जीवनसाथी -2/45

जीवनसाथी -2 भाग -45

   शाम ढल रही थीं, गोधूलि बेला थीं, मंदिर के बाहर से गायों के गले कि घंटियों की रुनझुन बहुत मनभावन लग रही थीं, अपने नीड़ पर लौटते पंछियों का कलरव मन को सुकून दे रहा था लेकिन इस सुकून भरे मौसम में वासुकी के माथे पर पसीना छलका हुआ था…
   उसे नेहा के हाव भाव, रंग ढंग और उसका बनाव सिंगार देख कर समझ तो आ गया था कि वो क्या करने के उद्देश्य से यहाँ आई है.. लेकिन तब भी वो अपने मन को मनाने कि कोशिश में था कि वो जो सोच रहा वैसा कुछ नहीं है…
   लेकिन उसी वक्त नेहा ने पंडित जी को आवाज़ लगा दी…
   उसकी पुकार सुनते ही दर्श और वासुकी चौंक कर पीछे मुड़े और पीछे पीले वस्त्र पहने माथे पर तिलक लगाए एक अपनी ही उम्र के पंडित जी को देख दोनों कि आँखे आश्चर्य से फटी रह गयी…

  ” ये क्या है नेहा… ? क्या करने जा रही हों तुम.. ?”

” हाय कितने भोले हैं मिस्टर वासुकी आप.. ? सच्ची जब ऐसा बोलते हैं ना तो आप पर और भी ज्यादा प्यार…
   छोड़िये यहाँ बहुत लोग है.. ये सारी बातें हम बाद में करेंगे.. !”

  वासुकी ने दर्श कि तरफ देखा, दर्श ने भी इन सब बातों से खुद को अनजान दिखाते हुए कंधे उचका दिये…

“मुझे ये सब नहीं करना… मै वापस जा रह हूँ.. !”

  वासुकी के ऐसा बोल कर पलटते ही नेहा उसके सामने चली आई…

“सोच लीजिये वासुकी साहब, आपने प्रॉमिस किया था… और एक बार नहीं कई बार आपसे पूछने के बाद ही मैंने ये सब तैयारियाँ की हैं..!
    अब अगर आप पीछे हटते हैं तो मै समझ जाउंगी अनिरुद्ध वासुकी अपनी ज़बान का पक्का नहीं हैं… !”

“पर ये तो गलत हैं, झूठ हैं, चीटिंग हैं… तुमने क्या बोला था और क्या सब लेकर बैठी हो.. ?”

“ध्यान से सोच कर देखिये की मैने क्या बोला था…? वैसे मैंने ऐसा कुछ बोला ही नहीं था… आप मनगढंत इल्जाम न लगाए…
   दूसरी बात मुझ पर झूठ का इल्जाम लगा रहें हैं आप, लेकिन मुझसे बड़े झूठे तो आप हैं… एक तरफ हां बोल कर अब बात नहीं सुन रहें.. !”

“तुम बहुत बड़ी ड्रामाबाज़ और झूठी हो.. !”

“इश्क़ और जंग में सब जायज़ हैं मिस्टर वासुकी… !”

“मैंने नहीं सोचा था कि तुम इस हद तक आगे बढ़ सकती हों… ?”

“मैंने भी कहाँ सोचा था कि मै इस हद तक आपको चाहने लगूंगी…
   बस एक दिन के लिए आपकी दुल्हन बनना चाहती हूँ… सिर्फ एक दिन.. ?”

“अरे शादी शादी होती है.. कोई मजाक तो नहीं होता.. !”

“जानती हूँ.. शादी का महत्व जानती हूँ इसलिए आपसे हाथ जोड़ कर विनती कर रही कि सिर्फ एक दिन के लिए मुझे आपकी दुल्हन बनने का मौका दे दीजिये.. !”

“और उसके बाद.. ?”

“उसके बाद आप चाहें तो तलाक दे दीजियेगा.. !”

वासुकी ने झुंझला कर अपना चेहरा दूसरी तरफ को मोड़ा और एक गहरी सी सांस छोड़ कर कमर पर हाथ रखें वापस नेहा को देखने लगा..

“ये कैसी बच्चो वाली ज़िद शुरू कर दी है तुमने नेहा.. ?”

