
जीवनसाथी -2 भाग -56
राजा ने मुस्कुरा कर बाँसुरी का माथा चूम लिया…
“अब थोड़ी देर आराम कर लो… शाम को हमें वापस महल के लिए निकलना है… !”
“हम आज शाम निकल जायेंगे ?”
बाँसुरी चहक उठी और राजा के हाँ में सर हिलाते ही वो आगे बढ़ कर राजा से लिपट गयी..
उसके सर पर हाथ फेरते हुए राजा जाने के इंतज़ाम के बारे में जानने प्रेम को फ़ोन लगाने लगा…
अस्पताल में सभी की व्यस्तता अपने चरम पर थी.. आखिर राजा साहब की पत्नी को डिस्चार्ज किया जाना था.. अस्पताल की तरफ से बिना किसी देर बिना किसी कोताही के सारी तैयारियाँ कर दी गयीं थी…
आखिर वो समय भी आ गया जब बाँसुरी को अस्पताल से छुट्टी दें दी गयी.. !
उसके लिए व्हील चेयर लायी गयी लेकिन उसने इशारे से मना कर दिया…
“मै खुद अपने पैरों पर चल लूंगी डॉक्टर ! अब इसकी ज़रूरत नहीं है !”
रानी हुकुम के निर्णय को काटने की किसकी हिम्मत थी.. सभी मुस्कुरा कर चुप रह गए… !
कमरे में सिर्फ राजा और एक नर्स और एक डॉक्टर को छोड़ कर बाकी लोग बाहर निकल गए..
नर्स की मदद से तैयार हो कर बाँसुरी भी निकलने को आगे बढ़ी की राजा ने आगे बढ़ कर उसकी बांह थाम ली…
राजा की बाँहों को थामे वो आगे बढ़ गयी….
कुछ कदम आगे बढ़ने के साथ ही बाँसुरी को अचानक कुछ याद आया और उसने राजा के कान में धीरे से कुछ कहा… राजा ने तुरंत मुस्कुरा कर अपनी जेब से कुछ पैसे निकाल कर उसके हाथ में धर दिये…
बाँसुरी ने राजा को आगे बढ़ने कह कर खुद अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी…..
राजा का उसी समय फ़ोन घनघना उठा और उसने फ़ोन उठा लिया…
बाँसुरी अपने कमरे को रोज़ साफ करने वाली लड़की को अलग से कुछ पैसे देने गयी थी… पैसे पकड़ा कर कुछ देर में ही बाँसुरी वापस लौट आई…
और राजा साहब के साथ चलते हुए गाड़ी तक चली गयी…
राजा साहब का पर्सनल जेट उन सबका इंतज़ार कर रहा था… उन सबके बैठते ही फ़्लाइट ने महल के लिए उड़न भर ली…..
वहीँ दूर खड़े वासुकी ने राजा के साथ जाती बाँसुरी को एक नज़र देखा और कुछ पलों के लिए अपनी पलकें बंद कर ली…
उसके साथ ही खड़े दर्श ने उसकी तरफ देखा…
“अब हमें भी चलना चाहिए वासुकी… ! “
“हम्म !”
“इन्हे किस कोठी में लें कर जाना है.. ?”
“फ़िलहाल पहाड़ी वाली पर.. ! तू जा, मै आता हूँ.. !”
वासुकी अपनी गाड़ी में बैठा खंडवाल के आउटहाउस की तरफ निकल गया…. उसके मन में जाने क्यों रह रह कर ये अंदेशा आ रहा था कि खंडवाल की गैंग में कोई शेखावत का आदमी मौजूद है… !
और बस यहीं जानने के लिए वो वहाँ से खंडवाल के घर की तरफ निकल गया…
वो खंडवाल के आउट हॉउस में पहुंचा तब तक वो लोग शेखावत की बॉडी को वहाँ से हटा चुके थे…
वो सीधे खंडवाल के ऑफ़िस में दाखिल हो गया..
“आओ आओ, इस वक्त कैसे आना हुआ वासुकी.. ?”
“शेखावत का क्या किया.. ?”
