जीवनसाथी- 2/54


जीवनसाथी -2 भाग – 54

       कस्बे से बाहर बड़े शहर के अस्पताल में सभी अपने काम में व्यस्त इधर से उधर भाग रहें थे…..
   अस्पताल पुराना था लेकिन अनुभवी डॉक्टर्स की टीम से लैस था…
    ऊपर पहली मंजिल पर बने आईसीयू के कांच के दरवाज़े के बाहर खड़े राजा अजातशत्रु अपलक नेत्रों से कांच के उस पार मशीनों से घिरी बाँसुरी को देख रहें थे.. उनके ठीक पीछे खड़े प्रेम ने एक पल के लिए भी उन्हें अकेला नहीं छोड़ा था…
  
    और राजा अजातशत्रु ने जिस पल से बाँसुरी अंदर बेहोश पड़ी थी इस कांच के दरवाज़े को नहीं छोड़ा था.. लग रहा था जैसे उन्होने कोई व्रत लें रखा हो…

   बस चुपचाप वहाँ खड़े वो सामने लेटी बाँसुरी को देख रहें थे…..
  निर्निमेष….

   उसी समय आदित्य भी वहाँ चला आया… उसने प्रेम को देख इशारे से बाँसुरी का हाल चाल पूछा और प्रेम ने विवशता से ना में गर्दन हिला दी…

   कुछ डॉक्टर्स वहाँ से होते हुए अंदर चलें गए… अपनी आदत के अनुसार उन लोगो ने राजा साहब को धैर्य रखने की सलाह दी और अंदर चलें गए…
   उनके अंदर जाते ही नर्स ने आकर कांच पर परदे को खींच कर ओट कर दी और अब तक राजा साहब को नज़र आती बाँसुरी दिखनी बंद हो गयी….

     आदित्य ने धीमे से पानी की बॉटल उनकी तरफ बढ़ा दी लेकिन ना में सर हिला कर राजा साहब वहीँ रखी बेंच पर बैठ गये …..

     वो दिन भी उसी मनहूसियत में बीत गया….

आज ब्लास्ट के बाद दो दिन हो चुके थे और अब तक बाँसुरी को होश नहीं आया था…
   छोटी मोटी दो तीन सर्जरी उसकी निपट चुकी थीं और राजा बस इस इंतज़ार में था कि बाँसुरी को होश आये और उसे अपने साथ लें कर वो वापस चला जाये..
  लेकर जाने के लिए तो वो अब भी उत्सुक था लेकिन डॉक्टर्स ने बाँसुरी कि हालत देखते हुए मना कर दिया था…

   वो हैरान परेशान सा उसी बेंच पर बैठा ज़मीन को ताक रहा था कि आईसीयू से निकल कर सिनियऱ डॉक्टर बाहर चलें आये…

“राजा साहब !”

राजा तुरंत चौकन्ना हो गया..

“जी.. !”

“रानी साहिबा को होश तो नहीं आया है… ! लेकिन  अब वो खतरे से बाहर है…. ! हालाँकि उन्होंने अब तक ऑंखें नहीं खोली है लेकिन उनकी उँगलियाँ अब हिल रही है… !”

राजा ने राहत भरी साँस लेकर आँखे बंद कर ली… एक छोटी सी बून्द ऑंख कि कोर में  उलझ कर रह गयी…
  
    राजा ने डॉक्टर कि तरफ देखा और इशारे से अंदर जाने की बात पूछी और डॉक्टर ने हाँ में गर्दन हिला दी…

डॉक्टर की मंजूरी मिलते ही राजा लपक कर कमरे की तरफ बढ़ गया..
उसके पीछे ही आदित्य और प्रेम भी बढ़ गए….

वहीँ इन सबसे कुछ दूर दीवार की ओट में एक बेंच पर ज़मीन की ओर ताकता बैठा वासुकी भी इस खबर को सुन अपनी जगह पर खड़ा हो गया…
   उसकी घनी दाढ़ी  मूंछ और लंबे बालों के ऊपर उसने एक टोपी लगा रखी थी जिससे उसका आधा चेहरा वैसे ही छुपा हुआ था…
आंखों पर चढ़े काले गॉगल्स निकालकर उसने जेब में डाले और अपनी लाल-लाल आंखों से एक नजर आईसीयू को देखकर वह वहां से बाहर निकल गया….

