
जीवनसाथी 2 भाग 46
शाम ढलने लगी थी और वासुकी के ठीक बगल में बैठी नेहा मुस्कुराकर वासुकी के कंधे से टिक गयी.. वासुकी साँस रोके चुप बैठा रहा और गाड़ी वासुकी मेंशन की तरफ आगे बढ़ गई…
घर के मुख्य द्वार पर पहुंचते ही वासुकी आगे बढ़कर अंदर जाने लगा कि नेहा ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक दिया…
” इतनी जल्दी क्या है मिस्टर हस्बैंड, रुकिए दरवाजे पर… !”
नेहा ने काका और दर्श को अंदर जाने का इशारा किया.. -” काका आप अंदर जाकर मंदिर से एक थाली में दिया एक बड़े कलश में पानी थोड़े से चावल और कुमकुम का तिलक लेकर आइए.. !”
” जी बहु जी मैं अभी आया.. !”
काका फटाफट अंदर चले गए लेकिन घर पर ऐसा कोई मंदिर तो था नहीं वासुकी पूरी तरह से नास्तिक था और भगवान में उसका कोई विश्वास नहीं था..
दर्श भी पूजा पाठ में कुछ खास रुचि नहीं लेता था..
काका ने ही जरूर एक दो बार इन दोनों लड़कों को इस बात के लिए टोका था लेकिन जब इन्होंने कान ही नहीं दिए तो काका भी चुप रह गए इसलिए उन्हें दीया बाती सब कुछ ढूंढने में बड़ी दिक्कत होने लगी..
उन्होंने रसोई से एक छोटी सी कांसे की थाली निकाली और उस पर कहीं से ढूंढ ढांढ कर एक कैंडल निकाल कर रख ली.. एक बड़े कटोरे में चावलों का ढेर लिया और एक बड़े कलश में पानी लेकर बाहर आ गये…
वासुकी को यह सब देखकर अंदर ही अंदर ढेर सारी झुंझलाहट हो रही थी लेकिन वह समझ चुका था कि अब नेहा को किसी भी बात पर टोकने का कोई मतलब नहीं था…
नेहा उसके टोकने के बावजूद उसे धमकी देकर अपने मन की करवा ही लेगी इसलिए वह चुपचाप हाथ बांधे खड़ा था….
उसके अंदर की झुंझलाहट बेशक उसके चेहरे पर नजर आ रही थी और जिसे देख देख कर नेहा के चेहरे की मुस्कान और चौड़ी होती जा रही थी…
काका जैसे ही सब कुछ लेकर दरवाजे पर पहुंचे उन्हें दरवाजे के भीतर ही हाथ दिखाकर नेहा ने रोक दिया…
” काका अब इस थाली से नए जोड़े की आरती उतार लीजिए…
हम दोनों को तिलक लगाने के बाद इस पानी के कलश को 7 बार मेरे पतिदेव के ऊपर से उतार कर बाहर जाकर एक तरफ फेंक दीजिएगा | इससे इन्हें लगी कोई भी अला बला बुरी नजर दरवाजे के बाहर से ही वापस लौट जाएगी…
इसके बाद यह चावलों के कटोरे को जमीन पर रखियेगा जिसे मैं धीरे से एक पाँव से सरका कर भीतर चली आऊंगी…!”
काका ने सब कुछ नेहा के कहे मुताबिक कर दिया.. और नेहा चावलों को धीरे से अपने पैर से टकराकर बिखेर कर अंदर चली आई ! उसके अंदर आते ही दर्श और काका दोनों धीमे-धीमे हाथों से तालियां बजाते हुए उस का उत्साह बढ़ाते उसका स्वागत करने लगे …..
” तुम्हारा बहुत-बहुत स्वागत है नेहा..! वैसे एक बात कहूं जब तुमसे पहली बार पब में मिला था तब मुझे नहीं लगा था कि तुम इतनी संस्कारी लड़की होंगी.. आई मीन तुम्हें यह सारे रिचुअल्स पता है..?”
