
जीवनसाथी – 2/7
सर कलेक्टर साहब का औचक निरीक्षण हो गया है.. नीचे जाँच कर रहें हैं.. वहाँ के बाद यहाँ भी आने वाले है… !
ऊपर मौजूद मैनेजर ने फटाफट उस स्टाफ के साथ रसोई की तरफ दौड़ लगा दी… और कलेक्टर साहब सुनते ही पंखुड़ी के कान खड़े हो गए….
कुछ देर बाद ही शेखर अपनी टीम के साथ ऊपर चला आया….इधर उधर देखते हुए वो मैनेजर के साथ रसोई कि तरफ बढ़ गया…..
पंखुड़ी ने उसे जाते देखा और अपनी सहेलियों में व्यस्त हो गयी… उसे लगा शेखर ने उसकी तरफ ध्यान नही दिया…
वो अभी अपनी किसी दोस्त से कुछ कहने में व्यस्त थीं कि अचानक शेखर उसकी टेबल पर चला आया..
“हेलो पंखुड़ी जी, कैसी हैं आप.. ?”
शेखर को एकाएक अपनी टेबल पर देख वो चौंक कर खड़ी हो गयी.. उसकी सहेलियां भी आश्चर्य से उसे देखने लगी..
“मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं.. ?”
“बढ़िया ! यहाँ कैसे.. ?”
“मैं बस फ्रेंड्स के साथ चिल करने आई मीन मिलने जुलने आई थीं.. और आप.. ?”
“मुझे यहाँ कि शिकायत मिली थीं कि यहाँ के डेयरी प्रोडक्ट में मिलावट है, बस इसी लिए अचानक छापामारी करनी पड़ी… ” शेखर और पंखुड़ी अब तक खड़े ही थे कि पंखुड़ी कि दोस्त ने उसे बैठने को कहा लेकिन वक़्त कि कमी बता कर शेखर ने उन लोगों से इजाजत ली और निकलने लगा, पंखुड़ी भी उससे बात करती हुई बाहर तक निकल गयी…
दोनों काफी देर तक बाहर खड़े इधर उधर कि बातों में लगे रहें….
शेखर को बाहर आकर खड़े होते देख उसकी गाड़ी का ड्राइवर, गाड़ी से उतर कर एक तरफ खड़ा हो गया..
शेखर की टीम के बाकी सदस्य भी एक तरफ खड़े हाथ बांधे उसका इंतजार करते रहे..
दूसरी तरफ पंखुड़ी की सहेलियां ऊपर खिड़की के पास जमी पंखुड़ी और शेखर पर पूरी नजर रखे हुए थी..| घड़ी की सुइयां टिक टिक करती आगे बढ़ रही थी लेकिन शेखर और पंखुड़ी की बातों का कोई अंत नहीं था, दोनों अपने आप में व्यस्त थे !
वो दोनों ही अपनी बातों में मगन थे कि, शेखर के मोबाइल पर किसी का फ़ोन आने लगा.. और उस फ़ोन के बाद किसी ज़रूरी मीटिंग का बता कर शेखर को निकलना पड़ा.. उसे सी ऑफ़ करने के बाद पंखुड़ी अपनी सहेलियों के पास वापस लौट आई…
उसकी सारी सहेलियां बैठी उसे घूर रही थीं..
” क्या हो गया ?तुम सब ऐसे घूर क्यों रही हो.. ?”
“वाह बेटा, बड़ी होशियार निकली तू तो.. एक तरफ तो खुद को शादी डॉट कॉम का लाइफ टाइम मेंबर घोषित कर रखा है, दूसरी तरफ चोरी चोरी शहर के कलेक्टर के साथ खिचड़ी पकाई जा रही है.. !”
“अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.. !”
“चल झूठी, और कितना झूठ बोलेगी, हाँ बोल !”
“क्या झूठ बोला है मैंने.. वो तो बस जरा सी जान पहचान है बस… !”
