
जीवनसाथी -2/51
वक्त बीतता जा रहा था, और बीतते वक्त के साथ नेहा के मन में हलकी उदासी घर करती जा रही थी….
दोनों मंदिर से निकले और और वही से थोड़ा आगे बढ़ कर नेहा कि ज़िद पर रास्ते से कुछ बलून लें लिए…
कुछ आगे बढ़ते ही जंगल का रास्ता शुरू हो गया और वासुकी से सनरूफ खुलवा कर नेहा गाडी में खड़ी हो कर बलून उड़ाने लगी…. ….
उसकी मस्तियाँ ख़त्म होने का नाम नहीं लें रही थी… वो आगे बढ़ रहे थे कि गाड़ी एक झटके से रुक गयी.. वासुकी ने उतर कऱ देखा, गाड़ी में कोई खराबी आ गयी थी, जिसकी वजह से गाडी फिर स्टार्ट नहीं हुई…
” देखा मिस्टर हस्बैंड ये कायनात भी नहीं चाहती कि हम इस जगह को छोड़ कर घर चले जाएं… !”
वासुकी ने नेहा की तरफ देखा और अपनी जेब से फोन निकालकर दर्श को फोन लगाने की कोशिश करने लगा…
लेकिन वह लोग उस वक्त घने जंगल के बीच फंसे थे, जिसके कारण वहां पर नेटवर्क नहीं मिल रहा था और इसलिए वासुकी दर्श को फोन लगाकर गाड़ी के बारे में कुछ भी नहीं बता पाया…
वासुकी जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहता था, लेकिन नेहा को वहां जंगल में तफरीह करते हुए बड़ा मजा आ रहा था…
” आपको पता है मिस्टर हस्बैंड, अगर एक लड़का और लड़की इस कंडीशन में फंस जाए तो उन्हें क्या करना चाहिए..?”
वासुकी ने सवालिया नजरों से नेहा की तरफ देखा, उसे लगा नेहा कोई उम्दा और दिमागदार आइडिया बताने वाली है….
नेहा ने मुस्कुराकर वासुकी की तरफ एक फ्लाइंग किस उछाल दी…
“मिस्टर हस्बैंड आज तो हम दोनों के साथ एक के बाद एक फिल्मी सिचुएशन जुड़ती जा रही है… पहले आप और मैं शाहरुख खान और दीपिका बन गए थे, अब आप आमिर खान बन गए हो और मैं जूही चावला हो गई हूं…
वैसे फिल्मों में अगर ऐसी सिचुएशन में लड़का लड़की पड़ते हैं तो लड़का आपकी तरह इरिटेट होता जाता है और लड़की मेरी तरह रोमांटिक गाने गाती है…
देख लो हमको करीब से
आज हम मिले हैं नसीब से
यह पल फिर कहाँ और यह मंजिल फिर कहां,
गजब का है दिन देखो जरा, यह दीवानापन सोचो जरा हम भी अकेले तुम भी अकेले मजा आ रहा है
कसम से….
” कितना बोलती हो तुम ! इतना बोल कैसे लेती हो..?”
” गॉड गिफ्टेड है! टैलेंटेड हूं पर कभी घमंड नहीं किया..! लेकिन अब घमंड करने का जी करता है अपने हस्बैंड पर..!”
वासुकी ने झुंझलाहट से दूसरी तरफ मुंह फेर लिया उसी समय उनके पास से हॉर्न बजाती हुई एक मिनी बस आगे की तरफ बढ़ी…
और वासुकी ने तुरंत हाथ दिखा कर उसे रोक लिया….
बस ड्राइवर ने भी गाड़ी रोक दी…
वासुकी ने नेहा को बस में चढ़ने का इशारा किया और बस की तरफ बढ़ गया…
नेहा ने उसे देखकर ना में गर्दन हिला दी…
वासुकी बस की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते वापस उतर गया और नेहा के पास आकर उसकी कलाई पकड़ कर खींचते हुए बस की तरफ ले गया…
” हमारे बिना हमारी गाड़ी का क्या होगा मिस्टर हस्बैंड..?”
