
जीवनसाथी – 2 भाग -55
एक जोर का गन शॉट हुआ…
जले हुए बारूद की महक सारी फिजाओं में घुलने लगी…. एक छोटी सी धुंए की पंक्ति सीधी ऊपर की तरफ बढ़ गई और वही खड़े बरगद के पेड़ पर शाम को लौट आए पक्षी इस गन की आवाज सुनकर भरभरा कर वहाँ से उड़ गए…….
बहुत धीमे से वासुकी की आँखे बंद होने लगी….
उधर अस्पताल में बाँसुरी ने धीरे से आँखे खोल दी….
बांसुरी के सामने बैठे राजा साहब उसे ही अपलक नेत्रों से देख रहे थे आंखें खोलते ही बांसुरी ने अपने आसपास देखना शुरू किया और अपने ठीक पास में बैठे राजा साहब को देखकर बांसुरी की आंखें इतनी पीड़ा में भी मुस्कुरा उठी…
उसका चेहरा, उसके हाथ इतनी मशीनों से घिरे हुए थे कि राजा साहब चाह कर भी अपनी प्राण प्रिय पत्नी का चेहरा अपने हाथों में थाम नहीं सकते थे…
लाचारगी से उन्होंने बांसुरी की तरफ देखा और बस देखते ही रह गए..
… दोनों की आंखें आपस में मिली और यूं लगा जैसे सदियों से तड़पते दो ह्रदय एक हो गए..
आंखों ही आंखों में सारी बातें सारे ताने उलाहने, रूठना मनाना सब कर लिया…
राजा अजातशत्रु जैसे विशाल विराटकाय व्यक्ति की आंखों में भी आंसू झिलमिलाने लगे..
और बांसुरी ने आंखों से ही ना रोने का इशारा कर दिया हालांकि बांसुरी की आंखें सतत बहती चली जा रही थी…
मौत के मुंह तक जाकर वापस लौटने वाले व्यक्ति को अपने जीवन का और भी ज्यादा मूल्य समझ में आने लगता है ! अपने जीवन से कहीं अधिक खुद से जुड़े लोगों की कीमत समझ में आने लगती है…!
वही बांसुरी जो अब तक अपने कैरियर अपनी शिक्षा दीक्षा को बहुत ज्यादा मायने देती थी आज इस दुर्घटना के बाद उसके लिए सारा महत्व अब उसके पति और बच्चे का ही रह गया, उसे एकाएक अचानक समझ में आ गया कि अगर वह अपने राजा साहब से दूर रहकर अपने कैरियर और व्यक्तित्व अलग से तराश भी रही है तो भी उसका कोई मोल नहीं…
इस दुर्घटना से उसे समझ में आ गया था कि जीवन में अगर प्रेम नहीं तो जीवन का कोई मोल नहीं….
बांसुरी की आंखें स्पष्ट रूप से राजा साहब से यही कह रही थी कि मुझे अपने साथ ले चलो…
राजा साहब भी बांसुरी की कही बातें समझ रहे थे…
बांसुरी की हथेली अपने हाथों में लिए राजा साहब बैठे बांसुरी को देख रहे थे और बांसुरी उन में खोई हुई थी कि तभी पीछे खड़े आदित्य ने उन दोनों का ध्यान भंग कर दिया…
” कैसी हैं आप भाभी सा?”
” बांसुरी में धीरे से पलकों को झपक कर ठीक हूं का इशारा कर दिया..
” ईश्वर आपको और आपके राजा साहब को बुरी नजर से बचा कर रखें… 2 दिन से आपके साहब ने पानी की एक बूंद तक नहीं पी है..!”
राजा ने परेशानी से पलटकर आदित्य को देखा जैसे उसे आँखों ही आँखों में डपट रहें हो कि इस वक्त ये सब बोलने कि क्या ज़रूरत है.. ?
तब तक बांसुरी ने राजा की हथेली जोर से दबा दी जिससे राजा आदित्य को यह बात कहने के लिए डाँट ना लगाएं…
बांसुरी का इस वक्त कुछ भी कह पाना कठिन हो रहा था….
लेकिन उसकी आंखें देखकर साफ समझ में आ रहा था कि राजा साहब के कुछ ना खाने पीने से उसे कितनी तकलीफ हो रही थी ! उसने आदित्य की तरफ देख कर इशारा किया और आदित्य तुरंत ही उसके इशारे को समझ कर मुस्कुराते हुए झुक कर उसे प्रणाम कर बाहर निकल गया…
बांसुरी को अब प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था.. कमरा काफी साफ सुथरा और बड़ा था..!