“अभी बच्चो वाली ज़िद कहाँ शुरू की है वासुकी साहब.. ! वो तो मै बाद में करुँगी,  लेकिन अगर आपकी इनायत हुई तो इंशा अल्लाह मेरी वो ज़िद भी आप एक दिन पूरी कर ही देंगे और हमारे भी बच्चे  होंगे…..और वो भी ढ़ेर सारे जो आपके आगे पीछे पापा पापा कहते घूमेंगे… !”

नेहा की बात सुन कर झुंझलाहट में वासुकी ने अपने माथे पर हाथ मार लिया..
 
“दर्श इसे समझाओ यार कुछ.. !”

” ये मेरे लेवल से बाहर की है… !
     वैसे मै तो पैदा ही हुआ हूँ पागलों को हैंडल करने के लिए… पहले तू अकेला था जिसे झेलना होता था अब ये भी आ गयी… वैसे ये तेरे से भी बड़ी वाली पागल है.. !”

नेहा दर्श को देख मुस्कुरा उठी… – ” और हम दोनों पागलों के डॉक्टर हों तुम… !”  नेहा इतना बोलने के साथ ही मंदिर से बाहर की तरफ जाने वाले दरवाज़े की तरफ देखने लगी, जैसे उसे किसी का इंतज़ार है..
  उसी वक्त काका भी हाथ में कुछ सामान किये अंदर चलें आये…
उन्हें देखते ही नेहा खुश हों गयी…. और चहक कर वो पंडित जी की तरफ मुड़ गयी…

“पंडित जी अब आप अपना काम शुरू कर सकते हैं..!”

काका को दोनों हाथ में पकड़े थैलों के साथ वहां पर देखकर वासुकी ने गुस्से में घूर कर देखा…..

” अब आप ये सब क्या लेकर चले आये… ?”

वासुकी की दहाड़ सुन काका घबरा गए, और उनके हाथ का सामान गिरता उसके पहले दर्श ने उनके हाथ से सारा सामान ले लिया…

  वासुकी  झुंझलाहट में अपने माथे पर अपनी उँगलियों से सहलाने लगा… अक्सर परेशान होने पर वो ऐसा ही किया करता था… उसे यूँ लग रहा था जैसे उसके हाथ से सब कुछ निकलता जा रहा है… 
   काका के लाये सामान को आनन फानन पंडित जी ने थाली में सजाया और नेहा और वासुकी के साथ ही सभी को बैठने के लिए बुला लिया…

वासुकी को अंदर से घबराहट सी हों रही थीं और नेहा मुस्कुराते हुए उसे घूर रही थीं…

वासुकी ने दर्श का हाथ पकड़ कर एक तरफ को खींचा और उसके कान में फुसफुसा उठा… -” ये क्या हों रहा है दर्श.. ?”

“तुझे अब तक समझ नहीं आया.. तेरी शादी होने वाली है.. ज़बरिया शादी… ! भाई आज तक फिल्मो में देखा था ऐसा…
.   आज पहली बार आँखों के सामने देखने को मिल रहा है… बड़ा मजा आ रहा .. !

आगे की बात बोले बिना ही दर्श चुप हों गया… और वासुकी उसे घूरने लगा…
  नेहा पंडित जी के कहे अनुसार अपने आसन पर बैठ चुकी थी लेकिन वासुकी अब तक नहीं आया था !  नेहा ने मुड़कर वासुकी और दर्श की तरफ देखा और इशारे से वासुकी को अपने पास आकर बैठने के लिए बुला लिया…
   वासुकी पीछे खड़ा चुपचाप उसे घूरता रहा और नेहा ने उसे हाथ के इशारे से वापस अपने पास आकर बैठने का इशारा किया…
  वासुकी अब भी चुपचाप खड़ा रहा तो नेहा ने थक कर उसे आवाज लगा ही दी…-” मिस्टर वासुकी आइए पंडित जी आपको बुला रहे हैं… !
    देखिये आप अपना प्रॉमिस तोड़ नहीं सकते और वह भी भगवान के मंदिर में तो बिल्कुल नहीं.. इसलिए चुपचाप चले आइये.. !”