जैसे ही बाहर जाकर उसने अपनी गाड़ी खोलकर ड्राइविंग सीट पर कब्जा जमाया वैसे ही भागते हुए से  काका आकर उसके ठीक बगल की सीट पर बैठ गये …

” तुम क्या करने जा रहे हो अनिर  ?”

”  जिसका 2 दिन से इंतजार कर रहा था..!”

” अब जब पता चल गया है कि मैडम ठीक है फिर अभी क्या जरूरत है..?”

वासुकी ने एक नजर अपने बाजू में बैठे काका  की तरफ देखा और उसकी लाल जलती हुई आंखों को देखकर कुछ पल के लिए काका भी हैरान रह गये …

” जो काम अभी करने जा रहा हूं वह मैं 2 दिन पहले ही कर चुका रहता, लेकिन 2 दिन रुक कर इंतजार इसलिए किया जिससे मैं यह तय कर सकूं कि शेखावत को कैसी सजा देनी है…?
उसे एक बार में मार डालना है या तड़पा तड़पा कर..!”

वासुकी ने गाड़ी तेजी से रोड पर आगे की तरफ भगा दी…

” तुझे क्या लगता है.. वो घर पर बैठा तेरा इंतजार कर रहा होगा.. ?”

” मैं जानता हूं वह घर पर नहीं है..
   और वह कहां है यह भी मैं जानता हूं…!”

वासुकी ने गाड़ी चलाते हुए दर्श को फ़ोन लगा लिया…

“निकल गया तू.. ?”

दर्श के सवाल पर वासुकी ने एक छोटी सी हामी भर दी…

“मतलब कलेक्टर साहिबा को होश आ गया.. !”

“हम्म !”

“खतरे से बाहर है वो.. ?”

“हम्म !”

“मतलब.. शेखावत गया.. !”

“हम्म !”

“ठीक है… ! मैं लोकेशन भेज रहा हूँ… तू फॉलो कर लें.. वैसे सही समय पर तू निकल गया है.. उसे चेज़ कर ही लेगा… उस कमीने ने चॉपर मंगवाया है और बस निकलने वाला है… !”
 
दर्श का मोबाइल स्पीकर पर था और काका सब कुछ सुन पा रहें थे…

“एक बात पूंछू अनिर.. ?”

“हम्म.. !”

“ये शेखावत क्या तुम्हारे आने का रास्ता देख रहा था..भागने के लिए.. !”

वासुकी का इस वक्त कुछ भी कहने का इरादा नहीं था लेकिन काका के मन की शंका का समाधान करना जरूरी था इसलिए उन्हें एक नजर देखने के बाद गाड़ी चलाते हुए वासुकी अपने मन की बात कहने लगा…

” एक्सीडेंट के बाद से ही शेखावत समझ गया था कि मैं उसके पीछे पड़ जाऊंगा और वह उसी दिन भागने वाला था लेकिन उसे फ्लाइट के टिकट नहीं मिल पाए.. उसके बाद उसने चॉपर मंगवाने के लिए संपर्क करना चाहा लेकिन वह संपर्क भी उसका नहीं हो पाया और इसीलिए वह अपने एक दोस्त के फॉर्म हाउस पर छुपा हुआ था उसे मालूम था कि मैं उसे उसके घर और उसके फॉर्म हाउस से ढूंढ निकाल लूंगा…!”

” उसे टिकट क्यों नहीं मिल पाए..?”

” क्योंकि दर्श ने  उसके घर के आसपास का सारा नेटवर्क जाम कर रखा था जिससे उसका ना तो किसी से फोन पर संपर्क हो पा रहा था और ना ही इंटरनेट के जरिए..!”

” तो तुम यहां बैठकर किस बात का इंतजार कर रहे थे.
!”

” उन के ठीक होने का…!”

काका समझ गए कि वासुकी बाँसुरी कि बात कर रहा था !

वासुकी की सर्द और गहरी आवाज सुनकर काका  की कुछ और पूछने की हिम्मत नहीं हुई….

वासुकी तेजी से गाड़ी चलाते हुए दर्श के भेजे लोकेशन पर पहुंच गया…..