बाँसुरी की हालत अब पहले से स्थिर थी इसलिए उसके चेहरे पर लगी सारी पाइप्स और मशीन हटा दी गयी थी…
अंगूठे पर लगे पल्स ऑक्सीमीटर और बाँह पर लगी कैनुला के अलावा अब बाँसुरी बाकी मशीनों से रिहा हो चुकी थी…
नर्स ने कुछ देर को सबको बाहर भेज बाँसुरी को स्पंज भी कर के तैयार कर दिया था…
चेहरे पर ज़रूर अब भी कुछ घाव नज़र आ रहें थे…
माथे पर उभरे ज़ख्मों के अलावा गाल पर भी एक तिरछा सा कट लग गया था… लेकिन फिर भी बाँसुरी बाँसुरी ही थी…
उसने नर्स से कह कर राजा साहब को भीतर बुलाने के पहले आइना मांग कर खुद को देखा और जब संतुष्ट हो गयी तब राजा साहब को अंदर बुला लिया…..
बांसुरी के बैड के पास की कुर्सी पर राजा साहब बैठे थे ! वहीं साथ लगे लम्बे से अटेंडर बेड पर प्रेम बैठा था…
कुछ 10-15 मिनट में ही आदित्य तीनों के लिए ही नाश्ता और कॉफी लेकर वहां चला आया…..
राजा बाँसुरी की हथेली अपनी हथेली में लिए बैठा था…. और बाँसुरी अपलक उसे देख रही थी…
जैसे आज पहली बार उसे देख रही हो या आज के बाद ना देखने वाली हो…
वही हाल राजा का था…
आदित्य उनके पीछे खड़ा हल्के से खांस उठा..
“सॉरी आप लोगों को डिस्टर्ब किया.. ! लेकिन भाई अगर कुछ खा लेते तो… !
” सही कह रहा है आदित्य! साहब आप कुछ खा लीजिए!”
” बस तुम ठीक हो जाओ हुकुम ! उसके बाद तो खाना-पीना जिंदगी भर का है..!”
” ऐसे प्लीज इमोशनल मत कीजिए मुझे,… आप कुछ तो खा लीजिए..!”
” 2 दिन पहले तुमने जान निकाल दी थी मेरी… जानती हो यह 2 दिन कैसे मर मर के जिया हूं ! एक एक साँस ऐसे भारी पड़ रही थी जैसे उधार की हो, मुझे लग रहा था अगर तुम्हें कुछ हो गया तो, मैं भी नहीं बचूँगा और जाने फिर हमारे बेटे का क्या होगा..?”
” हमारे बेटे के लिए आप हैं.. मैं जानती हूं! और मैं यह भी जानती हूं कि जब तक आप मेरे पास है, मेरा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता..!”
” लेकिन जिस वक्त एक्सीडेंट हुआ उस वक्त तो मैं तुम्हारे पास नहीं था ना.. और इसलिए बस.. अब बहुत हुआ !
अब अब जो करना है जैसा करना है, तुम्हे मेरे साथ ही रहकर करना है..!”
बांसुरी ने धीमे से हां में गर्दन हिला दी…
उसे अब भी बात करने में कष्ट हो रहा था लेकिन वह जानती थी अगर वह बोलेगी नहीं तो राजा साहब यूं ही चुपचाप बैठे रहेंगे…
आदित्य ने धीरे से कॉफी का कप बांसुरी की तरफ बढ़ा दिया और बांसुरी ने उस कॉफ़ी कप को हाथ लगाते हुए राजा साहब की तरफ बढ़ा दिया……
” भाई अब तो पी लीजिए, भाभी सा दे रही हैं आपको.!”
” पी लीजिए साहब आप को मेरी कसम है..!”
इसके बाद कोई बात बाकी ना बची… बाँसुरी की कसम झूठी कर दें तो वो राजा कैसा.., ?
राजा ने कॉफ़ी का गरम प्याला अपने होंठो से लगा लिया… वहीँ पीछे बैठे प्रेम की तरफ झांक कर बाँसुरी ने देखा और इशारे से उसे अपने पास बुला लिया…
प्रेम भी धीमे से बाँसुरी के पास चला आया.. !
