
जीवनसाथी -2, भाग, -30
समर और पिया को घर लौटने में रात के तीन बज गए…
कमरे में आने पर कैंडल्स बुझ चुके थे….. कमरे में चल रहा म्युज़िक भी बंद हो गया था… और थकान से दोनों कि ऑंखें बोझिल हो रहीं थीं….
पिया फ्रेश होने वाशरूम में घुस गयी और समर अपना सुबह का अलार्म रिसेट करने लगा…
वो फ्रेश होकर आई और अपने अगले दिन के कपड़े अलमारी में से निकाल कर ड्रेसिंग के पास सेट कर के रखने के बाद ड्रेसिंग पर ही बैठ कर चेहरे पर नाईट क्रीम लगाने लगी….
समर पलंग पर पसरा पड़ा उसे ही देख रहा था…
आईने में समर को देख कर पिया मुस्कुराने लगी….
“क्या सोच रहें हो… ?”
“मुझे समझ आ गया पिया कि लोग शादी से पहले मुहूर्त क्यों निकलवाते हैं… ?”
“क्यों निकलवाते हैं.. ? बताओ.. ?”
“सही मुहूर्त में शादी होने से हर चीज़ सही समय पर हो जाती है.. अब देखो ना बिना मुहूर्त के शादी तो कर ली, अब सुहागरात मनाने ही नहीं मिल रहा… !”
पिया ने बनावटी गुस्से से समर कि तरफ देखा…
” मुझे पहले क्यों नहीं समझ में आया कि तुम ऐसा ही कुछ बोलोगे… घूम फिर कर तुम्हारा दिमाग वहीँ अटक जाता है.. है ना.. ?!
समर ने ज़ोर से हाँ में गर्दन हिला दी…
” अब जिसके सामने छप्पन भोग सजी थाली मंडरा रहीं हो और खाने न मिले उसका यहीं हाल तो होगा… !”
“व्हाट छप्पन भोग मंत्री जी… इट साउंड्स सो चिपो… मैं आपको छप्पन भोग थाली लग रहीं हूँ… कम्पेयर करना ही था तो कुछ क्लासी सा लेकर आते ना.. लाइक व्हाइट सॉस पेने पास्ता, हनी कोटेड पैन केक्स…!”
” ओह्ह्ह ओके माय क्लासी वाईफ़ी…. हाँ तो जिसके सामने हॉट चॉकलेट ब्राउनी विथ आइसक्रीम रखी मेल्ट हो रहीं हो और उसे इंतज़ार करने को कहा जाएं तो जैसा फील होता है न वैसा लग रहा मुझे… !”
“इट साउंड्स बेटर… !”
” बेटर तो अभी बताता हूँ…!”
और समर ने पिया को अपनी तरफ खींच लिया… पिया भी मुस्कुरा कर उसकी बाँहों में आ गयी…
“बहुत रात नहीं हो गयी… ? सुबह हम दोनों को ही जल्दी उठना है.. ?” पिया की फरियाद पर समर के पास जवाब मौजूद था
“कल देर से उठ जायेंगे… !”
पिया मुस्कुराने लगी.. उसी वक्त समर के लैपटॉप पर कोई नोटिफिकेशन आई और वो पिया से इजाज़त लेकर वहीं पलंग पर अपना लैपटॉप खोल कर बैठ गया… बमुश्किल 5 मिनट में उसने उस नोटिफिकेशन को पढ़कर देखा और उसका जवाब लिखने के बाद लैपटॉप को किनारे रख दिया! मुस्कुराते हुए समर ने पिया की तरफ जैसे ही अपना मुंह मोड़ा, पिया को गहरी नींद में डूबा देखकर उसके चेहरे का रंग कुछ देर के लिए बदल गया..
लेकिन उसे जल्दी ही समझ में आ गया कि पिया वाकई बहुत ज्यादा थकी हुई थी….
समर ने धीरे से पिया के ऊपर चादर डाली और लाइट ऑफ कर के खुद भी पिया के बाजू में लेट गया….
