जीवनसाथी-2/59

जीवनसाथी 2- भाग -59

       पार्टी ख़त्म करने का किसी का मन नहीं कर रहा था.. लेकिन अगले दिन काम पर तो सभी को जाना था !
   पिया और समर भी रूपा युवराज, राजा से मिल कर घर जाने के लिए निकल गए…
   बाँसुरी उन के निकलने के कुछ देर पहले ही शौर्य को सुलाने के लिए लेकर निकल गयी थी !  

पिया ने गाड़ी में बैठने के बाद कुछ सोचते हुए समर की तरफ देखा…

“आपने ध्यान दिया… ? मुझे रानी हुकुम की तबियत ना, अभी भी सही नहीं लग रही थी.. !”

पिया आपने ख्यालों में इस कदर मशगूल थी कि उसे यहीं ध्यान नहीं रहा कि वो समर से बात ही नहीं कर रही है…
   समर भी उसकी बात सुन चौंक कर उसकी तरफ देखने लगा… पिया को जैसे ही अपनी बात का एहसास हुआ वो एकदम से चुप हो गयी…

“हाँ मुझे भी रानी साहेब कुछ बदली बदली सी लगीं…. लगता है,तबियत के कारण ही ये बदलाव होगा.. !”

इस बार पिया ने कोई जवाब नहीं दिया और कार के कांच से बाहर देखने लगी.. !

उनका घर भी महल परिसर में था, लेकिन परिसर था ही इतना बड़ा कि गाड़ी में ही आना जाना पड़ता था…
गाड़ी में बैठने के कुछ देर में ही शोवन पीछे वाली सीट पर नींद में लुढ़क गया..

घर के सामने उतरने के बाद पिया ने बेख्याली में पीछे बैठे शोवन की तरफ नज़र डाली और उसे सोया हुआ पाकर उसे उठाते उठाते उसने खुद को रोक लिया…

वो चुपचाप अपना पर्स टंगा कर घर के अंदर बढ़ गयी..
गाड़ी पार्क करने के बाद समर ने गाड़ी में पीछे का दरवाजा खोला और शोवन को गोद में लेकर घर के अंदर चला गया…

शोवन को समर ने नीचे अपनी माँ के कमरे में ही रखा हुआ था…
   समर ने शुरू में इस बात पर कोई खास ध्यान नहीं दिया कि शोवन को उसकी ज़रूरत है!
   और वो पिया कि नाराज़गी से भी ज़रा परेशान था.. इसलिए शोवन को अपने साथ अपने कमरे में लेकर  जाने कि उसकी हिम्मत नहीं हुई थी और इसीलिए नीदरलैंड से आने के बाद उसने शोवन को अपनी मां और पिता के कमरे में सोने के लिए मना लिया था…

    शोवन वैसे भी हद सीधा बच्चा था और इसीलिए समर के साथ रहना चाहते हुए भी वह चुपचाप उसकी  बात मान कर  उसकी मां के कमरे में सोने लगा था…

आज समर जब शोवन को गोद में लेकर घर के अंदर दाखिल हुआ,तब तक घर में लगभग सभी लोग सोने जा चुके थे ! उसने अपनी मां के कमरे की तरफ झांक कर देखा दरवाजा हल्का सा लगा हुआ था..
    उसे लगा इस वक्त अगर वह अंदर गया तो कहीं उसकी मां जाग ना जाए..

उसने हॉल के बड़े सोफे पर ही शोवन को लेटाने की कोशिश की….
शोवन आराम से करवट लेकर सोफे पर लेट तो गया लेकिन समर की हथेली को अपने दोनों हाथों के बीच बड़े प्यार से उसने पकड़ लिया था…
समर ने धीरे से अपने हाथ को शोवन की हथेली में से छुड़ाने की कोशिश की लेकिन उसी सब में शोवन ने  और भी ज्यादा उसे जकड़ लिया….

