जीवनसाथी -2/4

जीवनसाथी 2.. – 4

    समर के फोन पर जैसे ही महल के ऑफिस से फोन आना शुरू हुआ वो तुरंत वहां से उठ गया!  पिया भी जा चुकी थी इसलिए अब उसके रुकने का कोई खास औचित्य नहीं था ! उसने तुरंत अपनी गाड़ी महल की तरफ भगा दी…
    महल में पहुंचते ही वो तुरंत ऑफिस की तरफ आगे बढ़ गया ! ऑफिस में सामने से ही आते प्रेम से वो  टकराते टकराते बचा…

”  ऑफिस से बाहर इस वक्त कहां जा रहे हो प्रेम? मुझे तो ऑफिस में बुलाया गया है.. ?”

” बाँसुरी हुकुम ने बुलाया है, जाओ मिल लो.. !”

” बांसुरी हुकुम ने!! लेकिन क्यों?

”  तुम चलो तो सही ऑफिस में सारी बात पता चल जाएगी मैं भी तुरंत वापस आ रहा हूं.. !” समर प्रेम कि तेज़ चाल से समझ गया कि उसे निरमा ने बुलाया है !

समर स्वभाव से ही उतावला था उसे किसी भी बात को जल्दी से जान लेने कि आदत थीं.. ऐसे सस्पेंस उससे सहन नहीं होते थे..
वह भागते दौड़ते ऑफिस में दाखिल हो गया | ऑफिस में अंदर युवराज के साथ-साथ बांसुरी भी  बैठी हुई थी…
  राजा किसी काम में होने के कारण वहाँ मौजूद नहीं था.. !
दोनों को प्रणाम कर वह भी एक तरफ हाथ बांधे खड़ा हो गया बांसुरी ने अपने सामने से एक एन्वेलप उठाकर समर की तरफ बढ़ा दिया..समर ने देखा चिट्ठी मंत्रालय से आयी हुई थीं…
  समर उसमे से चिट्ठी निकाल कर पढ़ने लगा,  जैसे जैसे वो पढता गया,  उसके चेहरे के रंग बदलने से लगे..
  ये बाँसुरी का ट्रांसफर लेटर था,  उसे मंत्रालय से सिर्फ साल बीतते ही उठा कर सुदूर किसी वनांचल में पटक दिया गया था…
  समर के चेहरे पर नाराजगी दिखने लगी थीं…

“हुकुम क्या राजा साहब इस बारे में जानते हैं.. ?”

“हाँ जानते हैं !”

“क्या कहाँ उन्होंने.. ?”

   समर के इस सवाल का जवाब युवराज ने दिया..

” उसे जानते तो हो, वह हर चीज हर काम अपनी लाइन पर ही चल कर करना चाहता है |  उसने बांसुरी से भी कह दिया है कि जॉइनिंग दे दो, और अगर वहां जाना ना चाहो तो छुट्टी लेकर बैठ जाओ!”

” भाई साहब, लेकिन वह मन ही मन यही चाहते हैं कि मैं जाकर ज्वाइन कर लूँ ! क्योंकि उनके अनुसार ईमानदारी और सच्चाई से काम करना ही मेरी ड्यूटी है.. वैसे इस बात पर मुझे भी ऑब्जेक्शन नहीं है क्योंकि मुझे पता है कि साल डेढ़ साल से ज्यादा कोई भी आईएएस और आईपीएस एक ही जगह नहीं टिक सकता ! मैं भी मंजूर करती हूं कि मुझे ट्रांसफर कर दिया जाए ! लेकिन इतने बीहड़ में मुझे भेजा गया है वहां पर जॉइन  करने में एक संकोच सा हो रहा था!  बस इसीलिए मैं चाहती थी कि समर और  प्रेम भैया एक बार देख लेते की जगह कैसी है उसके बाद मैं  ज्वाइन कर लेती..!”