“जरा सी जान पहचान में बंदा रेस्टोरेंट के बाहर चालीस मिनट तक खड़े खड़े बात नही कर सकता.. हम सब ने देखा है यहाँ इस खिड़की पर खड़े होकर… यहाँ तक कि तेरे उस कलेक्टर कि टीम भी तुम लोगों से कुछ दूर हाथ बांधे खड़े चुपचाप अपने साहब का इंतज़ार करती खड़ी थीं और सबके चेहरे पर यही नज़र आ रहा था कि साहब कब वापस जायेंगे.. बिचारा ड्राइवर भी गाड़ी से उतर कर हाथ बांधे खड़ा हो गया था..
और मैडम यहाँ का मैनेजर भी चार बार चक्कर लगा आया कि कलेक्टर कि गाड़ी उसके रेस्टोरेंट के सामने से हट क्यों नहीं रही है.. “
“ओह्ह अच्छा ! क्या हमने इतनी देर बात कर ली.. लेकिन मुझे तो याद तक नही कि कोई ढंग कि बात भी हुई है…..!”
“पर हम लोगों को समझ में आ गया है कि तुम लोगों कि काफी ढंग से बात हुई है और अगर इसी रंग ढंग कि बातचीत होती रही तो वो दिन दूर नही जब हम सब तेरी मेहँदी पर ‘चिट्टियां कलाइयाँ वे’ पे डांस करते नज़र आएंगे, और जल्दी ही तू शहर कि नयी कलक्टरनी घोषित हो जाएगी.. !”
पंखुड़ी अपनी सखी कि बात पर हंस पड़ी…
“ऐसा कुछ नहीं है यार.. कल मम्मी घर आ रही हैं, और उनके आते ही वापस मेरा चाय समोसा प्रोग्राम शुरू हो जायेगा.. !”
“चाय समोसा.. ?”
“हाँ मतलब लड़के देखो और बस देखते रहो जब तक या तो कहीं समझौते कर के तुम हाँ न बोल दो या सामने वाला हाँ न बोल दे.. !
“तो तू क्यों लड़के देख रही है ? कलेक्टर साहब से ही बात कर ले न सीधे.. !”
“क्या बात कर लूँ.. ? कि देखिये आपकी भी शादी नहीं हुई है और मेरी भी.. तो क्यों न हम दोनों शादी कर लें ऐसा.. ?”
“हाँ और क्या.. ? जब तुझे पसंद है तो बोल दे.. ?”
“अरे ऐसा नहीं होता यार.. खैर चल छोड़ ये सब, अब मैं हॉस्पिटल निकलती हूँ…. आज सुबह काफी पेशेंट्स एडमिट हुए हैं, शाम का राउंड निपटाना पड़ेगा मुझे.. !”
काफी वक़्त भी हो चुका था इसलिए सारी ही सहेलियां उठ गयीं और अपने अपने घर के लिए निकल गयी…
****
अनिरुद्ध वासुकी अपने ऑफिस के केबिन में बैठा था उसकी शानदार टेबल के सामने एक तस्वीर पड़ी थी जिसे वह बहुत ध्यान से और प्यार से देख रहा था उसी वक्त उसके केबिन में दर्श दाखिल हुआ…
” खुशखबरी है तुम्हारे लिए, बांसुरी ने जॉइनिंग के अगेंस्ट कोई लेटर नहीं जारी किया है, इसका मतलब है कि वह जल्दी ऑफिस ज्वाइन कर लेगी..!”
अनिरुद्ध के चेहरे पर एक तीखी सी मुस्कान चली आई | उसने दर्श की तरफ देखा और अपने रिवाल्विंग चेयर पर पीछे की तरफ टेक लगा कर अपने दोनों हाथ सिर के पीछे बांध लिये…
रिवाल्विंग चेयर इधर से उधर घूमाते हुए वह छत को देखते हुए मुस्कुराता रहा.. दर्श ने उसके सामने उसकी ब्लैक कॉफी का कप रखा और टेबल से टिक कर खड़ा हो गया..
” एक बात पूछूं अनिरुद्ध, सच सच बताना? आखिर उस लड़की में ऐसा क्या है जो तुम उसके पीछे इतने बावले हुए जा रहे हो..?
” कर दे वो नजरे करम हम पर, उस पर एतबार कर लूँ,
दीवाना हूं उसका ऐसा की, दीवानगी की हर हद पार कर लूं..”
” शादीशुदा है वो और सुनने में तो आया है कि एक बेटा भी है उसका..!”