प्रेम और बांसुरी का रिश्ता भी निराला था… ! प्रेम भले ही राजा का सिक्योरिटी हेड था, बावजूद बांसुरी ने उसे हमेशा ही प्रेम भैया कहकर बुलाया और उसे भी पूरे हक से खुद को हुकुम या रानी साहिबा ना बुलाकर बांसुरी बुलाने को ही कहा…
प्रेम और बांसुरी का रिश्ता भले ही निरमा और राजा के कारण ही आपस में जुड़ा था, लेकिन एक गहराई वाला भाई बहन का प्यार इस रिश्ते को बाकी रिश्तो से अलग करता था !
बांसुरी जानती थी कि उसकी तकलीफ से प्रेम भी बेहद तकलीफ में पहुंच जाता है…!
” कैसी हो बाँसुरी.. ?”
” मैं ठीक हूं ! आप कैसे हैं प्रेम भैया..? और आप दोनों दोस्तों ने ही ये क्या हाल बना रखा है ? मुझे लगा था कि मैं नहीं रहूंगी तो आप मेरे साहब का ध्यान रखेंगे ! आपके भरोसे ही तो इन्हें छोड़कर इतनी दूर गई थी, और आपने खुद अपना हाल अजूबा बना रखा है.. अब आप से क्या उम्मीद करूं..?”
बाँसुरी बेहद कष्ट के साथ धीरे-धीरे बोल रही थी… प्रेम ने झुक कर उसके सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुरा कर खड़ा हो गया..
” हम सब ठीक हैं बस तुम अपना ख्याल रखो और इस वक्त थोड़ा कम बोलो..!”
बाँसुरी ने धीरे से हां में सर हिला दिया और आदित्य उसके पास पहुंच गया…
“इतने दिन बाद हम सब मिले है, इसलिए भाभी सा खुश है ना.. ?”
बाँसुरी धीमे से मुस्कुरा उठी…
राजा ने आदित्य की तरफ देखा और उसे अपने पास बुला लिया…
” मै एक बार डॉक्टर से बात करके आता हूं कि, क्या हम आज शाम तक बांसुरी को लेकर वापस जा सकते हैं..!”
” आप भाभी सा के साथ बैठे…
मेरे रहते आपको पूछताछ करने की क्या जरूरत है..? इसीलिए तो मै आया हूं यहां पर…!”
राजा मुस्कुराते हुए बांसुरी की तरफ देखने लगा कि तभी अचानक उसे समर का ध्यान आया…
” आदित्य !! समर से कुछ बात हुई तुम्हारी..?”
” जी हुई थी ! वह लोग महल पहुंचने वाले हैं..!”
” उसे बांसुरी के बारे में कुछ बताया तो नहीं..?
” नहीं!! उन्हें कुछ नहीं बताया है…! बल्कि उन्होंने मुझे काफी कुछ बताया है, जो मैं आप लोगों को बाद में बताऊंगा..!”
राजा ने हां में सिर हिलाया और वापस बांसुरी की तरफ मुड़ गया….
आदित्य मुस्कुराकर डॉक्टर से मिलने चला गया…
*****
शेखावत वासुकी से हद दर्ज़े की नफरत करता था.. उसे हमेशा ये लगा करता था कि वासुकी खुद दो नंबर के धंधे कर के अपनी तिजोरी भरता है बावजूद दूसरों के काम में अड़ंगा डाला करता है…..
वासुकी ने ही उसके बेटे का ह्यूमन ट्रेफिकिंग का काम पकड़वाया था…
इसके अलावा उसकी नकली शराब का धंधा हो या ड्रग्स का सब पर कहर बन कर वासुकी समय समय पर बरसता रहता था..
वासुकी का मुख्य काम ज़मीन का था.. वो गांव के किसानों से अच्छे दामों पर ज़मीन खरीद कर बहुत ऊँचे महंगे दामों पर वो ज़मीने बेचा करता था… इसके अलावा उसने ज्यादातर बड़े व्यापारियों को डरा धमका कर प्रोटेक्शन मनी के साथ ही उनकी कम्पनी में हिस्सेदारी भी वसूल कर ली थी.. !
और यहीं उसका कमाई का जरिया था… लेकिन इस काले धंधो में लिप्त वासुकी का भी इमान धरम था…
नशा और लड़कियों से उसने हमेशा खुद को अलग रखा था और इस व्यापार के भी वो सख्त खिलाफ था…
शेखावत पर एक के बाद एक कहर ढाने के बाद इसने गुस्से में एक बार शेखावत का बाजू भी काट दिया था, जिसके बाद शेखावत ने गुस्से में वासुकी और बाँसुरी को मारने का प्रण लिया था…. !