समर को उस मासूम नादान से बच्चे पर तरस आने लगा था..
  बेचारा 5 साल की छोटी सी उम्र में अपनी मां को खो चुका था ! अपने पिता को देखने का सौभाग्य तो उसे आज तक मिला ही नहीं था !और शायद रेवन जब से बीमार पड़ी थी उसे हर वक्त यही दिलासा दिया करती थी कि 1 दिन उसके पापा उसके पास आ जाएंगे..
    बस उसी एक उम्मीद में ये 5 साल का छोटा सा मासूम अपना जीवन जिए जा रहा था…
    उसे मालूम था कि उसकी मां उसे हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर चली गई है, लेकिन साथ ही उसे यह उम्मीद भी थी कि एक ना एक दिन उसकी मां के वादे के अनुसार उसके पिता उसके पास चले आएंगे….
    लेकिन वह नहीं जानता था कि वह दिन आखिर कब आएगा.. ?
   समर को एकाएक लगा, कहीं घर में किसी ने इस बच्चे से यह कह दिया कि उसके पिता कभी नहीं आएंगे तो इस पर क्या बीतेगी..! लेकिन अब जो भी  जैसा भी हो,  यह बच्चा पूरी तरह से उसकी जिम्मेदारी थी..! वह सिर्फ अपनी मां और पिया के भरोसे इसे नहीं छोड़ सकता था! उसे सिर्फ रेवन के एक दोस्त के तौर पर देखने की जगह अब एक पिता के तौर पर देखना होगा ! क्योंकि अगर उसने रेवन से उसके बच्चे की जिम्मेदारी ली है तो उसे पूरी तरह से निभाने के लिए समर को शोवन का पिता ही बनना पड़ेगा…
    तब जाकर ही इस बच्चे का मासूम बचपन जिंदा रह पाएगा…

शोवन के बालों पर हाथ फेरते हुए धीरे से समर ने  उसका सिर उठाया और सोफे पर बैठ गया! अपनी गोद में उसने शोवन का सिर रख लिया और दूसरे हाथ से उसके बालों पर हाथ फिराता रहा…
   अपनी गहरी नींद में कोई मीठा सा सपना देखता हुआ शोवन धीरे से मुस्कुरा उठा…  और उसके मक्खन से सफेद गालों पर गहरे काले भंवर पड़ गये…
उसके गालों के गड्ढे देखकर समर को अचानक ही रेवन की मुस्कान याद आ गई…..
      रेवन के चेहरे पर भी तो ऐसे ही गड्ढे पड़ते हैं…. वैसे गड्ढे तो पिया के गालों पर भी बहुत मनोहारी पड़ते हैं…..
    पिया के बारे में याद आते हैं उसने हॉल से ही बैठे हुए ऊपर अपने कमरे की तरफ देखा…
  .   हॉल से ऊपर की सीढ़ियां दोनों तरफ से होते हुए ऊपर जहां खुलती थी,वहाँ खाली जगह से थोड़ा आगे बढ़कर ही पिया और समर का कमरा था…

अपने कमरे के दरवाजे की तरफ देखने के लिए समर  में जैसे ही सर ऊपर उठाया,  कमरे के सामने की रेलिंग पर खड़ी पिया नजर आ गई!
  पिया समर और शोवन को ही देख रही थी… लेकिन पिया के चेहरे पर ऐसे भाव नहीं थे, जिन्हें देखकर समर के चेहरे पर राहत आ पाती…
पिया की नाराजगी देखते ही समर को समझ में आ गया कि समर का इस तरह शोवन के साथ नीचे हॉल में ही रुक जाना पिया को पसंद नहीं आया था…
लेकिन उस छोटे से बच्चे को इतने बड़े हॉल में अकेले रात के वक्त छोड़कर जाने का भी समर का दिल नहीं कर रहा था! उसे लगा कहीं आधी रात के वक्त शोवन की नींद खुल गई तो वह अकेला घबरा जाएगा…
   उसे ऐसे अकेले छोड़कर समर ऊपर नहीं जा सका …

लेकिन क्या शोवन को अपने कमरे में ले जाया जा  सकता है.. ? लेकिन उसके लिए पिया से इजाजत लेना जरूरी होगा…!

