
जीवनसाथी -2 भाग – 50
नेहा को मंदिर दर्शनों में लिए जाना था इसलिए वासुकी वहाँ से उसे मंदिर की तरफ लें गया…
मंदिर के बाहर गाड़ी खड़ी कर वो गाड़ी से उतर कर मंदिर की ओर बढ़ने लगा कि उसका ध्यान अपने साथ चलती नेहा के पैरों पर गया… उसने देखा नेहा ने पैर से चप्पलें उतार कर गाड़ी में छोड़ दी थीं..
वासुकी ने नेहा से कोई सवाल नहीं किया, इतना तो वो भी समझता था कि भगवान के द्वार पर दर्शन के लिए खड़ा बंदा चप्पलें नहीं पहना करता, लेकिन दर्शनों के लिए चढ़ी जाने वाली नवासी सीढ़ियां बिना चप्पलों के चढ़ने के पीछे भक्त की आस्था और विश्वास का सोच पाना मुश्किल था…
उसे पहली मुलाकात में नेहा जैसी लगी थीं वैसी वो थीं नहीं…
नेहा के साथ साथ चलता वो भी उस दुकान के सामने रुक गया जहाँ नेहा ऊपर मंदिर में चढाने के लिए फुल माला नारियल अगरबत्ती की टोकरी खरीद रही थीं…
नेहा तो अपने हाथ में छोटी सी टोकरी थामे आगे बढ़ गयी लेकिन पीछे से दुकानदार को पैसे देकर वासुकी ने अपने जूते और मोज़े भी उसी दुकान पर उतार कर छोड़ दिये…
नेहा ने कुछ कहने के लिए अपने साथ चल रहे वासुकी कि तरफ देखा, तब उसे मालूम चला कि वासुकी ज़रा पीछे रह गया है…
“क्या हो गया मिस्टर हस्बैंड.. ? आप वहाँ कहाँ रह गए.. ?”
“आ रहा हूँ.. ! पैसे दें रहा था.. !”
“हम्म देखा मैंने.. !” नेहा कि नजर नंगे पैर आते वासुकी पर पड़ी और उसके चेहरे पर शातिर सी मुस्कान खेल गयी…
” आपको पता है मिस्टर हस्बैंड, आप बड़े स्वीट हस्बैंड है.. ?”
“शट अप !”
“देखा मेरी ज़बान भी कितने प्यार से बंद करवा रहे.. !”
“तुम थोड़ी देर भी चुप नहीं रह सकती क्या.. ?”
“ना.. ! मैंने कहीं सुना था किसी फिलोसफर ने कहा है कि कान हमारे पास दो हैं और मुहँ एक इसका मतलब है कि ज्यादा सुनो और कम बोलो.. पर मेरा मानना है उसी मुहँ में एक लम्बी सी ज़बान और बत्तीस दाँत भी तो हैं, फिर क्यों कम बोले… ? बत्तीस गुना क्यों ना बोले.. ?”
वासुकी ने एक नजर घूर कर नेहा को देखा और नेहा ने वापस उसे छेड़ दिया…
“हाय… इस अदा से ना देखा करो मिस्टर हस्बैंड, आपकी ये अदायें हमारी जान ले जाएगी… वो गाना है ना
इस प्यार से मेरी तरफ ना देखो प्यार हों जायेगा..
ये प्यार हों गया तो तीर दिल के पार हों जायेगा… “
“पागल हों गयी हों क्या… ? मैंने प्यार से कब देखा तुम्हे.. ?”
” जैसे भी देखते हों, बस कमाल कर देते हों देख कर… !”
वासुकी मुहँ चढ़ा कर आगे बढ़ गया… वो तेज़ तेज़ कदमों से सीढ़ियां चढ़ता जा रहा था.. उसकी बराबरी में पहुँचने के लिए नेहा भी तेजी से उसकी तरफ भागती हुई आगे बढ़ी और उस तक पहुँचते ही पैर में पत्थर चुभने से अपना संतुलन खो कर गिरने को थीं कि वासुकी ने पलट कर उसे संभाल लिया.. लेकिन इस सब भाग दौड़ में नेहा का पैर बुरी तरह मुड़ कर मोच खा गया….