********
सुबह सुबह बांसुरी उठकर अपने घर के बाहर के बगीचे में टहल रही थी….
उसने बाहर झांक कर देखा उसे रास्ता साफ और सुंदर लग रहा था उसका उसी वक्त जॉगिंग के लिए जाने का मन करने लगा… उसने अपना फोन निकाला और राजा को फोन लगा दिया….
सुबह के 6 बज रहे थे… राजा भी उठ चुका था और अपनी बालकनी में बैठा, चाय पी रहा था…
” क्या कर रहे थे..?”
” तुम्हें याद करते हुए चाय पी रहा था, क्योंकि सुबह का यही वक्त होता है जब मुझे तफ्सील से तुम्हें याद करने का मौका मिल जाता है… उसके बाद तो दिन भर इतना सारा काम होता है कि क्या ही कहूं..!”
” कहां बैठे हैं आप अभी..?”
” बालकनी में हूं और यहां से मुझे वह कमरा साफ नजर आ रहा है जहां तुम पहली बार महल में आने पर रुकी थी और याद है, उस वक्त एक सुबह नहा कर तुम बाथरोब में ही बालकनी में निकल आई थीं और मुझे देखते ही वापस कूद कर अंदर भाग गयी थीं… !”
” आपने उस वक्त मुझे देख लिया था..? मुझे तो लगा आप अपने लैपटॉप में बिजी थे और आपका ध्यान ही नहीं गया मुझ पर और इसीलिए मैं तुरंत वापस लौट गई…!”
” तुम सामने रहो और मेरा दिमाग कहीं और रहे ऐसा पॉसिबल है क्या बांसुरी..? मैंने उस वक्त भी तुम्हें देख लिया था…!”
” अभी ये बताने का क्या मतलब…? मुझे शर्म आ रही है, मैं बात भी नहीं कर पाऊंगी अब आपसे..!”
राजा बांसुरी की बात सुनकर हंसने लगा…
” यह बताओ इतनी सुबह सुबह मेरी याद कैसे आ गई…?”
” जॉगिंग करने जा रही थी तो सोचा वीडियो कॉल में आपको भी साथ ले लूँ… ..!”
” और इस दौरान मोबाइल गिर गया तो…!”
” अरे मैं गले में टांग कर रखूंगी… आपको मेरा चेहरा नहीं दिखेगा, सामने की रोड दिखेगी समझे…?”
” ओके चलो फिर जॉगिंग करते हैं साथ में…!”
मुस्कुराकर बांसुरी ने अपने गले में फोन लटकाया और गेट खोल कर निकल गई उसके पीछे ही उसके दोनों गार्ड भी निकल गए….
छत पर खड़े वासुकी ने किसी को फोन किया और उसे कुछ इंस्ट्रक्शन देने के बाद वह भी सीढ़ियां उतरकर अपनी गाड़ी निकाल कर बांसुरी की बढ़ी दिशा में आगे बढ़ गया….
असल में बांसुरी जब अपने बगीचे में खड़े होकर बाहर के रास्ते को देख रही थी उसी वक्त वासुकी ने अपने दो गार्ड्स भेजकर पूरे रास्ते को दो चार मजदूर लगवा कर साफ करवा दिया था…. जिससे अगर बांसुरी उस रास्ते पर जॉगिंग करने जाए तो उसे रास्ते में किसी तरह की कोई गंदगी नहीं मिले….
इसके अलावा वासुकी के आदमी हर थोड़ी थोड़ी दूर पर पेड़ों के पीछे गन लिए तैनात खड़े थे जिससे की बांसुरी पूरी सुरक्षा के साथ जॉगिंग करके वापस आ सके…
इस सब के बावजूद भी अनिरुद्ध वासुकी को उन लोगों पर पूरी तरह से विश्वास नहीं था, इसलिए वह अपनी गाड़ी में बहुत धीमी गति से बांसुरी के पीछे पीछे चल रहा था…
हालांकि उसने अपनी गति इतनी धीमी रखी थी कि बांसुरी को मालूम भी नहीं चला कि उसके पीछे कोई गाड़ी भी चल रहीं है…..