कस्बे से थोड़ा बाहर एक छोटी पहाड़ी पर बना ये एक  आउटहाउस था जो शेखावत के किसी पुराने दोस्त का था…
   इस वक्त वहां किसी का भी परिवार नहीं रह रहा था ! और इसीलिए शेखावत ने उस घर को अपने छुपने के लिए चुना था…
    उसे लगा था उस ब्लास्ट में बांसुरी के साथ-साथ वासुकी भी उड़ जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हो पाया था….
     उसने अपने आदमी से जानबूझकर बांसुरी तक यह खबर पहुंचाई थी कि सुबह किस वक्त पर ब्लास्ट होने वाला है…
बांसुरी के पास खबर पहुंचाने वाले खबरी ने सुबह 7 का समय बांसुरी को बताया था और जिसके बाद बांसुरी ने सारे पुलिस प्रशासन को इस बारे में अलर्ट कर दिया था…..
    बांसुरी ने अपने कुछ विश्वास पात्र लोगों को पहले ही उस ब्लास्ट साइट पर उसे डिएक्टिवेट करने भेज दिया था !  जहां से उसे फोन करके यह जानकारी दी गई थी कि सारे ब्लास्ट डीएक्टिवेट कर दिए गए हैं…!
अपने दो सुरक्षाकर्मियों के साथ सुबह के समय वह वहां का सारा जायजा लेते हुए गांव वालों को गांव खाली करवाने के लिए मनाने ही जा रही थी, क्योंकि उसे यह लगा था कि अगर कोई हिस्सा डीएक्टिवेट होने से रह गया होगा तो वहां पर 7 बजे होने वाले ब्लास्ट से पहले गांव वालों को वहां से हटा लेना चाहिए…..
   उसके सुरक्षाकर्मियों ने उसे अपने साथ जाने से मना भी किया लेकिन बांसुरी को अपना आदेश अपने सामने पूरा होते देखना ही पसंद था !
    वह अपने किसी काम में किसी भी तरह का झोल नहीं चाहती थी, इसलिए अपनी गाड़ी में एक ड्राइवर और दो सुरक्षाकर्मियों के साथ वह उस साइट के लिए निकल गई थी.. लेकिन वह नहीं जानती थी कि उसे ब्लास्ट की जगह और समय के बारे में गलत खबर दी गई थी और उसके आदमियों को पहले ही शेखावत के आदमियों ने पकड़ कर गन पॉइंट पर उनसे झूठ बुलवाया था…!

     लेकिन वहीं मौजूद एक आदमी ने चुपके से दर्श  को फोन करके यह सारी बात बता दी थी…
   इसीलिए दर्श ने वासुकी को तुरंत ही फोन कर दिया था!  वासुकी को बताने के साथ ही दर्श खुद अपने सिक्योरिटी ऑफिसर के साथ बांसुरी के पीछे निकल गया था….

लेकिन इतनी सारी तैयारियों के बावजूद भी शेखावत का षड्यंत्र सफल हो गया था और बांसुरी को मिली  गलत खबर के कारण बांसुरी जिस वक्त उस साइट पर पहुंची उसी वक्त ब्लास्ट हो गया…

हालांकि शेखावत ने यह सोचा था कि बांसुरी के पीछे वासुकी भी वहां पहुंच जाएगा, और वो भी मारा जायेगा !
    उसे यह आभास नहीं था कि वासुकी नेहा के साथ भी हो सकता है…
नेहा के साथ होने के कारण ही वासुकी जरा देर से पहुंचा वरना वह भी बांसुरी के साथ उस ब्लास्ट का शिकार हो जाता…

जैसे ही वहां मौजूद शेखावत के आदमियों ने यह देखा कि वासुकी के पहुंचने के ठीक आधा मिनट पहले ही बांसुरी की गाड़ी हवा में उड़ गई…
.  उन लोगों ने तुरंत यह खबर शेखावत को दे दी थी…
शेखावत को जैसे ही मालूम चला कि वासुकी  का बाल भी बांका नहीं हुआ है, उसके दिल में धुकधुकी सी मच गयी… 
  उसे समझ आ गया था कि अब वासुकी उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा और इसीलिए उसने अपने भागने का इंतजाम करना शुरू कर दिया…

