जीवनसाथी-2/66

जीवनसाथी – 2/66

    शोवन को लेकर समर और पिया घर वापस आ चुके थे…
  शोवन के कमरे में उसे बिस्तर पर लिटाने के बाद पिया उसके पास बैठी उसकी दवाओं को एक डिब्बे में संजो कर रखती जा रही थी…
उसने तुलसी को वहीँ बुला लिया था और उसे शोवन के खाने पीने से जुडी हिदायत देती जा रही थी कि लाली भी वहाँ चली आई…
लाली शोवन को बिल्कुल पसंद नहीं करती थी, हालाँकि लाली को पिया जैसी खड़ूस मालकिन भी पसंद नहीं थी…
   और उसकी नापसंदी पिया से छुपी हुई भी नहीं थी.. पिया को सब समझ आता था इसलिए पिया नहीं चाहती थी कि लाली शोवन के आसपास रहें…
  
“तुलसी !! आज से शोवन के खाने पीने का अलग से ध्यान रखना है.. उसका बचपन से ही विदेश में रहना  हुआ है, वहाँ इन लोगों का खान पान हमसे बहुत अलग होता है.. इसलिए इसका शरीर अभी हमारे भारी भरकम मसालेदार खाने को नहीं पचा सकता…
इसलिए अब रोज़ इसे सुबह से शाम तक में क्या क्या देना है, मैं सुबह ही तुम्हें बता कर जाया करुँगी, उसी हिसाब से इसका खाना होगा…
और अब इसके खाने पीने में किसी तरह की कोई कोताही हुई तो मैं बर्दाश्त नहीं करुँगी… !”

पिया ने आखिरी पंक्तियाँ कहते हुए लाली की तरफ नज़र घुमा ली…
लाली उसे ही देखती खड़ी थी…
तुलसी ने हामी भर दी…

“भाभी आप लोगों के लिए चाय बना दूँ… ?”

तुलसी ने पूछा और पिया ने हाँ में गर्दन हिला दी…

” हाँ और शोवन के लिए सूप बना दो !”

उसने पलट कर देखा समर उसके ठीक पीछे खड़ा था….

दोनों की नज़रे मिली और पिया ने नज़रे झुका लीं…

समर मुड़ कर अपने कमरे में चला गया… और पिया अपनी सास के कमरे में…
वो उन्हें भी शोवन की देखभाल से जुडी ज़रूरी बातें बताना चाहती थी… !

शोवन आंखें बंद कर आराम कर रहा था…..

पिया ने ऊपर जाने से पहले एक बार उसके कमरे में झांक कर देखा फिर ऊपर चली गयी…

वो कमरेे में पहुंची तब समर पलंग के एक किनारे बैठा अपना लैपटॉप लिए किसी काम में व्यस्त था….
उसने नज़र उठा कर एक बार पिया को देखा और वापस अपने काम में लग गया.. पिया भी कपड़े बदलने फ्रेश होने वाशरूम में चली गयी…

पिया बाहर आई तब तक में तुलसी उनकी चाय लेकर चली आई… चाय समर के सामने रख पिया भी एक तरफ बैठ गयी…

” मंत्री जी… सुनिए.. !”

जैसे ही पिया ने कहा समर एकदम से उसे देखने लगा.. समर के चेहरे पर ऐसे भाव चलें आये जैसे जाने कब से इसी आवाज़ को इसी नाम को सुनने के लिए तरस रहा था…

लैपटॉप एक तरफ पटक कर समर ने आगे बढ़ पिया को गले से लगा लिया…

” तरस गया था तुम्हारे मुहँ से मंत्री जी सुनने के लिए…
मुझे लगने लगा था अब कभी ये शब्द नहीं सुन पाउँगा.. आधा तो मैं इसी वजह से तुमसे सहजता से बात नहीं कर पा रहा था…|
पिया तुम नहीं जानती जितना तुम तड़पी हो उतना ही मैं भी तड़पा हूँ… बस अंतर इतना ही था कि मैं चाह कर भी कुछ कह नहीं पाता था… |
पिया… पिया… बहुत तड़पा हूँ तुम्हारे लिए… मेरी ज़िन्दगी में तुम ही मेरा प्यार बन कर आई हो,  ऐसा नहीं है कि तुमसे पहले मेरे जीवन में कोई और नहीं थी लेकिन तुम जैसी कभी कोई नहीं थी, ना ही इतने करीब कभी कोई रही… |
  तुमसे जैसा प्यार किया है मैंने आज तक किसी से नहीं किया और ना ही कर पाउँगा… तुम्हारे लिए जैसा महसूस किया है कभी किसी के लिए नहीं किया और ना कर पाउँगा…

