जीवनसाथी- 2/47


जीवनसाथी -2 भाग -47

  
   नेहा के आवाज़ देते में वासुकी अंदर चला आया…..
उस वक्त हॉल में और कोई मौजूद नहीं था… काका  अपने कमरे में सोने जा चुके थे.. !
  दर्श भी नजर नहीं आ रहा था…. !
वासुकी जिस वक्त अंदर आया उसे नेहा भी कहीं नजर नहीं आई,  जबकि उसे आवाज़ नेहा ने ही दी थी, इसलिए ना चाहते हुए भी उसने एक बार चारों तरफ नजर दौड़ाई और फिर पानी लेने के बहाने एक बार रसोई में भी झांक लगा आया…
   लेकिन उसे उन तीनों में से कोई भी नजर नहीं आया…
मुख्य दरवाजे पर और बाहर गेट पर ताला डालने का काम काका का था, लेकिन आज वो नजर नहीं आ रहे थे ! इसलिए वासुकी ने ताला उठाया और दोनों जगह ताला डालकर  लंबे-लंबे कद भरता अपने कमरे की ओर चला गया…
    दरवाजे पर पहुंचकर उसने जैसे ही दरवाजा खोलना चाहा दरवाजा अंदर से बंद था…  झुंझलाकर उसने दरवाजे पर तेजी से दस्तक दे दी और 5 मिनट के भीतर ही दरवाजा खुल गया…

” क्या हो गया मिस्टर हस्बैंड जरा भी सबर नहीं है आपको…!”

नेहा दरवाजे के ठीक सामने खड़ी थी और वासुकी  उसके एक तरफ से होकर अंदर घुस गया… अंदर घुसते वक्त वासुकी की पूरी  कोशिश थी कि वह गलती से भी नेहा से छू न जाए और उसकी इस हरकत पर नेहा को और जोर से हंसी आ गई…
बिना नेहा की ओर देखे ही वासुकी ने उससे सवाल कर दिया…

” दरवाजा बंद करने की क्या जरूरत थी..?”

” मुझे कपड़े बदलने थे, इसलिए दरवाजा बंद किया था!”

वासुकी ने नेहा की तरफ देखे बिना ही अंदर जाकर अपनी अलमारी खोली और अपने लिए चादर तकिया निकालने लगा…

नेहा दरवाजा बंद करके वापस वासुकी की तरफ मुंह करके खड़ी हो गई और उसे घूरती रही…
बिना नेहा की तरफ देखे ही वासुकी ने खिड़की के पट बंद किए और एसी का रिमोट उठाकर एसी चला दिया…

” इस तरह मुझे घूर क्या रही हो.. ?”

” अरे वाह !! बिना मेरी तरफ देखे भी आपको पता चल जाता है कि, मैं आपको देख रही हूं.. !”

” बातें गोलमोल घुमाने की जगह बता दोगी तो ज्यादा सही रहेगा और वैसे मुझे नींद आ रही है, इसलिए मैं लाइट बंद करने जा रहा हूं… !”

” ठीक है बता देती हूं.. !
   दरवाजा अभी भी मैंने बंद किया है, क्योंकि मुझे अब भी कपड़े बदलने है.. ! लेकिन आप एकदम मेरे सामने मुंह करके लेटे हुए हैं… ऐसे में ऐसा लग रहा है जैसे आप मुझे इनवाइट कर रहे हैं.. !”

” पागल हो क्या..?
   इस कमरे में एक बाथरूम भी है !  तुम वहाँ  जाकर अपने कपड़े बदल सकती हो.. !”

” ना बाबा कभी नहीं.. !  मुझे अच्छे से पता है नीचे खाना खाने आने से पहले आपने इस बाथरूम में बाथ लिया था और आपको पानी वाइप  करके निकालना तो आता नहीं है…!
      इस रूम में आते ही मै बाथरूम में ही गई थी…. लेकिन पूरे फर्श पर पानी फैला हुआ है..
   मैंने वाइप  करके पानी निकालने की कोशिश तो की है बावजूद अब भी फर्श गीला ही है, और मैं अपने  50,000 के लहंगे को पानी में ऐसे गीला करके बर्बाद नहीं कर सकती.. समझे आप.. !”