उस मोच और चोट के बावजूद मंदिर जाने के लिए नेहा अपना सारा ज़ोर लगा कर खड़ी हुई लेकिन पैर मुड़ जाने के कारण होने वाले दर्द से तिलमिला कर वहीँ बैठ गयी…
उसकी आँखों में आँसू छलक आया…
“क्या हुआ.. ? निकल गयी सारी होशियारी.. ? और बनो हीरोइन.. ? क्यों उतना उछल कूद मचा रही थीं.. ?”
नेहा ने लाचारी से वासुकी की तरफ देखा और सर नीचे कर अपना पैर सहलाते बैठ गयी… धीमे से नीचे देखते हुए ही उसने वासुकी को आवाज़ लगायी…
“मिस्टर हस्बैंड ! मेरा तो अब ऊपर चढ़ना मुश्किल है.. आप ही दर्शन कर लीजिये.. !”
“मुझे ऐसा कोई खास शौक नहीं था… मैं तो तुम्हारे कारण ही आया था.. !
“लेकिन अब मैं नहीं जा पाऊँगी.. ! एक कदम उठाना भारी पड़ रहा है.. सीढ़ियां चढ़ना तो असम्भव ही है.. “
एक गहरी ठंडी आह भर कर वो लाचारगी से नीचे ज़मीन को ताकती बैठी थीं कि उसे लगा वासुकी उसकी तरफ क्यों आ रहा है…
वासुकी उसके ठीक सामने आ कर खड़ा हों गया… नेहा ने आँखे उठा कर उसकी तरफ देखा और एक झटके में वासुकी ने झुक कर नेहा को अपनी बाँहों में उठा लिया…
नेहा कुछ समझ पाती तब तक वो उसे गोद में लिए पलट कर सीढ़ियों कि तरफ बढ़ गया…
लम्बे लम्बे डग भरता वासुकी इतनी आसानी से उसे लिए चलता जा रहा था जैसे उसकी गोद में कोई छोटी बच्ची हों…..
वासुकी के गले में अपनी बाहें डाले नेहा धीमे धीमे मुस्कुरा रही थीं…
मुस्कुराते हुए उसने धीरे से गुनगुनाना शुरू कर दिया…
होने दे रे, जो ये जुल्मी है, पथ तेरे गाँव के
पलकों से चुन डालूँगी मैं, कांटे तेरे पाँव के
लट बिखराए, चुनरियाँ बिछाए
बैठी हूँ मैं, तेरे लिए
आजा पिया…तोहे प्यार दूँ
गोरी बय्याँ, तोपे वार दूँ
किसलिए तू, इतना उदास?
सूखे सूखे होंठ, अखियों में प्यास
किसलिए, किसलिए….
नेहा वासुकी कि आँखो को तकते हुए अपना गीत गुनगुना रही थीं और वासुकी सीढ़ियां चढ़ता जा रहा था…
नेहा ने अपने आंचल से वासुकी के माथे पर छलकता पसीना पोंछ दिया और वापस गुनगुनाने लगी… कि वासुकी उस पर बरस पड़ा…
” तुम चुप रहने का क्या लोगी.. ?”
नेहा ने शरारत से उसे देखा और अपनी एक ऑंख दबा कर मुस्कुराने लगी…
“पहले पक्का प्रॉमिस कीजिये कि आप देंगे.. !”
वासुकी नेहा कि ये बात सुन और नाराज़गी से उसे घूरने लगा… और नेहा हंसने लगी…
“डर गए, डर गए मिस्टर हस्बैंड डर गए…!”
बच्चो जैसे तालियाँ बजाती नेहा की ये हरकत देख वासुकी वापस उसे घूरने लगा…
” ये क्या बच्चो जैसी हरकत है.. ?”
“ये हरकत आपको बच्चो जैसी लग रही है… ? ठीक है मंदिर दर्शनों के बाद जब घर चलेंगे तब एडल्ट्स वाली हरकते करने लगूंगी… खुश.. !!”
“थकती नहीं हों इतनी नॉनसेंस टॉक कर के.. !”