“उसके बेटे का फ़ोन आया था, अपने पिता के बारे में पूछताछ करने लगा था.. तो हड़बड़ी में मैंने कह दिया कि फ़िलहाल उसके पिता यहाँ नहीं है और कहीं बाहर गए है… अब थोड़ी देर में उसे फ़ोन कर के बता दूंगा कि उसके पिता की गाड़ी खाई में गिर गयी..
उसकी बात आधे में ही काट कर वासुकी चीख उठा…
“उसके बेटे का पहली बार फ़ोन आया था या पहले भी आया करता था… ?”
“बहुत पहले कभी आया रहा होगा… अभी तो बहुत दिन बाद ही आया.. !”
यहीं जानने वासुकी आया था…
“शेखावत के लड़के का कोई आदमी तुम्हारी गैंग में शामिल है खंडवाल.. उसका पता करो और उसे गैंग से तुरंत बाहर करो.. !”
खंडवाल से ये सारी बातचीत वासुकी उसके गुर्गों के सामने ही कर रहा था.. ये कुछ चुने हुए गुंडे थे जो अक्सर खंडवाल के आसपास ही रहा करते थे…
उन्हीं में वो लड़का भी मौजूद था…
उसने सुनील को वीडियो भेजने के बाद अब तक वीडियो डिलीट नहीं किया था… असल में उस दिन वीडियो बना कर जल्दी जल्दी भेजने के बाद उसने मोबाइल छुपा लिया था और उसके बाद वो खुद खंडवाल के आदेश का पालन करने में लग गया था..
इसी सब में उसके ध्यान से वीडियो डिलीट करना रह गया था और अभी वासुकी की बात सुनते ही उसके दिल में धुकधुकी सी मच गयी…
वो लड़का दिल का बहुत कच्चा था… गुंडों वाली दिलेरी अब भी उसमे नहीं थी, और इसलिए उसे डरा धमका कर सुनील यहाँ भेज पाया था !
उस लड़के को सुनील या शेखावत से भी कोई खास लेना देना नहीं था… बड़ा बेमुरव्वत किस्म का लड़का था, जो सिर्फ पैसो या गन की भाषा समझता था !
वो धीमे कदमो से पीछे से होकर वहाँ से निकल गया.. सर नीचे किये वो पिछले दरवाज़े की तरफ बढ़ रहा था ,कि वासुकी की तेज़ आवाज़ उसके कानो से टकराई…
“हे तुम.. ! चुपचाप जहाँ हो वहीँ खड़े रहो.. !”
वासुकी की आवाज़ सुन वो पसीने से भीग गया.. और जहाँ था वहीँ खड़ा रह गया…..
कुछ देर में ही वासुकी की तेज़ आवाज़ वापस उसके कान से टकराई…
“शेखावत के बारे में क्या क्या जानते हो.. उसके घर, उसके परिवार के बारे में.. ?
डर के मारे इस लड़के की ऑंख बंद हो चुकी थी.. उसने जवाब देने के लिए धीमे से ऑंख खोली लेकिन अपने आसपास वासुकी को ना देख कर वो आश्चर्य चकित हो गया… अपने आप को संभालते हुए उसने धीरे से पीछे पलट कर देखा, वासुकी किसी और लड़के के पास खड़ा उसका मोबाइल देख रहा था….
चैन की साँस भर कर वो लड़का दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गया….
बहार निकलते ही उसने लम्बी लम्बी साँसे ली और अपने मोबाइल को जेब से निकाल कर उसमे से वीडियो को खोल कर डिलीट करने जा रहा था कि उसके हाथ से किसी ने मोबाइल छीन लिया…
उस लड़के ने आश्चर्यमिश्रित भय से पलट कर देखा और डर के मारे उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी…..
“वासुकी !”
” हाँ वासुकी… ज़हरीला सांप ! और मेरा डंसा पानी भी नहीं मांगता !”
वासुकी ने फ़ोन छीन कर उस पर चलते वीडियो को देखा और घूर कर उस लड़के को एक तमाचा लगा दिया….