” तुम मुझसे क्या चाहती हो..? कमरे से बाहर निकल जाऊं.. ?”

” नहीं बिल्कुल नहीं.. !  मैं तो चाहती हूं कपड़े बदलने में आप मेरी मदद कर दो.. !”

वासुकी ने घूरकर एक नजर नेहा को देखा, लेकिन वह उस वक्त खुले स्ट्रेट बालों में इतनी मासूम लग रही थी कि वासुकी की नजर बदल गयी..  और उसकी आंखों के बदलते रंग को नेहा ने भी पकड़ लिया..

” थोड़ी सी मदद कर दीजिए ना मिस्टर हस्बैंड.. !”

” अब इस बेवकूफी भरे काम में मेरी क्या मदद चाहिए तुम्हें.. ?”

” पहला तो कपड़े बदलना कोई बेवकूफी भरा काम नहीं है दूसरा आप मेरे डिअर हस्बैंड है…
आपके अलावा और किस की मदद लूंगी मैं…?
शादी इतनी जल्दी में हुई ना कि मुझे सब कुछ रेडीमेड लेना पड़ा.. ! यह जो ब्लाउज है, इसमें हुक पीछे लगे हुए है…  इतनी देर से अपने हाथ पीछे करके तरह-तरह के योगासन ट्राई किए लेकिन यह कमबख्त हुक नहीं खुल रहें !
      आप बस उतना कर दीजिए बाकी सब मैं कर लूंगी…. “

  गुस्से में एक गहरी सी फूँक छोड़कर वासुकी पलंग से वापस खड़ा हो गया और नेहा के पास चला आया…
नेहा मुस्कुराती हुई उसी की तरफ देख रही थी…
वासुकी ने उसके दोनों कंधो को पकड़ कर उसे दूसरी तरफ घुमाया और उसकी पीठ अपनी तरफ कर उसके हुक खोलने का प्रयास करने लगा..

“आउच… थोड़ा आराम से मिस्टर हस्बैंड.. !”

वासुकी नेहा की इस बात पर चौंक गया क्योंकि उसने ऐसा कुछ किया ही नहीं था की नेहा इतनी ज़ोर से चीखे…

”  तुम इतना ड्रामा क्यों करती हो..?”

” मजा आता है.. बहुत मजा..!  तुम बताओ कि तुम इतना गुस्सा क्यों करते हो..?”

” मेरी मर्जी..!”

”  वासुकी एक बात पूछूं…? नेहा पलटकर वासुकी के चेहरे के ठीक सामने आ गई.. उसने अपने दोनों हाथों में वासुकी का चेहरा थाम लिया और यही वह पल था जब वासुकी के चेहरे के करीब नेहा का चेहरा था… नेहा की साँसे वासुकी को अपने चेहरे पर  महसूस हो रही थी..

” क्या तुम्हें मैं बिल्कुल पसंद नहीं हूं..? जानती हूं मेरा यह सवाल ही बेमानी है..! मैं भी तो तुमसे उतना ही प्यार करती हूं जितना तुम किसी और से करते हो.. ! फिर मैं तुमसे यह सवाल ही क्यों कर रही हूं कि मैं तुम्हें पसंद हूं या नहीं?
    क्योंकि मैं जानती हूं कि, अब मेरी जिंदगी में तुम्हारी  जगह कोई नहीं ले सकता ! तुम्हें जानती हूं तुम्हारी जिंदगी में भी उसकी जगह कोई नहीं ले सकता ! लेकिन बस मेरी एक बात याद रखना.. मैं सच में तुमसे इतना प्यार करती हूं कि तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकती हूं, बस एक बार मुझे आवाज दे देना…!
तुम प्यार से नहीं भी कहोगे तब भी तुम्हारी बात मान जाऊंगी ! तुम अपने इसी रुखे सूखे  अंदाज में भी एक बार मेरा नाम पुकार लोगे ना, आखरी सांस तक तुम पर वार दूंगी वासुकी… आई लव यू…!
    बस एक रात के लिए बस आज के लिए मुझे अपनी दुल्हन सच में मान लो… !
    मैं जानती हूं मैं तुमसे बहुत बड़ी चीज मांग रही हूं, क्योंकि हम औरतें भले ही बिना प्यार के रिश्ते निभा लें,  लेकिन तुम आदमियों  के लिए यह बात बहुत मुश्किल होती है…!
पर प्लीज अगर हो सके तो अपने उस प्यार के लिए मेरे इस प्यार को पूरा कर दो……
     मेरी आज की रात सुहागन कर दो…!”

