफर्ड और अल्सेशियन भी गेट पर की दरारों से नज़र आ रहे थे कि तभी पिछली बालकनी से हलकी सी धुंए की लहर ऊपर उठने लगी…
शाम मंदिर में दीपक और धूप लगाने के बाद बाँसुरी वहीँ बैठी कुछ सोच रही थीं…
उसी धूप की महीन सी रेखा सुनील की आँखों में सवाल पैदा कर रही थीं !
इधर बाँसुरी को अपने ख्यालों में गुम देख सारिका ने पूछ लिया…
“आप क्या सोच रही हैं हुकुम ?”
“सारिका !! सच सच बताना, मुझे यहाँ रहते कितना वक्त बीत गया है ?”
“लगभग छैः, साढ़े छैः महीने !”
बाँसुरी की आँखों में पीड़ा के आँसू छलक आये… जाने कब तक उसे अपना वनवास काटना था !
आज ना जाने ऐसा क्या हुआ कि बाँसुरी खुद को संभाल नहीं पायी और बिलख बिलख कर रोने लगी…
उसी वक्त नीचे खड़े सुनील के मोबाइल पर उसकी माँ का मेसेज आ गया….
“वो औरत अब हमारे निशाने पर हैं, तुम उसकी तरफ से परेशान होना छोड़ दो !”
अपनी माँ के मेसेज को पढ़ने के बाद सुनील ने मोबाइल अपने सर पर मार लिया… वो अपनी माँ को समझा नहीं पा रहा था या शायद वो खुद ही अपनी तकलीफ समझ नहीं पा रहा था !
उधर राजमहल में दादी की तबियत अचानक ही बहुत ख़राब सी हो गयी थीं…
राजा अभी ही अपने पिता को स्वास्थ्य लाभ दिलवा कर वापस लौटा था….
उसे एक पूरा दिन भी नहीं बीता था कि दादी साहब की तबियत उखड़ गयी…
वापस लौटने के बाद अपने ऑफ़िस में बैठा राजा कुछ ज़रूरी काम देख रहा था कि नौकर उसके नाम कि पुकार सी लगाता वहाँ पहुँच गया !
दादी हुकुम के कमरे में पहुँचते तक में बाकी लोग भी वहाँ पहुँच चुके थे… डॉक्टर दादी सा की नाड़ी पकडे बैठे थे…
राजा के पहुँचते ही दादी हुकुम ने प्यार भरी नज़र से राजा को देखा और बाँसुरी को ढूंढने लगी…
रूपा ने वहीँ पीछे खड़ी बाँसुरी को सामने ठेल दिया… वो झिझकते हुए आगे चली आयी… उसके पेट के उभार को देख कर दादी हुकुम हल्का सा मुस्कुरा उठी…
राजा को अपने पास बुला कर उन्होंने उससे कुछ कहने के लिए अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ा दिया… राजा ने आगे बढ़ कर उनका हाथ थाम लिया और उनके पलंग पर बैठ गया…
दादी ने इशारे से शौर्य और बाकी बच्चों के बारे में पूछा, और रूपा के साथ रेखा सारे बच्चों को साथ लें आई…
हर्ष, शौर्य, यश और परी को देख दादी हुकुम के चेहरे पर राहत की मुस्कान चली आई…
उन्होंने धीमे से युवराज को देख अपने पास बुला लिया, जैसे कुछ कहना चाहती हों… !
युवराज और राजा दादी के करीब चले आये.. अपनी सारी शक्ति जोड़ कर दादी सा ने बोलना शुरू किया…
“युवराज के प्रथम पद पर हर्ष ही बैठेंगे, राजमहिषी होंगे हमारे हर्ष… !! बिना उनकी इजाज़त के रियासत का पत्ता भी नहीं हिलेगा !
लेकिन गद्दी पर राजाधिराज महाराज बन कर शौर्य प्रताप ही बैठेंगे… यहीं हमारी अभिलाषा है !
युवराज अगर आप और अजातशत्रु हमारी बात से इत्तेफाक नहीं रखते तो आप लोग अपनी मर्ज़ी से निर्णय लें सकतें हैं… ये तो हमने अपने मन की बात कहीं हैं ! बस इतना ही… !”
“कैसी बात कह रही हैं दादी साहब ! आपका हुकुम सर माथे पर.. जैसे आज तक हमारे और कुंवर के बीच गद्दी की लड़ाई नहीं आई वैसे ही हमारे बच्चों के बीच भी नहीं आएगी…
आपके हुकुम के अनुसार शौर्य प्रताप ही राजगद्दी पर बैठेगा !!”
युवराज ने दादी सा का हाथ अपने हाथ में लेकर उनसे वादा किया और युवराज की बात सुन कर वहाँ मौजूद सभी लोग आश्चर्य से युवराज को देखते रह गए…
रूपा के दिल में हूक सी उठी लेकिन उसने अपने चेहरे से किसी को कुछ मालूम नहीं चलने दिया…
सबसे पीछे खड़े विराज का दिमाग घूम गया….
वो चुपके से वहाँ से बाहर निकल गया…
रेखा ने उसकी बाँह थाम कर उसे रोकने की कोशिश की लेकिन विराज ने उसका हाथ झटका और बाहर चला गया…..
एक बार फिर महल अपने आंतरिक मसलों में उलझता नजर आने लगा… !
राजा ने सवालिया नजरों से युवराज की तरफ देखा..
“कुंवर !! हमारे लिए जैसा हर्ष है वैसे ही शौर्य और यश भी हैं.. गद्दी पर जो बैठेगा हमारा ही तो होगा ! इसमें इतना आश्चर्य क्यों भाई ! तुम और हम कोई अलग तो नहीं !”
राजा ने हाँ में सर हिलाया और दादी सा के पास बैठ कर उनका माथा सहलाने लगा…
राजा को देख कर मुस्कुराती दादी सा ने धीमे से एक बार सब की तरफ देखा और अपनी आँखे मूंद ली….
डॉक्टर ने दुबारा नब्ज़ जांची, आला लगा कर दिल की धड़कन पढ़ने की कोशिश की और फिर राजा को देख ना में सर हिला दिया….
राजा के साथ-साथ आसपास खड़े सभी लोगों का दिल डूब कर रहा गया !
राजमहल के एक स्वर्णिम युग का अवसान हो गया…. पूरा महल शोक में डूब गया….
क्रमशः
aparna….
” आंठवा महीना पुर चुका हैं, अब आपको ऐसे अकेले कहीं नहीं जाना चाहिए !”
रूपा की बात मुस्कुरा कर अनसुनी करती बाँसुरी गिफ्ट में मिली आरामदायक चप्पलों को पहन कर इठलाती हुई अपनी राजसी गाड़ी में जा बैठी… अपनी आदत के अनुसार उसने कुछ आगे बढ़ कर ड्राइवर को गाड़ी से उतारा और फर्राटे से गाड़ी आगे बढ़ा लें गयी….
उसकी गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रही थीं कि एक गोलाकार मोड़ पर सामने से आते हाइवा से ज़ोर कि टक्कर हुई और……
अगले एपिसोड कि झलक….