” कैसी बात कर रही हो बांसुरी?  देखा जाए तो रियासत की रानी हो तुम ! ठीक है तुम अपनी मर्जी से काम करना चाह रही हो,  वह भी जिलाधीश का काम है ! इसलिए महल में किसी ने तुम्हें मना नहीं किया लेकिन इतने बीहड़ में जाकर तुम्हें काम करने की इजाजत तो हम खुद नहीं दे सकते.. !”

” आपकी तकलीफ मैं समझ रही हूं भाई साहब, लेकिन यह मेरा कर्म क्षेत्र है और मैं इससे पीछे नहीं हटूंगी.. !”

” नहीं रानी साहेब! अभी युवराज सा सही कह रहे हैं,  आप कर्मठ हैं, जुझारू भी हैं, यह बात हम सभी जानते हैं |  लेकिन इतने बीहड़ में जाकर काम करने कि आपको कोई आवश्यकता नहीं है | फिलहाल तो मैं यह सोच रहा था कि आपका ट्रांसफर इस तरह से क्यों करवाया गया है?  मेरी समझ से बाहर यह बात है कि राजा साहब जब खुद मुख्यमंत्री के पद पर हैं, आखिर किसकी हिम्मत है जिसने आपका ट्रांसफर करवाने की कोशिश की है…?
फिलहाल तो मुझे उस आदमी के बारे में पता करना है, कि कौन है जो आपको राजा साहब से दूर भेजने का यह षड्यंत्र रच रहा है!”

” अरे समर इतनी दूर की मत सोचो, ये  किसी एक आदमी का काम नहीं है |  प्रशासन में तो यह उठापटक चलती रहती है | और आईएएस आईपीएस लोगों की किस्मत ही इस उठापटक से जुड़ी हुई है…!

” लेकिन इन प्रशासनिक पदों में भी कुछ पद ऐसे होते हैं ना, जो मंत्रालय के करीबी होते हैं | और ऐसे लोगों को मंत्रालय अपने आप से दूर नहीं करना चाहता | जब आपके पति स्वयं मुख्यमंत्री हैं और आपको मंत्रालय में पद स्थापित किया गया है, तो आपका यहां से ट्रांसफर करने की ज़ुर्रत किसने की है ?  मुझे वह जानना है?  इस वक्त मुझे ये पता करना होगा, और जब तक मैं ना कहूं हो सके तो होल्ड में रखियेगा और ज्वाइन करने की हड़बड़ी मत कीजिएगा रानी साहेब!”

” हम भी यही कहेंगे बांसुरी अभी जॉइनिंग की हड़बड़ी मत करो होल्ड में रखो, बाद में देखते हैं क्या हो सकता है?”

   बांसुरी असल में इस ट्रांसफर से दुखी तो थीं,  दो ढ़ाई साल के शौर्य को लेकर राजा साहब से दूर जाकर रहना उसके लिए भी दूभर था.. और इसलिए वो कोई निर्णय नहीं ले पा रही थीं.. कल जब से ये चिट्ठी उसके हाथ आई थीं,  उसका मन किसी काम में  नहीं लग रहा था..
    राजा  भी किसी काम से बाहर गया था| इसलिए उससे सिर्फ फ़ोन पर ही बात हुई थीं और अपने स्वभाव के मुताबिक राजा ने जॉइन कर लेने कि बात ही कही थीं, हालाँकि वो एक बार अपनी तसल्ली के लिए एक बार उस जगह पर जाकर जाँच लेना चाहता था कि जगह कैसी है.. ?