    नेहा का चेहरा, उसकी आंखें, उसके बाल, उसका इजहार, उसकी बातें, उसकी खुशबू,उसका अंदाज और बाकी माहौल का असर कुछ ऐसा था कि वासुकी ने आगे बढ़कर नेहा के भोले से चेहरे को अपने दोनों हाथों में ले लिया….

    अगर अनिरुद्ध वासुकी खुद बांसुरी के प्यार में ना होता तो शायद उसे नेहा के प्यार की भी कोई कदर ना होती, लेकिन अब उसे लगने लगा था नेहा का प्यार तो उसके प्यार पर भी भारी पड़ रहा था !
क्योंकि नेहा ने उसे बांसुरी के साथ अपनाया था ! नेहा ने कभी उसे बांसुरी को भूल जाने या उससे अलग हो जाने के लिए किसी तरह भी बाध्य नहीं किया, ना उसने कभी बांसुरी के लिए किसी तरह के  अपशब्द कहे…!

यहां तक कि जब वह खाने के बाद बाहर बगीचे में बैठा बांसुरी को देख रहा था, तब भी वह आम पत्नियों की तरह जल भून कर उसके पास आकर उसे खींचकर अंदर नहीं ले गयी,  बल्कि सुकून से अंदर बैठकर बांसुरी के अंदर जाने का इंतजार करती रही… और उसके अंदर जाने के बाद ही उसे आवाज लगाई…

यह जानते हुए भी कि वह कभी वासुकी के दिल में जगह नहीं बना पाएगी, क्यों उसके पीछे अपना जीवन बर्बाद कर रही है और सिर्फ जीवन बर्बाद नहीं कर रही बल्कि खुद आगे बढ़कर उसने कहा है कि वह अपनी जान देने को तैयार है…!
     आखिर कहीं ना कहीं वासुकी उस की इसी बात का तो फायदा उठा रहा था…

कुछ पलों के लिए वासुकी को खुद पर नाराजगी होने लगी कि क्यों वह एक भोली लड़की के भोलेपन का इस तरह फायदा उठा रहा है..?  क्या वह उसके प्यार के बदले उसकी मांगी हुई चीज भी नहीं दे सकता…?

वासुकी को नेहा के ऊपर तरस आने लगा…

नेहा का चेहरा उसके बहुत करीब था और उस चेहरे को, उसकी आंखों को देखते हुए वासुकी की भी धड़कन बढ़ने लगी थी…

ऐसा नहीं था कि वासुकी को इस वक्त नेहा के ऊपर सिर्फ तरस आ रहा था क्योंकि अगर सिर्फ तरस आता तो वह एक बार किसी तरह नेहा को समझा-बुझाकर अपने कदम पीछे खींच लेता, लेकिन आज की रात में शादी के बंधन में कुछ तो ऐसी बात थी जो वह उस साधारण सी लड़की की तरफ खींचा चला जा रहा था….
      नेहा के सर पर डला दुपट्टा वासुकी ने धीरे से खींच लिया और पास रखें टेबल पर डाल दिया…

धीरे से झुक कर उसने बहुत नजाकत से नेहा को अपनी गोद में उठा लिया और धीमे-धीमे कदमों से आगे बढ़ते हुए उसे अपने पलंग तक ले गया….
  
    ” नेहा तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ .. हो सकता है अगर तुमसे पहले मिला होता तो शायद मेरे कमरे के साथ साथ मेरे दिल पर भी तुम्हारा राज होता… ! मुझे खुद भी इस बात का अफ़सोस होता है कि मै क्यों उनसे मुहब्बत कर बैठा जिन्हे मै डिज़र्व तक नहीं करता.. लेकिन क्या करूँ नेहा,  मै बहुत मजबूर हूँ अपने दिल के हाथों.. !
   लेकिन तुम्हारी इतनी बेइंतहा मोहब्बत देख कर मुझे अपने आप पर नाराजगी होने लगी है कि, मैं तुम्हारे इस इतने सारे प्यार के बदले तुम्हें कुछ दे नहीं सकता मुझे माफ कर देना नेहा… !