वो लड़का घूम कर एक चक्कर मार कर ज़मीन पर गिर गया… उसके कानों में सन्नन्न्न्न की आवाज़ सुनाई पड़ने लगी.. अपने कान को हाथ से हिलाता हुआ वो ऑंखें फाड़े वासुकी को देखने लगा…
इसके बाद वासुकी के बिना पूछे ही उस लड़के ने सारी बातें बता दी… सुनील विदेश में बैठा यहाँ क्या क्या कारनामे कर रहा है सुनने के साथ वासुकी ने ऊपर एक नज़र आसमान पर डाली और वापस उस लड़के की तरफ देखने लगा….
वो लड़का वासुकी को आगे बताने लगा….
“सुनील ने ही खंडवाल के इरादों पर नज़र रखने के लिए मुझे यहाँ भेजा था… मै खंडवाल के सारे कारनामे उसे बताया करता था और आज उसके पिता के मर्डर का वीडियो भी भेज दिया.. !
“सुनील वहाँ बैठे बैठे यहाँ का कौन सा काम देख रहा है.. ? उसका कारोबार तो वहीँ फ़ैला हुआ है ना.. !”
उस लड़के ने ना में गर्दन हिला दी..
” वो वही बैठे शेखावत का सारा काम हैंडल करता है.. फ़र्ज़ी पासपोर्ट से लोगों को विदेश भेजना हो या, यहाँ की करंसी का विदेशी हेर फेर करना हो, वो सब कुछ वहाँ से ऑपरेट कर लेता है… यहाँ तक की यहाँ मेडिकल सीट्स में जो हेराफेरी होती आ रही है उसका मास्टरमइंड भी सुनील ही है…
वो वहाँ बैठे ही यहाँ के रईसों से मेडिकल सीट्स के बदले मोटा पैसा लेता है और होशियार बच्चों कि खेप को कुछ पैसों के बदले उन रईसज़ादों के बदले इम्तिहान दिलवा कर पास करवाता है.. कुछ बच्चे तो अब बस इसे ही धंधा बना बैठे है.. हर साल बस अलग अलग एडमिट कार्ड से एग्जाम देते है और दूसरे बच्चो को सेलेक्ट करवाते है.. कुछ एक मेडिकल के बच्चे भी इस सबमें शामिल है…
इन सभी बच्चो को भी उनका हिस्सा मिलता है…
लेकिन अभी कुछ समय पहले मायानगरी मेडिकल कि एक लड़की इसी सब में मारी गयी है…..
उसके मारे जाने में शेखावत साहब का हाथ था.. और बस इसी लिए सुनील चाहता था कि यहाँ से सब कुछ छोड़ कर उसका बाप भी उसके पास पहुँच जाये…
ये मेडिकल वाला मामला ठंडा पड़ते ही वो लोग वापस अपना काम शुरू कर देंगे..
“कहाँ कि लड़की मारी गयी.. नाम क्या था उसका.. ?”
“मायानगरी मेडिकल कॉलेज की अदिती शर्मा ! वो भी फ़र्ज़ी मेडिकल कांड में इन्वॉल्व थी… और बस उसी सब में मारी गयी.. !”
“तो मतलब इन सब में शेखावत इन्वॉल्व था.. ?”
“हाँ उसे सब मालूम था… पैसे का सारा लेनदेन उसी के पास से हुआ करता था.. सारी इंडियन करेंसी को वो बिट में बदल कर अपने बेटे के अकाउंट में डाल दिया करता था…. “
“और कौन कौन है इसके पीछे… ?”
“वही के एक विधायक का नाम भी आ रहा है, कोई सभरवाल है.. ! उस लड़की के मरने के बाद और बवाल हो गया था…!
यूनिवर्सिटी राजा अजातशत्रु की है ना, इनके डर के मारे वहाँ की पुलिस भी हरकत में आ गयी थी! यूनिवर्सिटी का स्टाफ और पुलिस मिल कर मामले की तहकीकात कर रहें थे, जिसमे यूनिवर्सिटी के दो स्टूडेंट्स ने उनका साथ दिया.. एक कोई मेडिकल वाली लड़की थी और एक शायद इंजीनियरिंग का लड़का था…
इन दोनों की मदद से वहाँ के लोकल लोग जो इस रैकेट में शामिल थे, पकडे गए थे…
हालाँकि उन लोगों ने शेखावत या सुनील सर किसी का भी नाम नहीं लिया लेकिन इन सब बातों से शेखावत साहब चिढ गए थे और उन्होने गुस्से में सभरवाल को फ़ोन कर के ख़ूब जली कटी सुनाई, और कहा कि उन विद्यार्थियों कि असल अर्थी निकलनी चाहिये वरना वो सभरवाल को अगले चुनाव तक पार्टी से बाहर निकलवा देंगे… !”
