जीवनसाथी- 2/27

जीवनसाथी -2 भाग -27

” अगर साफ और सही जवाब दे दिया तो सिर्फ मेरी गन की एक ही गोली खत्म होगी और अगर 5 मिनट के भीतर तुम चारों ने जवाब नहीं दिया तो मेरी गन की हर एक गोली यहां ज़ाया हो जाएगी…

       याद रखना मरने के बाद लाशें माफी नहीं मांगती…

इसलिए जिंदा रहते में ही माफी मांग लो और उसका नाम बता दो.. इसी में तुम चारों की भलाई है..!”

चारों के चेहरे पर हल्का सा पसीना छलक आया और वह चारों एक दूसरे को देखने लगे….
  वो चारों ही लोग वासुकी के काम करने के तरीके से वाकिफ थे, और अच्छे से जानते थे कि दया धर्म जैसी बातों  से इस जल्लाद का कोई लेना देना नहीं था…
इसे सिर्फ चाकू गोली कि ही भाषा समझ आती थीं…
  फिर भी वो चारों चुप ही बैठे रहें,  कहीं न कहीं शेखावत के बाक़ी तीनों दोस्त शेखावत से भी मन ही मन थोड़ा घबराते थे…
    उसी वक्त एक बार फिर जूतों कि ठक ठक सुनाई दी…. – “सत्यानाश !! उसी कि कमी थीं, वो भी चला आया… !” 
    धीमे से चरण ने बोला….
दर्श के कान बड़े तेज़ थे,  उसने तुरंत सुन लिया… और उचक के चरण के पास पहुँच गया…

“तुम लोग याद भी तो कर रहें थे ना मुझे.. तो बस शैतान का नाम लिया, शैतान हाज़िर.. !अरे लेकिन वो तो तुम चारों हो.. !

और उसने उन चारों के पीछे से सामने कि तरफ आकर सामने रखी टेबल पर एक कटार, माउज़र और छुरी रख दी.. और सामने खड़े वासुकी कि तरफ देखने लगा…

“अनिर मुझे लगता है,  ये चारों ही काम के आदमी है इसलिए इनकी जान लेना सही नहीं है.. ! बाक़ी अगर लेना ही चाहो तो जिस से लेना चाहो लें लो.. मैंने सारी ज़रूरत का सामान सजा दिया है… !”

उन चारों के चेहरे पर पूरी तरह राहत के भाव नहीं थे क्योंकि उन्हे पता था दर्श भी कम क्रूर नहीं है…..

“ठीक कह रहें हो दर्श… अगर हाथ ने गुनाह किया है तो सज़ा भी उसे ही मिलनी चाहिए ना… !

वासुकी एकदम से उन चारों के सामने आया और उसने दिक्पाल का हाथ पकड़ कर सामने कि तरफ खींच कर अपने दूसरे हाथ में कटार  उठा ली… उसके ऐसा करते ही दिक्पाल ज़ोर से चीख पड़ा…

“मैंने कुछ नहीं किया वासुकी… सारा किया धरा शेखावत का है… वो कलेक्टर कहीं बाहर से आज ही आयी है.. आज ही उसने जॉइन किया है,  और ये हम सब को लेकर आज ही उसे धमकाने पहुँच गया.. !
   मैंने तो कहा भी था कि इस सब में हम क्यों कूदें ?  सीधा तुमसे बात कर लेंगे लेकिन शेखावत को लगने लगा है कि तुम अब अपना बोरिया बिस्तर समेट कर शहर उड़ने वाले हो बस इसलिए ये ऐसी बेवकूफी कर बैठा…. “

उसकी बात सुन कर अनिरुद्ध ने शेखावत कि आँखों में घूर कर देखा… और फिर बाक़ी लोगो को देखने लगा…

“अगर जंगल का राजा कुछ समय के लिए जंगल से बाहर गया तो क्या तुम सब शेर कि जगह गीदड़ को राजा मान लोगे…. ” उसने गहरी नजर से वहाँ बैठे दिक्पाल चरण और सुखबीर को देख कर कहा और उन तीनों ने तुरंत हाथ जोड़ लिए…
  शेखावत अब भी पहले जैसे ही बैठा था…
उसकी तरफ घूम कर वासुकी ने दहाड़ लगा दी…

” अब तुझ से हाथ जोड़ने के लिए भी बोलना पड़ेगा क्या…? और हां याद आया तू तो अपने जूते साफ करवाने की बात कर रहा था ना..?
   चल अपनी जगह पर खड़ा हो जा..!