  आज सुबह महल के ऑफिस में जब युवराज को बाँसुरी ने अपना ट्रांसफर लेटर दिखाया तब उसी ने तुरंत समर को बुलवा लिया था…

समर का दिमाग घूम गया था  उस पत्र को पढ़ने के बाद,| और वो उस पत्र को भेजने के पीछे किसका हाथ है ये  पता करने निकल  गया था..
  उसने जाते जाते प्रेम को फ़ोन घुमा दिया…

प्रेम कुछ देर पहले ही निरमा के फ़ोन पर घर वापस आया था… निरमा वैसे तो बहुत प्यार से बात करती थीं लेकिन जब उसका दिमाग किसी बात पर खराब होता तब उसकी टोन से ही प्रेम को समझ आ जाया करता था कि घर पर कुछ तो कांड हुआ है… |
  मीठी कि शरारतें भी उसकी उम्र से कहीं बड़ी थीं | इस लिए अक्सर उसके  लिए निरमा प्रेम पर नाराज होती थीं..
आज भी निरमा ने फ़ोन किया.. और..

“आप जरा घर आएंगे,  कुछ जरुरी बात करनी है.. !”

निरमा ने इतना कह कर फ़ोन रख दिया था और प्रेम के चेहरे पर पसीना छलक आया था.. पूरी दुनिया के सामने निर्भीक खड़ा रहने वाला यह छै फुटिया सांड सा आदमी जाने क्यों उस बित्ते भर की निरमा के सामने पत्ते सा कांपने लगता था..
कई बार निरमा इस बात पर उसका मजाक भी बना चुकी थीं पर फिर भी उसे निरमा के पीछे हाथ बांधे  घूमने और उसकी डांट सुनने में ही मजा आता था..
आज भी गिरते पड़ते वो अपने घर जैसे तैसे पहुंचा की बाहर वाले कमरे में ही निरमा से सामना हो गया..
   निरमा मीठी का होमवर्क करवा रही थीं.. प्रेम को अंदर आते देख उसने उसे आँखों के इशारे से ही बैठने का इशारा किया और मीठी की किताब में कुछ टिक लगाने लगी….

“क्या बात हो गयी निरमा,  अचानक ऐसे क्यों  बुलाया..?”

“बता रही हूँ, दो मिनट चैन से साँस तो ले लो.. !”

प्रेम को बैठा कर वो अंदर उसके लिए पानी लेने चली गयी … निरमा कितनी भी व्यस्त हो पर उसका ये नियम ही था की प्रेम किसी भी वक़्त बाहर से घर आये नौकरों के होने के बावजूद निरमा उसे अब भी अपने ही हाथ से पानी देती थीं और उसके लिए चाय चढ़ा आती थीं…
   इतने दिनों में शायद ही क़भी ये नियम टूटा हो.. आज भी वो उठ कर उसके लिए पानी लेने चली गयी..
  उसके पानी लेकर आते तक में प्रेम ने मीठी से थोड़ा बहुत जानने की कोशिश की कि क्या ममा नाराज हैं.. ?और अगर नाराज़ है भी तो क्यों ?लेकिन मीठी को भी कुछ ज्यादा मालूम ना था,  निरमा ने आकर ग्लास प्रेम के हाथ में थमा दिया…

प्रेम को प्यास लगी हो या ना लगी हो निरमा के थमाए गिलास को बिना पिए नीचे रख देने कि उसकी हिम्मत नहीं होती थीं…
  उसने झटपट गिलास खत्म किया और निरमा के सामने बैठ कर उसे देखने लगा..
  निरमा ने मीठी कि किताबें बंद कि और उसे बाहर जाकर खेलने कह दिया…
उस वक़्त सुमित्रा घर का काम निपटा चुकी थीं,  निरमा ने उसे ही बुला लिया…

“सुमित्रा जा मीठी को पीछे वाले बगीचे में खेलने ले जा !”