  तुम्हारे साथ अपनी ज़िन्दगी की
  साँझ बिताना चाहता हूँ,
  तुम्हारे साथ अपनी सारी
  जवानी गंवाना चाहता हूँ…
  तुम हंसो तो मैं हँसू,
  तुम रूठो तो मैं मनाऊँ,
तुम्हारी हर उलझन को
अपनी साँसे देकर सुलझाना चाहता हूँ….

पिया की आँखों से आँसू बहने लगे थे…पिया ने धीरे से समर के सीने पर अपनी मुट्ठी से वार किया…

“बड़े शायर हुए जा रहें हैं.. ! मैं क्या बोलना चाहती थी वो भी नहीं सुना… बस सुनाने लगे… !”

“सुनाना ज़रूरी था पिया, क्योंकि मेरे अंदर भी भड़ास बढ़ती जा रही थी… मेरा ऑफ़िस, महल सभी जगह सब कुछ बिखरता चला जा रहा है… |
अपने काम को समेटने के चक्कर में मैं अपनी पर्सनल लाइफ को समय नहीं दे पा रहा था…|
तुम नाराज ना हो जाओ ये सोच कर शोवन को वक्त नहीं दे पा रहा था.. |
और इन्हीं सब उलझनों में खुद को इतना सारा ज़ाया करने के बाद भी रत्ती भर भी नहीं पा रहा था…|
  बहुत उलझने फ़ैल गयी थी… अब अगर मेरे घर को मेरे रिश्तो को तुम संभाल लो तो मैं अपने काम को तवज्जो दे पाउँगा… |
महल में बहुत सारी अंदरूनी ऐसी उलझने चल रही हैं जो अभी बाहर नहीं लायी जा सकती…
अगले चुनाव होने को सिर्फ साल भर बचा है, सारी विरोधी पार्टियाँ पूरा ज़ोर लगा रही हैं कि किसी तरह राजा साहब कि पार्टी को किनारे कर दिया जायें…
विधायकों के तेवर दिखाने का वक्त आ गया है…. उस वक्त जो भी कैंडिडेट्स भारी बहुमत से विजयी हुए थे  अब सारे लोग खुद को ही पार्टी के जीतने का प्रमुख कारण मान कर सर पर नाच रहें हैं..
राजा साहब पहले ही रानी साहेब को लेकर चिंतित है और उस पर रोज़ नए मसले पैदा हुए जा रहें हैं…

पिया समर के बालों पर हाथ फेरने लगी….

“मंत्री जी आप बहुत ज्यादा परेशान लग रहें है.. ? बात क्या है.. ?”

“बात बहुत बड़ी है पिया, यूँ समझ लो अभी बता नहीं पाउँगा… पर इस बार मैंने महल के भले और सुरक्षा के लिए जो निर्णय लिया है वो राजा साहब को ही मालूम नहीं है.. !”

“मतलब.. ?”

“मतलब उनकी और रानी सा की  सुरक्षा के लिए मुझे  जो करना पड़ रहा है उस सब से राजा साहब अनजान है, बस डर ये है कि मेरे बताने से पहले अगर उन्हें इस बात की भनक लग गयी तो जाने क्या हो जायेगा… !”

“आपको ये पता है मंत्री जी कि रानी बाँसुरी फिर से माँ बनने वाली हैं.. ?”

“क्या… ?”

समर चौंक कर पिया को देखने लगा…

“तुमसे किसने कहा… ?”

“मुझे दो चार दिन पहले महल से बड़ी रानी सा ने इसीलिए बुलावाया था लेकिन शोवन के साथ अस्पताल में होने के कारण मैंने एक दूसरी डॉक्टर को भेजा था, उसी ने वापस आकर बताया.. ! आज भी रानी सा का फ़ोन आया था, वो लोग देवी मंदिर जाने वाले हैं तो मुझसे पूछ रही थी कि क्या मैं फ्री हूँ, अगर हूँ तो उन लोगों के साथ मंदिर चली जाऊं.. ! बाँसुरी हुकुम भी जा रही हैं ना !”

“फिर तुमने क्या कहा ?”