नेहा ने बेहद मासूमियत से वासुकी से सवाल किया और वासुकी ने अपने तीखे रंग ढंग में जवाब दे दिया…
” थार हैं, बच्चा नहीं है जो अकेले रह नहीं पाएगा..! घर पहुंचते ही अपने लोगों को भेज दूंगा, वह लोग यहां से इसे खींचते हुए घर ले आएंगे..!”
” पर यहां इस बीहड़ में हमारी कार मतलब आपकी थार सुरक्षित तो है ना..?”
वासुकी ने नेहा के बिना मतलब की बात पर उसे घूर कर देखा और एक ज़हरीला जवाब जड़ दिया..
” तुम उसकी देखभाल के लिए यही रुक जाओ, जब मेरे लोग आएंगे तो उनके साथ तुम भी चली आना..!”
” नो नो नो !! इस बस में मैं अपने मिस्टर हस्बैंड को अकेले नहीं जाने दे सकती… क्या पता यह लोग गन दिखा कर आप को लूट ले गए तो ? आपकी रक्षा और सुरक्षा भी तो मेरी ही जिम्मेदारी है ! आखिर आप सिंदूर हैं मेरे माथे का..!”
वासुकी को नेहा की उठ पटांग बातें सुनकर अब हंसी आने लगी थी, लेकिन उसने बहुत कोशिशों से अपनी हंसी रोकी और नेहा की कलाई पकड़ कर उसे दूसरी तरफ की एक सीट पर बैठा दिया…
” तुम्हारी बातों से एक बात समझ में आई..?”
” क्या समझ में आया मिस्टर हसबैंड..?”
” यही कि तुम सारे फालतू सीरियल बहुत ज्यादा देखती थी..!”
वासुकी की बात सुनकर नेहा जोर से हंसने लगी..
” देखती थी से क्या मतलब, मैं अब भी देखती हूं..!”
हां में गर्दन हिलाकर वासुकी ने एक बार पूरे बस पर नजर डाली… बस में उन दोनों के अलावा और कोई नहीं बैठा था….
बस का ड्राइवर अपनी सवारियों को किसी गांव में उतार कर वापस लौट रहा था….
शाम भी ढलने लगी थी, और शायद इसीलिए उसने वापसी में कोई सवारी नहीं ली थी या फिर शायद उसे वापसी की कोई सवारी नहीं मिली थी…!
बस कि एक तरफ की सीट पर वासुकी बैठा था और उसने नेहा को दूसरी तरफ बैठा दिया था ! नेहा सीट पर सामने के हाथे पर दोनों हथेलियां रखें उसमें अपना चेहरा टिकाए वासुकी को ही देख रही थी….
वासुकी ने नेहा को देखा और पूछ लिया… -“क्या हुआ.. ?”
नेहा ने ना में गरदन हिला दी… -“तो फिर इधर क्या देख रही हो.. ? उधर देखो.. !”
वासुकी के ऐसा बोलते ही बिना उल्टा जवाब दिये नेहा ने अपनी गर्दन घुमा ली और खिड़की से बाहर देखने लगी…
वासुकी को उम्मीद थी नेहा कोई अजीब सा जवाब देकर उसे घूरती बैठी रहेगी लेकिन उसकी उम्मीद से अलग नेहा ने उसकी बात मान कर अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया….
वासुकी को नेहा का ये बर्ताव अजीब तो लगा लेकिन उसी ने कहा था ऐसा करने और अब अपनी बात से पलटता कैसे.. ?
नेहा कुछ देर तक बाहर देखती बैठी रही…. उसके बाल हवा में इधर उधर उड़ रहे थे…
“क्या हुआ नेहा ? उदास हो.. ?”
आखिर वासुकी से रहा नहीं गया और उसने पूछ ही लिया और नेहा वापस उसकी तरफ चेहरा घुमा कर बैठ गयी… -” मिस करने लगे थे ना मुझे और मेरी बातों को… देखा दो मिनट के लिए खामोश क्या हुई आपको मेरी याद आने लगी, और आप मुझे इन कुछ घंटो के बाद तलाक देने की सोच रहे थे….
क्या वाकई आप मुझे छोड़ना चाहते हैं.. ?”
नेहा की इस बात पर वासुकी एकाएक कुछ न कह सका….