वैसे तो समर ने शोवन को देखते हुए मन ही मन एक निर्णय और ले लिया था… वह सोचने लगा था कि लीगल तरीके से अब उसे और पिया को शोवन को गोद ले लेना चाहिए क्योंकि यही शोवन के भविष्य के लिए भी सही होगा और उसके और पिया के रिश्ते के लिए भी…

लेकिन इस सब में सबसे पहले उसे पिया से बात करनी पड़ेगी और उसके मन की गलतफहमी दूर करनी पड़ेगी… अब चाहे कुछ भी हो जाए, पिया सुनाना चाहे या ना चाहे लेकिन उसे पिया को सारी सच्चाई बतानी ही पड़ेगी…

समर ऊपर खड़ी पिया को देख रहा था और पिया भी अपलक समर को ही देख रही थी….
   लेकिन दोनों के दिलों में चलता द्वंद एक दूसरे को और एक दूसरे की तकलीफ को नहीं समझ पा रहा था…
कुछ देर समर को देखते रहने के बाद पिया वापस मुड़कर अपने कमरे में चली गई…

बिस्तर पर लेट कर वह भी करवटें बदलती रही और नीचे सोफे पर बैठा समर भी रात भर उनींदी आंखों से जागता रहा…..

******

पुलिस थाने का काम यथावत चल रहा था…
अनिर्वान के आने के बाद से उस ऑफिस में भी हर काम का एक कायदा हो गया था… वहां के कैदी ही नहीं पूरा स्टाफ भी अनिर्वान के नाम से ही थरथर कांपने लगा था…
सभी जानते थे कि वह पूरी इमानदारी से अपना काम करता था लेकिन उसकी इमानदारी की सनक ऐसी थी कि उसमें वह अगर सामने वाले की गलती है तो उसकी गलती की ऐसी अनोखी और निराली सजा देता था कि सामने वाला उस गलती को क्या किसी भी गलती को करना भूल जाए….

अनिर्वान अपने केबिन में बैठा  मेडिकल कॉलेज में मरी पाई गई लड़की अदिति की केस फाइल देख रहा था कि तभी बाहर से बाबूराव भागता हुआ उसके केबिन में चला आया…

” साहब ! बाहर  कुछ लोग आ कर हल्ला मचा रहे हैं..?

” ऐसा क्या हो गया बाबू राव..? हम कोई सरकार तो है नहीं कि महंगाई के खिलाफ हमारे थाने के बाहर बैठकर ये लोग हल्ला मचाए… है कौन यह छछूंदर लोग… चलो देखते हैं.. !भेज दो केबिन में..!”

“जी हुजूर !”

बाबूराव  वहां से बाहर निकला और अपने साथ लगभग सात आठ लोगों को साथ लेकर अनिर्वान के केबिन में दाखिल हो गया…

वह लोग एक दूसरे को इस तरह घूरते हुए अनिर्वाण के केबिन में दाखिल हुए… उन्हें देख कर ही समझ में आ रहा था कि यह 2 परिवार हैं जो आपस में बैर पाले हुए हैं….

” क्या बात है भाई..? यह कौरव पांडव क्यों बने हुए हो?   मसला क्या है आखिर..?”

उनमें से एक लड़का अनिर्वान के ठीक सामने की कुर्सी खींच कर बैठ गया और अनिर्वान उसे ध्यान से  देखने लगा…

” साहब बात यह है कि इस जलील कमीने बुड्ढे का लड़का इनकी बेटी को भगा कर ले गया है …!”