शेखावत ने जापान जाकर अपने कटे हाथ की जगह पर लाखों का नया हाथ जुड़वा लिया था, लेकिन फिर भी उसके दिल में सुलगती बदले की आग ठंडी नहीं हो पाई थी…
वह कहीं ना कहीं यह अच्छे से जानता था कि वासुकी के दिल में बांसुरी के लिए कुछ तो है और उसी बात का फायदा उठाते हुए उसने अपने ऊपर टूट पड़ने को आतुर वासुकी को बांसुरी की कसम देकर रोक दिया ! वह जानता था कि उसका कहा यह वाक्य वासुकी पर पर असर जरूर करेगा…
और जैसा शेखावत ने सोचा था वासुकी का उठा हुआ हाथ थम गया और वह अपनी सोच में गुम अपने गिरे हुए खंजर को उठाने जा रहा था कि शेखावत ने अपने नकली हाथ से अपनी तरफ गिरी हुई गन को उठाया और वासुकी पर गोली चलाने को ही था कि तभी खंडवाल ने शेखावत पर गोली चला दी….
शेखावत घुटने के बल उठ रहा था और उसका हाथ सामने की तरफ झुकते वासुकी की ओर था इसलिए जैसे ही खंडवाल की गोली शेखावत का सीना चीर कर आरपार हुई शेखावत सामने की तरफ वासुकी को अपने घेरे में लेता हुआ गिर पड़ा….
पथरीली जमीन पर पीठ के बल जोर से गिरने पर वासुकी को भी चोट आई लेकिन उसने अपने ऊपर गिरे शेखावत को दोनों हाथों से उठाकर अपने से दूर कर दिया…
शेखावत के सीने से निकलता खून वासुकी की कमीज को रंग गया….
गन शॉट की आवाज हुई और धुंधली शाम की नीरव स्तब्धता में वह गूंज वहां के पेड़ पर शाम को लौटे पक्षियों के आशियाने से उन्हें उड़ा गई….
उस गन शॉट के बाद आसपास एक उदास सन्नाटा पसर गया….
इस सारी थकान के बाद वासुकी ने धीरे से अपनी आंखें मूंद ली…!
लेकिन इन सारी बातों से अलग खंडवाल के पीछे खड़ा एक लड़का यह सारा वीडियो बना रहा था.. गन शॉट के बाद उसके भी हाथ और कलेजा कांप कर रह गए….
उसने इस सारे वीडियो को अपने मोबाइल में उतारने के बाद उसे शेखावत के बेटे के नंबर पर भेज दिया….
वह लड़का असल में शेखावत के बेटे का आदमी था जिसे शेखावत के बेटे सुनील ने शुरू से ही खंडवाल के गैंग में भर्ती करा रखा था…
शेखावत बहुत खतरनाक आदमी था ! उसके पास ढेर सारे गन गोला बारूद और इंसानी ताकत मौजूद थी, वह अपने सामने आए लोगों को चींटी की तरह मसल कर रख देता था ! वह क्रूरता और पैसे कमाने को लेकर हद दर्जे का सनकी था…
संवेदनशीलता मानवता इंसानियत जैसे शब्द उसे दूर से भी छू कर नहीं गए थे…
वह सिर्फ कट्टे और गोलियों की ही भाषा समझता था…
उसका एक ही उसूल था.. Eye for an eye..
उसने अपना इतना लम्बा चौड़ा साम्राज्य सिर्फ ताकत के बूते पर बना रखा था, और अपनी ताकत से ही वह अपने आसपास के लोगों पर राज किया करता था…!
आज उसके खत्म होते ही उसका साम्राज्य भी भरभरा कर गिरने को था, लेकिन विदेश में बैठा उसका बेटा उसके साम्राज्य का असर उत्तराधिकारी था… ! शेखावत जहां सिर्फ और सिर्फ अपनी ताकत का प्रयोग करके यहां तक पहुंचा था वही उसका बेटा सुनील उस ताकत के साथ ही अपने दिमाग को भी प्रयोग करता आया था और इसीलिए उसने इस बात को बहुत पहले भांप लिया था कि जिस व्यापार में उसके पिता शामिल है, वहां किसी की जिंदगी का कोई भरोसा नहीं होता.. !