वो उससे क्या कहता कि अकेली वो नहीं बल्कि खुद वासुकी भी एक बड़े काम का मुहरा बस हैं…. वो चाह कर भी अब पीछे नहीं लौट सकता… !
उसने नेहा की बात का कोई जवाब नहीं दिया और यूँ ही चुप बैठा रहा…
“मिस्टर हस्बैंड आज के दिन की मेरी आखिरी ख्वाहिश भी पूरी कर दीजिये.. !”
वासुकी ने सवालिया नजरों से नेहा की तरफ देखा… जैसे उससे पूछ रहा हो कि अब क्या बचा हैं..
“मैं आपके साथ किसी छोटे से बार में बैठ कर ढ़ेर सारी शराब पीना चाहती हूँ…. बिल्कुल होश खोने तक पीना चाहती हूँ…
और सुनिए मिस्टर हस्बैंड, जब मैं बिल्कुल बेसुध हो जाऊं तब आप मुझे छोड़ कर चलें जाना…
जिससे मैं जब कल सुबह नशा उतरने पर जागूँ तो मुझे यही लगे कि मैं एक सुन्दर सपना देख कर जाग रही हूँ… !
बस आज की ये मेरी आखिरी इच्छा हैं और इसके बाद आपके काम के लिए मैं पूरी तरह तैयार हूँ.. !”
वासुकी को नेहा पर तरस आने लगा लेकिन वो वैसा ही कठोर बना रहा…
बस में बहुत पुराने गाने चल रहे थे…….
अकेला चला था मैं था मैं
ना आया अकेला,
मेरे संग संग… हाँ संग संग…
आया तेरी यादो का मेला…
बस जंगल पार कर शहर में चली आई…. बस वाले ने अब पीछे पलट कर वासुकी से कहाँ उतरना हैं पूछा और वासुकी के बताते ही उन दोनों को उतार कर वो आगे निकल गया….
नेहा ने वहीँ खुले एक छोटे से बार की तरफ इशारा किया और वासुकी जब तक उसे रोक पाता वो उस बार में घुस गयी…
नीली बैंगनी भड़कीली रोशनियों के बीच इधर उधर टेबल पर बैठे आदमी अपनी सस्ती दारू से अपना गला तर करते बैठे थे…
उन्ही के बीच से निकलते हुए नेहा भी एक टेबल पर जम गयी…
सारे आदमी नेहा को आश्चर्य से घूर रहे थे….. वासुकी ने नेहा को वहाँ घुसने से रोकने की एक नाकाम सी कोशिश की और फिर चुपचाप उसके पीछे अंदर घुस गया…
उसी टेबल पर नेहा के सामने वो भी बैठ गया…
एक आदमी कांधे पर झाड़न लिए वहाँ चला आया…..
“क्या लेंगे साब.. !”
उसके सवाल पर नेहा ने अपनी फरमाइश उसे सुना दी… और आश्चर्य से नेहा को देखते हुए वो आदमी वहाँ से चला गया…
उसने नेहा की बताई बियर वहाँ लाकर रखी और फिर वासुकी के देखते देखते नेहा ने वो पूरी बोतल अपने गले से नीचे उतार ली.. इसके बाद तो नेहा अपने मन मुताबिक शराब मंगवाती रही और अपने गले से नीचे उतारती रही ! वासुकी चुपचाप बैठा उसे देखता रहा….
बार से एक-एक करके लोग जाने लगे थे और धीरे-धीरे बार बंद करने का वक्त हो गया ! आधी रात के वक्त नीम बेहोशी की हालत में नेहा को अपने कंधों पर डालकर वासुकी वहां से बाहर निकल गया…..
नेहा जिस वक्त होश में थी उस वक्त उसने वासुकी से यह निवेदन किया था कि आज की रात वह अपने खुद के कमरे में जाना चाहते हैं ! और यह चाहती है कि वासुकी भी नेहा के कमरे में उसके साथ रुके..
बस उसी बात को याद कर वासुकी नेहा को साथ लिए अब उसके कमरे की तरफ निकल गया….!