बीच बीच में कानों में लगे ब्लूटूथ कि सहायता से बांसुरी अपने राजा जी से बातें भी करती जा रही थी और वो राजा जी को बराबर रास्ते की साफ सफाई के बारे में बता रही थी…
” देखिए साहब आंखें खोल कर देख लीजिए.. आपकी रियासत से कहीं ज्यादा साफ मेरा कस्बा है! रोड ऐसे साफ-सुथरी रखी है जैसे किसी ने जीभ से चाट कर सफाई की हो…!
राजा मुस्कुरा कर रह गया….
” हमारी हुकुम के पैरों में कांटा ना चुभ जाएं.. इस बात का ख्याल रखना भी तो ज़रूरी है… !”
” हां वही बैठे-बैठे ख्याल रख लीजिए आप… वैसे आपके हाथ कानून से भी ज्यादा लंबे हैं..!”
” और कितनी लंबी जॉगिंग करनी है मैडम… एक घंटा हो चुका है आप को टहलते हुए..!”
” अरे हां देखिये कितना वक्त निकल गया ! आपके साथ बातों में वक्त कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता… इसीलिए सुबह सुबह फोन लगा लेती हूं… क्योंकि एक बार अपने ऑफिस में घुस गई उसके बाद तो मुझे सर उठाने की फुर्सत नहीं मिलती… बहुत ज्यादा करप्शन फैला है यहां पर..!”
” कोई बात नहीं ! किसी भी काम में बहुत ज्यादा इंवॉल्व मत होना.. क्योंकि तुम्हें दो 4 महीने में ही वापस आना है..!”
” फिर वही बात.. ! ऐसा ही था तो, मुझे यहां आने नहीं देना था! पहले ही ट्रांसफर रुकवा लेना था, अब आ गई हूं तो काम तो करूंगी..!”
” ठीक है हुकुम! बस अपना ख्याल रखिएगा..!”
मुस्कुराकर बांसुरी वापस घर की तरफ मुड़ गई…..
उसके वापस मुड़कर दौड़ना शुरू करते ही वासुकी ने अपनी गाड़ी एक तरफ को करके रोक ली…
उसकी गाड़ी के बगल से निकलते हुए बांसुरी ने एक नजर कांच की तरफ देखा और आगे बढ़ने को थी कि वासुकी से रहा नहीं गया और वह दरवाजा खोलकर बांसुरी के सम्मान में बाहर निकल आया…
” अरे आप यहां..?”
बांसुरी के सवाल पर वो अचानक कोई जवाब नहीं दे पाया और बस मुस्कुरा कर उसके सामने हाथ जोड़ दिए…
” यह तो अच्छी मुलाकात हो गई आपसे…
मुझे नहीं पता था कि आप यहां रहते हैं… मुझे लगता था कि आप शायद देहरादून में ही रहते होंगे और इसीलिए हमारी हवेली आपको चाहिए थी…!”
अनिरुद्ध की जो हालत हो रही थी वह सिर्फ वही महसूस कर सकता था! साढ़े छै फुट का लंबा चौड़ा विशालकाय आदमी सामने खड़ी बांसुरी के सामने पत्ते सा कांप रहा था…
ऐसा लग रहा था उस सामान्य कद काठी की लड़की में आखिर ऐसी कौन सी ताकत थी जिसके वशीभूत हो अनिरुद्ध वासुकी इस कदर उस पर सम्मोहित हो चुका था कि उसे अपने सामने देखकर वह खुद पर ही काबू नहीं रख पा रहा था… अपनी दोनों हथेलियों को आपस में एक दूसरे से रगड़ते हुए वह चुपचाप जमीन को देख रहा था और बांसुरी उसे देखते हुए यही सोच रही थी कि शायद यह व्यक्ति मानसिक अवसाद से ग्रस्त है या फिर किसी तरह का कोई इंफिरियरिटी कांपलेक्स इसे घेरे हुए हैं…..