अनिर्वाण ने एक नजर उस आदमी की तरफ देखा जिस पर इस लड़के ने इल्जाम लगाया था…
वह आदमी भी गुस्से में उस लड़के को ही घूर रहा था..
अनिर्वान ने पलटकर उस आदमी को देखा जिसकी बेटी को भगा कर ले जाया गया था, उनका भी चेहरा तमतमाया हुआ था और दोनों ही पक्ष एक दूसरे को घूर घूर कर ऐसे देख रहे थे जैसे आंखों से ही एक दूजे को भस्म कर देंगे…
    अनिर्वान ने सामने बैठे उस लड़के की तरफ देखा और थोड़ा आगे बढ़ कर उसकी कॉलर पकड़कर अपनी टेबल पर उसे आधा खींच लिया…
    टेबल की किनारी से उस लड़के के सीने से लेकर पेट तक इतनी जोर से लगा कि वह लड़का कलबलाकर चीख उठा…

” तू बड़ा चौधरी बन रहा है…! तू है कौन..? और ये तेरा कायदा है किसी बुज़ुर्ग से बात करने का.. हैं.. ? “

” अरे सर मेरी कोई गलती नहीं है… मैं.. यानी.. मैं इनका भतीजा हूं.. लड़की मेरी चचेरी बहन है..!”

” तो तेरे पेट में इतनी जोर से दर्द क्यों हो रहा है..? तेरी बेटी थोड़ी है..?”

” साब कैसी बात कर रहे हो आप.. ? बहन तो है मेरी..?”

” तो बहन का ख्याल रखना चाहिए था ना..?”

” पूरा ख्याल रखा था साहब.. ! नजर भी रखी हुई थी लेकिन उसे इस ननजतिया से शादी जो करनी थी, पता नहीं कब इनका घसियारा लड़का हमारी बहन को ले उड़ा..?”

” इस हिसाब से तो लड़का बड़ा स्मार्ट निकला,  क्योंकि तुम 6-7 आदमी मिलकर भी उस लड़की पर नजर नहीं रख पाए !  वह तुम सब की आंखों में धूल झोंक कर उसके साथ निकल भी गई !
     बाबूराव यह तो वही बात हो गई कि लड़का ट्रैक्टर में बैठकर खेती कर गया और यह लोग खेत में खड़े कौव्वें उड़ाते रह गए….
   सही कहा ना बाबूराव..!”

” जी साहब!”

” तो हमारी बात पर ताली बजाओ यार..!”

” जी” धीरे से मुस्कुरा कर बाबुराव ताली बजाने लगा और वहां मौजूद सारे लोग घूर कर बाबुराव की तरफ देखने लगे…
वह लड़का एक बार फिर  जोर जोर से उड़ने लगा..

” साहब यह कोई छोटी मोटी बात नहीं है और ना ही कोई हंसी मजाक की बात है..! हम दोनों परिवार एक ही गांव के रहने वाले हैं!  पहली बात तो हमारे यहां एक ही गांव के लड़का लड़की एक दूसरे से शादी ब्याह नहीं करते, क्योंकि गांव के सारे लोग आपस में भाई बहन हो जाते हैं… !
दूसरी बात इनकी और हमारी जात में भी फरक है.. यह लो हम से नीचे पायदान पर आते हैं.. इनके यहां हम लड़की नहीं देते..!”

” साले सूअर हम नीची जात में आते हैं..हम… ?  ठाकुर कब से नीची जात हो गये बे..! यहां से बाहर निकलोगे ना बाहर तलवारे बिछ जाएंगी तुम्हारे नाम की..! याद रखियो.. !”

अबकी बार लड़के वालों की तरफ से एक लड़का तेज़ी से अपनी आवाज बुलंद कर उठा…

” आपकी तारीफ..?”

उसकी तरफ देखकर अनिर्वाण ने अपना सवाल उसी पर दाग दिया और वह उतनी ही तेजी से आगे बढ़कर टेबल पर अपना हाथ मारते हुए जोर से जवाब देने लगा…

” लड़के के बड़े भाई हैं हम..! और यह जो बिना बात की बात का हमारे भाई के ऊपर इल्जाम लगा रहा  है ना वह सरासर गलत है ! इनकी बहन के चरित्र में ही खोट था !उसकी तो आदत ही है लड़कों को अपने जलवे दिखा दिखा कर रिझाने की ! हमारा भाई बेवकूफ था जो उसकी अदाओं के फेर में आ गया…
और वैसे एक बात साफ-साफ हम बता दें कि हमारे भाई ने इनकी बहन को नहीं भगाया बल्कि इनकी बहन आई थी बाइक लेकर हमारे भाई को वह भगा कर लेकर गई है…
कलुवा ने साफ साफ देखा है…