शेखावत फटी फटी आंखों से अनिरुद्ध को देखने लगा..  क्योंकि वह भी अंदर से जानता था कि यह आदमी बहुत खतरनाक है और यह किसी को भी सजा देने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है…
पर शेखावत की भी अपनी अकड़ थी वह अपने उन तीन कायर दोस्तों के सामने इस तरह वासुकी के सामने झुक नहीं सकता था, इसलिए वैसा ही बैठा रहा कि तभी वासुकी ने आकर उसके माथे पर गन लगा दी..

” अनिरुद्ध वासुकी को बहुत ज्यादा बोलने का कोई शौक नहीं है, जो भी बोल रहा हूं एक बार में मान कर चुपचाप कर ले वरना मुझे जबान से ज्यादा गोली की बोली पर यकीन है..!”

माथे पर तनी गन देखकर शेखावत वाकई घबरा गया और तुरंत अपनी जगह से खड़ा हो गया..

” बहुत अच्छे..! अब ऐसा कर अपनी शर्ट के बटन खोल…!”

“पर क्यों.. ?”

” क्यों, क्या, कहाँ, कैसे, किसने, यह सारे सवाल पूछने का अधिकार तू खो चुका है…
    फटाफट अपनी कमीज के बटन खोल और शर्ट निकाल.. वैसे उसके पहले अपनी शर्ट का प्राइस भी बता देना…!”

अनिरुद्ध के ऐसा कहते हैं दर्श ने जाकर शेखावत की कॉलर पीछे से पकड़ कर उसका ब्रांड देखने के लिए कॉलर को नीचे किया…

” अनिर इसकी शर्ट 10,000 से ज्यादा की नहीं है, एरो पहनी है इसने… !”

” ठीक है चल जाएगी..!”

उसने जैसे ही कमीज के बटन खोले अनिरुद्ध ने उसे कमीज उतारने को कहा…
शेखावत के सामने कोई चारा नहीं बाकी था हालांकि अपमान से वह तिलमिला रहा था… उसके कान लाल हो चुके थे और उसका चेहरा गुस्से से और ज्यादा काला पड़ चुका था…
शेखावत ने अपनी शर्ट उतार कर अपने हाथ में पकड रखी थी और अनिरुद्ध ने उसे हल्के से धक्का देकर वापस उसी कुर्सी पर बैठा दिया और उसके पैरों के ऊपर अपना पैर उठाकर रख दिया…
शेखावत की गोद में अनिरुद्ध वासुकी का पैर यानी जूता रखा था….

” यह जूता ही सवा दो लाख का है तो  इसलिए इसे पोंछने के लिए अगर पांच दस हज़ार की शर्ट खर्च की जाए तो कोई खास बड़ी बात नहीं है…
  चल शेखावत साफ़ कर दे… !”

    उस चमकते हुए काले जूते को शेखावत अपनी गोद में देखकर गुस्से से पागल हो रहा था, लेकिन इस वक्त अपने गुस्से को दबाए रखना ही समझदारी थी.. क्योंकि वह जानता था उसका उठाया एक भी गलत कदम उसे सीधे यमराज के पास पहुंचा सकता था….
उसे अच्छे से मालूम था कि अनिरुद्ध वासुकी और,दर्श  से किसी भी बात के लिए पंगा लेना अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारने बराबर है,  लेकिन उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि अनिरुद्ध वासुकी और उस कलक्टरनी में ऐसा कौन सा संबंध था जिसके कारण अनिरुद्ध यहां उसे फांसी पर टंगा देने के लिए इतना व्याकुल हुआ जा रहा था… उसने जूते पर अपनी शर्ट को रखा और धीरे से पोंछने लगा…

” मजा नहीं आ रहा है.. थोड़ा और जोर लगाकर पोंछ… ..