वरना देखने में ठीक ठाक, सभ्य, पढ़ा लिखा, रईस आदमी उसके सामने इस तरह अपने हथेलियों को मसलते हुए चुपचाप खड़ा है इससे उसका हद से ज्यादा गिरा हुआ आत्मविश्वास ही नजर आ रहा था..! बांसुरी कुछ देर खड़ी इसके जवाब का इंतजार करती रही और फिर धीरे से उसे नमस्कार कर आगे बढ़ गई…
” अच्छा वासुकी साहब मैं चलती हूं… मुझे बहुत सारा काम है…”
वासुकी ने जमीन की तरफ देखते हुए ही धीरे से हाँ में गर्दन हिला दी और उसके आगे बढ़ने की दिशा की तरफ मुंह किए चुपचाप खड़ा हो गया..! बांसुरी के वहां से जाते ही उसने एक गहरी सी सांस भर ली …
ऐसा लग रहा था जैसे जब तक बांसुरी उसके सामने खड़ी थी उसकी सांसे शरीर के अंदर आनी जानी बंद हो गई थी…
उसे बिल्कुल यह महसूस हो रहा था कि अगर कुछ देर और बाँसुरी उसके सामने खड़ी रह गई तो उसके प्राण पखेरू उड़ जाएंगे…
उसकी दिल की धड़कन इतनी तेजी से बढ़ी हुई थी कि उसने गाड़ी खोल कर अंदर की पानी की बोतल निकाली और पूरी की पूरी एक साँस में पी गया…
बचा हुआ पानी अपने चेहरे और बालों पर डालने के बाद जब उसे लगा कि अब उसका सर थोड़ा ठंडा हुआ है तब अपने बालों को झटक कर वह वापस गाड़ी में बैठ गया और उसने अपनी गाड़ी वापस उसी तरफ धीमी गति से बांसुरी के पीछे बढ़ा दी….
****
बाँसुरी तैयार होकर ऑफ़िस निकाल गयी… आज उसकी अलग अलग विभागों के पदाधिकारियों के साथ मीटिंग्स थीं….
इन सब के लिए जाने के पहले ही दीवान ने उसके सामने एक ज़िक्र छेड़ दिया….
” मैडम कल से आज तक में गांव वालों की ढेर सारी अर्ज़ियाँ एक ही मुद्दे पर आई है.. क्या वह मुद्दा आपको बता दूँ ..?”
” ऐसी क्या बात हो गई दीवान जी, बताइए..?”
” मैडम अधिकतर अर्ज़ियां इस बात पर है कि आप के परिसर में जो क्षेत्र जनदर्शन के लिए तय किया गया है वहां पर ऊपर कोई शेड नहीं है..! जिसके कारण गांव वालों को बहुत तकलीफ हो जाती है ! वहां कड़क धूप में खड़े होकर आपसे बात करना और आपका इंतजार करना उन लोगों को बहुत भारी पड़ता है ! बरसात के दिनों में वह बारिश से परेशान होते हैं और गर्मी के दिनों में धूप से…!”
” एक बात नहीं समझ में आई दीवान साहब ! गांव वालों का तो जीवन ही धूप मिट्टी बरसात इन्हीं सब के बीच गुज़रता जाता है… जो किसान कड़ी धूप में खेती करता है, भरी बारिश में घुटनों तक भरे पानी के बीच खेतों में घुसकर धान का रोपा लगाता है उस किसान को मुझसे मिलने के लिए शेड की क्या आवश्यकता है…? यह बात कुछ अजीब नहीं लग रही…?”
” अब हम क्या कह सकते हैं मैडम ?. अलग-अलग कस्बों से यह चिट्ठियां और अर्ज़ियाँ आई है… आश्चर्य की बात है कि कल से आज तक में इन अर्ज़ियों की संख्या 1500 हो चुकी है जबकि कस्बे की जनसंख्या, लगभग सात हज़ार ही है… अगर आज और देखा तो इन अर्ज़ियों की संख्या और बढ़ सकती है… !”