” इश्क और जंग में हर चीज जायज है यह सुना नहीं क्या तुमने.. ?और इश्क़ की किस किताब में लिखा है कि इश्क़ केवल कुंवारी लड़कियों से ही किया जा सकता है… भई जो सोच समझकर किया वह इश्क़ कैसा हुआ..?”
” देख अनिरुद्ध आज तक तेरे हर डिसीजन पर मैं तेरे साथ खड़ा रहा हूं | आज भी साथ हूं, लेकिन यह चक्कर मेरी समझ से बाहर है..!
” तुझे क्या और कैसे समझाऊं दर्श जब ये खुद मेरी समझ से बाहर है.. मैं खुद कहाँ जानता हूँ कि मैं क्यों इतना दीवाना हो गया हूँ मुझे आज भी याद है उससे वह पहले मुलाकात….
“हम्म मुझे भी याद है….
अनिरुद्ध वासुकी लगभग 6 महीने पहले बीत चुकी उस बात में खो गया….
उस वक़्त अनिरुद्ध के खिलाफ वहाँ के कुछ व्यापारियों ने कलेक्टर ऑफिस में शिकायत दर्ज़ करवाई थीं… और उसके बाद वहाँ से उसके पास नोटिस इश्यू हुआ था जिसके बाद उसे कलेक्टर से मिलने जाना था..
वो अपनी गाड़ी से जा रहा था कि ट्रैफिक सिग्नल पर उसकी गाड़ी के ठीक बगल में कलेक्टर कि गाड़ी आकर रुकी…
“अनिरुद्ध ! देख ले, यही है वो कलेक्टर जिससे हम मिलने जा रहें… !”
अनिरुद्ध ने बाजु में खड़ी गाड़ी पर नज़र डाली.. कांच के पीछे बैठी बाँसुरी पर उसकी नज़र थम कर रह गयी.. वो उस वक़्त भी बहुत ध्यान से अपनी गोद में रखें पेपर्स पढ़ रही थीं.. बीच बीच में अपने बालों को वो किनारे कान के पीछे करती जा रही थीं…
अनिरुद्ध उसे देख कुछ सोच ही रहा था कि सिग्नल क्लियर हुआ और बाँसुरी कि गाड़ी आगे बढ़ गयी.. ..
अनिरुद्ध के ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ाने कि कोशिश की लेकिन एक झटका खा कर गाड़ी रुक गयी.. बार बार स्टार्ट लेने के बावजूद गाड़ी इंच भर भी नही सरकी और अनिरुद्ध और दर्श को गाड़ी से उतरना पड़ा…
दर्श ने उतरने से पहले ही अपने खास भरोसेमंद आदमी को बुला लिया और उसकी गाड़ी में सवार वो दोनों वहाँ से निकल गए..
कलेक्टर से मिलने का उनका सुबह का समय तय था, जिस पर वो दोनों ही नही पहुँच पाए..
और उन्हें अब बाहर बैठ कर अगले टाइम स्लॉट का इंतज़ार करना पड़ रहा था.. अनिरुद्ध और दर्श के साथ ऐसा क़भी नहीं हुआ था.. उन दोनों का एक एक पल कीमती था, जो वो लोग कहीं ज़ाया नहीं किया करते थे लेकिन आज इस कदर फंसना हो गया की वो दोनों भी हाथ पर हाथ धरे बैठें रह गए.. इंतज़ार के अलावा उनके पास भी कोई चारा नही बचा था..
उसी वक़्त घर से फ़ोन आया कि काका कि तबियत सही नही लग रही है.. बुज़ुर्ग और रिश्तेदार के नाम पर उन दोनों के पास कोई नहीं बचा था, इसलिए उनके लिए घर का हर सदस्य चाहे वो दरबान हो या रसोइया, सभी महत्वपूर्ण थे.. इसलिए तबियत का सुन अनिरुद्ध ने दर्श को वापस भेज दिया…
एक आध बार ऑफिस के बाहर से अनिरुद्ध ने झाँकने की कोशिश भी कि लेकिन बाँसुरी की झलक तक नहीं मिली..लंच ब्रेक में कलेक्टर ऑफिस का मातहत उसके पास चला आया..