   मन मसोसकर अपने चेहरे पर आती नाराजगी को एक किनारे रख वासुकी को आगे बढ़कर नेहा के पास पहुंचना ही पड़ा और पंडित जी के कहे अनुसार नेहा के ठीक बगल वाले आसन पर वो बैठ गया…

    उन दोनों के बैठते ही दर्श और काका भी मुस्कुराते हुए उनके आस-पास बैठ गए और पंडित जी ने विधि शुरू करवा दी…
   वासुकी के दिल दिमाग में इस वक्त जो द्वंद छिड़ा  हुआ था वह सिर्फ वही जानता था…
   उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसने जिस काम के लिए नेहा से बातचीत की थी नेहा उस काम के बदले उससे इतनी बड़ी रकम वसूल लेगी…
     मन ही मन कहीं ना कहीं उसे पछतावा भी था… लेकिन अब उसके हाथ से सारी बातें निकल चुकी थी वह खुद अपने किए प्रॉमिस में फंस चुका था…!
     नेहा चेहरे मोहरे आकार आकृति से भले ही बांसुरी जैसी दिखती थी लेकिन वह इतनी तेज दिमाग की और चालाक निकलेगी, यह वासुकी ने बिल्कुल नहीं सोचा था…!

       वह कुछ अजीबोगरीब परिस्थितियों में फंस चुका था… !
. अब यहां तक आने के बाद अगर वह नेहा की बात  बात पूरी करने से पीछे हट जाता है तो, नेहा उसके प्लान का हिस्सा नहीं बनेगी और यहां तक आने के बाद और नेहा पर इतना कुछ तैयारी करने के बाद अगर नेहा मुकर गई तो उसके पास ऊपर वाले को जवाब देने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा…!

नेहा को लेकर जो कुछ भी प्लान कर रहा था वह एक बहुत बड़े प्लान का एक छोटा सा हिस्सा मात्र था ! और सबसे बड़ी बात उन्होंने उस पर बहुत ज्यादा विश्वास किया था और वह उस विश्वास को तोड़ नहीं सकता था ! भले ही उस विश्वास को पूरा करने के लिए उसे खुद की जान की बाजी ही क्यों न लगानी पड़ जाए…
अपने मानसिक द्वंद से लड़ता वासुकी चुपचाप वहां बैठा पंडित जी की बताई सारी रस्मों को एक-एक कर पूरा करता जा रहा था…

      सनातन परंपरा से चली आ रही पवित्र मंत्रों की की शक्ति अपने आप में इतनी होती है कि उन मंत्रों के बिना कोई भी विवाह अधूरा ही होता है…
    और वाकई उन मंत्रों की ताकत भावी जोड़े को जिस अदृश्य सूत्र में बांध देती है वह अलौकिक है…
    वह परिणय सूत्र फिर जन्म जन्मांतर का रिश्ता बन जाता है….
      पंडित जी के कहने पर काका के लाए सामान में से एक पीले रंग का पट दर्श ने वासुकी के कांधे पर डाला और नेहा कि चुनरी से उसकी गांठ लगा दी…
    मंत्रों के उच्चारण के बीच पंडित जी ने जोड़े को खड़े होने के लिए कहा और अग्नि के पवित्र फेरे लेने का आदेश दे दिया…
    नेहा मुस्कुरा कर खड़ी हो गई और वासुकी अपने विचारों में खोया अग्नि की लपटों को देखता बैठा रहा..!  नेहा ने बहुत धीमे से उसके कंधे पर हाथ रखकर उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ खड़ा कर लिया…
     वासुकी की चौड़ी हथेलियों को अपने नाजुक पतले से हाथों में लेकर नेहा ने सात फेरों की रस्म पूरी कर ली…. ..
     सात फेरे होते ही पंडित जी ने दोनों को बैठने का आदेश दिया और पूजा की थाली में से सिंदूर की डिबिया निकालकर नेहा की तरफ बढ़ा दी…
     दर्श ने एक दूसरे डिब्बे में से चांदी का एक सिक्का निकाला और वासुकी के हाथ में रख दिया…
     पंडित जी के बताए अनुसार वासुकी यंत्रचलित सा  सिंदूर के डिब्बे में से चांदी के सिक्के में सिंदूर निकालकर नेहा की मांग भर गया…..
         सात बार एक ही तरह से मांग भरने के बाद ढेर सारा सिंदूर नेहा के नाक और चेहरे पर भी गिर गया नेहा की आंखें भर आई…

     उसने भरी हुई पलके उठा कर वासुकी की तरफ देखा, वासुकी भी उस वक्त नेहा को ही देख रहा था..! नेहा का चेहरा बांसुरी से इतना ज्यादा मिल रहा था कि वासुकी कुछ देर को उस चेहरे को देखता रह गया….