” संस्कारों का तो पता नहीं दर्श लेकिन यह सारे रिचुअल्स मुझे फिल्मों और टीवी सीरियल्स में देख देख कर याद हो गए हैं…
अब तो मैं टीवी नहीं देखती लेकिन जब बहुत छोटी थी तो मम्मी अक्सर टीवी पर ऐसे ही सारे सीरियल देखा करती थी…
जिसमें चेहरे पर खूब सारा मेकअप पोत कर दुल्हने ऐसे ही अंदर आती थी…
वह एक बार पैर से चावल गिराती थी और 7 बार उस सीन को दिखाया जाता था…
तब मुझे लगता था यह बहुत इंपॉर्टेंट सीन है..! मुझे आज भी इस रिचुअल का कोई मतलब नहीं पता लेकिन ऐसा करते मैंने टीवी पर देखा है… बस इसीलिए फॉलो कर लिया..!”
” क्या बात है… ! तब तो एक और रिचुअल भी देखा होगा जो अब होना चाहिए… कायदे से..!”
” कौन सा..?”
नेहा ने मुस्कुराकर पूछा और दर्श शैतानी से वासुकी की तरफ देख मुस्कुराने लगा… -” सुहागरात का… !”
काका इस बात को सुनकर जबरदस्ती खांसने का बहाना करते हुए रसोई में चले गए…
और वासुकी अपनी जगह से उठकर तेज तेज कदमों से सीढ़ियां चढ़ता हुआ ऊपर चला गया..
नीचे सिर्फ दर्श और नेहा ही बाकी रह गए…
नेहा ने दर्श की बात पर कंधे उचका कर पता नहीं का इशारा कर दिया और खुद भी उठ कर रसोई में चली गयी…
” काका वैसे तो रोज खाना आप ही बनाते हैं, लेकिन क्या आज मैं खाना बना सकती हूं..?”
” बहु जी आज आपका पहला दिन है.. !
अभी कुछ घंटे भी नहीं बीते आपकी शादी को हुए ! इतनी नई नवेली ताजा बहू से रसोई का काम थोड़े ना कराया जाता है..?”
” वह तो तब काका जब बहू जिंदगी भर के लिए ससुराल आए… मैं तो सिर्फ 40-45 घंटों की मेहमान हूं इस घर में.. !
इसलिए मैं अपने मन का सारा सब कर लेना चाहती हूं…! मैं चाहती हूं अपने मिस्टर हस्बैंड को अपने हाथ से बनाकर सब कुछ खिला दूं ! उनकी हर तरह से सेवा कर लूँ ! वह सब कुछ कर लूँ जो एक पत्नी अपने पति के लिए जीवन भर करती हैं…!
बस आशीर्वाद दीजिए कि इन कुछ घंटों में ही मैं अपने पति का दिल जीत लूँ.. !”
” शादी का बंधन इतना कच्चा नहीं होता बहुजी कि सिर्फ कुछ घंटों में और कुछ शर्तों के कारण बांधा जाए और तोड़ दिया जाए.. !
वासुकी को भले ही आज समझ में ना आए लेकिन एक दिन आप का महत्व और आपका प्यार जरूर समझ जाएंगे!
और दूसरी बात, हमें नहीं लगता कि आप सिर्फ कुछ घंटों में इस घर से चली जाएंगी…
अब तो ऐसा लग रहा है यह घर आपकी ही प्रतीक्षा में था और आपके आने से यह मकान घर बन गया है..!
आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं कि चाहे कुछ भी हो जाए आप यह घर छोड़ कर मत जाइएगा…!”
काका की बातें सुनकर नेहा एक बार फिर भावुक हों गई लेकिन इस बार उसने अपनी आंखों से आंसू बहने नहीं दिए… !
फटाफट अपनी आंखें पोंछ कर उसने फ्रिज खोला और सब्जियों का बक्सा उठाकर बाहर निकाल लिया…
” अरे बाबा इतनी सारी सब्जियां..? काका घर पर रोटी चावल बनता है या फिर यह सब सब्जियां ही बनाते हैं आप..?”
” इन दोनों लड़कों को सिर्फ सब्जियों का ही शौक है..