“इसका मतलब लोगों को वाकई शेड की ज़रूरत है..! ठीक है दीवान जी आप इसके लिए भी टेंडर निकलवा लीजिये.. देखते हैं क्या कोटेशन मिलती है… सरकारी टेंडर पास होकर जिसको मिले उसे जल्दी से जल्दी काम शुरू करने बोलियेगा…
अगर गांव वालों को इतनी तकलीफ है तब तो ये काम जल्दी ही शुरू हो जाना चाहिए…. !”
“जी मैम ! वैसे हमारे बाक़ी कामों के लिए जिस कम्पनी को हायर किया जाता है क्या उन्हें ही ये भी काम दिया जा सकता है… !”
“उन्हें भी कोटेशन भरने बोलियेगा… ऐसे किसी को भी सरकारी काम कैसे दें सकते है दीवान जी.. आप तो ये सब मुझसे ज्यादा जानते होंगे… !
“जी मैम.. मैं आज ही इसका टेंडर निकलवाता हूँ… मीटिंग में चलने से पहले एक ये इन्विटेशन कार्ड देख लीजिये…
“ये किसने भेजा है… यहाँ तो मैं किसी को जानती तक नहीं.. !”
“मैडम चिनार वाला कॉन्ट्रैक्ट शेखावत एंड कंपनी को मिल गया है… उसी ख़ुशी में वो पार्टी दें रहा है… आपको स्पेशल रिक्वेस्ट कर के बुलाया है मैम… कुछ माफ़ी भी मांगना चाहता है, ऐसा मुझे लगा.. !”
“वो आदमी ऐसा माफ़ी मांगने वाला तो नहीं लगा मुझे, लेकिन ठीक है अगर कार्ड आया है तो मेरी तरफ से फूल भिजवा दीजियेगा… !”
“जी मैडम हम फूल भिजवा देंगे.. पर कहना यहीं चाहते हैं की वो खतरनाक लोग हैं.. उनसे उलझने से बेहतर है बीच का कोई रास्ता निकाला जाएं… आखिर आपको यहाँ रहना है, अगर इसी तरह एक एक से आप दुश्मनी पालती रहीं तो यहाँ रहना दूभर हो जायेगा… !”
“डरा रहें हैं आप मुझे.. ?”
“नहीं मैडम, आपसे उम्र में बड़े हैं और शायद अनुभव में भी… बस आपको अपने मन की बात बता रहें.. बाक़ी जैसा आपको सही लगे… !”
एक गहरी सी साँस लेकर बाँसुरी ने हाँ में गर्दन हिला दि और मीटिंग्स के लिए बाहर निकल गयी….
उधर वासुकी अपने ऑफ़िस में बैठा कुछ काम कर रहा था की दर्श उसके केबिन में चला आया.. आते ही उसने टेबल पर एक कार्ड वासुकी के सामने उछाल दिया….
“ये क्या है… ?”
“खुद देख ले… !” वासुकी के सवाल पर दर्श ने जवाब दिया और वासुकी ने उस कार्ड को उठा लिया…
“ओह्ह तो अब ये इस बात पर पार्टी कर रहा है… ?”
“तूने उसका हाथ काट दिया इस बात पर वो पार्टी कर रहा और उससे बढ़ कर अविश्वसनीय ये है की हमें पार्टी में बुला भी रहा.. !”
“जायेगा कौन, इस ज़हर की पार्टी में… ?”
“देख ले.. वैसे उसने सारे प्रशासनिक अमले को बुला रखा है… !”
“क्या बात कर रहा है.. ?”
“हाँ सच कह रहा हूँ… सिर्फ प्रशासनिक ही नहीं फारेस्ट डिपार्टमेंट, कृषि व विद्युत् विभाग और इसी तरह के आदि इत्यादि अफसरों को भी बुलाया है… !”
“मतलब…. !”