इस बार में पहुंचने तक में ही वासुकी में फोन करके अपने आदमियों को थार लेने के लिए भेज दिया था…
और उसके आदमी उसके लिए उसकी दूसरी गाड़ी लेकर बार के बाहर उसकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे ! नेहा को साथ लेकर जब वासुकी बाहर निकला तो उसके आदमियों ने उसके हाथ में गाड़ी की चाबी सौंपी और वहां से दूसरी तरफ निकल गए…
नेहा के फ्लैट का दरवाजा खोल वासुकी नेहा को साथ लिये अंदर दाखिल हुआ और नेहा को संभाल कर उठाए हुए उसके बेडरूम की तरफ बढ़ गया..
उसने बड़े आराम से उसे पलंग पर लेटा दिया… वह पलट कर जाने को था कि नीम बेहोशी की हालत में नेहा ने उसकी कलाई पकड़ ली…-” आज मत जाओ वासुकी !”
नेहा की आवाज का दर्द वासुकी टाल नहीं पाया और उस रात नेहा के साथ ही वहीं रुक गया….
वो रात कब बीत गई उसे पता ही नहीं चला !
वासुकी गहरी नींद में सोया हुआ था…
कि तभी फोन की घंटी बजी और उसकी नींद खुल गई ! उसने अपनी बगल में देखा उसकी बांहों को तकिया बनाएं नेहा उस पर अपना हाथ लादे चैन की नींद सो रही थी…
नेहा के मासूम चेहरे को देख कर ना चाहते हुए भी उसके होंठो पर मुस्कान छा गयी…
उसने अपने बजते हुए फ़ोन को उठा लिया, दूसरी तरफ से दर्श का फ़ोन था…..
“वासुकी कहाँ हैं तू.. ?”
“क्या हुआ दर्श.. ?”
“शेखावत ने पिछले कुछ दिनों में माइंस के लिए ब्लास्ट की जो प्लानिंग की थी, वो कलेक्टर साहिबा के कानों तक पहुँच गयी हैं… और वो उस ब्लास्ट को रुकवाने खुद निकल पड़ी हैं…
वासुकी ने तुरंत अपनी घडी देखी, सुबह के चार बज रहे थे…
“वासुकी शेखावत ने ब्लास्ट का समय भी इतनी सुबह का इसलिए चुना हैं कि वहाँ रहने वाले लोग नींद में ही भगवान को प्यारे हो जाएं, अब डर इसी बात का हैं कि कहीं वो मैडम को भी हानि ना पहुंचा दें… !
“अगर शेखावत ने ऐसा किया तो वो जानता हैं अंजाम कितना खतरनाक होगा…
दर्श से बात करते करते ही वासुकी उठा और अपनी कमीज़ पहन कर तुरंत कमरे से बाहर निकल गया…
“दर्श मैं शेखावत कि साईट पर जा रहा हूँ.. तू भी वहीँ आ जा.. !”
“मैं तो मैडम की गाड़ी के पीछे ही हूँ वासुकी… तुझे बताता रहूँगा… तू बस जल्दी आ जा.. !”
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आखिर बतायें हुए पते पर समर और पिया पहुँच ही गए…..
एक बड़े से मिशनरी अस्पताल के पीछे कॉलोनी सी बनी थी…. अस्पताल से जुड़े लोग ही वहाँ रहा करते थे.. !
जिन मरीज़ो का लम्बा इलाज चलता था और अस्पताल में कमरे कि किल्लत हो उन्हें उस कॉलोनी में बने हॉस्टल में कमरा दें दिया जाता था..
समर इधर उधर पूछताछ करता तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा था और उसकी बेसब्री देख कर पिया का गुस्सा सांतवे आसमान पर चढ़ता जा रहा था…
अस्पताल के स्टाफ से पूछताछ में मालूम चला कि रेवन नाम कि मरीज़ पीछे बने हॉस्टल में रह रही हैं…
ये जानकारी मिलते ही समर कि बेचैनी और भी ज्यादा बढ़ गयी….
वो उसके बारे में सब कुछ जान लेना चाहता था… रेवन के बारे में रिसेपशन पर इतना ही मालूम चला… समर उससे मिलने वहाँ से निकलकर हॉस्टल कि तरफ बढ़ने ही वाला था कि सामने से आते डॉक्टर से टकराते टकराते बचा….