“मैडम ने लंच के बाद का वक़्त आपके लिए रखा है.. आप कुछ खाना चाहें तो यहाँ कि कैंटीन में खा सकते हैं.. !” और उसके हाथ में चाय पकड़ा कर चला गया…
अनिरुद्ध को आज तक किसी ने इंतजार नहीं करवाया था | मामला जिलाधीश का नहीं होता तो अनिरुद्ध इतनी देर तक किसी का इंतजार भी नहीं करता, और पांव पटकता वापस लौट जाता | लेकिन वह भी जानता था कि किसी जगह पर राज करने के लिए वहां के प्रशासन से बना कर रखना पड़ता है | वैसे भी अनिरुद्ध का जो स्वभाव था व्यापारी वर्ग उससे खासा चिढ़ा हुआ था, इसलिए प्रशासनिक लेवल पर अनिरुद्ध को अपनी साख बचाए रखना बहुत जरूरी थी | और इसीलिए वह कलेक्टर के आदेश के कारण कलेक्टर ऑफिस के बाहर पड़ी एक सामान्य सी बेंच पर पिछले 3 घंटे से बैठा बांसुरी का इंतजार कर रहा था…
… यह वही कोमल और नाजुक सी लड़की थी जिसे वो ट्रैफिक सिग्नल पर देख चुका था…
इतनी जरा सी लड़की और इतना रुआब कि अनिरुद्ध वासुकी को पिछले तीन घंटे से इंतजार करवा रही थी… आखिर है कौन यह कलेक्टर अब तो इसे देखना ही पड़ेगा…
घर जाने के बाद दर्श दरबान काका को अस्पताल ले जाकर डॉक्टर से परामर्श करवा चुका था और उसके बाद उसने अनिरुद्ध को फोन करके वहां का हाल-चाल बताने के बाद उससे पूछ लिया कि कलेक्टर से मुलाकात हुई या नहीं ? अनिरुद्ध के यह बताने पर कि वह अब तक बैठा कलेक्टर का इंतजार कर रहा है दर्श भी चकित रह गया था, क्योंकि वह भी अनिरुद्ध के गुस्सैल स्वभाव को अच्छे से जानता था |जो चीज अनिरुद्ध के मुताबिक नहीं होती थी वह फिर उस चीज को अपनी जगह पर मौजूद भी नहीं रहने देता था…
दर्श को यही डर सता रहा था कि कहीं अनिरुद्ध कलेक्टर को भी खरी-खोटी सुनाकर निकल ना जाए, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ | बांसुरी के केबिन से अनिरुद्ध के नाम का बुलावा आते ही अनिरुद्ध अपनी मस्त चाल से चलते हुए ऑफिस केबिन में दाखिल हो गया…
अनिरुद्ध ने अंदर जाने के पहले कर्टसी में बाँसुरी से पूछ लिया.. कि “क्या मैं अंदर आ सकता हूं.?” बांसुरी अपनी फाइल्स पर आंखें गड़ाए बैठी रही और बस उंगली के इशारे से उसे अंदर बुला लिया | अनिरुद्ध आश्चर्य से सामने बैठी सुंदरी को देखता रह गया, मन ही मन उसके यह विचार भी चल रहा था कि, क्या इतनी सुंदर लड़की भी कलेक्टर बन सकती है…?
आज तक रूखे सूखे चेहरों के बीच रहने का आदी अनिरुद्ध पहली बार अपने सामने बैठी किसी अपरूप सुंदरी को देख रहा था | उसके लिए तो आज तक लड़कियां अजूबा ही थीं.. उसकी ज़िंदगी उसने खुद ने इतनी रूखी सुखी कर रखी थी कि प्यार मोहब्बत जैसे शब्दों के लिए उसकी डिक्शनरी में कोई जगह नहीं थीं…
ऐसा नहीं था कि लड़कियों से उसका क़भी पाला नहीं पड़ा हो, लेकिन उसने हमेशा दूर से ही सलाम दुआ रखी थीं..