आज जैसे बाकी लोग उसके पिता की गोलियों का शिकार हो जाते हैं किसी दिन उसके पिता भी इसी तरह किसी की भी गोलियों का शिकार हो सकते हैं ! और यही सब सोचकर उनकी सुरक्षा के लिए ही उसने उन्हें अपने पास बुलाने की योजना बना ली थी ! अगर शेखावत के दिमाग में वासुकी और बांसुरी को मारने का फितूर नहीं सवार हुआ होता तो आज शेखावत अपने बेटे के साथ विदेश में बैठकर आराम की जिंदगी बसर कर रहा होता, लेकिन वासुकी से बदला लेने की उसकी मंशा ने आखिर उसे ही मरने पर मजबूर कर दिया….
सात समंदर पार बैठे उसके लड़के ने फोन पर जैसे ही अपने पिता के मरने का वीडियो देखा गुस्से में खड़ा होकर उसने अपने फोन को ही जोर से जमीन पर पटक कर चूर-चूर कर दिया !
अपने दोनों हाथों से अपने बाल नोचता सुनील बदले की उसी आग में जलने लगा जिसमें जलते हुए उसके पिता मारे गए थे….
” मैं कसम खाता हूं वासुकी, जिस लड़की के कारण तूने मेरे बाप को मार गिराया है.. उसे मैं अब जिंदा नहीं छोडूंगा…!
मैं वापस आ रहा हूं ! और वापस आकर तुझे तेरी जमीन पर तेरे लोगो के बीच तड़पा तड़पा कर मारूंगा .. ये मेरा वादा है खुद से.. और अगर ऐसा न हुआ तो खुद मर जाऊंगा !”
सुनील शेखावत ने वहीं से उस लड़के को फोन लगाया और कुछ जरूरी बातें बताने लगा…
वह लड़का सुनील का फोन आता देखकर खंडवाल के पीछे से सरक कर जरा दूर निकल गया | वह सामने से होकर सुनील को बताना चाहता था कि गोली वासुकी ने नहीं खंडवाल ने चलाई है, लेकिन सुनील कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था | सुनील को वीडियो में बस यह नजर आया था कि एक गोली चली और उसका बाप मारा गया…. जिस तरह की गहमागहमी उस वक्त शेखावत और वासुकी के बीच चल रही थी, उससे वीडियो देखने वाले को यही समझ आ सकता था कि गोली वासुकी ने हीं चलाई है…
सुनील का पारा उस वक्त इस कदर उबल रहा था कि, वह किसी की कोई बात सुनने को तैयार नहीं था…. अपने पहले मोबाइल फोन को तो वह तोड़ कर चूर-चूर कर ही चुका था दूसरे फोन को भी उसने बात करने के बाद काट कर जोर से जमीन पर पटक दिया….
अपनी तकलीफ को आंसू में ना बहा पाने के कारण बहुत जोर से चिल्ला कर वहीं जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया और उसकी तेज आवाज सुनकर उसका पिए बाहर से भागता हुआ अंदर उसके ऑफिस केबिन में चला आया… !
इधर वासुकी ने जैसे ही अपनी पलकें बंद की, दर्श भी भागकर उसके पास चला आया ! उसने तुरंत वासुकी के गालों पर हथेली से थपथपाना शुरू किया….
” अनिर… अनिर.. सुन.. मैडम ने आंखें खोल दी हैं..!”
दर्श धीमे से वासुकी के कानों में गुनगुना गया……
और ढेर सारी चोटों के बावजूद वासुकी ने भी अपनी आंखें खोल दी…
उसकी लाल-लाल आंखों में 2 दिन का रतजगा साफ साफ नजर आ रहा था ! दर्श और खंडवाल ने वासुकी को सहारा देकर उठाया और उसे गाड़ी की तरफ लेकर आगे बढ़ गए….
” वासुकी अगर उस दिन जब शेखावत ने मुझे धोखा देकर मेरे ही घर, मेरे ही ऑफिस से धक्के मार कर निकाल दिया था तब अगर तूने मेरी मदद नहीं की होती तो मैं आज यहां जिंदा खड़ा नहीं होता !