डॉक्टर ने उसे सवालिया नज़रों से देखा और उसका नाम पूछ लिया…
डॉक्टर डच था लेकिन सामने खड़े हिंदुस्तानी समर को देखकर वह समझ गया कि समर डच भाषा नहीं समझ पाएगा और इसीलिए उसने इंग्लिश में ही उससे बातचीत करनी शुरू की…
समर का नाम जानते ही वो डॉक्टर रेवन के बारे में उसे सारी जानकारी देने लगा….
उस डॉक्टर के मुताबिक रेवन एक ऐसी अनुवांशिक बीमारी से जूझ रही थी जिसमें दिन-ब-दिन उसकी शारीरिक ताकत कम होती जा रही थी ! इसके साथ ही उसके अंदरूनी सारे अंग धीरे धीरे काम करना बंद करने लगे थे ! वह किडनी फैलियर की कंडीशन में पूरी तरह से जा चुकी थी…
उसके बाक़ी अंग भी मुश्किल से दस से बीस प्रतिशत ही काम कर रहे थे..
और अब उसका ज़िंदा रहना मुश्किल था !
डॉक्टर के अनुसार रेवन साल भर पहले एक छोटे से बच्चे के साथ इस अस्पताल में आई थी, अपना इलाज करवाने…..
पहले तो बहुत समय तक उसकी बीमारी का ही पता नहीं चला लेकिन फिर ढेर सारी जाँच पड़ताल के बाद उसकी इस बीमारी का केंद्र बिंदु पकड़ में आया था ! और उसके बाद से ही इस अस्पताल में रेवन का इलाज चल रहा था ! रेवन के पास जितनी भी जमा पूंजी थी वह उसके इलाज पर खर्च हो चुकी थी…
रेवन इस सब के पहले एक अच्छी नौकरी में थी और अपना और अपने बच्चे का भरण पोषण खुद अपने दम पर कर लिया करती थी….
लेकिन इस बीमारी ने उससे उसका सब कुछ छीन लिया था ! शुरुआती 2 महीने उसे उसके ऑफिस से उसकी तनख्वाह के साथ छुट्टियां मिल गई थी, लेकिन बाद में बिना तनख्वाह के भी छुट्टियां मिलना नामुमकिन हो गया था !
और फिर रेवन को उसके ऑफिस से निकाल दिया गया था…
यह तो अच्छी बात थी कि नीदरलैंड की सरकार बच्चे के भरण-पोषण का खर्च दिया करती थी और इसीलिए रेवन को अपने इलाज और खर्चे के लिए पैसों का मोहताज नहीं होना पड़ा था, लेकिन साल बीतते बीतते उसकी हालत बेहद खराब होने लगी थी और उसे अपने बाद अपने बच्चे की चिंता सताने लगी थी..!
यहां नीदरलैंड सरकार के नियम बच्चों के मामले में बहुत कड़े थे ……
यहां के नियमों के मुताबिक बच्चे के अभिभावकों में से अगर कोई एक ना रहे तब दूसरा अभिभावक ही उस बच्चे का पालन पोषण कर सकता है, उन दोनों के ना रहने पर बच्चे को चाइल्ड होम भेज दिया जाता है..
मैंने रेवन को समझाने की कोशिश की कि वह अपने बेटे को चाइल्ड होम भेज सकती है, लेकिन जाने क्यों वह चाइल्ड होम भेजने को तैयार ही नहीं है! बाद में उसने बातों में एक बार बताया कि उसके माता-पिता भी उसकी बहुत छोटी उम्र में गुजर गए थे और अपने अंकल के साथ गुजर-बसर नहीं कर पाने के कारण उसे कुछ समय के लिए चाइल्ड होम में भी रहना पड़ा था जहां उसने काफी कुछ झेला था और इसीलिए शायद उसे चाइल्ड होम पर भरोसा नहीं था…
उसने एक बार पूछा भी कि क्या वह अपने किसी दोस्त को अपना बच्चा दे सकती है..? तब मैंने उसे यहां की सरकार के कड़े और कठोर नियमों के बारे में साफ शब्दों में बता दिया था कि बच्चा किसी एक अभिभावक की ही जिम्मेदारी होता है !और किसी भी ऐसे दोस्त को जो इस देश का नागरिक नहीं है बच्चा नहीं दिया जा सकता…!