न उसने किसी लड़की को अपने करीब आने दिया था और न ही खुद किसी के करीब गया था.. या ये भी कहा जा सकता है कि आज तक उसके दिल में शहनाई बजा दे ऐसी कोई लड़की उसके जीवन में आई ही नही थीं…
लेकिन आज पहली बार सामने बैठी कलेक्टर साहिबा को देख उसका मन चाह रहा था कि वो बस उसके सामने बैठें उसे यूँ ही देखता रहें…
उसके रूखे सूखे खुरदुरे से दिल ने अचानक ऑक्सीजन मिलने पर जैसे धड़कना शुरू कर दिया था…
पर सामने बैठी कलक्टरनी को जैसे उससे कोई लेना देना ही नही था.. इतनी देर में बाँसुरी ने आंख उठा कर उसे एक बार देखा तक नहीं था…
अपनी नजरे फाइल पर गड़ाए हुए ही उसने उसे बैठने का इशारा भी किया और उसके बैठते ही उसके चेहरे पर अपनी ऑंखें गड़ा दी…
उफ़ कितनी गहरी थीं ये आँखे.. जिस चेहरे कि मासूमियत में वो इतनी देर से खोया हुआ था इन आँखों को देखते ही डूब गया.. ये ऑंखें ऐसी थीं कि सामने वाले को देख कर बस उसका सारा एक्सरे उतार ले…
“तो आप है मिस्टर अनिरुद्ध वासुकी.. नाम तो बड़ा फ़िल्मी है आपका..!”
“जी काम भी सारे फ़िल्मी ही हैं.. !”
बाँसुरी ने उसे घूर कर देखा…
“आप जानते हैं न आप किसके सामने बैठें है… ? ढ़ेर सारे एलीगेशंस हैं आपके खिलाफ, आप लोगों से मनमाना रुपया वसूलते हैं, गन रख कर लोगों से कम्पनी में हिस्सेदारी मांगते हैं.. !”
“जी !! मानता हूँ मैं.. लेकिन इनमें से कौन सा ऐसा व्यापारी है जो जो दूध का धुला है? जो सोने का व्यापार कर रहा है और सोने सा खालिस मन का भी है..? ऐसा इनमें से कोई नहीं है | यह सारे लोग जितना धंधा आपके सामने दिखाते हैं उससे कहीं ज्यादा छुपा कर रखते हैं | इनके इल्लीगल कामो का अगर मैं कच्चा चिट्ठा खोलने बैठा तो पूरा एक ग्रंथ लिखा जाएगा..!”
” लेकिन आपके पास कोई राइट्स नहीं है इनके इलीगल कामों का कच्चा चिट्ठा खोलने का भी और ना ही उन पर ग्रंथ लिखने का..!
और दूसरी बात अगर वह लोग इलीगल तरीकों से काम आ रहे हैं, तो कायदे से आपका फर्ज बनता है कि आप पुलिस या प्रशासन को उनके बारे में जानकारी दें न कि उनके इलीगल धंधो को छुपाए रखने के बदले में उनसे अपना हिस्सा लें….
दूसरी बात सामने वाला झूठ बोल रहा है यह सफाई देकर हम अपने झूठ को सच का जामा नहीं पहना सकते…! शक्ल से इतने बेवकूफ तो नजर नहीं आते आप कि मेरे पास अपनी यह बेवकूफाना सफाईयां पेश कर रहे हैं…
” शुक्रिया मेरी शक्ल की तारीफ करने के लिए, वैसे आप से एक बात बता दूं, पहली बार किसी लड़की ने मेरी शक्ल पर कोई कमेंट दिया है ! और इसीलिए मेरी खुशी कंट्रोल नहीं हो रही….!अब क्या ही कहूं आपसे कलेक्टर साहिबा !”
” स्टॉप इट!! अगर आप इसी तरह बकवास करते रहेंगे तो मुझे अभी के अभी बिना सबूतों के ही आपको थाने में डलवाना पड़ेगा..!”
” अब अगर थाने की इंचार्ज भी आप होंगी तो मैं थाने में रहना मंजूर करता हूं! और वैसे अभी अभी आपने कहा कि आपके पास मेरे खिलाफ सिर्फ एलिगेशन है, पर सबूत नहीं है तो इसका मतलब मैं जा सकता हूं..!”
” जी हां मेरे पास सिर्फ आपके नाम पर शिकायतों का अंबार ही आया है, और मुझे एक्शन लेने के लिए कहा गया था…. लेकिन मेरे पास फिलहाल कोई सबूत नहीं है और बिना किसी सबूत के मैं अपनी पोज़िशन का गलत फायदा उठा कर आपको दोषी तो नहीं मान सकती न!