     दर्श ने उस सुंदर से पल को अपने कैमरा में कैद कर लिया….

     यह कुछ खास पल ही तो होते हैं जो यादें बनकर जिंदगी भर मन के किसी कोने में यादों की रोशनी जलाये रखते हैं…
    उनकी खुशबू से जीवन को महकाए रखते हैं..! वरना हर एक पल अपने आप में खास होता है, क्योंकि वह पल दुबारा पलटकर कभी नहीं आता…

नेहा ने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ खोया था… अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए, एक ऊंचे मुकाम पर पहुंचने के लिए उसने बहुत बार बहुत सी जगह समझौते किए थे…
    लेकिन आज जिंदगी में पहली बार उसके हिसाब से कुछ घटित हो रहा था |  उसके मन की बात पूरी हो रही थी | उसने अपनी जिंदगी में सिर्फ और सिर्फ अनिरुद्ध से प्यार किया था, और आज उसका प्यार उसे शादी के रूप में मिल रहा था…|

नेहा की जिंदगी का यह सबसे बड़ा  खुशी का मौका था बावजूद रह-रहकर उसकी पलकें भीगी जा रही थी..!
    अनिरुद्ध के उसकी मांग भरते ही उसकी आंखों से दो बूंद उसके गालों पर लुढ़क पड़े…
   दर्श ने पंडित जी के कहने पर एक सुनहरी डिबिया वासुकी के सामने खोल कर रख दी और डिबिया में से मंगलसूत्र निकालकर वासुकी ने एक बार अपने हाथों को देखा और पंडित जी के कहे अनुसार नेहा के गले में बांध दिया….

     सुंदर सुनहरी गोधूलि बेला में जब सूर्य अस्त होने को था, सभी प्राणी अपने अपने डेरे में लौटने को थे… उसी सुंदर प्रदोष काल में एक जोड़ा हमेशा हमेशा के लिए एक दूसरे का हों कर परिणय सूत्र में बंध गया था…

नेहा ने आगे बढ़कर पंडित जी के पैर छू लिए…

वासुकी चुपचाप खड़ा रहा… नेहा ने जैसे ही उसे पैर छूने के लिए कहा उसने उपेक्षा से दूसरी तरफ मुंह फेर लिया…

” मानते हो या नहीं मेरी बात या अभी के अभी चली  जाऊं यहां से..?”

नेहा की धमकी सुनते ही गुस्से में उसकी तरफ देखकर वासुकी पंडित जी के घुटने तक झुक कर वापस खड़ा हो गया… मुस्कुराकर नेहा ने उसकी चौड़ी हथेली में अपना हाथ डाला और उसे काका के सामने ले गई…

” काका आपके लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है…. खासकर इसलिए क्योंकि इतने साल आपने इन्हें अपने हाथों से रोटियां बना कर खिलाई हैं.. इन्हें जब जरूरत हुई आप एक पिता की तरह इनके साथ मौजूद रहे और  इनके सुख दुःख के संगी रहें है आप..! इसीलिए मैं ह्रदय से आप का सम्मान करते हुए आपके पैर छूना चाहती हूं मुझे मना मत कीजिएगा..!”

नेहा की कही बात सुनकर काका की आंखें भीग गई.. उन्होंने अपने कांपते हाथों को धीरे से आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया और नेहा वासुकी का हाथ पकड़कर खींचते हुए काका के पैरों में झुक गयी…..

   जाने वासुकी ने क्या सोचा, उसने अपने दोनों हाथ बहुत श्रद्धा से काका के पैरों के ऊपर रखकर फिर अपने माथे से लगाकर उन्हें प्रणाम किया और मुस्कुरा कर खड़ा हो गया…

  ” चलिए हमारे पतिदेव के होठों पर मुस्कान तो आई..!
      दर्श ज़रा देखना,  मिठाई भी होगी उस थैले में क्योंकि मैंने काका को कल मैसेज करते समय मिठाई भी लिखी थी.. काका आप लेकर आए हैं ना..?”

“हाँ बहु जी !”