“ना बिल्कुल नहीं.. ! इसी नॉनसेंस पर तो पी एचडी की है मैंने.. ! वैसे अगर मेरी बातें इतनी बुरी लग रही तो मैं गाना ही गा लेती हूँ… आप जो बोलो.. अच्छा चलो मेरी एक ऊँगली चुन कर बताओ.. !”
नेहा ने अपनी दो उँगलियाँ वासुकी के सामने खोल दी..
“कहाँ से चुन के बताऊँ.. ?तुम्हारी उँगलियाँ चुनने के चक्कर में तुम्हारी हड्डी टूट जाएगी.. !”
“ओह्ह माय स्वीटहार्ट हस्बैंड ! मेरा कितना ख्याल है न आपको.. !
आपको मेरी उँगलियाँ चुनने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है, उँगलियों के नाम भी रखें हैं हमारे हिन्दुस्तान में भी और अंग्रेज़ो ने भी.. तो आप बिना अपने हाथ से ईशारा किये भी एक ऊँगली चुन सकतें हैं… इंडेक्स या मिडल फिंगर.. !”
“मुझे तुम्हारे ये बचकाने गेम्स नहीं खेलना.. !”
“समझ गयी.. मिस्टर हस्बैंड को बचकाने गेम्स पसंद नहीं उन्हें बड़ों वाले यानी कल रात वाला गेम ही खेलना है शायद.. !”
“शटअप यू इडियट !”
“हाय आपके मुहँ से तो ये शट अप भी कितना भला भला सा लगता है… दिल करता है बस मैं यूँ ही सारी ज़िन्दगी बकवास करती रहीं और आप यूँ ही मुझे शट अप करवाते रहे….. !”
वासुकी ने वापस उसे घूर कर देखा…. -” ऐसा करो तुम गाना ही गा लो…. क्योंकि गाना नहीं गाओगी तो यूँ ही बकवास करोगी फिर… !”
नेहा ने हाँ में गर्दन हिला दी….
बातों ही बातों में दोनों सारी सीढ़ियां पार कर ऊपर पहुँच गए…. सीढियों के बाद आगे बढ़ता वासुकी नेहा को उसी तरह गोद में उठाये हुए ही मंदिर की तरफ बढ़ गया…
आसपास के लोग उन दोनों को देख देख कर मुस्कुरा रहे थे…
मंदिर के द्वार पर पहुँच कर वासुकी ने नेहा को संभाल कर नीचे उतार दिया…
नेहा ने आगे बढ़ने की कोशिश की और पैर की मोच के कारण लड़खड़ा गयी…
उसने वासुकी की बांह थाम ली…
दोनों महादेव की विराट प्रतिमा के सामने खड़े थे… श्रद्धा से नेहा ने आँखे मूंद ली और हाथ जोड़ लिए.. वो मन ही मन अपने इष्ट से प्रार्थना करती होंठो ही होंठों में कुछ बुदबुदाती रही और वासुकी उसे देखता रहा…
धीमे से बंद आँखों में ही नेहा ने उसे टोक दिया… – मिस्टर हस्बैंड अपनी ब्यूटीफुल वाइफ को घूरना बंद कीजिये और भगवान के सामने हाथ जोड़ लीजिये.. !”
नेहा की बात सुन वासुकी पल भर को झेंप गया….
और दूसरी तरफ देखने लगा…
नेहा ने मुस्कुरा कर आँखे खोली और वासुकी के दोनों हाथ पकड़ कर महादेव की प्रतिमा के सामने जुड़वा दिये…
“इन्हे नमन कर आप छोटे नहीं हों जायेंगे ! इनकी ताकत का आपको अंदाज़ा भी नहीं है.. ये न्यायप्रिय इतने हैं कि अच्छे अच्छों का घमंड पल भर में चूर कर देते हैं और भोले ऐसे हैं कि मांगने वाले कि झोली भर देते हैं…
आप भी अपने अब तक के पापों का प्रायश्चित कर लीजिये… ख़ून तो आपने भी कम नहीं बहाया है.. !”