“फिर… ?”
“बस इतना ही मालूम है… शायद सभरवाल उन बच्चो कि जान लेना चाहता होगा जिससे वो खुद बच सके.. हालाँकि सभरवाल ने शेखावत को इस बात के लिए मनाने की बहुत कोशिश की, कि उन बच्चो का डायरेक्ट इस सब से कोई लेना देना नहीं है तो उन लोगो को मारने से क्या फायदा, लेकिन शेखावत से भी खतरनाक उसका बेटा उन लोगो कि मरने कि खबर सुनने को आतुर बैठा है.. !”
वासुकी कुछ सोचते हुए उस लड़के को कॉलर से पकड़ कर पीछे खंडवाल के आदमियों के पास धकेलते हुए बाहर निकल गया…
अब तक में दर्श भी वहाँ पहुँच चुका था… वासुकी ने उसे अपना कुछ समान लाने को कहा था, दर्श उस सारे सामान के साथ मौजूद था… !
बाहर दर्श उसका इंतज़ार कर रहा था….
गाड़ी में बैठते हुए वासुकी ने दर्श कि तरफ देखा.. और अपना हाथ बढ़ा दिया…
दर्श ने उसके हाथ में एक लिफाफा रख दिया… और गाड़ी आगे भगा दी…
वासुकी ने लिफाफा खोला उसमे उसका पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, और परिचय पत्र रखा था…..
वासुकी ने गाड़ी में पीछे पलट कर देखा उसका बैग और साथ ही कुछ ज़रूरी सामान भी रखा था..
“तू यहाँ संभाल लेना, मै जल्दी ही वापस आऊंगा.. !”
“यहाँ की टेंशन मत लेना.. मै और काका दोनों है यहाँ.. ! पर एक बात थी अनिर… ? तेरा जाना ज़रूरी है क्या.. ?”
“हाँ ज़रूरी है, एक वादा है जो निभाना है.. अपनी बात से मुकर जाऊं इतना कमज़ोर नहीं हूँ… !
“लेकिन वहाँ जाकर मैडम तक पहुंचना आसान रहेगा… ?”
“उन तक पहुँचने के लिए पहले उनके करीबियों तक पहुंचना पड़ेगा, उनसे दोस्ती बढ़ानी होगी.. और जब ये दोस्ती बढ़ जाएगी तब खुद ब खुद उन तक पहुँचने के सारे रास्ते खुल जायेंगे… !”
“अनिर….. अपनी जान को खतरे में क्यों डाल रहा है.. ? एक बार फिर सोच लें.. !”
“मेरी जान ही तो खतरे में है दोस्त… फिर मै कैसे सुकून से बैठूं… ?
जब तक उसके पीछे मौजूद लोगो को पकड़ नहीं लूंगा, चैन से नहीं बैठूंगा… ! एक बार ये सारा मसला सुलझ जाये फिर वापस अपने घर आ जाऊंगा…
अब मै भी इस उलझन भरी ज़िंदगी से थकने लगा हूँ…
पर दर्श मेरे यहाँ नहीं रहने पर तुझे पल भर के लिए भी घर छोड़ कर नहीं निकलना है.. सारा काम घर से ही करना.. तू समझ रहा है ना.. !”
“सब समझ रहा हूँ मेरे दोस्त.. ! तू अपना ध्यान रखना… !”
दर्श ने वासुकी को गाड़ी से उतारा और उसके साथ ही खुद भी उतर गया… वासुकी ने आगे बढ़ने के पहले दर्श को खींच कर अपने सीने से लगा लिया.. !
दर्श की आँखे भर आई.. -“अपना ख्याल रखना !” दर्श की बात सुन कर हाँ में गर्दन हिला कर वासुकी तेज़ कदमों से सामने खड़े चॉपर की तरफ बढ़ गया……
चॉपर में बैठने के बाद उसने एक नजर अपने प्राणप्रिय सखा पर डाली और आँखे मूंद कर सर सीट से टिका कर बैठ गया….