” अरे वाह यह तो बहुत अच्छी बात है तुम्हारे कलुआ को बहुत साफ साफ दिखाई देता है!
     जरा उसे बुलाकर लाना..! वैसे बाबूराव किसी मूवी से भी ज्यादा इंटरेस्टिंग लग रही है मुझे, इन दोनों परिवारों की लव ईशटोरी…!
    हां तो आप लोग कह रहे थे,कि आप ठाकुर हैं तो आप कौन हैं..?”

अबकी बार अनिर्वान ने लड़की वालों की तरफ देखकर पूछा और उनमें से वही लड़का वापस फुदकने  लगा…

”  साहब हम प्रतिहार राजपूत हैं और यह लोग ठाकुर है…  !”

” बाबूराव हमें तो लगता था ठाकुर और राजपूत एक ही होते हैं लेकिन यह लोग तो इनमें भी अंतर कर दे रहे है…

” अंतर होता है साहब बहुत अंतर होता है…

वह लड़का वापस बोलना शुरू कर ही रहा था कि अनिर्वान ने अपनी गन निकाल कर उसके मुंह को खोलकर उसमें अपनी गन घुसा दी…

“अब बोलो बेटा कौन हो.. ?”

वो आँखे फाड़े अनिर्वान को देखने लगा..

” बहुत बोल रहा है ये बाबूराव… और हमें हमसे ज्यादा कोई बोलने लगे ये पसंद नहीं आता… है ना बाबूराव.. !

“जी हुज़ूर.. !

“तो क्या करें.. ? गोली मार दें इसे.. ?”

“हुज़ूर.. लेकिन थाने में ऐसी गोली मारेंगे तो हम पुलिस वालों पर ऊँगली उठने लगेगी हुज़ूर .. !”

“हम पर ऊँगली उठाने की हिम्मत कौन करेगा बाबूराव.. !”

बाबूराव ने वहाँ खड़े सभी की तरफ इशारा कर दिया…
उसी बीच अनिर्वान ने आपने मोबाइल से किसी से बात की और फ़ोन रख कर वापस मुस्कुराने लगा…

“ये लोग.. ? ये हम पर ऊँगली उठा सकते हैं क्या बाबूराव.. ?”

“जी हुज़ूर.. !”

“तो लाओ फिर.. ! हमारी स्पेशल ऊँगली काटने वाली छुरी लें आओ और चौक पर बैठने वाले चौरसिया के समोसे की गर्म कड़ाही भी लें आओ..
  आज इन सब की उँगलियाँ काट कर तल डालूंगा और समोसे के साथ मिर्ची की जगह वही खा लूंगा… बाबूराव साथ दोगे ना खाने में.. !”

वहां खड़े सारे लोग एक दूसरे को देखने लगे…उन  सबकी नजर में यह सामने बैठा सनकी पुलिसवाला एक नंबर का बदतमीज और बददिमाग था… !

एक बार फिर लड़की का चचेरा भाई दहाड़ने को था  की तभी उसे कुछ देर पहलें का अनिर्वान का गन कांड याद आ गया और वह बोलते बोलते रह गया…

उसे बोलने के प्रयास में मुंह खोलकर फिर चुप होते देखकर अनिर्वान को हंसी आ गई…

” बोलो बोलो !!अब आराम से बोलो ! उस समय क्या है तुम कुछ ज्यादा ही राजपूत ठाकुर छत्रिय टाइप की बातें करने लगे थे ना, जो पसंद नहीं आ रही थी….
    बस इसीलिए चुप करवाने के लिए गन घुसेड़नी पड़ गई थी मुंह में…!”

वो लड़का अब भी लड़के के तरफ वालों की बुराई गाना चाहता था, लेकिन कुछ कह नहीं पा रहा था..