शेखावत ने अपनी जलती हुई आंखों से चेहरा उठाकर वासुकी की तरफ देखा और वापस उसके जूते को घिसने लगा…

” शेखावत तू यह सोच लें कि यह जूता अनिरुद्ध  वासुकी की गर्दन है और तेरे हाथ में चमकती हुई आरी है… अब अगर तू मेरी गर्दन काटना चाहे तो आरी कैसे चलाएगा… झटका या हलाल.. !”

शेखावत ने एक बार फिर अनिरुद्ध की तरफ घूर कर देखा और वापस उसके जूते को साफ करने लगा…

” अपने एक पैर को जमीन पर रखकर और दूसरे को शेखावत की गोद में रखे हुए अनिरुद्ध बड़े आराम से खड़ा था… उसने जिस पैर को मोड़कर शेखावत के गोद पर रखा हुआ था उसी पर एक हाथ टिका कर वो खड़ा था और बड़े आराम से दूसरे हाथ से गन को घुमा घुमा कर शेखावत के माथे का नाप ले रहा था…

” वैसे एक बात कहूं दर्श, आज सुबह से ही हाथों में बहुत खुजली हो रही थी, पिछले महीने भर से ऐसा लगता है मैंने किसी को टपकाया ही नहीं… ऐसा लग रहा था जैसे सावन का महीना चल रहा हो मेरा और मैंने किसी को ना टपकाने की कसम ले रखी हो… …

दर्श मुस्कुरा कर उसकी तरफ देखने लगा कि तभी धीरे से चरण बोल पड़ा…

,” सावन के महीने में किसी को मारता नहीं है क्या वासुकी… ?”

” नहीं सावन के महीने में किसी को नहीं मारता, लेकिन जिसकी जो गलती रहती है वह हमारे काका डायरी में लिख कर रख लेते हैं..क्यों काका.. ?”

दर्श के ऐसा कहते हैं दिक्पाल और चरण रसोई से निकल कर आते काका की तरफ देखने लगे…

और काका ने भी वहां आने के बाद एक फुलझड़ी छोड़ दी…

” हां हम सब कुछ नाम के साथ डायरी में नोट कर लेते हैं और सावन बीतने के बाद इन दोनों के सामने वो डायरी ले आते हैं.. !

” ऐसा क्या लिखते हो डायरी में.. सिर्फ नाम ही ना.. ?”

“,हाँ नाम के आलावा किसने क्या गुनाह किया है तो उसे कैसी सज़ा दी जानी चाहिए.. जैसे अगर कोई आदमी बिना जरूरत के गाली गलौज करता है ऊटपटांग शब्द बोलता है तो उसकी जबान काटनी  होती है… कोई लड़का है वो किसी लड़की को गलत तरीके से देख रहा है और उसके कारण उसके मन में गलत भावनाएं आ रही है तो वासुकी उसकी आंखें फोड़ देता है…
   इसी तरह अगर कोई वासुकी के खिलाफ खड़ा होता है तो उसकी टांगे काट देता है ये जल्लाद और…

“और अगर कोई किसी को जान से मारने की धमकी देता है तब…?”  दिगपाल ने धीरे से पूछा और काका और दर्श एक दूसरे की तरफ देख कर हंसने लगे..

” तब क्या.. ? यह तो सीधा धमकी देने वाले को ही ऊपर पहुंचा देता है…! तुम लोगों को पता नहीं है क्या पूरी दुनिया ब्रह्मा जी ने ज़रूर बनाई है,  लेकिन अनिरुद्ध वासुकी को डायरेक्ट यमराज ने बना कर भेजा है अपने दूत के रूप में…. इनका और उनका डायरेक्ट कांटेक्ट है… आजकल तो वह वहीं से इसे आदेश दे देते हैं और ये यहाँ पर उनके कहे अनुसार साफ सफाई में लग जाता है…”

“हा हा.. अरे मजाक कर रहा हूं.. तुम सब सही समझ बैठे क्या… ?”