नेहा अपने मन की बात कहती रही और उस प्रस्तर प्रतिमा के सम्मोहन में बंधा वासुकी वाकई अपने जुड़े हाथों के साथ अपने मन का सारा क्लेश उस मूर्ति के सामने बहा देने को आतुर हों उठा…
बचपन में समाज से मिला तिरस्कार, अपनी माँ की अकाल मुत्यु, अपने पिता के साथ हुआ छल कपट, अपने साथ हुई नाइंसाफी, अपने अंदर पनपता क्रोध, सारे संसार को जला कर राख देने की बलवती इच्छा, और अंत में बाँसुरी का मासूम सा चेहरा….
ये जानते हुए भी कि वो किसी और कि पत्नी है उसके लिए अपने मन में आया अनुराग.. सब कुछ उस पल में शिव के सामने समर्पित कर देने को वो व्याकुल हों उठा…
मन में एक झंझावात सा उठा और लगा यही इन्हीं चरणों में अपना माथा रख दें… जाने क्यों देह के अंदर उबलती सारी भावनाएं आँखों के रास्ते बह कर बाहर निकलने को व्याकुल हों उठी और कहीं वो आँखों से बह ना निकले इस डर से वासुकी ने घबरा कर आँखे खोल दीं….
नेहा अपलक उसे ही देख रही थीं…
वासुकी के मन में चलते द्वन्द से वो भी परिचित थीं लेकिन वासुकी कि असल पीड़ा क्या थीं ये कोई नहीं जानता था…
ना दर्श ना नेहा और ना काका.. !
अपनी पीड़ा अपने कष्ट का अकेला गवाह वो अपने मन कि उन संकरी अलियों गलियों का अकेला स्वामी था….
नेहा ने आगे बढ़ कर उसके जुड़े हाथों को अपने हाथों में लेकर अपने माथे से लगा लिया…
वासुकी ने एक नजर नेहा को देखा और मुड़ कर बाहर जाने को था कि पंडित जी ने उन दोनों को आवाज़ लगा दी…
“यहाँ आइये… भगवान का आशीर्वाद लेकर जाइये.. !
नेहा मुस्कुरा कर वासुकी कि बाहें थामे पंडित जी तक पहुँच गयी… नेहा के सर पर हाथ रख कुछ मन्त्र पढ़ कर पंडित जी ने शिव मूर्ति के चरणों पर रखी फूलों कि माला के साथ नारियल सिंदूर सब कुछ नेहा के हाथ में रख दिया…
“सदा सौभाग्यवती भव ! चिरंजीव भव !”
उनका आशीर्वाद सुन प्रसन्नता से पुलकित नेहा ने झुक कर पंडित जी के पैर छू लिए और उन्होंने उसके सर पर हाथ रख आशीर्वाद कि झड़ी लगा दी.. -“शीघ्र ही संतान प्राप्ति हों ! “
नेहा मुस्कुरा कर उठ गयी… -” धन्यवाद पंडित जी !”
“धन्यवाद देने से काम नहीं बनेगा बेटी… अपनी संतान को यहाँ लेकर ज़रूर आना….. महादेव का रक्षा सूत्र बांध देंगे उसे, जो सदा उसकी रक्षा करेगा.. !”
नेहा ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिलाया और वासुकी की तरफ देखने लगी… -” सुन लिया मिस्टर हस्बैंड ! मैं रहूँ न रहूँ मेरे बच्चे को आपको यहाँ लेकर आना ही होगा.. !”
वासुकी ने एक नजर नेहा को देखा और मंदिर से बाहर निकल गया….
नेहा भी अपने हाथ में प्रसाद की टोकरी लिए किसी तरह अपने पैर को सहारा देती बाहर चली आयी…
वासुकी ने उसे देखा और उसकी तरफ चला आया… -” सीढ़ियां उतरते बनेगा या… ?”
“आप फिर से गोद में उठाना चाहते हैं मुझे.. ?”
“मुझे ऐसा कोई शौक नहीं है.. ! तुम खुद चल सकती हों तो आ जाओ, मैं जा रहा हूँ.. !”