वासुकी को तो बस थाली भर के सब्जियाँ उबाल कर दे दो… उसे और कुछ नहीं चाहिए..!”
” अब समझ आया इसलिए मिस्टर हस्बैंड इतने फिट है…! कमबख्त ने कहीं पर भी फैट नहीं जमने दिया है..! मेरे मेरे हस्बैंड एक्सरसाइज भी बहुत करते हैं क्या..?”
” नहीं बहु जी…आजकल वासुकी को एक्सरसाइज करते नहीं देखा हमने…
लेकिन हां सुबह सवेरे उठकर 1 घंटे के लिए दौड़ने जरूर घर से बाहर निकल जाते हैं..! वह बाजू वाली कलेक्टरनी..
” जानती हूं…! उसकी जासूसी में लगे रहते हैं हमारे मिस्टर हस्बैंड… पर पहले तो इन्हे जिम विम का बड़ा शौक था…!”
” शौक तो अब भी है बहु जी लेकिन अब समय नहीं निकाल पाते हैं ना..!
सुबह 5 बजे से उठकर तो भागने चले आते हैं..! फिर सारा दिन अपने ऑफिस में बैठकर जाने इतने सारे कैमरा में क्या करते रहते हैं ! कहीं कुछ सुनते रहते हैं, कहीं कुछ देखते रहते हैं ! फिर कहीं किसी को फोन करते हैं ! कभी कहीं निकल जाते हैं कभी कहीं निकल जाते हैं…. !
आजकल तो इनके काम का कोई रंग ढंग ही नहीं समझ में आता !
अच्छा इस सब के साथ इनको अपना बिजनेस भी देखना रहता है…!
और इन सब कामों से फुरसत मिलती है कि शेखावत से दुश्मनी निभाने चले जाते हैं ! सुना है अब शेखावत नया माइंस का काम शुरू कर रहा है.. उस मीटिंग में भी सुना है अनिर ने बहुत बवाल मचाया था..!”
” क्यों.. अगर शेखावत अपनी माइंस का काम कर रहा है तो उससे मिस्टर हस्बैंड को क्या लेना देना..?”
” यही सब तो झोल झपाटा है बहु जी..!
माइंस का काम करने के लिए शेखावत को कलेक्टर मैडम परमिशन नहीं दे रही… अब हमें समझ नहीं आता कि कलेक्टर मैडम भी इस सदी की है या सतयुग से चली आई है..? पता नहीं कौन से जमाने में जी रही हैं भाई..?
इन सब कामों में अगर सामने वाला थोड़ी बेईमानी नहीं करेगा तो पैसे कैसे कमाएगा..?
लेकिन कलेक्टर मैडम को तो हर काम ईमानदारी से चाहिए ! उन्होंने पहले शेखावत का फॉरेस्ट वाला काम रुकवा दिया, अब वह माइंस की खुदाई करना चाहता है… !
माइंस की खुदाई का काम भी काफी लंबा चौड़ा होता है, और उसके लिए ब्लास्ट करना पड़ता है ! अब वही तराई वाले जितने गांव हैं उनको शेखावत ने खाली करवा कर दूसरी जगह घर देने की मांग रखी जिससे कि अगर वह माइंस की खुदाई के लिए ब्लास्ट करवाता है तो उन गांव के लोगों को नुकसान ना हो..! वह गांव वाले फरियाद लेकर चले आए मैडम जी के पास | अब मैडम जी अपना झंडा बुलंद करके शेखावत के सामने खड़ी हो गई है कि यहां पर माइंस के लिए कोई भी ब्लास्ट नहीं किया जाएगा…| और कोई भी गांव वाला यहाँ की ज़मीन खाली नहीं करेगा… !
सुना है उस मीटिंग के बाद शेखावत कुछ ज्यादा ही गुस्से में आ गया था….!
मैडम जी ने तो शेखावत वाली मीटिंग में साफ तौर पर उसे कह दिया कि उनके रहते वह माइंस में ब्लास्ट की परमिशन नहीं देंगी |
वो तो अपने तरकश से तीर निकाल कर छोड़ गयी, लेकिन उनके पीछे जैसे ही शेखावत ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी हमारे वासुकी जी शेखावत के ऊपर चढ़ गए..!