   दर्श की खतरनाक हंसी उन लोगों के कानों में शीशे की तरह पिघल गयी…

दिगपाल ने धीरे से चरण को अपने करीब बुलाया और उसके कान में फुसफुसाने लगा… अच्छा हुआ शेखावत ने उस कलक्ट्रानी  कि इज़्ज़त लूट लेने की बात नहीं कही वरना यह बात होती तो सरेआम वासुकी शेखावत की  इज्जत  लूट लेता…

   अनिरुद्ध का एक जूता साफ हो चुका था उसने उस पैर को हटाकर दूसरे पैर को शेखावत की गोद में रख दिया….

” अनिर कुछ पियोगे…?

काका के सवाल पर अनिरुद्ध ने उन्हें देखा और मुस्कुरा कर हां में गर्दन हिला दे…

” इसकी गर्दन से निकला हुआ खून पियूँगा….  शेखावत शुरू से जानता है कि अनिरुद्ध वासुकी  क्या है… ? फिर भी उसने मुझसे पंगा लेने की ज़ुर्रत  की है अब इसका खून तो पीना ही पड़ेगा…!”

” लेकिन मैंने ऐसा किया क्या..?
               नहीं मुझे यह नहीं समझ में आ रहा उस कलक्टरनी से तुम्हारा ऐसा क्या लेना देना, जो मेरे उस को धमकी देते ही तुम इस तरह चिढ बैठे हो…?”

शेखावत अब एकदम से तमक गया उसका सारा डर  गुस्सा बनकर फूट पड़ा और वह अनिरुद्ध वासुकी से सवाल करने लगा…
बांसुरी का नाम सुनते ही अनिरुद्ध थोड़ी देर के लिए एकदम चुप हो गया उसने अपनी टांगें शेखावत के ऊपर से हटाइ और मुड़कर कुछ दूर चलते हुए निकल गया….

   दर्श और काका, ने वासुकी की तरफ देखा और वापस उन चारों की तरफ देखने लगे, दर्श शेखावत के पास पहुंच गया…..

“अनिर का स्वभाव तो जानते ही हो… वो कभी किसी औरत की तौहीन नहीं सह सकता…!”

“अरे जहाँ काम निकल रहा वहाँ क्या औरत और क्या आदमी… ? ऐसे ही देखते रहें तब तो हो चुका काम… ये आदमी है इसे धमकी दी जा सकती है..!  ये औरत है इससे काम नहीं करवाया जा सकता… !
   ये सब कबसे देखना शुरू कर दिये हो वासुकी…? और अगर इसी तरह का काम चलता रहा तब तो हो चुका काम ! मैं इसके आगे तुम्हारे साथ काम नहीं कर पाउँगा… यहाँ साला उस बित्ते भर की छोकरी से निपटने की सोच रहा था तुम अलग ही राग लेकर बैठ गए…. इतनी मुहब्बत फूट रहीं है तो जाकर उस रं** से शादी ही…

अभी वो अपनी बात पूरी कर पाता की उसके चेहरे पर एक ज़ोरदार तमाचा पड़ा और शेखावत का सोने का दाँत निकल कर दूर तक ज़मीन में लुढ़कता चला गया…
   अनिरुद्ध ने उसकी हथेली को टेबल पर रखा और खचाक से एक वार किया और उसकी हथेली उसके हाथ से अलग पड़ी हुई थीं….
  वो दर्द से कलबला गया, गुस्से में उसके मुहं से गलियों की बौछार होने लगी….
काका हाथ में दवा की शीशी लिए चलें आये और उन्होंने खोल कर सारी दवा उसके हाथ में पलट दी…

“अबे पागल बुड्ढे… कुत्ते,साले, हरामखोर और जलन बढ़ा दी… !”

“इससे इंफेक्शन का खतरा काम हो जायेगा शेखावत.. अपने कटे हाथ को भी उठा लें… किसी अच्छे से सर्जन के पास चला जा.. सात घंटे में डॉक्टर मिल गया तो तेरा हाथ जुड़ भी सकता है… वरना एक हाथ लिए घूमना पड़ेगा…. !”