” सुनिए मिस्टर हस्बैंड उधर लेफ्ट में डोला है इलेक्ट्रिक से चलने वाला.. उसमें बैठकर हम आराम से नीचे उतर सकते हैं..!”
नेहा ने शरारत से मुस्कुराते हुए वासुकी को अपने लेफ्ट की तरफ इशारा किया और वासुकी ने जैसे ही उस तरफ देखा वह गुस्से से नेहा को घूरने लगा….
नेहा को घूरते हुए वासुकी उस डोले की तरफ बढ़ गया और उसके पीछे धीरे-धीरे लंगड़ाती हुई नेहा भी चली आई…..
डोले के आसपास खड़े लोग वासुकी को पहचानते थे इसलिए डोले में जैसे ही नेहा और वासुकी बैठे बाकी लोग अंदर जाने की हिम्मत नहीं कर सके…
लोगों को लगा कि पता नहीं वासुकी जैसा बड़ा आदमी साधारण आम लोगों के साथ बैठना चाहेगा या नहीं इसलिए डोले वाले ने बाकी लोगों को दूसरे डोले में जाने का इशारा किया और वासुकी और नेहा के डोले को अकेले ही रवाना कर दिया…
” तुम्हें इस क्रेडल के बारे में पता था..?”
नेहा ने हां में सर हिला दिया..
” जब हम ऊपर चढ़ रहे थे तब क्यों नहीं बताया…?”
“मेरी मर्ज़ी.. ! वैसे उस वक्त मुझे चेन्नई एक्सप्रेस मूवी का सीन याद आ गया था, और मैंने सोचा मेरे मिस्टर हस्बैंड तो शाहरुख़ से कहीं ज्यादा स्ट्रांग और मस्कुलर हैं तो मुझे उठा कर तो आराम से चढ़ ही लेंगे.. बस इसलिए.. !”
“बेवकूफ लड़की.. ! वो फिल्म थीं.. ये असल जीवन है… फिल्मों और ज़िंदगी में अंतर होता है.. !”
“सही कह रहे हैं आप ! फिल्मों में भले ही अमिताभ दूसरे की बीवी रेखा को देख कर गा सकता है… ये कहाँ आ गए हम यूँ ही साथ साथ चलते !
और रेखा यानी किसी और की बीवी जवाब भी दें देती है.. – तेरी बाँहों में हैं जानम मेरे जिस्म ओ जां पिघलते.. ! लेकिन असल ज़िन्दगी में ऐसा नहीं होता मिस्टर हस्बैंड… एक बार जो आपके पल्ले बंध गयी फिर ज़िंदगी भर उसी के साथ अपना सर फोड़ना होता है.. !”
वासुकी नेहा की बात सुन कुछ कह नहीं पाया…और बाहर की तरफ देखने लगा…
नेहा खुद भी अपनी बात कह दुःखी हों गयी, उससे भी फिर कुछ नहीं कहा गया….
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नीदरलैंड्स पहुँच कर समर और पिया अपने पहले से बुक्ड होटल में पहुँच गए…. थकान दोनों को ही थीं, लेकिन थकान से ज्यादा समर को रेवन से मिलने की जल्दबाजी थीं…
कमरे में पहुँच कर वो तुरंत वहाँ का लोकल सिम अपने मोबाइल पर डाल कर रेवन का नंबर लगाने लगा… उसे ऐसा करते देख पिया के चेहरे पर और भी ज्यादा नाराज़गी पसर गयी पर उसने समर से कुछ कहा नहीं और चुपचाप फ्रेश होने चली गयी…
पिया नहा कर बाहर निकली तब तक में समर ने रेवन से बात कर के उसका पता ठिकाना सब कुछ नोट कर लिया था… पिया के निकलते ही वो वाशरूम में घुस गया……
“पिया मेरे नहा कर आते में तुम कुछ खाने के लिये ऑर्डर कर दो… सर्विंग में भी ये लोग बहुत समय लगाएंगे… और वक्त नहीं है हमारे पास.. !”