   लेकिन एक प्रॉमिस करता हूं.. तुमसे इस जन्म प्यार कर पाऊँ या ना कर पाऊँ पर जब तक जिंदा रहूंगा तुम्हें कभी अकेला नहीं छोडूंगा…!”

वासुकी की बात सुनकर नेहा उसके गले से लग गई…..
    और नेहा से किए वादे को पूरा करने वासुकी  उसे अपने साथ प्यार के उस सतरंगी संसार में ले गया जहां पहुँचने के बाद नेहा खुद को भूल बैठी…
   आसमान पर खिला चाँद उनके प्यार का गवाह बन रहा था….

*****

     रात जाने किस वक्त समर बालकनी से थका हारा कमरे में लौटा और थक कर पलंग पर निढाल हो गया उसके आते तक में पिया भी गहरी नींद सो चुकी थी…
यह बात सच है कि दोनों ही दुखी थे, दोनों ही परेशान थे लेकिन यह भी बात सच थी कि दोनों अपनी अपनी परेशानियों से अकेले ही जूझ रहे थे…!
समर  चाहता तो रेवन से जुड़ी सारी बातें पिया को सिलसिलेवार बताकर उसके मन की उलझन दूर कर सकता था, लेकिन समर खुद इस वक्त रेवन से जुड़ी सारी सच्चाई जानने के लिए उत्सुक था…
       और दूसरी तरफ उसके मन में यह बात भी गहरे पैठी हुई थी कि पिया एक समझदार लड़की है और ऐसे कठिन समय में वह समर की हालत को समझ कर उसका साथ देगी…!

    दूसरी तरफ पिया यह सोच सोच कर परेशान थी कि समर ने आज तक उससे रेवन के बारे में कोई भी बात क्यों नहीं बताई…?
   वह बस एक बार समर के मुंह से यह सुनने के लिए तरस रही थी की रेवन और समर के बीच प्यार मोहब्बत वाले कोई बात नहीं थी और जो भी हुआ वह एक भूल थी लेकिन उसकी जगह समर कुछ और ही राग अलाप रहा था…!

दोनों के बीच गलतफहमी का एक छोटा सा गड्ढा बना था जो आपसी बातचीत ना होने के कारण खाई में बदलने को तैयार था…

सुबह समर की नींद खुली तो एक पल के लिए उसके दिल दिमाग से रात वाली बात निकल चुकी थी…
   उसने बड़े प्यार से अपना हाथ पलंग में अपने बाजू में लेटी  पिया की ओर बढ़ाया लेकिन वह जगह खाली थी..
समर चौक कर उठ बैठा.. कमरे में कहीं पर भी पिया मौजूद नहीं थी…
समर को एकदम से लगा कि कहीं पिया घर छोड़कर चली तो नहीं गई…
    रात तो उसने सिर्फ गुस्से में यह बात कह दी थी लेकिन दिल से वह बिल्कुल नहीं चाहता था कि पिया घर छोड़कर जाए..

लेकिन उसी वक्त बाथरूम का दरवाजा खोल कर पिया बाहर निकल आई…
     पिया को अपने कमरे में मौजूद देख समर ने एक राहत की सांस ली और चुपचाप पलंग से टेक लगाकर बैठ गया…

रात भर सोचते रहने के बाद अब उसके दिमाग से रेवन को लेकर जो चिंता थी वह काफी हद तक कम हो चुकी थी…
  उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वह रेवन से एक बार मिलने उसके शहर जरूर जाएगा… !
और  रेवन किस बच्चे के बारे में बात कर रही है वह सारी सच्चाई पता करके ही लौटेगा…!
इस बात को तय कर लेने के बाद अब समर के दिमाग से थोड़ा सा बोझ कम हुआ था और इसलिए वह  आराम से पिया को इधर से उधर घूमते देख रहा था… वह चाहता था कि किसी तरीके से फिलहाल पिया को मना ले…