काका की बात सुन कर बाक़ी के तीनों उन्हें देखने लगे.. किसी को भी वासुकी के अचानक ऐसा कर देने की उम्मीद नहीं थीं…   दर्द से पागल होता शेखावत  चीख रहा था…. और उसकी चीख सुनता वासुकी उसे घूर कर देख रहा था…

“एक तो तूने गलत काम किया, दूसरा जिस बात पर मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा आया, वो बात ये है की मुझे गलियों से सख्त नफरत है.. और खास कर अगर किसी औरत को किसी ने गाली दी तो मैं उसकी ज़बान काट कर फेंकने में भी कोई गुरेज़ नहीं करता … 
अब भी अपने किये कांड की माफ़ी मांगने की जगह तू खलबला रहा है शेखावत…

शेखावत के बाक़ी दोस्त वासुकी के पैरों में गिर पड़े…

” हम सब को माफ़ कर दो वासुकी.. अब से बिना तुमसे पूछे कहीं कोई काम नहीं करेंगे.. बल्कि जिस काम का आदेश तुम दोगे बस वही करेंगे.. !”

“अपने इस चौथे को भी समझा देना वरना इसका चौथा निपटाने में वक्त नहीं लगेगा मुझे… !”

वो तीनों बड़ी मुश्किल से शेखावत को पकड़ कर बाहर लें गए…. उसे गाड़ी में डालने के बाद वो लोग भी उस में सवार हो गए… गाड़ी वासुकी की ही थीं और गाड़ी वाले लोग भी…

दर्श बाहर चला आया… और बाहर खड़े लड़कों में से एक को बुला कर कुछ समझाने लगा…

“यहाँ से लगभग चालीस मिनट के रास्ते पर श्रीदान हॉस्पिटल पड़ेगा… इसे वहीँ लें जाना.. ये एक डॉक्टर का नंबर है, तुम्हें भेज दिया है मैंने.. मैं उनसे बात भी कर लूंगा… उनके ही पास लेकर जाना है इसे… !”

सामने खड़े लड़के ने हाँ में गर्दन हिलायी और आगे बढ़ गया….

  दर्श अंदर की तरफ मुड़ गया…

वो अंदर जा रहा था की उसका मोबाइल  बजने लगा…..
   उसने देखा नेहा का फ़ोन था….

*****

   बाँसुरी राजा के साथ मंदिर में एक तरफ बैठी थीं,  सामने शौर्य उछलकूद मचाता हुआ खेल रहा था.. राजा उसकी हरकते देखता हुआ खुश हो रहा था.. उन दोनों को इस तरह एक दूसरे के साथ ख़ुशी से खेलते देख बाँसुरी की राजा को सुबह की ऑफ़िस की कोई भी बात बताने की हिम्मत नहीं हुई…
   शौर्य और राजा एक दूसरे में मग्न थे… बाँसुरी को रात वाली बात भी रह रह कर याद आ रहीं थीं, लेकिन उस रात वाली बात में वो खुद पूरी तरह से निश्चिन्त नहीं थीं की वाकई खिड़की से कोई झांक भी रहा था या नहीं… और जो कोई अगर झांक भी रहा था तो वाकई कोई बाहर का आदमी था या इन सिक्योरिटी गार्ड्स में से कोई था….

“किस सोच में गुम हो बाँसुरी… !”

“,आप दोनों से अलग होने का बिल्कुल मन नहीं कर रहा.. !”

राजा ने मुस्कुरा कर बाँसुरी को कन्धों से पकड़ कर अपनी तरफ कर लिया और बाँसुरी राजा के कंधे से जा लगी…
  उसके कंधो पर सर रख कर वो चुप बैठी सामने आसमान पर दिखते चाँद को देखती रहीं…

“फिर से उदास हो गयी तुम… अच्छा सुनो.. बहुत दिन से तुमने खुद का लिखा कुछ सुनाया नहीं है.. ! आज कुछ सुना दो… !”