पिया को यहाँ पहुँच कर समर की हर बात पर गुस्सा आ रहा था… वो उसके साथ चली तो आई थीं लेकिन इस शहर में कदम रखते ही उसे यहाँ की हर एक जगह पर रेवन ही नजर आ रही थीं…
एक विदेशिनी के प्यार में पड़े अपने पति के बच्चे और उसकी प्रेयसी से मिलने पर उसका खुद का रिएक्शन कैसा होगा वो यही नहीं समझ पा रही थीं…
उसने समर पर किसी तरह से भी अपना गुस्सा निकाला नहीं था और इसलिए उसके दिल ही दिल में जमा होता उसका गुस्सा एक खामोश सिसकी में बदल गया था… एक ऐसे नासूर में बदल गया था जिसका फ़िलहाल कोई मरहम ना था…..
उसने समर की बात सुन कर भी अनसुनी कर दी और जींस पर एक स्वेटर पहनकर ऊपर से एक ओवरकोट और नीचे बूट्स पहन कर तैयार हो गई…
वह अपने फोन पर अपने हॉस्पिटल और पेशेंट की की जानकारी लेती बैठी थी, समर नहा कर निकला और उसने देखा कि अब तक पिया ने उसकी बात सुनकर नाश्ता नहीं मंगवाया था !
समर खुद भी पिया की हालत समझ रहा था लेकिन था तो वह भी एक पुरुष ही, कितना भी समझदार हो कितना भी दिमाग वाला हो, भले ही उसने पिया से प्रेम विवाह किया था लेकिन इसके बावजूद कहीं ना कहीं पिया के बर्ताव के कारण उसका पौरुषत्व आहत हो रहा था ! उसका स्वाभिमान बात-बात पर अचानक टूटकर बिखरता जा रहा था और यही बात समऱ को परेशान किए हुए थी…..
तैयार होने के बाद उसने पिया की तरफ देखा और उसे चलने को कह कर कमरे से बाहर निकल गया…
नीदरलैंड्स में उस वक्त गजब की ठंड पड़ रही थी और पिया हाथों में ग्लव्स पहने बिना ही समर के साथ बाहर निकल गई….!
होटल की तरफ से समर ने पहले ही गाड़ी बुक कर रखी थीं… समर ने उसे रेवन का पता बताया और गाड़ी में बैठ गया…
समर ने गाड़ी वाले को रास्ते में एक कैफे में गाड़ी रोकने को कहा और खुद गाड़ी से उतरकर कैफे की तरफ बढ़ गया ! पिया कुछ देर तो गाड़ी में बैठी रही लेकिन फिर मन मारकर वह भी समर के पीछे उस कैफे में दाखिल हो गई….
समर ने वेटर को बुलाकर अपने लिए एक कॉफी और सैंडविच का ऑर्डर दे दिया…-” तुम्हें जो भी खाना है अपना आर्डर दे दो..!”
समर का इतना रूखा व्यवहार पिया की समझ से बाहर था ! उसके हिसाब से तो समऱ ने गलती की थी फिर वह क्यों इतनी तुनक मिजाजी दिखाने लगा था ?
क्योंकि पिया का गुस्सा पिया की नजरों में जायज था ! जब समर ने उसे अपने और रेवन की सारी सच्चाई बताई नहीं थी तो पिया से वो कैसे समझदारी और प्यार की उम्मीद कर रहा था…-” मुझे भूख नहीं है, मैं कुछ नहीं खाऊंगी..!”
समर ने एक नजर पिया को देखा और दूसरी तरफ मुंह फेर लिया..-” मत खाओ.. !”
धीरे से होठों होठों में बुदबुदा कर समर एक सर्द सी आह छोड़कर अपनी टेबल पर खड़ा हो गया..
उसने वेटर को बुलाकर अपना आर्डर कैंसिल किया और पैसे टेबल पर ही छोड़ कर वहां से बाहर निकल गया…
पिया को एक पल को बुरा तो लगा कि समर ने उसके कारण कुछ खाया नहीं लेकिन अपनी उस भावुकता को अपने गुस्से की आग से दबाकर पिया भी पैर पटकती समर के पीछे बाहर निकल गई ! दोनों के कैब में सवार होते ही कैब वाला गाड़ी को समर के दिए पते की तरफ भगा ले गया….
क्रमशः
aparna….