काका ने भी नेहा के सवाल का बहुत ही तत्परता से जवाब दिया और वासुकी आश्चर्य से कभी नेहा कभी काका को देखता रह गया…
    तो यह इन सब की मिलीभगत थी और एक वही उल्लू बन कर बैठा इन सब बातों से अनभिज्ञ था!
उसने दर्श की तरफ घूर कर देखा और दर्श ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिये..

” सॉरी मिस्टर वासुकी लेकिन मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानता…!”

इसके बाद दर्श ने मिठाई निकालकर पहले पंडित जी के सामने की और उसके बाद काका का  मुंह मीठा कराते हुए वासुकी और नेहा के सामने चला आया…

   उसने वासुकी के सामने जैसे ही मिठाई का डिब्बा खोला,  वासुकी ने हिकारत से अपना मुंह मोड़ लिया…
   नेहा वासुकी की हरकत देखकर  मुस्कुरा उठी…

उसने डिब्बे में से मिठाई का टुकड़ा निकालकर पहले दर्श का मुंह मीठा कराया और उसके बाद एक दूसरा टुकड़ा उठाकर अपने मुंह तक ले गयी !
    दर्श ने इशारे से नेहा से वासुकी को दिखाते हुए पूछा भी कि उसने वासुकी को क्यों नहीं खिलाया ? तो अपनी आंखों से दर्श को आश्वस्त  कर नेहा ने अपने  हाथ में पकड़ रखी  मिठाई  का एक टुकड़ा काटने के बाद उस जूठी मिठाई को वासुकी के सामने कर दिया..
    वासुकी ने मिठाई के टुकड़े को देखकर जैसे ही दूसरी तरफ मुंह फेरने की कोशिश की,  नेहा ने उसके गाल पकड़ कर उसका चेहरा अपनी तरफ घुमा लिया..

” खाते हो कि जाऊं..?”

गुस्से में नेहा को घूरते हुए वासुकी ने उसके हाथ में रखे मिठाई के झूठे टुकड़े को अपने मुंह में ले लिया..

उसके ऐसा करते ही नेहा को हंसी आ गई और वासुकी की बांह पकड़ कर उसके कंधे से सर लगाकर वो वापस सीधी खड़ी हो गई…

” लव यू  मिस्टर हस्बैंड!”

दर्श ने मुस्कुरा कर वहां फैला सामान समेटना शुरू किया और इसके साथ ही वासुकी वहां से घर जाने के लिए आगे बढ़ने लगा…
     लेकिन उसके कंधे पर डाले पट वस्त्र से बंधी चुन्नी नेहा के सर पर थी और इसलिए नेहा ने अपनी चुन्नी को पकड़कर वासुकी को रोक लिया..

” जब तक यह गठबंधन नहीं खुलेगा आप मुझे छोड़कर नहीं जा सकते और इसे बंधे बंधे ही आपको मुझे अपने घर तक ले कर जाना होगा.. क्यों पंडित जी ठीक कह रही हूँ  ना मैं..!”

” जी बिटिया !  घर पर जाकर दूल्हे की किसी बहन या छोटी बच्ची से यह गठजोड़ खुलवा कर उसे नेग में कुछ पैसे दे देना..”

” पंडित जी ननंद कह लीजिए या देवर मुझे तो यही एक पीस गिफ्ट में मिला है मिस्टर दर्श !तो यही खोलेंगे हमारा गठबंधन ! आप कहे तो मैं इन्हें ही नेग के 101 पकड़ा दूंगी..!”

” बिल्कुल बिटिया… जहां जिस घर में कन्या नहीं होती है वहां दूल्हे का भाई भी इस नेग को कर सकता है..!”

” धन्यवाद पंडित जी..! चलिए दूल्हे राजा अब हम घर चलते हैं.. अपने घर! आपका और मेरा घर..!”

वासुकी ने वापस एक गहरी और ठंडी सांस छोड़ी और धीमे कदमों से सीढ़ियां उतरने लगा…
  उसके  कदम से कदम मिलाती नेहा भी उसके पीछे पीछे चलती हुई उसकी कार तक चली आई…
    काका के ड्राइविंग सीट पर बैठते ही दर्श  सारा सामान डिक्की में डालकर आगे बैठ गया और नेहा वासुकी के साथ कार में पिछली सीट पर बैठ गई…
   
     हवा से बातें करती हुई गाड़ी वासुकी मेंशन की तरफ बढ़ चली…

क्रमशः

aparna…
  

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