प्रेम  के घर से बच्चो का गार्डन जरा दूर था और उसे नौकरों के भरोसे मीठी को वहाँ भेजने में डर भी लगता था… निरमा और प्रेम का सारा दिन तो अपने अपने काम में निकल जाता था,  इसलिए घर के पीछे वाले बगीचे को निरमा और प्रेम ने छोटा सा प्ले ग्राऊंड बना दिया था.. छोटे छोटे स्लाइड्स, सी सॉ और बाकी झूले लगा कर उन लोगों ने अपनी लाड़ली के लिए घर पर ही सारा इंतज़ाम कर लिया था…
   निरमा ने सुमित्रा के साथ मीठी को वहीँ भेजा और प्रेम कि चाय लेने चली गयी…
  लेकिन प्रेम इतनी देर से निरमा के इस भयंकर सस्पेंस को देख देख कर मरा जा रहा था !  उसे निरमा का बातों को यूँ खींचना बिलकुल पसंद नहीं था लेकिन वो क़भी उससे कह नहीं पाता था..
  आख़िर निरमा चाय लेकर आयी और प्रेम के हाथ में थमा कर उसके सामने बैठ गयी…

“अब बताओ निरमा कि आख़िर हुआ क्या है.. !”

निरमा ने अपने पास से एक गुलाबी परचा निकाला और प्रेम के हाथ में रख दिया..
प्रेम के माथे पर बल पड़ गए… -“ये क्या है ?”

“खुद देख लीजिये !”

प्रेम ने खोल कर देखा उस पर्चे में सिर्फ तीन शब्द लिखे थे लेकिन वो पढ़ कर प्रेम कि आँखे चौड़ी हो गयी..
  हैंडराइटिंग देख कर यूँ लग रहा था जैसे कागज़ पर मकड़ी चली हो… !

” तुम्हें इस उम्र में भी लड़के ‘आई लव यु’ लिख कर गुलाबी पर्चे दे रहें हैं.. ?”

अपनी भौंह के ऊपर अपनी ऊँगली से सहलाते हुए प्रेम ने विचारणीय मुद्रा में कहा.. !

“क्यों उन्तीस साल की ही हूँ,  ऐसी कोई बुज़ुर्ग नहीं हो गयी कि मुझे इस उम्र में कह कर आप पुकारें,  और वैसे भी मेरे लिए नहीं है ये !  आपकी राजकुमारी को उसकी क्लास में किसी ने दिया है !”

अब तो प्रेम के मुहँ कि चाय बाहर निकल पड़ी … उसकी आँखे और चौड़ी हो गयी.. वो वापस बार बार उस कागज़ को पढ़ने लगा…

” कौन है ये बद्तमीज, बददिमाग बेवकूफ़ लड़का ! पकड़ में आये ज़रा इसकी गर्दन न दबोच दी तो मेरा नाम प्रेम सिंह चंदेल नहीं  ! “अपने दांत चबाता प्रेम खड़ा हो गया…

और उसका गुस्सा देख निरमा ठंडी पड़ गयी…

” प्रेम सिंह चंदेल जी, जाने भी दीजिये,  बात इतनी भी बड़ी नहीं है, कि इतना बढ़ाया जाये ! मैं बस ये दिखाना चाहती थीं कि आजकल बच्चे कैसे हाथ से निकलते जा रहें हैं.. !”

“हमारी मीठी ने भी उसे कुछ रिप्लाई किया क्या.. ?”

“शायद नहीं !क्योंकि ये उसकी नोट बुक से मुझे मिला और शायद उसने अब तक देखा भी नहीं था.. मैंने पूछा कि ये पर्ची कैसी है इसमे, तो उसने कहा कि उसे यश ने दी थीं,  और उसने बिना देखें ही नोटबुक में रख ली थीं !”

“यश !! मतलब विराज का बेटा.. ?”

“हम्म !! पर आप ज्यादा गुस्सा मत हो जाइये,  बच्चे ही हैं अभी ये लोग.. मुश्किल से आठ साल के तो हुए हैं,  अभी इन लोगों को ये प्यार मुहब्बत क्या मालूम होगी ?  पर टीवी फिल्मों में देख देख के कुछ भी ऊलजलूल लिख देते हैं.. !”

“अरे कैसे गुस्सा ना करूँ.. मेरा तो दिल चाह रहा है जाकर अभी दोनों बाप बेटे कि नाक तोड़ कर आ जाऊं… वो तो तुम और हुकुम रोक देते हो वरना आज तक विराज जाने कितनी बार मुझसे पिट चुका होता.. !”