उसके बाद से ही रेवन बहुत ज्यादा परेशान रहने लगी थी ! लेकिन अभी 2 दिन पहले बातचीत में उस ने बताया कि बच्चे का पिता जल्दी ही बच्चे को लेने आने वाला है और तब उसने मुझे तुम्हारे बारे में बताया…!”
समर को डॉक्टर से यह सारी जानकारी सुनकर रेवन पर बहुत तरस आने लगा था ! अगर रेवन उसे वाकई अपना सबसे अच्छा और खास दोस्त मानती थी, तो आज तक उसने अपनी इतनी बड़ी बीमारी और अपने बच्चे के बारे में कुछ भी क्यों नहीं बताया ? बस यही सोच कर समर दुःखी हो गया था…
समर और डॉक्टर की बातचीत के बीच ही पिया इधर-उधर घूमती अस्पताल के परिसर से निकलकर हॉस्टल की तरफ बढ़ने लग गई थी, और इसीलिए वह डॉक्टर की सारी बातें नहीं सुन पाई थी….
डॉक्टर से सारी बातें सुनने के बाद समर रेवन से मिलने के लिए और भी ज्यादा बेचैन हो उठा ! डॉक्टर से उसका पता पूछ कर समर तुरंत हॉस्टल की तरफ आगे बढ़ गया ! पिया धीमे-धीमे कदमों से हॉस्टल की तरफ जा रही थी कि तभी उसकी बगल से एक तरफ से दौड़कर समर आगे निकल गया और उसके साथ ही डॉक्टर भी समर के पीछे पीछे चलते हुए आगे बढ़ गया…
समर की यह बेचैनी और बेसब्री पिया के समझ से बाहर थी…
वह भी तेज कदमों से उन दोनों के पीछे चलती आगे बढ़ गई…
रेवन के कमरे के बाहर पहुंचकर डॉक्टर ने बहुत हल्के हाथों से दरवाजे पर दस्तक दी.. अंदर से एक भीगी सी और कमजोर सी आवाज बाहर चली गई…
इसके साथ ही डॉक्टर ने धीमे से दरवाजा खोल कर अंदर प्रवेश कर लिया उसके पीछे ही समऱ, पिया भी रेवन के कमरे में चले आए….
उस उस पूरे कमरे में एक मनहूस मुर्दनी छाई हुई थी.. कमरे की दीवारों और पर्दों के पीले रंग से मिलता-जुलता रेवन का पीला रंग उसकी कमजोरी और उसकी बीमारी को बयां कर रहा था…
रेवन इतनी कमजोर हो चुकी थी कि पलंग से हिलने में भी उसे दिक्कत आ रही थी ! ऐसा लग रहा था उसके लिए अपनी पलकों को ज्यादा देर तक खुला रखना भी बहुत मशक्कत का काम था…!
समर को देखते ही रेवन के चेहरे पर राहत वाले भाव चले आए और अपने साथ आए डॉक्टर और पिया की परवाह किए बिना समर आगे बढ़कर रेवन की हथेली पकड़कर उसके पलंग के बगल में रखे स्टूल पर बैठ गया….
रेवन का बुझा हुआ सा चेहरा देखकर जाने क्यों पिया के दिल की कसक और भी ज्यादा बढ़ गई…
अगर कोई बहुत सुंदर सी लड़की होती तो एक बार पिया को समऱ और रेवन की मोहब्बत का कारण समझ में भी आ जाता, लेकिन इतनी साधारण सी शक्ल सूरत वाली इस लड़की से अगर समर प्यार करता है तो वाकई उसका प्यार बहुत ज्यादा गहरा था जिसमें रूप रंग का कोई महत्व नहीं था और आज रेवन के दर्द को समर के चेहरे पर देख कर पिया का रहा सहा धैर्य भी ढह गया…
अपने आंसू संभाल ना पाने के कारण पिया चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई….
समर रेवन का हाथ पकड़े बैठा उसके बहते आँसुओ में अपने आंसू मिलता रहा… और एक कोने में खड़ा डॉक्टर उस अजूबी जोड़ी को देख चुप सा सोचता रह गया कि जाने इस सबका अंजाम क्या होना हैं….
क्रमशः
aparna…..