  लेकिन शेखावत वासुकी को जितना जानता था वासुकी उससे कहीं ज्यादा खतरनाक था ! वासुकी ने बिना एक पल गंवाए  दर्श को उसके सारे गैजेट्स के साथ शेखावत पर नजर रखने भेज दिया…

शेखावत को अचानक से  नेटवर्क में खराबी का कोई कारण समझ नहीं आया और वह 2 दिन तक सिर्फ इसी परेशानी से जूझता रहा कि कैसे वो यह जगह छोड़कर अपने बेटे के पास निकल जाए…

उसका एक बेटा अमेरिका में था जो वहीं से अपने बाप के कारोबार को बढ़ा रहा था…
बहुत पहले ह्यूमन ट्रैफिकिंग में उसका नाम उछल रहा था जिसके बाद शेखावत ने उसे बड़ी सफाई से यहां से निकालकर अमेरिका भेज दिया था और अब वहां बैठे वो अपने बाप के काले कारोबार को दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करवा रहा था….

चॉपर का प्रबंध भी शेखावत के बेटे ने ही करवा कर भिजवाया था…
और अब शेखावत को बस यहां से अपना सामान लेकर दिल्ली के लिए रवाना होना था…
   वह अपने घर के बाकी सदस्यों को पहले ही यहां से रवाना कर चुका था…

  शेखावत ने उस आउटहाउस में भी अपने लोगों को अपनी सुरक्षा के लिए तैनात कर रखा था…
    शेखावत अपने बेटे के फोन का इंतजार कर रहा था, जैसे ही उसके बेटे ने उसे फोन करके बताया कि चॉपर उतर चुका है वह तुरंत बाहर निकल कर उस पर सवार होकर निकल जाए शेखावत हड़बड़ी में अपना ब्रीफकेस उठाएं सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंच गया…

उसके दिमाग में वासुकी का डर इस कदर बैठा हुआ था कि उसने नीचे के हॉल में भी लगभग 10  सशस्त्र आदमियों को तैनात कर रखा था…

लेकिन नीचे पहुंचते ही हॉल का जो नजारा उसने देखा उसके होश फाख्ता हो गए….

    वहां अब उसके आदमी नहीं बल्कि उनकी लाशों का ढेर उसका इंतजार कर रहा था..
   वह चौक कर इधर-उधर देखने लगा ! उसे लगा जरूर वासुकी वहां पहुंच चुका है लेकिन वह गलत था…

बहुत पहले शेखावत  ने 1 डील में  अपने ही 1 साथी खंडवाल को बुरी तरह से धोखा दिया था..!
बिजनेस के शुरुआती दिनों में शेखावत और खंडवाल काफी अच्छे मित्र थे और दोनों साथ मिलकर व्यापार किया करते थे ! लेकिन कुछ समय बाद शेखावत को इन सारी बातों में समस्या दिखाई देने लगी थी उसे लगने लगा था कि उसके पास ज्यादा ताकत है और उसकी ताकत के डर से ही उसका बिज़नेस फल-फूल रहा है ! और यही उसने गलती कर दी ! उसने बात बात पर खंडवाल से हिसाब किताब करना शुरू कर दिया था जबकि सच्चाई यह थी कि शेखावत के पास ताकत भले ही ज्यादा थी लेकिन दिमाग शुरू से ही खंडवाल  के पास ही था…

एक बहुत बड़ी डील जिसमें दोनों ने हीं अपना आधा आधा पैसा लगाया था के बाद शेखावत ने अपनी तुच्छ बुद्धि का प्रदर्शन करते हुए उस डील का सारा पैसा अपने पास रख लिया था और धोखे से खंडवाल के कागजों पर भी उसके साइन लेकर उसके हिस्से का भी सब कुछ हड़प लिया था इसके बाद उसने खंडवाल की बुरी तरह से तौहीन करके उसे अपने ऑफिस से धक्के मार कर निकाल दिया था…

खंडवाल उस समय तो कुछ नहीं कर पाया था और अपना सा मुंह लेकर वहां से चला गया था लेकिन आज जब वो अपना एक एंपायर तैयार कर चुका था तब वो वापस लौट आया था…

    और आज ऐसे दिन में वापस लौट कर आया था जब वह शेखावत पर बुरी तरह कहर बनकर टूटा था…
शेखावत सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंचा और अपने आदमियों को वहां मरे पड़े देखकर आश्चर्य से इधर-उधर वासुकी को ढूंढ रहा था कि खंडवाल अपने आदमियों के  साथ उसके सामने चला आया…

   ” तू…. ? तू यहाँ क्या कर रहा है.. ?”