“अरे बस कीजिये !हर वक़्त एक्शन हीरो बने रहने कि जरूरत नहीं है,  क़भी दिमाग से भी सोच समझ कर निर्णय लेना चाहिए.. !

“पर तुम तो खुद बहुत नाराज़ लग रही थीं.. !”

“हाँ ये परचा देखते समय नाराज़ थीं,  बहुत नाराज़ !लेकिन जब आपको गुस्सा करते देखा तो मेरा गुस्सा उड़ गया ! होता रहता है ये सब ! आजकल के बच्चे भी तो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा जल्दी बड़े होते जा रहे हैं |  और फिर यह यशवीर का तो जानते ही हैं सब ,  विराज का लड़का है एक नंबर का बदमाश है ! रेखा बाई सा भी अपने कामकाज के कारण कहां ज्यादा ध्यान दे पाती हैं! खैर इस सब के कारण ही तो बच्चे का कसूर मुझे कम लगता है..!”

प्रेम आंखों आंखों में मुस्कुरा रहा था.. असल में उसे यह बात कुछ खास बड़ी नहीं लगी थी! लेकिन अगर वह इतना गुस्से वाला रिएक्शन नहीं देता तो निरमा जरूर बहुत नाराज हो जाती और हो सकता है अपनी नाराजगी में वह मीठी को भी चार बातें सुना जाती |  बस वह नाराज ना हो इसलिए अपने आप को प्रेम ने बहुत ज्यादा गुस्से में उसके सामने प्रस्तुत कर दिया था!

   वरना प्रेम का स्वभाव ऐसा था कि वह ऐसी छोटी मोटी बातों को अक्सर हवा में उड़ा जाया करता था, लेकिन निरमा इन सब बातों को बहुत ही बढा देती थी.. प्रेम यह भी जानता था कि जब कभी प्रेम बहुत नाराज हो तब निरमा अक्सर  शांत रह जाती थी, जिससे की मीठी के ऊपर कोई गलत प्रभाव ना पड़े |  निरमा के स्वभाव की इसी कमी को समझकर प्रेम ने अभी अपना गुस्सा दिखाया कि निरमा खुद ठंडी पड़ गई..

” अरे आप चाय पीजिए ना, आपकी चाय भी मेरे कारण ठंडी हो गई ! चले इसे रहने दीजिए, मैं दूसरी चाय बना कर ले आती हूं!”

” नहीं निरमा,  इस विराज के बच्चे के कारण अब दिमाग बहुत खराब हो गया कि, कुछ भी खाने पीने का मन नहीं है!  मैं फिलहाल महल जा रहा हूं बहुत जरूरी काम है!”

“क्यों क्या हुआ !”

“रानी बाँसुरी का ट्रांसफर लेटर आया है.. !”

“अरे इतनी जल्दी ट्रांसफर !”

“हम्म और जॉइनिंग डेट भी बहुत करीब कि ही है..  मैं सोच रहा हूं एक बार रानी बांसुरी के जाने के पहले उस जगह की जा कर तफ्तीश कर लेनी चाहिए कि जगह रानी साहेब के रहने लायक है या नहीं..?”

” हां बिल्कुल सही! बल्कि बांसुरी को तो चाइल्ड केयर लीव लेकर बैठ जाना चाहिए, उसे इतनी दूर जाने की जरूरत ही क्या है?”

” राजा साहब और रानी हुकुम का स्वभाव नहीं जानती हो क्या,  जो ऐसा कह रही हो?  वह दोनों कभी अपने कर्तव्य से पीछे हटे हैं क्या?   बांसुरी तो तुरंत ही जाने को तैयार है पर समर ने मुझे फोन किया था और वह चाहता है कि पहले मैं और वह जाकर उस जगह को देखकर आ जाए!”