“,मैंने माफ़ी मांग लीं कि नहीं जा पाऊँगी, शोवन को छोड़ कर.. !”

समर ने पिया को देखा और उसका माथा चूम लिया…

“रानी सा भी जा रही हैं.. ! “कुछ सोचते हुए उसने पूछा..

“हाँ उन्ही का तो मन है देवी मंदिर जाने का.. !”

एक गहरी सी साँस लेकर समर ने कुछ सोचते हुए अपना फ़ोन उठा लिया…

“एक बहुत ज़रूरी फ़ोन कर के आता हूँ पिया.. !”

पिया ने आगे बढ़ कर समर का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया…

” अब घर परिवार की तरफ से निश्चिन्त हो जाइये, मैं हूँ यहाँ,  लेकिन आप महल की उलझनों में खुद को मत भूल जाइएगा… !

“मेरा ध्यान रखने के लिए तुम हो ना.. !”

मुस्कुरा कर समर फ़ोन में बात करते हुए बाहर निकल गया, और पिया दोपहर के खाने की तैयारी देखने नीचे चली गयी…

******

    देवी मंदिर एक छोटी मोटी सी पहाड़ी पर था.. …  पहाड़ी में चढ़ने के लिए पहले केवल सीढ़ियां थी, लेकिन राजमहल के लोगों के लिए घोड़े और पालकी की व्यवस्था भी थी…
लेकिन अब कई सालों से पहाड़ी में घुमावदार रास्ता बना कर गाड़ियों का आवागमन भी शुरू कर दिया गया था…
  लेकिन हर गुरुवार जब महल की रानियाँ दर्शनों को जाया करती उस दिन सिर्फ महल की गाड़ियां ही ऊपर चढ़ा करती थी…
   बाकी लोग अगर अनजाने में दर्शनों के लिए आ भी गए तो पहाड़ी के नीचे ही रोक दिया जाता था…

महल से सभी औरतें महल की शानदार गाड़ियों में पहाड़ी के नीचे पहुँच चुकी थी… वहाँ एक छोटा सा चेकपोस्ट बनाया गया था..
   वहाँ पर महल की गाड़ियों को रोक दिया गया….
रूपा ने अपनी तरफ का कांच नीचे किया और चेकपोस्ट से एक सिक्योरिटी गार्ड भागता हुआ चला आया…

” धोक देता हूँ रानी साहब !”

“क्या हुआ ? “

“महल से आदेश के बाद पुलिस के एक बड़े अधिकारी आये हैं, ये भी आप लोगों के साथ ही जायेंगे… !”

“महल से किसका आदेश.. ?”

रूपा के सवाल पर गार्ड भौचक सा उसे देखता रह गया…

“रानी सा महल से कोई भी फ़ोन करें, हम में कहाँ इतनी ताब कि पूछ लें कौन बोल रहा है.. !”

उस बेचारे का कहना भी सही था, सामने वाले ने अगर ये कह दिया कि हम महल से बोल रहें और ये हमारा आदेश है फिर पूरे शहर में किसकी मजाल थी जो पलट कर कोई पूछताछ कर सके.. !

रूपा ने उसकी बात समझ कर हाँ में सर हिला दिया…

“भेज दीजिये.. हम भी तो देखें कौन है जो हमारे साथ जाने वाला है.. !”

” जी हुकुम !”

वो गार्ड फौरन दौड़ कर एक तरफ निकल गया…

सामने खड़ी थार से उतर कर अनिर्वान उन लोगों की गाड़ी तक पहुँच गया…

रूपा उसे ध्यान से देखने लगी… अनिर्वान ने बड़े अदब से झुक कर उसे प्रणाम किया और अपना आई कार्ड निकाल कर रूपा के सामने कर दिया…

रूपा ने ध्यान से कार्ड को पढ़ा और उसे साथ चलने की सहमति दे दी.. !

बड़े अदब से चेहरे को हल्का सा झुका कर उसने रूपा को आभार व्यक्त किया और ड्राइवर के बाजू वाली सीट पर बैठ गया….

उस गाड़ी में रूपा और बाँसुरी बस थे… उनके ठीक पीछे वाली गाड़ी में रेखा और जया थे…

अनिर्वान के बैठते ही गाड़ी आगे बढ़ गयी…
चौड़े घुमावदार रास्ते को पार कर गाड़ियों का काफिला मंदिर की ओर बढ़ चला….