    ” यह सवाल तो मुझे तुझसे पूछना चाहिए क्योंकि यह आउटहाउस, यह जगह, यह घर सब कुछ मेरा है… मुझे मेरे घर से भगा कर आज जब तुझे दुनिया से छुपने की जरूरत पड़ी तो,  तू मेरे घर में पनाह लेने चला आया और जब मैं अपने घर में वापस आया हूं तो तू  मुझसे सवाल कर रहा  कि, मैं यहां क्या कर रहा हूं..!”

” खंडवाल देख.. तेरा मेरा जो भी था मैं सब कुछ सही  करने के लिए तैयार हूं… तू जितना पैसा बोलेगा मैं तेरे मुंह में ठूंसने को तैयार हूं ! बस इस वक्त मुझे यहां से निकल जाने दे!”

” क्यों निकल जाने दूँ.. ! तूने आज तक मेरी की हुई भलाई का बदला मेरे साथ गलत कर के ही लिया तो फिर आज अब मुझे मौका मिला है तेरे खून से अपने हाथ रंगने का तब मैं यह मौका कैसे जाने दे सकता हूं…!
     तू आज मुझसे नहीं बच सकता शेखावत… आज तो ब्रह्मा भी आ जाएंगे सामने, तब भी मैं तुझे मार कर ही जाऊंगा…!”

शेखावत  के चेहरे पर लाचारगी के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे..!  उसने धीरे से अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर खंडवाल की तरफ देखते हुए हाथ जोड़ दिये….

शेखावत के ऊपर गन ताने खड़े खंडवाल के ऊपर शेखावत ने तुरंत अपने ब्रीफकेस से वार किया और उसकी गन गिरा कर अपनी जेब से गन निकाल कर उसने उसकी तरफ तान दी…

शेखावत के इस अचानक के प्रहार से खंडवाल के सारे आदमी चौक कर स्तब्ध खड़े रह गए…

    शेखावत ने  खंडवाल के माथे पर अपनी  गन तानी  और उसे साथ लिए हुए दरवाजे की तरफ बढ़ गया… दरवाजे तक पहुंच कर उसने जैसे ही दरवाजा खोला सामने उसके ऊपर गन ताने वासुकी खड़ा था…

    वासुकी को देखते ही शेखावत के चेहरे की लाचारगी नजर आने लगी ! वह एकदम से खंडवाल की तरफ तान रखी गन को वासुकी की तरफ तान ने को झपट पड़ा लेकिन इसी बीच वासुकी ने एक जोर का तमाचा शेखावत के चेहरे पर मारा और शेखावत घूम कर जमीन पर गिर गया…

उसके पेट पर अपने जूतों से प्रहार करते हुए वासुकी ने जोर से गरज कर वहां मौजूद सारे लोगों को एक तरह से चेतावनी दे दी कि…

      “शेखावत सिर्फ और सिर्फ मेरा शिकार है और इसे वासुकी के अलावा और कोई नहीं मार सकता…!”

    शाम के उस धुंधलके  में वासुकी का विध्वंसकारी रूप भयावह लग रहा था..!
   उसके बिखरे हुए बाल, उसकी लाल-लाल चढ़ी हुई आंखें और उसका रौद्र रूप यूं लग रहा था उसे देखकर जैसे महादेव स्वयं किसी बात से क्रोधित होकर तांडव कर रहे हो..!
    उसके हाथ में जो आ रहा था वह उससे शेखावत की पिटाई कर रहा था ! लात घूंसे बरसाने के बाद भी उसका मन नहीं भरा तो उसने शेखावत की कॉलर पकड़कर उसे उठाया और उसके सिर पर अपने माथे से प्रहार कर दिया…..