लेकिन  पिया अलग ही मिट्टी की बनी थी…
    उसे बाकी औरतों की तरह रो धोकर लड़ झगड़ कर अपना गुस्सा निकाल कर अपना दिल हल्का नहीं करना था !  इसीलिए उसने समर पर ना तो बहुत जोर से चीख चिल्लाकर लांछन लगाए..
   ना रो धोकर अपना दिल हल्का किया…
बल्कि सब कुछ अपने दिल में जमा रख कर एक सर्द सी खामोशी की चादर अपने ऊपर लपेट ली…

     वो अब भी समर के साथ तो थी लेकिन नहीं के बराबर…

अपने बालों को समेट कर  उठाकर उसने पोनीटेल बांधी और टेबल पर पड़ा चश्मा आंखों में चढ़ा कर नीचे उतर गई…

समर ने उसे तैयार होते देखकर यह बात जरूर नोटिस की कि आज पिया ने ना तो बिंदी लगाई थी ना माथे में सिंदूर लगाया था..!  यहां तक कि अपने हाथों में पहनी  चूड़ियां भी उसने उतारकर ड्रेसिंग टेबल में रख दी थी…
   जिस दिन से शादी हुई थी उसी दिन से बड़े शौक से पायल अपने पैरों में पहन कर इधर-उधर छनकाती चलती  पिया ने आज गुस्से में शायद अपनी पायल भी निकाल कर फेंक दी थी…

एक गहरी सांस लेकर समर फ्रेश होने बाथरूम में चला गया…

नहाकर वो सीधा तैयार होकर ही नीचे चला आया… आज उसे महल थोड़ा जल्दी जाना था, क्योंकि उसे राजा साहब से अपने विदेश भ्रमण के बारे में बात करनी थी ! उसे इस वक्त इस बात का बेहद अफसोस हो रहा था कि आज ही शाम उसकी और राजा साहब की गुरुदेव से मिलने जाने की टिकट हों रखी थी… !

   गुरुदेव से मिलकर लौटते हुए रानी हुकुम  से मिलने जाना था और जहां से अपनी कुछ दिनों की छुट्टियों पर रानी हुकुम राजा साहब के साथ महल वापस लौटने वाली थी…!

    इतनी सारी तैयारियों के बीच अचानक उसे अपना जाना कैंसिल करना पड़ रहा था, और इसलिए समर मन ही मन दुखी भी था ! उसके लिए इस दुनिया में राजा साहब से बढ़कर कोई नहीं था ! अगर रेवन ने अपने जन्म मृत्यु का सवाल उसके सामने न लाकर  खड़ा किया होता तो वह बेशक राजा साहब के साथ गुरुदेव से मिलने जाता और वापस लौटने के बाद ही रेवन से मिलने निकलता, लेकिन रेवन  से हुई बातचीत के बाद उसे लगा 1 दिन की देरी भी रेवन से जुड़े कई सारे सवालों को निरुत्तरित छोड़ सकती है…
  और इसलिए उसका वहां जाना बेहद जरूरी हो गया था…!

अपने ख्यालों में खोया समर तैयार होकर नीचे पहुंच गया, उस वक्त उसकी माँ भी वही नीचे मौजूद थी….

समर तैयार होकर जैसे ही नीचे आया, डायनिंग पर सबके लिए नाश्ता परोसती पिया झट से रसोई में चली गयी…

  “पिया,  समर आ गया है.. इसका नाश्ता भी ले  आना.. !”

पिया की सास ने बाहर से आवाज़ लगायी और पिया एक प्लेट में नाश्ता लिए बाहर चली आई…
  समर के चेहरे पर हलके से राहत के भाव चलें आये…
  कि कम से कम पिया ने समझदारी दिखाते हुए माँ कि बात रख ली और घर में उसके बारे में किसी को बिना बतायें सबके सामने सामान्य बनी हुई है…
   उसने आगे बढ़ कर अपने हाथ नाश्ते की प्लेट पकड़ने को आगे बढ़ा दिये…
   पिया ने समर की तरफ देखें बिना ही प्लेट टेबल पर रखी और खुद खाने लगी…

उसे  ऐसा करते देख समर की माँ चौंक कर पिया को देखने लगी और उनसे अधिक समर चौंक गया…

“ये क्या पिया…? समर का नाश्ता नहीं लायी.. ?”