मंदिर के थोड़ा पहले गाड़ियां रुक गयी…. सारे लोग एक एक कर नीचे उतर गए.. रेखा और जया भी उन लोगों के पास चलें आये.. बाकी की गाड़ियों में आई सहायिकाएं भी पूजा का सामान उतारने लगी…

रेखा ने अनिर्वान को देखा और बड़े ध्यान से उसका चेहरा देखने लगी.. उसे इस तरह खुद को घूरता पा कर दूर खड़े अनिर्वान को भी असहज लग रहा था लेकिन उन्हें जाकर टोकना भी सही नहीं था…

रेखा ने रूपा की तरफ देखा और रूपा ने उससे पूछ लिया कि बात क्या है.. ?

“रूपा भाभी सा हमें लगता है हम इस आदमी को पहले कहीं देख चुके हैं… ?”

रूपा ने दूर खड़े अनिर्वान की तरफ ध्यान से देखा उस वक्त अनिर्वान अपने पुलिस के लोगों को सिक्योरिटी के हिसाब से किसे कहाँ खड़ा होना है ये समझा रहा था… लेकिन अपनी पीठ पर पड़ती उन दोनों औरतों की बातचीत वो भी समझ पा रहा था…
बाँसुरी और जया भी वहाँ खड़े थे…

” मुझे तो पहचाना सा नहीं लग रहा.. !” जया की इस बात पर रेखा के माथे पर बल पड़ गए…

”  पता नहीं, लेकिन क्यों ये मुझे इतना पहचाना सा लग रहा है.. ? मेरी याददाश्त धोखा नहीं खा सकती,  इसे मैंने देखा है, और वो भी हमारे महल में ही देखा है.. लेकिन कब ये याद नहीं आ रहा… ?”

बाँसुरी ने रेखा की बात पर उतना ध्यान नहीं दिया…

” बाँसुरी, क्या तुम्हें याद नहीं आ रहा ?”

बाँसुरी ने भोलेपन से ना में गर्दन हिला दी और अपनी सहायिका के हाथ में थाम रखी पूजा की थाली लेकर वो मंदिर के अंदर चल दी…
उसके जाते ही रूपा ने रेखा को घूर कर देखा…

” रेखा ! ऐसी बातें बाँसुरी से मत पूछा करो.. उसके वापस आने के बाद डॉक्टर ने हम सब से कहाँ था ना कि वो बहुत बड़े एक्सीडेंट से बच कर आई है और इसलिए अभी काफ़ी समय तक वो कोई भी ऐसी बातें ना सोचें जो उसके स्ट्रेस का कारण बन सकती हो…
डॉक्टर ने साफ तौर पर कहा था कि भले ही वो ऊपर से पूरी तौर पर स्वस्थ नजर आती है, लेकिन अब भी उनका दिमाग उस हादसे से पूरी तरह उबरा नहीं है… और उनके दिमाग से उस समय के आसपास की बहुत सी बातें वो भूल चुकी हैं…
राजा अजातशत्रु इस एक इस नाम के अलावा वो बेहोशीे में और कुछ नहीं बोलती थी….
यानी असल में वो उनके सिवा शायद हर किसी को थोड़ा थोड़ा भूल चुकी है…. हम सब की भी कोई बात तो उन्हें याद रहती है और कई भूल जाती हैं….

रेखा ने हामी भर दी…
जया बाँसुरी के साथ अंदर गयी थी…

” हमसे वाकई भूल हो गयी भाभी सा ! हमें बाँसुरी से ये सवाल नहीं करना चाहिये  था! जब अपनी याददाश्त पर इतना गर्व होने के बावजूद हम नहीं रिकॉल कर पा रहे तो एक बीमार दिमाग से इस वक्त बाँसुरी कितना याद कर पायेगी… ?

आखिर क्या क्या याद रख पायेगी बाँसुरी….

*****

    शहर में नया साल मनाने की तैयारी जोरो से चल रही थी.. उस समय मायानगरी को खुल कर ज्यादा वक्त भी नहीं हुआ था…
मायानगरी के विद्यार्थी महा उत्साह से नए साल की अगुवानी का जश्न मनाने को आतुर थे…
बहुत बड़ा जलसा था,  ख़ूब भीड़ भाड़ कोलाहल के साथ  ढ़ेर सारे रंगारंग कार्यक्रम भी थे,  लेकिन इस भीड़ के जुटने का सबसे बड़ा आकर्षण थे राजा अजातशत्रु और उनकी रानी का इस आयोजन का हिस्सा बनना….

   यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के उत्साह वर्धन के लिये राजा साहब ने उनके निमंत्रण को स्वीकार लिया था, और साथ ही उन्हें ये आश्वासन भी दिया था कि वो अपनी रानी के साथ आएंगे…
  उस समय शौर्य भी नहीं हुआ था.. इसलिए बेहिचक इतनी ठण्ड में भी बाँसुरी राजा साहब का हाथ पकडे कहीं भी चली जाया करती थी… !

उस शाम भी गहरे काले रंग के टक्सिडो में राजा साहब अपनी शानदार परसनैलिटी में चमकते जब अपनी ऑडी से नीचे उतरे तो देखने वालों कि सॉंस पल भर को थम सी गयी…
राजा अजातशत्रु में ऐसा आकर्षण था कि देखने वाले कुछ क्षणों के लिए मंत्रमुग्ध से हो जाते थे….

राजा अजातशत्रु में वाकई वो सम्मोहन था कि अगर वो अपने किसी मानने वाले को विष का प्याला पकड़ा कर उसे कह भर दे कि इसे पी जाओ तो वो व्यक्ति हँसते हँसते उस प्याले को पी जाता …

   राजा से उसकी रियासत के लोगों को प्रेम पहले भी था लेकिन समय के साथ-साथ अब राजा अजातशत्रु को लेकर गांव-गांव में घर-घर में किवदंतियां  बनने लगी थी…
  कई माएँ अपने बच्चों को राजा अजातशत्रु की वीरता और बुद्धिमानी की कहानियां सुनाया करती थी..
     इनमें से कुछ असली होती थी और कुछ में वह अपनी कल्पनाओं का तड़का लगा दिया करती थी |  लेकिन जो भी था इन सब कारणों से राजा अजातशत्रु की कीर्ति चारों दिशाओं में इस कदर फैल चुकी थी कि वह जहां कदम रख देते जमीन वहीं ठहर जाती थी……

   राजा साहब के ब्लैक टक्सीडो को कंप्लीमेंट करती बांसुरी की गहरी मैरून रंग की  झिलमिलाती साड़ी और उसकी मोतियों की लेस उसे और भी खूबसूरत दिखा रही थी…

दोनों की इस रूपसी जोड़ी ने कॉलेज के अंदर  प्रवेश किया और इसके साथ ही लोगों की भीड़ और उनका उत्साह अपने चरम पर पहुंच गया…
हर तरफ राजा साहब और रानी की जय जयकार होने लगी !
राजा अजातशत्रु अमर रहे रानी बांसुरी हुकुम अमर रहे के जयकारे लगने लगे…
और अपने दोनों हाथ उठाकर लोगों को शांत करते हुए मुस्कुराते हुए राजा अजातशत्रु ऑडिटोरियम की तरफ बढ़ गए..
अपने दोनों हाथों से राजा साहब की बाँह थामे चलती बांसुरी भी राजा साहब की जयकार सुन सुन कर मन ही मन प्रसन्नता के हिंडोले लें रही थी…

   स्टेज पर राजा साहब के साथ उनकी हुकुम भी बैठ गयी…
  स्वागत सत्कार के बाद एक एक कर प्रिंसिपल और बाकी फैकल्टी के बड़े पदाधिकारी मोटे मोटे शब्दों में ऊंचे ऊंचे भाषण देते गए..!
सब को वहाँ बैठे राजा रानी पर अपना प्रभाव जमाना था…
सब के बहुत इसरार करने पर राजा भी माइक पर आ गया…
   सारे ऑडिटोरियम में सन्नाटा छा गया.. हर कोई साँस रोक कर उस आवाज़ को सुन लेना चाहता था… जो जाने कितनो के जीवन में रौशनी भर चुकी थी, कितनों को जीने के मायने दे चुकी थी…
वो आवाज़ जिसने अपनी रियासत से बेरोज़गारी और अशिक्षा जैसी चीज़ों को जड़ से उखाड़ फेंका था…

उस महानायक को सुनने के लिए बैठे लोगों की आंखें अजातशत्रु पर टिकी थी…
अजातशत्रु को हर कोई भर भर कर सुनना चाहता था लेकिन अपनी अनमोल वाणी से बिना एक पल व्यर्थ गंवाए उन्होंने दो चार शब्द कहे और अपना स्थान ग्रहण कर लिया… 