उस दिन तो अगर दर्श बीच में नहीं आता तो वासुकी शेखावत को गोली मार चुका होता…!
नेहा की एक गहरी सी साँस भरी…
” ये मिस्टर हस्बैंड की दीवानगी भी ना, मुझे पागल किये दें रही है ! .
कितनी अजीब बात है…
वह दीवाना किसी और के लिए हो रहा है, और उसका यह पागलपन मेरे दिल में उसके लिए दीवानगी बढ़ाता जा रहा है…! आइए काका कुछ अच्छा सा बनाते हैं.. क्योंकि अगर मिस्टर हस्बैंड का टॉपिक चलता रहा तो मैं तो रात भर बैठ कर आप से गप्पे मारती रहूंगी और फिर हम सबको भूखा ही सोना पड़ जाएगा…!
नेहा काका की मदद से खाना बनाने में लग गई और उसी वक्त दर्श भी रसोई में चला आया…
” कर क्या रहे हो तुम लोग इतनी देर से..? खुशबू तो बहुत बढ़िया रही है..?”
” जी हां मिस्टर देवर, मैं और काका मिलकर आप दोनों के लिए खाना बना रहे थे..!”
” वैसे मिसेस भाभी आपसे एक बात कहूं.. आपके पतिदेव से आपका इंतजार हुआ नहीं और बेचारे जितने ताव से ऊपर गए थे, उसी चाव से खुद ही नीचे चले आए हैं…
सच कहूं तो आज वासुकी को देखकर मेरी हंसी नहीं रुक रही बेचारा !! आज से पहले कभी भी इतना ज्यादा बेचारा नहीं लगा…!
वह गाना है ना दलेर मेहंदी का..
जोर का झटका हाय जोरो से लगा हाय लगा
शादी बन गई उम्र कैद की सजा सजा…
वह गाना आज पूरी तरह से वासुकी के चेहरे पर फिट हो रहा है मैंने नहीं सोचा था कि हमारे इस शेर के दांत आप इस तरह गिन लेंगे..
” आप बस देखते जाइए…
अभी तो आपके शेर के दांत गिने बस हैं…
धीरे से उन्हें ब्रश भी करवा दूंगी, और धीरे-धीरे अपनी आदत भी डलवा दूंगी…!”
” गणेश तुम्हारी हर इच्छा पूरी करें..!”
दर्श ने बहुत प्यार से नेहा के सिर पर आशीर्वाद की मुद्रा में अपना हाथ रखा और पानी की बोतल भरने फ्रिज की तरफ बढ़ गया…
” काका आज खाना-वाना मिलेगा या नहीं..?”
बाहर झुंझलाया बैठा वासुकी जोर से काका को आवाज लगा उठा और काका घबराकर सब्जी का डोंगा उठाए बाहर जाने लगे कि नेहा ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें रोक दिया..
” आप रुकिए काका, मैं लेकर जाती हूं..!”
ट्रॉली ट्रे में सारे डोंगे खूबसूरती से सजाने के बाद नेहा ने सलाद कि प्लेट उठायी और बाहर चली आई..
बाहर आकर उसने सलाद वासुकी के सामने रख दिया..
वासुकी ने नेहा की तरफ देखे बिना ही सलाद की प्लेट से सलाद खाना शुरु कर दिया ! नेहा मुस्कुराती हुई हाथ बांधे वहीं खड़ी रही और वासुकी को देखती रही ! कुछ देर तक वासुकी चुपचाप सलाद खाता रहा और वापस काका को आवाज लगा उठा…
” क्या हुआ काका..?” आज क्या सिर्फ सलाद ही मिलेगा खाने को..?”
” तो आप मुझे प्यार से काका बुलाते हो..?”
नेहा का अजीबो गरीब सवाल सुनकर वासुकी ने गुस्से में उसकी तरफ घूर कर देखा और एक बार फिर दहाड़ उठा…
” अगर खाना नहीं खिलाना है काका तो मैं जा रहा हूं बाहर..!”