“अभी पूड़ियाँ उतर रही थी मम्मी जी.. सिर्फ दो ही पुड़ियाँ  कैसरोल में थी, और मुझे भी जल्दी से नाश्ता खत्म कर काम पर निकलना है.. !
इनका क्या है, ये तो अपनी मर्ज़ी के मालिक है… जब जो जी में आये कर सकते हैं.. इनसे कौन पूछेगा.. ? कौन सवाल करेगा..? लेकिन मै तो सरकारी नौकर हूँ.. वक्त पर नहीं पहुंची तो मेरे नाम का परचा घर पहुँच  जायेगा..
  मै खा कर जा रही हूँ.. आप अपने लाड़ले को नाश्ता करवा लीजियेगा… मै जानती हूँ, मेरी वजह से आपको कष्ट होगा, लेकिन ये भी जानती हूँ कि आप एक समझदार सास है… !

बात करते करते ही पिया ने अपना नाश्ता खत्म किया और प्लेट रसोई में डाल कर अपना बैग उठाये वहाँ से निकल गयी….. !

उसके पीछे ही समर भी बिना नाश्ता किए ही निकल गया ! पीछे से समर की मैं उसे नाश्ता करने के लिए आवाज लगाती रही, लेकिन उनकी बात बिना सुने ही गाड़ी की चाबियां उठाये  वह तेज कदमों से पिया के पीछे बाहर भाग गया…

” देखा आजकल की लड़कियों को..? कैसे नाच नचावे है अपने पति को..? बेचारा लड़का भूखा ही इसके पीछे चला गया… रे दो पुड़िया थी तो पहले पति को दे देनी थी ना !  वह जब तक खाता तब तक में अपने लिए निकाल लेती..
…  पर नहीं पहले खुद को खाना है, खुद की नौकरी देखनी है !  एक तो आजकल कि यह पढ़ी-लिखी लड़कियां वैसे ही नकचड़ी रहती हैं उस पर दो पैसे क्या कमा लेती हैं पूछो ही मत…? क्यों भाभी कुछ गलत कह दिया मैंने… ?”

समर की बुआ की बात सुन उसकी मां एक ठंडी सी  आह भरकर चुप रह गई…

” अरे ए लड़की.. एक कप चाय तो ले आ…  सर भारी हो रखा है..!”

    बुआ जी ने तीसरी कप चाय मंगवाई और चाय पीते हुए आराम से बैठ कर पिया, उसकी पढाई और उसकी नौकरी को वापस कोसने लगी…

पिया के पीछे भागते हुए समर ने  उसे आवाज दी लेकिन पिया ने उसकी आवाज अनसुनी करते हुए अपनी गाड़ी निकाली और आगे बढ़ने को थी कि समर ने आगे बढ़कर उसकी स्कूटी रोक ली…

” पिया रुको मैं तुम्हें अस्पताल छोड़ देता हूं…!”

” छोड़ तो उसी पल दिया आपने मुझे, जिस पल आपका पास्ट मेरे सामने आया..! कब और कहां तक छोड़ेंगे मुझे..?”

” पिया प्लीज मेरी बात तो सुनो..!”

” कहने सुनने के लिए अब कुछ भी बाकी नहीं रहा समर.. !”

” मैं बस यह बताना चाहता हूं कि मैं आज रात की फ्लाइट से नीदरलैंड जा रहा हूं… अगर तुम सारी सच्चाई जानना चाहती हो तो मेरे साथ चल सकती हो..?”

समर की इस बात को सुनकर पिया के पास विरोध करने के लिए कुछ भी बाकी नहीं बचा था !
  अगर समर वाकई गलत होता तो वह पिया को अपने साथ क्यों ले जाना चाहता…?
    कुछ तो ऐसी बात थी जो समर भी रेवन से मिले बिना पिया को नहीं बता पा रहा था…
हालांकि इस बात से पिया की नाराजगी कम तो नहीं हुई लेकिन उसने अपनी स्कूटी की चाबी निकाल कर वापस पर्स में डाल ली !  और चुपचाप जाकर  समर की गाड़ी का दरवाजा खोलकर सामने वाली सीट पर बैठ गई…
एक राहत की सांस लेकर समर भी ड्राइविंग सीट पर आ बैठा और उसने गाड़ी अस्पताल की तरफ भगा दी…

क्रमशः

aparna….

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