उस दिन के अपमान के बाद में इस कदर टूट गया था कि अपने सारे परिवार को एक साथ लेकर आत्महत्या करने का मन बना लिया था और जहर की गोलियों को मेरा पूरा परिवार मेरे साथ खाने ही जा रहा था कि तू बिल्कुल भगवान की तरह मेरे सामने प्रकट हुआ और मेरे हाथ से उन दवाइयों को छीन कर फेंक दिया…
सिर्फ रुपये से नहीं बल्कि तूने हर तरीके से मेरी मदद की और मुझे उस कठिन परिस्थिति से उबार लिया…
मैं जानता हूं कि मैं एक गलत धंधे में उतरा हुआ गलत आदमी हूं लेकिन यहां पर भी आपस में एक ईमानदारी होती है जो शेखावत में कभी नजर नहीं आई….
तूने उस वक्त मेरा साथ दिया है, जब सारे जमाने ने मुझ से मुंह मोड़ लिया था और इसलिए तेरे एहसान का किसी तरीके से भी मैं बदला नहीं चुका सकता…!
लेकिन आज फिर एक बार मैं यह वादा करता हूं कि जब जहां तुझे जरूरत हो मै वहाँ पहुंच जाऊंगा..!”
” बिलकुल वैसे ही जैसे आज यहां पहुंचे..!”
दर्श ने मुस्कुराकर खंडवाल की तरफ देखा और खंडवाल ने मुस्कुरा कर दर्श के कंधे थपथपा दिए…..
” दर्श तेरा भी एहसान मैं नहीं भुला सकता ! वासुकी ने अगर मेरी मदद की है तो तूने भी कदम कदम पर उसका साथ दिया है ! तुम दोनों की दोस्ती को दुनिया की नजर ना लगे, लेकिन यह तुम दोनों की सबसे अच्छी बात है कि तुम दोनों एक दूसरे से जो भी करने को कहते हो सामने वाला बिना कोई सवाल किए वह काम करने को बाध्य हो जाता है ! वासुकी आज जहां तक पहुंचा है उसके पीछे तेरी भी मेहनत साफ नजर आती है दर्श !
जहां वासुकी ने मुझे पैसा और सहारा दिया वही तूने मेरे काम को वापस खड़ा करने में मेरी पूरी मदद की !
तुम दोनों की मदद के बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं रह जाता.. !
आज भी मुझे कहां और किस वक्त पहुंचना है..? यह सारी जानकारी तूने ही तो दी थी, वरना मुझे तो पता भी नहीं था कि मेरे आउटहाउस में यह कमीना छुपा बैठा है !
अब तुम दोनों निकलो ! यहां पर मैं बाकी सब संभाल लूंगा !”
” इस की मौत को क्या दिखाओगे…?”
” इसे गाड़ी में बैठा कर खाई में फेंक देंगे..!”
यह बात सुनकर दर्श ने धीरे से हां में गर्दन हिलाई और वासुकी को साथ लिए अस्पताल की तरफ निकल गया….
दर्श ने गाड़ी चलाते हुए वासुकी की तरफ पानी की बोतल बढ़ा दी…
” अब तो पानी पी ले..! मैडम ने आंखें खोल दी हैं और सुना है कि वह राजा साहब से बात भी कर रही थी..! अब तो बेटा तेरा करवा चौथ का व्रत पूरा होता है चुपचाप पानी के घूंट ले ले..!”
वासुकी ने दर्श को घूर कर देखा और चुपचाप सामने रास्ते की तरफ देखने लगा….
” तेरा और तेरे पागलपन का कुछ नहीं हो सकता..!”
दर्श ने ना में गर्दन हिलाई और वापस गाड़ी चलाने लगा…….
******
इस सारे हादसे को 2 दिन बीत चुके थे…डॉक्टर्स की टीम ने आपस में सलाह मशविरा कर बाँसुरी को राजा साहब के साथ जाने की अनुमति दें दी थी…
इन दो दिनों में बाँसुरी में पहले से अधिक स्वास्थ्य लाभ नज़र आ रहा था.. अब वो नर्स की सहायता से धीरे धीरे चलने फिरने भी लगी थी…
खाने में ज़रूर अब भी उसे पतली खिचड़ी और सूप ही दिया जा रहा था… और इसी बात पर आज वो रूठी बैठी थी…
नर्स के लाये खाने की तरफ उसने देखा तक नहीं था..