वासुकी अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा होने वाला था कि नेहा ने उसके कंधों पर अपने हाथ रखे और उसे बैठा दिया…
” दो घड़ी इंतजार कर लीजिए मिस्टर हस्बैंड.. आपके लिए आपकी नई नवेली पत्नी ने अपने हाथों से खाना बनाया है.. !
नेहा पीछे मुड़ी और उसने काका को वही खड़े-खड़े आदेश दे दिया कि अंदर रखा खाना वह बाहर ले आए उसकी बात सुनते ही काका तुरंत ट्रॉली ट्रे सरकाते हुए बाहर ले आए….
उनके साथ ही दर्श भी वहां आकर वासुकी के ठीक बगल वाली कुर्सी में बैठ गया…
नेहा ने सबसे पहले सूप का बाउल वासुकी के सामने रख दिया…
सूप का पहला घूंट भरते ही वासुकी को उसका बेहतरीन स्वाद अपनी जीभ पर महसूस ज़रूर हुआ लेकिन उसने अपने चेहरे के भावो को बदलने नहीं दिया..
वासुकी को सूप बेहद जायकेदार लग रहा था, और इसलिए वह फटाफट सूप खत्म करके दोबारा लेना चाहता था, लेकिन उसके खत्म करने के पहले ही नेहा ने उसके सामने से सूप बाउल वाली प्लेट सरका कर हटा दी ! वह नेहा को सवालिया नजरों से देख रहा था कि नेहा ने उसके सामने प्लेट रख कर उस पर पालक पनीर, पंचमेल दाल और आलू पोस्ते की सब्जी के साथ रुमाली रोटी परोस दी…
पहला निवाला अंदर जाते ही वासुकी को समझ में आया कि स्वाद क्या होता है…?
आज तक वह सिर्फ जीने के लिए खाता था उसने इधर-उधर से जो पढ़ रखा था उसी के अनुसार काका से बोल बोल कर वह और दर्श अपने लिए ज्यादातर सब्जियां और दाल दलिया उबलवा कर खा लिया करते थे…
सेहत के नजरिए से भले ही उनका खाना बेहद पौष्टिक होता था, लेकिन स्वाद देखा जाए तो शून्य बटा सन्नाटा !
उन दोनों ने कभी बहुत स्वादिष्ट खाना खाया ही नहीं था…
दर्श तो फिर भी 18 उन्नीस साल तक अपने माता-पिता के साथ रहा था, इसलिए उसे घर के खाने का मोल पता था लेकिन वासुकी ने तो बहुत बचपन में ही अपने माता पिता को खो दिया था, और उसके बाद उसकी परवरिश जैसे हुई थी उस लिहाज से उसे जब जहां जो मिला उसने चुपचाप अपने पेट में डाल कर अपने शरीर को चलाए रखने के लिए ईंधन की पूर्ति बस कर ली थी! और यही उसकी आदत बन गई थी | उसे तो आज तक मालूम भी नहीं था कि घर के खाने में इतना स्वाद हो सकता है…|
वह अपने खाने के स्वाद में खोया एक के बाद एक चार रोटियां खा गया…
“क्या बात है अनिर, आज तुम्हारा कैलरी काउंटिंग बंद है क्या… ?”
दर्श के टोकने पर वासुकी का ध्यान उसकी तरफ चला गया…
“आज सुबह से कुछ खाया भी तो नहीं था.. क्यों काका.. ?”
वासुकी के ऐसा बोलते ही काका हड़बड़ा कर हाँ बोल उठे…
और वासुकी के प्लेट सरकाते ही नेहा ने उसके सामने गाजर का हलुवा परोस दिया..
“अब कुछ नहीं खा पाउँगा.. हटा लो इसे.. !”
वासुकी के रूखे जवाब को सुन नेहा ने चम्मच में हलुवा लेकर उसके सामने कर दिया…
“बार बार धमकी देना अच्छा नहीं लगता मिस्टर हस्बैंड… ! लेकिन आज हमारी शादी की ख़ुशी में मीठा तो खाना ही पड़ेगा आपको… ! चाहें तो बस चख कर छोड़ दीजिये, मै आपका जूठा ख़ुशी से खा लूंगी… !”