बाँसुरी मुस्कुरा कर उसे देखने लगी… और बहुत धीमे से उसने अपनी लिखी एक कविता कहनी शुरू कर दी…

मेरे एहसास बाकी है
मेरे जज्बात बाकी है
मैं चाहूँ तुझसे सब कहना,
मेरे अल्फ़ाज़ बाकी हैं ।।

तू चाहे जिस गली जाये
मैं ढूँढूँगी तुझे हर दम..
तेरे काँधे पे सर रख के
देखना चांद बाकी है।।

   बाँसुरी की आँखों से दो बून्द टपक कर उसके गालों तक चली आयी और गला इस कदर रुंध गया की वो आगे की अपनी कविता बोल ही नहीं पायी…
   राजा ने उसे अपने आप में भींच लिया….

राजा के जाने का वक्त हो चुका था… उसे वापस निकलना था… बड़े भारी मन से वो लोग वहाँ से बाहर निकल गए….
  
  मंदिर में एक बार फिर माथा टेक कर वो लोग सीढ़ियां उतर गए… राजा ने बाँसुरी का हाथ पकड़ रखा था.. गाड़ी तक पहुँचने के बाद राजा ने भर नजर बाँसुरी को देखा और उसकी गोद से शौर्य को लेकर गाड़ी में बैठ गया… शौर्य अपनी माँ के पास रहने के लिए मचल गया…
   उसकी ज़िद धीरे से उसके रोने में बदल गयी और उसे रोते देख बाँसुरी भी खुद को नहीं रोक पायी.. अब तक एक रानी साहिबा के सलीके में बंधी बाँसुरी अचानक ही सिर्फ एक माँ भर रह गयी.. और भरभरा कर फूट पड़ी… राजा ने धीरे से ड्राइवर को गाड़ी आगे बढ़ाने का इशारा किया और साथ ही सपना को बांसुरी को संभालने का भी..
..  सपना ने दोनों हाथों से बांसुरी को पकड़ रखा था वरना रोते-रोते बांसुरी वहीं गिर पड़ती….
    राजा की शाही सवारी आगे बढ़ गई और पीछे रह गई रोती हुई एक मां, तड़पती हुई एक बीवी और अपने कर्तव्य की बागडोर संभाले एक औरत….
     एक औरत का जीवन कितना कठिन होता है यह सिर्फ वही समझ सकती है जिसने उस पीड़ा के दंश को झेला हो……
    बांसुरी को इस हालत में देखने वाले यह सोच सकते थे कि आखिर रानी हुकुम को क्या जरूरत है अपने कर्तव्यों और अपने नौकरी के लिए अपने पति और बच्चे को छोड़कर इतने बीहड़ में आकर रहने की..? लेकिन इस सबके पीछे की असलियत कोई और नहीं सिर्फ और सिर्फ वक्त ही जानता था…
          आने वाला वक्त किस करवट बैठने वाला था इसके बारे में किसी को कोई अंदाजा नहीं था….!

     राजा साहब की गाड़ियों के जत्थे के निकलने के बाद बांसुरी की भी काली एसयूवी उसके सामने आकर खड़ी हो गई.. वह अपनी गाड़ी में अंदर दाखिल हो गई उसके ठीक बगल में उसके साथ सपना भी बैठ गई…
बांसुरी  को उसके ऑफिस की तरफ से एक गार्ड मिला हुआ था जो, उसकी गाड़ी में उसके साथ ही बैठा था.. लेकिन प्रेम के भेजे चार गार्ड्स  उसके आगे और पीछे अपनी गाड़ियों में मौजूद थे.. इन तीन गाड़ियों का काफिला वहां से निकलकर बांसुरी के घर की तरफ बढ़ गया….