वासुकी ने बात अधूरी छोड़ दि…
“हाँ मतलब कलेक्टर साहिबा के पास भी निमंत्रण पत्र गया तो होगा.. अब वो जाती है की नहीं ये मालूम नहीं है..
” तो मालूम करो… !”
“हम्म कोशिश करता हूँ… !”
दर्श अपना फ़ोन उठाये बाहर निकल गया और वासुकी वापस अपने काम में लग गया….
बाँसुरी को इतनी बड़ी संख्या में गांव वालों के खत मिले थे की उसने तुरंत आदेश पारित कर उसी समय शेड के लिए टेंडर निकलवा दिया… अगले दिन से कोटेशन भरने की तारीख मुकर्रर कर दी थीं उसने.. पर इतना सब होने के बावजूद महीना भर तो उसे टेंडर के कोटेशन जांचने और उसका बजट तय करने में लगने वाला था… वो इसी सब के उपाय में खोयी थीं और वासुकी शेड बनाने के लिए आवश्यक सामग्रियों की खरीद फरोख्त में भी लग गया था …
दर्श जैसे ही फोन पर बात करके वापस आया उसने वासुकी को अपने लैपटॉप में डूब कर काम करते देखा और जाकर उसका काम देखने लगा…
” अबे यार तुम तो मतलब मिल्खा सिंह से भी तेज भाग रहे हो…! अभी तो टेंडर नहीं निकला है और तुमने अभी से शेड बनाने का सामान और मजदूर जुगाड़ लिए…
” इस काम में किसी तरह की देरी नहीं चाहिए मुझे कल टेंडर ओपन होते ही कोटेशन डालनी है… यह काम किसी भी हाल में मुझे चाहिए जिससे काम शुरू होने की तारीख तय होते ही 2 दिन के अंदर मेरा शेड तैयार हो जाए…!”
” ठीक है मेरे दोस्त, मेरे भाई नागराज.. ! अब सुनो, आज रात की पार्टी में कलेक्टर साहिबा जाने वाली है..!”
यह खबर सुनकर वासुकी को किसी तरह की कोई खुशी नहीं हुई…बल्कि चेहरे पर हल्के नाराज़गी वाले भाव चले आये
” क्या जरूरत है कहीं भी जाने की..! घर से ऑफिस, ऑफिस से घर इतना तो पर्याप्त है..! यह जगह इस लायक थोड़ी ना है कि बार-बार घर से बाहर निकला जाए..!”
” वासुकी यार तुम कौन होते हो उन्हें यह सब बताने वाले..?”
” कोई नहीं होता तभी तो उन्हें नहीं बता रहा हूं… खुद से कह रहा हूं कि उन्हें नहीं जाना चाहिए… लेकिन मैं जानता हूं वह जाएंगी… जिद्दी बहुत है ना..!”
” मैं जानता हूं कि तुम भी जाओगे..!”
” मेरी तो मजबूरी है.. वरना मैं उस शेखावत के जनाजे पर ना जाऊं..! खैर शाम को चलने की तैयारी रखना… !”
वासुकी वहां से उठकर जाने को था कि दर्श ने उसके लैपटॉप में कुछ देखा और उसे टोक दिया…
” तू वहाँ शेड के काम के साथ-साथ सीसीटीवी भी लगवाने वाला है क्या..? “
वासुकी एकदम से पलटा और तुरंत जाकर उसने लैपटॉप को बंद कर दिया…
“वो बाद में सोचेंगे.. ! अभी चलें.. ?”
हाँ में सर हिला कर वो दोनों बाहर निकल गए.. उनके निकलते ही वासुकी की सेक्रेटरी अंदर घुसने लगी.. वासुकी ने उसे टोक दिया…
” मेरा लैपटॉप मत छूना… !”
“यस सर… !”
कह कर वो अंदर चली गयी.. लेकिन फिर जाने क्या हुआ वासुकी उसके पीछे अंदर गया और फटाफट उस लैपटॉप को उठा कर अपने साथ ले गया…
दर्श ने देखा और मुस्कुरा कर आगे बढ़ गया….
क्रमशः
aparna….