शेखावत के साथ-साथ वासुकी के भी माथे से खून की धार बहने लगी लेकिन उसके ह्रदय में उठती पीड़ा के सामने उसका यह शारीरिक कष्ट बहुत कम था…
वासुकी लगातार शेखावत के सर पर अपने माथे से प्रहार करता रहा…

शेखावत की हालत खराब होने लग गई थी… उसका चेहरा और उसका सारा शरीर लहूलुहान हो चुका था वह हाथ पैर जोड़कर वासुकी से रहम की भीख मांग रहा था…
लेकिन उस वक्त वासुकी को देखकर लग रहा था कि उससे ज्यादा क्रूर  पृथ्वी पर शायद ही किसी ने जन्म लिया हो….

” अरे पागल हो गया क्या वासुकी..?  तू राक्षस बन गया है राक्षस..!”

खंडवाल भी उसकी क्रूरता को देखकर एक पल को शेखावत पर तरस खा बैठा और वहीं से वासुकी को उसने आवाज लगा दी…

” मारना है तो एक बार में मारकर उसका काम खत्म कर..! क्यों इस तरह तड़पा रहा है उसको..?”

” अभी इसका तड़पना बाकी है..!”

वासुकी ने अपनी शर्ट की जेब से एक पतला और छोटा खंजर निकाला और शेखावत के सीधे हाथ को पकड़ कर उसकी तर्जनी उंगली को काटकर हथेली से अलग कर दिया…
शेखावत कलबला कर रह गया !  वह इतनी जोर से चीखा कि उसकी आवाज उस पहाड़ी पर गूंज कर रह गयी ..

” विस्फोट करने का बहुत शौक हो रहा था ना… इसी उंगली से ट्रिगर दबाया था ना तूने..!”

शेखावत अपनी हथेली को पकड़कर खून रोकने की नाकाम सी कोशिश करता हुआ तड़पने लगा…

और वासुकी ने उसकी बांह पर उसी  खंजर से वार कर दिया…
शेखावत खून रोकने की कोशिश में हथेली को छोड़कर उस वार वाली जगह पर कसमसा कर अपना दूसरा हाथ रखने लगा कि तभी वासुकी ने शेखावत के सीने पर उसी खंजर से वार कर दिया…

शेखावत तड़प कर अपनी पीड़ा को सहने के लिए नीचे झुक गया कि वासुकी ने उसकी पीठ पर उस
खंजर से वार कर दिया….

” तुझे क्या लगता है ब्लास्ट से लगी चोट में दर्द नहीं होता..?”

इस सारे हो हल्ले के बीच खंडवाल के पीछे कोई ऐसा खड़ा था जो उस सारे हंगामे को अपने मोबाइल पर रिकॉर्ड करता जा रहा था….

” मुझे माफ कर दे वासुकी.. ! मैं जाकर उस कलेक्टरनी के पैरों में गिर जाऊंगा… पुलिस के हवाले कर दूंगा खुद को, बस तू मुझे माफ कर दे….
    तू दुनिया में सबसे ज्यादा जिसे प्यार करता है तुझे उसकी कसम…!”

शेखावत का आखरी वार काम कर गया…
      उसकी कहीं आखरी पंक्तियां सुनकर वासुकी का शेखावत की गर्दन की तरफ बड़ा हाथ अचानक रुक गया और उसके हाथ से खंजर छूट कर नीचे गिर गया…

    थके हुए कदमों से वासुकी कुछ देर को वहीं खड़ा रह गया..
    यह शेखावत ने क्या कह दिया था ! क्या अब वह इस कसम को तोड़ कर उसकी जान ले पाएगा…

       अपने ख्यालों में गुम वासुकी अपना खंजर उठाने जा रहा था कि शेखावत ने दूर पड़ी गन उठाई और वासुकी की तरफ तान दी….

      एक जोर का गन शॉट हुआ…

    जले हुए बारूद की महक सारी फिजाओं में घुलने लगी…. एक छोटी सी धुंए की पंक्ति सीधी ऊपर की तरफ बढ़ गई और वही खड़े बरगद के पेड़ पर शाम को लौट आए पक्षी इस गन की आवाज सुनकर भरभरा कर वहाँ से उड़ गए…….

    बहुत धीमे से वासुकी की आँखे बंद होने लगी….

उधर अस्पताल में बाँसुरी ने धीरे से आँखे खोल दी….

क्रमशः

aparna…..

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