राजा साहब उस वक्त किसी ज़रूरी काम का दिशा निर्देश देने बाहर किसी से फ़ोन पर बात कर रहें थे.. उनके ही सामने नर्स खाने की ट्रे लेकर अंदर दाखिल हुई और पांच मिनट बीतते उलटे पैरों वापस लौट गयी.. उसे वापस ट्रे के साथ बाहर जाते देख कॉरिडोर में टहलते राजा ने नर्स को टोक दिया…
फ़ोन में “बाद में बात करता हूँ “कह कर राजा ने नर्स से खाना वापस लें जाने का कारण पूछ लिया…
“मैडम को ये नहीं खाना है सर.. !”
“लाइए मुझे दीजिये !”
बड़ी नफासत से राजा ने खाने की ट्रे अपने हाथ में ली और कमरे के अंदर चला गया…..
आज बाँसुरी ने थोड़ा ज्यादा चहलकदमी कर ली थी, इसलिए शायद थकान से उसने आँखे बंद कर रखी थी….
राजा ने उसके पास जाकर उसके माथे पर हाथ रखा और बाँसुरी ने ऑंखें खोल दी…
“कुछ खा लो हुकुम !”
बाँसुरी ने खाने की तरफ देखा और मुहँ बना लिया….
“बिल्कुल मन नहीं कर रहा साहेब.. !”
“ठीक है ! फिर मै भी नहीं खाऊंगा.. ! “
“ये तो गलत बात है.. ! आप मुझे ब्लैकमेल कर रहें है.. !”
“नहीं ब्लैकमेल नहीं कर रहा, बस आज तुम्हे अपने हाथ से खिलाने का दिल कर रहा है… खिला सकता हूँ ना.. ?”
“अच्छा अब आपको मुझसे इजाज़त लेनी पड़ेगी क्या.. ?”
मुस्कुरा कर राजा ने खाने का चम्मच बाँसुरी कि तरफ बढ़ा दिया..
“बाँसुरी !! तुम्हें पता है मुझे बैंगन कुछ पसंद नहीं थे, लेकिन जब बॉम्बे में पहली बार तुम्हारे साथ रुका था उस दिन सुबह ऑफ़िस जाने से पहले तुमने बैंगन आलू और पराठे बनाये थे… याद है.. ?”
बाँसुरी मुस्कुरा कर रह गयी… -“कैसे याद नहीं होगा.. मेरा उस दिन फ़ास्ट था और मैंने मेरे किये साबूदाना बनाया था.. !”
“उस दिन वो बैंगन इतने टेस्टी बने थे कि मै पूरा खाना एक बार में चट कर गया था… उसके पहले मै बैगन खाता तो था लेकिन मुझे कुछ खास पसंद नहीं था… और वो याद है जब भास्कर की मौसी और उनका परिवार आने वाला था…
तब तो तुमने क्या शाही दावत का इंतज़ाम किया था.. !
बाँसुरी वापस मुस्कुरा उठी…
“पर आपको तो सब कुछ शाम को खाने मिला था.. !”
“तो क्या हुआ.. टेस्ट तो और बढ़ गया था ! कितना मजा आया था ना उस दिन… इतना सारा खाना था और हम दोनों तुम्हारी बालकनी में बैठे मजे लेते हुए खा रहें थे…
तुम उस दिन मेरे लिए कॉफ़ी मशीन लें कर आई थी… याद है.. !”
“हाँ जी ! और आज भी वो कॉफ़ी मशीन आपके पास आपके ऑफ़िस की शोभा बढ़ा रही है… !”
बातों ही बातों में कब बोल भर कर खिचड़ी राजा ने बाँसुरी को खिला दी, बाँसुरी जान ही नहीं पायी…
आखिरी निवाले के साथ राजा ने उसका मुहँ नैपकिन से पोंछा और ट्रे को एक किनारे रख दिया…
“आप बहुत गंदे है साहब ! मुझे इतना टेस्टलेस खाना इतना स्वादिष्ट बना कर खिला दिया और मै जान ही नहीं पायी.. !”
राजा ने मुस्कुरा कर बाँसुरी का माथा चूम लिया…
“अब थोड़ी देर आराम कर लो… शाम को हमें वापस महल के लिए निकलना है… !”
“हम आज शाम निकल जायेंगे ?”
बाँसुरी चहक उठी और राजा के हाँ में सर हिलाते ही वो आगे बढ़ कर राजा से लिपट गयी..
उसके सर पर हाथ फेरते हुए राजा जाने के इंतज़ाम के बारे में जानने प्रेम को फ़ोन लगाने लगा…
क्रमशः
aparna….