बांसुरी की गाड़ी से कुछ दूर पीछे एक और लंबी सी काली लैंड रोवर चल रही थी……
    जंगल का रास्ता घना और लम्बा था और इसी रास्ते के बीच किसी गली से 1 लंबी चौड़ी रेंज रोवर निकली और बांसुरी की गाड़ी के सामने चल रहे गार्ड की गाड़ी के भी आगे चलने लगी…
   बांसुरी को आभास थी नहीं था कि उसकी एक अदद गाड़ी के आगे और पीछे दो-दो लंबी चौड़ी गाड़ियां उसे अपनी सुरक्षा के घेरे में लिए हुए आगे बढ़ रही थी…

सबसे पीछे की गाड़ी में जहां अनिरुद्ध वासुकी अपने लड़कों के साथ बैठा था वही सबसे आगे की गाड़ी में दर्श मौजूद था……

बांसुरी अपने दर्द में, अपनी पीड़ा में इस कदर खोई थी कि उसका ध्यान किसी और पर नहीं गया…
घर पहुँचते ही वो अपने कमरे में चली गयी…. ना उसका कुछ खाने का मन था न पीने का… सपना और बाक़ी लोगों को खाने का कह कर वो कमरा बंद कर बिस्तर पर लुढ़क गयी….
   अपने कमरे के एकांत में फिर उसका रोना जो शुरू हुआ,  वो सीधे राजा के फ़ोन पर ही रुका…
   आधी रात के वक्त राजा अपने महल में पहुँच चुका था.. और वहीँ से उसने फ़ोन लगाया था…

   राजा को वीडियो कॉल में देखने के बाद बाँसुरी के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान चली आयी… उसे मन भर कर देखने के बाद फोन रख कर बाँसुरी मुहं धोने चली गयी…
   मुहं धोकर अब उसे कुछ ठीक लग रहा था, उसने अपने कमरे की बत्ती बुझा दी… पलंग के किनारे रखें लैंप को जलाकर वो अपनी डायरी उठाये कुछ लिखने लगी….
   और खिड़की के बाहर दूसरी तरफ की हवेली में अपनी छत पर खड़ा वासुकी उसकी मुस्कान देख कर निश्चिन्त हो रात के तीन बजे अपने कमरे में सोने चला गया…

*****

   सुबह नाश्ते की टेबल पर दर्श ने एक दिन पहले हुई नेहा से बातचीत को अनिरुद्ध को बता दिया…

” वह तुम्हारी बात समझ तो गई ना..!”

” काफी कुछ समझ तो गयी है, लेकिन वो तुमसे बात करना चाहती है.. !”

अनिरुद्ध इस बात को सुनकर परेशानी से दूसरी तरफ देखने लगा…

” उससे इस कदर भागने से क्या होगा अनिरूद्ध… अगर तुम उससे कुछ काम करवाना चाहते हो तो एक बार बात तो करके देखो..!”

अनिरुद्ध के हाँ में  सिर हिलाते ही दर्श ने नेहा को फोन लगा दिया…..

” नेहा !! अनिर तुमसे बात करना चाहता है… !”

नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ गयी…

   “इन तस्वीरों को गौर से देख लो… बोलते समय होठों का उठना, पलकों का गिरना बालों का चेहरे से हटाना हर एक बात को गौर से देख लो.. इसके साथ ही तुम्हें कुछ ऑडियो और विजुअल भी भेजे जाएंगे..  सबको तुम्हें ध्यान देकर देखना है कहीं किसी तरह की कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए…”

” वह तो ठीक है… लेकिन मुझे इसकी काफी ऊँची  कीमत चाहिए… दे  पाओगे…!”

” जरूर… तुमसे पहले भी वादा किया था कि मेरे इस काम के बदले तुम्हारी मनचाही मुराद पूरी करूंगा..!”

” सोच लो कहीं मेरी विश सुनने के बाद तुम पलट ना जाओ…!”

” सवाल ही नहीं उठता…  अगर मैंने एक बार प्रॉमिस कर दिया, तो मैं अपनी बात से कभी नहीं मुकर  सकता..!”

” मैं मिल कर ही सारी बातें करना चाहती हूं… !”

“तो आ जाओ फिर.. लेकिन आज तो कुछ ज़रूरी काम है.. कल मिल सकते हैं… !”

“ओके लेकिन, इन माय प्लेस.. !”

“हम्म !”

  अनिरुद्ध ने फ़ोन रख कर एक गहरी सी साँस ली और सामने बैठे दर्श और काका की तरफ देखने लगा…

क्रमशः

aparna….


अगले एपिसोड की झलक….





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