वासुकी ने नेहा को बिना देखें ही कटोरी उठायी और पेट भरा होने के बावजूद पूरा हलुवा खत्म कर के ही कटोरी नीचे रखी..
” देखा देवर जी, कहीं मै इनका जूठा हलुवा खा कर अमर ना हों जाऊं इसलिए बेचारे जैसे तैसे पूरा ख़त्म कर गए… !”
दर्श और काका को भी हंसी आ गयी पर दोनों अपनी ज़बान पर ताला डाले खड़े रहें…
“अरे अनिर.. इतने अच्छे खाने के बाद तुझे नेहा को कुछ तोहफा देना चाहिए.. !”
“मुझे कोई शौक नहीं किसी को तोहफे बाँटने का.. !”
“वो तो किसी को नहीं होता मिस्टर हस्बैंड.. मुझे भी सिर्फ खुद के लिए तोहफे लेने का शौक है.. पर चलिए कोई नहीं.. अगर आप मुझे कुछ देना नहीं चाहते तो ना सही…..
वैसे भी आप पति है मेरे और आपको खाना खिलाना मेरा धर्म है.. मेरा फ़र्ज़ है.. और फ़र्ज़ की, प्यार मुहब्बत की कोई कीमत नहीं लगायी जा सकती.. !”
नेहा की इतनी बड़ी बड़ी बात सुन कर वासुकी का दिमाग चढ़ गया.. उसे किसी का एहसान लेना पसंद नहीं था…
वो शादी के नेग के तोहफे के तौर पर तो कुछ नहीं देना चाहता था लेकिन अपने ऊपर नेहा का अहसान भी उसे नहीं चाहिए था..
वो तुरंत उठा और अपनी चेक बुक उठा लाया…
उसमे साइन कर उसने एक चेक फाड़ कर नेहा की तरफ बढ़ा दिया…
” अमाउंट खुद भर लेना… !”
नेहा ने चेक लेकर अपने माथे से लगा कर उसे चूमा और अपने पास रख लिया…
“ज़हे-नसीब !”
वासुकी उसकी इस हरकत को देख चिढ कर वहाँ से उठ कर बाहर गार्डन में चला गया….
उसके जाने के बाद दर्श ने नेहा से भी खाने को कहा और उसकी प्लेट खुद परोसने लगा…
नेहा मुस्कुरा कर खाने बैठ गयी.. नेहा और काका के खाते तक दर्श वही बैठा उन लोगों को बड़े प्यार से परोसता रहा और नेहा को वासुकी के बारे में कुछ न कुछ बताता रहा…
इधर गार्डन में बैठे वासुकी की नजर बाँसुरी के गार्डन पर थी, जहाँ बाँसुरी इधर से उधर टहलती हुई राजा साहब और शौर्य से अपने सारे दिन का हाल चाल बता रही थी…
बाँसुरी की बातें बहुत कान लगा कर सुनने पर वासुकी भी समझ पा रहा था और उसका ध्यान बराबर इस बात पर गया की बाँसुरी ने पिछले दिन हुई शेखावत के साथ वाली मीटिंग का कोई ज़िक्र राजा साहब से नहीं किया…
वासुकी खुद वहाँ बैठा यही सोच रहा था की बाँसुरी को माइंस की खुदाई से जुडी बात राजा से बता देनी चाहिए लेकिन जाने ये औरत किस मिटटी की बनी थी की अपने से इतनी दूर बैठे पति को सिर्फ और सिर्फ अपनी कुशलक्षेम ही दें रही थी, खुद को मिलने वाली धमकियों तक के बारे में बाँसुरी ने राजा को नहीं बताया था…
और इसी बात से अब वासुकी परेशान हों उठा था… बाँसुरी कुछ समय बाद धीमे कदमो से अंदर चली गयी और तभी नेहा की आवाज़ वासुकी के कानों में पड़ी…
” अब आप भी अंदर आ जाइये मिस्टर हस्बैंड.. आज की चौकीदारी का कोटा पूरा हुआ… !”
क्रमशः…
aparna….
अगले एपिसोड कि झलक…