“बोलो ना.. बोल क्यूँ नहीं रहें… मैं और बाबूराव तरस रहें हैं तुम्हारी मीठी मीठी गलियां सुनने के लिए, और तुम हो कि अपनी गाली की दुकान बंद किये बैठे हो.. ऐस कैसे चलेगा… उहुँ… ना ना…. नहीं चलेगा
.चलो बोलना शुरू करो… !”

लड़के को अब अनिर्वान को देखकर डर लगने लगा था लेकिन साथ ही उसके अंदर लड़के वालों की तरफ बदले की भावना भी भड़क रही थी..
उसने चेहरा नीचे झुका लिया और धीरे-धीरे बोलने लगा…
” हम तो ठीक ही कह रहें है साहब!  हम प्रतिहार राजपूत हैं और यह लोग सामान्य ठाकुर !
   हम लोगों से नीचे आते हैं यह लोग, और ऐसे में हमारे घर की लड़की इनके घर नहीं रह सकती,  क्योंकि हमारे यहां लड़कियां ससुरालियों के पैर छूती  हैं.. अपने से नीचे ठाकुरों के पैर हमारे घर की लड़की कैसे…  !”

    वो अपनी बात कह पाता उसके पहले ही लड़के का भाई भी जोर से टेबल पर हाथ पटक कर अनर्गल प्रलाप सा करने लगा…

कुछ देर तक अनिर्वान उन दोनों लड़कों की तरफ बड़े ध्यान से देखता रहा, और उसके बाद बाबूराव की लाइ छुरी से उसने उन दोनों लड़कों की उंगलियों पर एक-एक कट लगा दिया..
   दोनों ही दर्द से बिलबिला कर चीख पड़े ! उनके साथ आए उनके पिता और बाकि आदमी भी घूर कर अनिर्वान की तरफ देखने लगे..
अनिर्वान ने उन दोनों की उंगली से अपने सामने की टेबल पर खून की बूंदे गिराई और उन दोनों खून को आपस में अपनी ऊँगली से मिला दिया…

” अब तुम दोनों इसमें से अपना अपना खून पहचान कर अलग कर लो…!”

दोनों आश्चर्य से अनिर्वान की तरफ देखने लगे तभी अनिर्वान ने बाबूराव को आवाज दी….

” बाबूराव जाओ… वह दोनों बाहर पहुंच गए हैं क्या . ? .. उन्हें अंदर लेकर आ जाओ..!”

अनिर्वान की यह बात सुनकर वहां बैठे सारे लोगों कि नजर  केबिन के दरवाजे की तरफ मुड़ गए और बाबूराव उन सबको आश्चर्य में डूबा एक केबिन से बाहर उन दोनों को लेने के लिए निकल पड़ा….

थाने के बहुत पास में एक बहुत पुरानी सी ऑडियो कैसेट की दुकान थी… जब से ऑडियो कैसेट का जमाना गया यह दुकान भी एक तरह से जाने जाने को थी लेकिन बूढ़ा दुकानदार आज भी अपने गुजरे वक्त को पकड़कर ही बैठा था…
     वह फिर अपनी दुकान पर पुरानी कविताओं और फिल्मी गीतों की कैसेट बेचा और बजाया करता था…

इस वक्त वही पुराना कैसेट जांच रहा था और उसी जांच पट्टी में उसने कर्ण के ऊपर लिखी एक कविता का कैसेट चला दिया उसकी पंक्तियां खिड़की से होकर वहां मौजूद सभी के कानों तक पहुंच गई….

अनिर्वान भी कर्ण के ऊपर लिखी इस कविता को सुनते हुए मुस्कुराने लगा….

तु गर्व था तु दर्प था
तु शौर्य था तु सर्व था
अनादि था अनंत था
कठिन महा सुमंत था……

तू मैत्री का उल्लास था ,तू प्रीत की सुवास था।
हरा जिसे ना पा सके ,वो शत्रुओं का त्रास था…..

क्रमशः

aparna…
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