” नमस्कार, मैं अजातशत्रु आप सभी का अभिनन्दन करता हूँ… आप सब अभी अपने जीवन के जिस पड़ाव पर है, यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है आपके जीवन का!
   यह वह मोड है जो आपको यह दिखाता है कि आप सही दिशा में आगे बढ़ते हैं या गलत..!
आपकी जिंदगी में बहुत  सारे मूल्यवान पल आएंगे लेकिन कॉलेज के दिनों के यह पल आपके जिंदगी में कभी वापस नहीं आएंगे…!
यह वह समय है जब आप अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी खुशियों की तिजोरी भी भर सकते हैं…!
जिंदगी सिर्फ एक अच्छा कैरियर या ढेर सारे पैसे कमाना नहीं होता, जिंदगी का मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को अपने अधीन रखना नहीं होता बल्कि अपनी खुशियां अपने अधीन रखना ही ज़िंदगी है !

   मैं सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं कि अपनी जिंदगी में कभी भी अपनी खुशियों की चाबी किसी और की जेब में मत तलाशना…|
    खुद के मन को कभी इस तरीके से मत बांधना की लोगों के हिसाब से आपका जीवन तय हो… |
  अरे इस दोस्त ने मुझे अपनी बर्थडे पर नहीं बुलाया, मुझे बुरा लगा!!
    अरे उस प्रोफेसर ने अच्छा करने के बावजूद मुझे नकार कर मुझसे ज्यादा मार्क्स किसी और को दे दिये… !!
  ये सारी शिकायतें दिखाती है की, आपने अपनी खुशियों की चाबी पहले केस में अपने दोस्त की जेब में और दूसरे केस में प्रोफेसर की जेब में डाल रखी थी…
  उन दोनों की जेब से निकाल कर अपने पास रखो… अपनी खुशियाँ, अपने सपने अपनी जेब में रखो, और अपने गम अपने दिल में…  अगर जीवन का ये मन्त्र कंठस्थ कर लिया तो कभी ज़िन्दगी में हारोगे नहीं… !”

पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया.. उन तालियों में बाँसुरी की तालियां भी मौजूद थी… उसके चेहरे की मुस्कान दिखा रही थी कि आज वो कितनी खुश है…
   राजा वापस आकर उसके पास बैठ गया ….

उसके बाद मंच पर यूथ फेस्ट का कार्यक्रम शुरू हुआ और एक लड़के के पुकारने पर भुवन माइक पर चला आया…

राजा साहब के पास जाकर उसने उनके पैर छू लिए…
  माइक पर आकर उसने कहना शुरू किया…

“सभी बड़ों को वंदन कर मैं आज यहाँ गजेंद्र प्रियांशु जी का गीत प्रस्तुत करने जा रहा हूँ….

युग युग का संकल्प अटल था

मुझमे मेरा राम प्रबल था
पग-पग पर जग की मर्यादा
देकर थोडा ले गयी ज्यादा
भोर नयन भर लायी आंसू, पीड़ा लायी शाम,
सिया तेरा अभिशापित है राम…

अग्नि परीक्षा जग का छल थी
पर जग के प्रश्नों का हल थी
फिर भी उस पर प्रश्न उठा है
जो गंगा जैसी निर्मल थी
मैंने घर से उसे निकाला
सागर जिसके लिए खंगाला
लंका जीतने वाला हारा जीवन का संग्राम
सिया तेरा अभिशापित…….

बोल रहा पौरुष की भाषा
मेरा राजकुंवर नन्हा सा
जो प्राणों से भी प्यारा है
आज वही प्राणों का प्यासा
मेरा साहस तोल रहा है
मानों मुझसे बोल रहा है
जननी की हर एक पीड़ा का पाओगे परिणाम
सिया तेरा अभिशापित………

तात मुझे करके वनवासी
आप हुए गोलोक निवासी
मेरे राजकुंवर कुटिया में
मैं हूँ राजभवन का वासी
कहती रघुकुल रीति अभागे
अब तक प्राण नहीं क्यूँ त्यागे
धरती शायद ठुकरा देगी जल में चिर विश्राम…
सिया तेरा अभिशापित है राम….
सिया तेरा अभिशापित है राम….
                साभार……

   क्रमशः

aparna…


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