इसलिए आपको बुलाकर चेतावनी दे रही हूं कि, अगर आपने इस तरह के अपने काम बंद नहीं किए तो मुझे मजबूरन आप के खिलाफ सबूत इकट्ठे करवाकर आपको जेल दाखिल करना होगा..!”
“अगर मेरे खिलाफ एक्शन लेकर आपको ख़ुशी मिलती है तो ये भी मंजूर है अनिरुद्ध वासुकी को.. !”
अनिरुद्ध ने मुस्कुरा कर सामने बैठी बाँसुरी को देखा और अपनी जगह से उठ कर बाहर निकलने लगा कि उसे वापस बाँसुरी ने आवाज़ लगा दी..
“मिस्टर वासुकी !! ये लोग बहुत खतरनाक हैं, आप इनसे बच कर रहें वहीँ आपके लिए अच्छा होगा.. “
“आप डरा रही हैं मुझे.. !”
“नही!! अलर्ट कर रही हूँ, क्योंकि मैं मानती हूँ कि आप गलत हैं लेकिन वो लोग आपसे कहीं ज्यादा गलत कर रहें हैं.. मुझे मेरे सूत्रों से मालूम चला है कि आपकी गाड़ी के ब्रेक्स फेल कर दिए गए है…
…मेरे ऑफिस पहुँचने में आज आप लेट हो गए थे न, वो कोई इत्तेफाक नही था, बल्कि जानबूझ कर आपको यहाँ देर तक रोके रखने की साज़िश थीं….
आपकी गाड़ी जानबूझ कर ख़राब करवाई गयी, जिससे आप यहाँ लेट पहुंचे और उन लोगों को आपके घर पर आपको मारने कि साज़िश रचने का पूरा मौका मिल जाये… !
आपकी गाड़ी जहाँ सुधरने भेजी गयी थीं, वहीँ से उसके ब्रेक्स फेल किये गए है..| जिससे आप जब इस गाड़ी में रवाना हों, तब आपका एक्सीडेंट हो जाये और कहीं इसमे आप बच गए तो घर पर तो मौत आपका इंतज़ार कर ही रही हैं… “
ये सारी बातें सुन कर अनिरुद्ध के माथे पर बल पड़ गए… उसकी सवालिया नज़रे देख बाँसुरी ने बिना मुस्कुराये ही उसके न पूछे गए सवाल का जवाब भी दे दिया..
“आप सोच रहे होंगे ये सब मुझे कैसे पता.. ? है न.. !
आपकी शिकायत करने वालों पर मेरी नज़र थीं और इत्तेफाक से मेरे खबरी ने उन लोगों कि सारी प्लानिंग्स सुन ली… और इसलिए मुझे ये समझ में आ गया कि आपकी शिकायत करने के पीछे उन लोगों का मूल उद्देश्य क्या है.. ?
अब मैंने तो आपको आगाह कर दिया है, आगे आपको क्या करना है ये निर्णय आपका खुद का है.. !”
अनिरुद्ध आज तक अपने बाहुबल से हर कहीं जीतता आया था| ऐसा नहीं था कि उसके दुश्मन नही थे या उसे मारने का प्रयास नहीं किया गया था, लेकिन आज पहली बार सामने से होकर किसी ने उसकी जान बचाने कि पहल की थीं… |
इस पूरी दुनिया दर्श के अलावा और कोई न था, जिस पर वो विश्वास कर सकता था | लेकिन आज सामने खड़ी इस अनजान सी लड़की की हर बात पर विश्वास कर लेने को उसका जी चाह रहा था… |
ज़रूर वो किसी गहरे षड्यंत्र का शिकार होने वाला था तभी तो दर्श को भी बहाने से उससे अलग कर के काका के साथ अस्पताल भेज दिया गया, जिससे उन दोनों के पीछे से इसके घर पर उसी की मौत का सामान तैयार किया जा सके….
अनिरुद्ध अपनी जगह से मुड़ कर जाने को हुआ और फिर थम कर रुक गया.. बाँसुरी की तरफ देख उसने ज़िन्दगी में पहली बार किसी लड़की से वो कहा जो आज तक उसने किसी से क़भी नहीं कहा था….
क्रमशः
aparna…..