” बिल्कुल सही बात है ! पहले आप दोनों चले जाइए और देख लीजिए कि कैसी जगह है?  कब निकलना है मुझे थोड़ा पहले बता दीजिएगा जिससे आपके जाने आने की तैयारी कर सकूं!”

” ठीक है मैं अभी निकलता हूं!”

प्रेम मुस्कुरा कर घर से बाहर निकल गया.. बाहर सुमित्रा के साथ खेलती हुई मीठी पर उसकी नजर पड़ी और उसने जाकर मीठी को एक बार गोद में उठा लिया उसके दोनों गालों को चूम कर उसे नीचे उतार कर वह महल की तरफ बढ़ गया……

*****

इधर महल से कई हजार किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच एक पुरानी सी इमारत थीं…
   लम्बी चौड़ी सी इमारत बाहर से देखने में किसी मजबूत किले सी नज़र आ रही थीं.. बाहर मुख्य द्वार पर कद्दावर से दो गार्ड खड़े थे ! अंदर बड़े से हॉल में टँगे शानदार झूमर पर लगी ढ़ेर सारी मोमबत्तियां टिमटिमा कर उस कमरे में एक अजीब पीली सी रौशनी भर रही थीं..
    कमरा बाहर कि ठंडक कि तुलना में कुछ गर्म महसूस हो रहा था, उस हॉल में उस वक़्त उस जगह से नामी गिरामी रईस व्यापारी बैठें उस कि प्रतीक्षा कर रहें थे..
ये सारे ही लोग शहर के सुप्रसिद्ध लोग थे जो बड़े बड़े काम किया करते थे,  किसी का कोयले का काम था तो किसी का ज़मीन का, किसी का हीरों का कारोबार था तो किसी का दवाओं का थोक व्यापार था..
  लेकिन इन सभी में एक बात कॉमन थीं, ये सभी भले ही दुनिया के सामने सफल और ईमानदार कारोबारी थे, लेकिन ये सभी लोग रात के अँधेरे में सरहद पार के देशों से टैक्स ड्यूटी चुरा कर सामान कि तस्करी किया करते थे,और पिछले एक महीने से अपने पास प्रोटेक्शन मनी के लिए आने वाले धमकी भरे फ़ोन से त्रस्त होकर आज उस फ़ोन करने वाले से  मिलने आये हुए थे ….
  चारों लोग आपस में धीमी आवाज़ में बातें करते उस आदमी कि बुराई कर रहें थे…
  उधर उस आदमी के ऑफिस के भीतर जरा अँधेरा सा था, और उसका खास आदमी बाहर से आकर उसके टेबल के सामने खड़ा था..

“अनिरुद्ध !तुम्हारा काम हो गया है !”

“मतलब.. ?”

अनिरुद्ध के सवाल पर उस सामने खड़े आदमी ने जवाब दिया..

“ट्रांसफर हो गया है उस राजा कि बीवी का !”

“क्या उसने जॉइन कर लिया है.. !”

अनिरुद्ध कि आवाज़ में चमक आ गयी…

“नहीं ! लेकिन जॉइनिंग के लिए ज्यादा वक़्त नहीं है,  उसे जल्दी ही जॉइन करना होगा.. !”

“हम्म !फिर समझो अब तक अनिरुद्ध वासुकि  का काम पूरा नहीं हुआ है.. मुझे हर काम में परफेक्शन पसंद है दर्श !जब तक बाँसुरी जॉइन नहीं कर लेगी तब तक समझ लेना मेरा काम नहीं हुआ है.. !”

“वो भी हो ही जायेगा, अभी चलो बाहर वो लोग मिलने आ गए हैं.. ! प्रोटेक्शन मनी उन्हें थोड़ा ज्यादा लग़ रही है,  काम करवाना चाहते हैं !”

“मैं क्या यहाँ भिंडी गोभी टिंडे बेचने बैठा हूँ जो मुझसे बार्गेन करने आये हैं,  उन सालों की जन्म कुंडली निकालो,  मैं आ रहा हूँ !”

“ओके !”

क्रमशः

aparna…..

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