कुछ देर बाद वो अपने गंतव्य पर पहुँच चुका था….
वो उतरा और लम्बे लम्बे डग भरता सामने खड़ी जीप की तरफ बढ़ गया…..
जीप से उतर कर एक कॉन्स्टेबल ने उसे सैल्यूट ठोंका और उसके कांधे से उसका बैग उठा कर जीप की पिछली सीट पर डाल दिया…
” वेलकम भरद्वाज सर.. ! कहाँ चलना चाहेंगे.. सबसे पहले.. ?”
वासुकी ने जेब से एक पर्ची निकाल कर उस के सामने बढ़ा दी…
“मुझे इस रेस्टोरेंट के आसपास उतार कर तुम मेरा सामान मेरे फ्लैट पर छोड़ देना… !”
“साब थाने नहीं चलेंगे… !”
“थाने हम खुद आ जायेंगे.. लेकिन कल ! आज थकान है ज़रा सी ! “
हाँ में सर हिला कर उस अर्दली ने गाड़ी आगे बढ़ा दी…
वासुकी वहीँ उतर कर टहलते हुए उस रेस्टोरेंट में चलती पार्टी की तरफ बढ़ रहा था…उसे सुबह की बातचीत में शेखावत के गुर्गे ने यह भी बताया था कि आज रात बारबेक्यू नेशन में मायानगरी के उन्हीं विद्यार्थियों की पार्टी होनी है… वासुकी उन्ही लोगो से मिलने के उद्देश्य से आगे बढ़ रहा था कि उसके पीछे से दो लड़कों ने उस पर कपड़ा डाल कर उसे पकड़ने कि कोशिश की… और वासुकी ने खुद उन दोनों को पकड़ लिया.. गन की नोक में उन्हें अपने साथ अपने फ्लैट पर लेकर छोड़ने के बाद वो एक बार फिर शहर का चक्कर लगाने निकल गया…
अगले दिन उन्ही की बाइक में उन्हें अपने साथ थाने लें कर जाने के बाद उसने उनकी पिटाई करते हुए थाने में प्रवेश किया और थाने में मौजूद लोग उसे घूर कर देखने लगे…
उसने अपना कार्ड निकाल कर सामने खड़े कॉन्स्टेबल की तरफ बढ़ा दिया… उसने कार्ड पढ़ा और एक ज़ोर का सैल्यूट मार कर खड़ा रह गया…
कार्ड में उसका नाम लिखा था….
अनिर्वान भारद्वाज !…
क्रमशः
दिल से…..
और आज सस्पेंस खुल ही गया.. ! अब आप जीवनसाथी 2 का पहला एपिसोड याद करें और अनिर्वान की एंट्री याद करें…
याद आया…. अब आपके मन में उठेंगे कुछ सवाल जैसे….
• आप लोग सोचेंगे कि एक ही समय पर अनिर्वान और वासुकी कि कहानियाँ कैसे चल रही थी?
तो आपको बताना चाहती हूँ कि शुरू से ही कहानी में वासुकी वाला हिस्सा भूतकाल में चल रहा था….. और अनिर्वान वाला हिस्सा वर्तमान में चल रहा था…
समर पिया का कुछ हिस्सा भूतकाल में चल रहा था लेकिन कुछ हिस्से उनके वर्तमान के थे…
• आपका अगला सवाल होगा, अब कहानी किस ट्रैक पर है.. ?
अब कहानी पूरी तरह से वर्तमान में आ चुकी है.. और हाँ आपमें से कुछ एक दो लोगो ने ये बात पकड़ भी ली थी कि अनिरुद्ध और अनिर्वान एक ही है क्या..?
बाकी तो सबके लिए ये सरप्राइज़ ही था…
तो आज आप को मालूम चल गया कि अनिरुद्ध वासुकी ही अनिर्वान भरद्वाज है !
बाकी आपके जो doubts होंगे आप समीक्षा में पूछ लीजियेगा… मै समाधान करने की पूरी कोशिश करुँगी… और आप सभी से गुज़ारिश है समीक्षा ज़रूर लिखियेगा…
तब तक पढ़ते रहिये….
जीवनसाथी !!!
सीज़न -2
aparna…..
