
जीवनसाथी -2 भाग -26
शेखावत ने धमकी कुछ इस अदांज़ में दी कि पास खड़ा दीवान हल्का सा कांप गया… लेकिन बाँसुरी के चेहरे पर शिकन तक नहीं आयी…
“फ़िलहाल दिखाई तो आप अकेले दे रहें हैं मुझे.. ! बाकी के लोग… ?
उसी के साथ दरवाज़ा हलके से खोल कर बाकी के तीन लोग भी अंदर दाखिल हो गए…
चेहरे मुहरे से सभी खुनी नजर आ रहें थे…. सभी का डीलडौल तगड़ा था और चेहरे पर भी अलग ही खुरदुरा सा भाव था, जैसे उन चारों को और किसी कि परवाह ही न हो… सारी दुनिया उनकी गुलाम और वो सारे जहाँ के मालिक हो जैसे…
अबकी बार उनमें से एक ने हँसते हुए बाँसुरी के सामने हाथ जोड़ दिये…
“मेरा नाम सुखबीर है मैडम… ! ये मेरे साथ बैठा चरण है और उसके बाजू बैठा है दिक्पाल ! शेखावत से आप मिल ही चुकी है… अब मैं आपको हमारा व्यापार समझाता हूं…
“व्यापार समझाने कि ज़रूरत नहीं है.. उन्हें उनका काम समझा दो बस..
चरण के ऐसा कहते ही सुखबीर ने उसे ज़ोर कि झिड़की लगा दी…
” चुप करो यू स्काऊंड्रल !तुम्हें क्या मैडम अंधी बहरी दिख रहीं हैं, जो हम लोग जैसा बोलेंगे बस वैसे ही हमारे सारे कागज़ो पर आंख मूंद कर चिड़िया बैठाती जाएगी..
ऐसा बोल कर उसने वापस एक नजर बाँसुरी पर डाली और उसे चिड़िया का मतलब समझाने टेबल पर ज़रा आगे झुक गया…
” मैडम चिड़िया का मतलब आप पूछें उसके पहली ही हम बता देते हैं…चिड़िया मतलब आपके दस्तखत… वो क्या है ना सरकारी दस्तखत बहुत हल्के होते हैं, कभी भी कहीं भी चिड़िया से उड़ पड़ते हैं… इसलिए उन्हें अपने कागज़ो पर टिकाये रखने के लिए शुरू में हम चिड़िया को दाना डालते हैं चुग गयी तो भला वरना हम लोग बड़ा बड़ा पत्थर उस चिड़िया के पंखों में बांध कर उसे कैद कर लेते हैं….. समझ गयी… “
गांजे कि पीनक में उसकी ऑंखें चढ़ी हुई थीं… बाँसुरी ने एक नजर उन चारों को देखा और अपने सामने रखे सारे पेपर्स उठा कर टेबल से नीचे फेंक दिये…
“दफा हो जाइये आप चारों.. इसी वक्त मेरे केबिन से दफा हो जाइये, वरना मुझे जान से मार देने कि धमकी देने का इलज़ाम लगा कर अभी सबको थाने कि सैर के लिए भेजना पड़ेगा मुझे.. !”
“ए लड़की पागल हो गयी है तू.. हम लोगों को जेल डालेगी तू… अभी जानती नहीं है तू हम लोग कौन है..?
“तुम चारों कि शक्ल और बातचीत देख कर इतना तो समझ गयी हूं कि किसी भले परिवार कि पैदाइश नहीं हो तुम लोग… मेरे सामने बैठने के लिए ज़रूरी रिक्वायरमेंट बस उतनी ही है और वो भी तुम चारों पूरा नहीं कर पा रहे..इसलिए बाहर निकल जाओ वरना मुझे पुलिस बुलानी पड़ेगी..
“बित्ते भर कि छोकरी और तेवर देखो ज़रा इनके… पुलिस बुलाएगी.. तू पुलिस बुलाएगी.. हैं.. इतनी औकात है तेरी… ? आज एक दिन में तेरी ज़िंदगी ऐसी जहन्नम कर देंगे कि कल मेरे जूते अपनी इसी साड़ी से पोंछ कर, तू हम सब को यहाँ बैठ कर खुद हमारी सेवा करेगी… “
शेखावत कि बात पर बाँसुरी ने ज़ोर से अपना हाथ दरवाज़े कि तरफ मोड़ कर उन लोगो को बाहर का रास्ता दिखा दिया…
“आउट… जस्ट गेट आउट.. !”
एक तरफ खड़ा दीवान डर से थर थर कांप रहा था.. उसकी समझ से बाहर था कि ऐसे खतरनाक लोगों से पहले ही दिन मैडम ने पन्गा क्यों ले लिया.. आज तक तो जो भी आया था इन्हीं लोगो के हिसाब से चलता आया था.. पिछले कलेक्टर साहब भी भले आदमी थे… चुपचाप मान सकने वाली हर बात मान जाया करते थे.. वो तो जंगल वाला .मामला ज़रा पेचीदा हो गया था और उसमे साइन कर के उनके भी फंसने कि बात हो सकती थीं बस इसलिए ही तो उन्होने मना किया था वरना कितने समझदार थे.. ना वो इन चारों कमीनो के मामले में कुछ बोलते थे ना ये कमीने उन्हें कुछ कहते थे.. आपसी समझदारी से सब ठीक ही चल रहा था.. लेकिन ये सिरफिरी मैडम तो एकदम आत्महत्या करने कि ठान कर ही आयी है.. लगता है… !
बाँसुरी के बाहर का रास्ता दिखाने से वो चारों एकदम से नाराज हो गए…
“क्या बक रहीं है ये मिसाल.. ?यहीं टपका दे.. ?”
शेखावत ने ना में सर हिलाया और तभी दरवाज़ा खोल कर धड़धडाते हुए बाँसुरी के पर्सनल और ऑफिस के सशस्त्र गार्ड्स भीतर चलें आये…
“यस मैम.. !”, उनमें से एक ने मुस्तैदी से कहा और बांसुरी ने सामने बैठे उन चारों को बाहर ले जाने का इशारा कर दिया…..
दीवान के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी उसे शेखावत की माउज़र, उसकी गोली और अपना सिर नजर आ रहा था..
यह सामने बैठी मैडम तो पूरी तरह से पागल थी… आते ही साथ जंगल के शेरों से उलझ पड़ी थी! ना जंगल में रहते हुए वहां के राजा से कोई बैर पाल सकता है भला…? बाहर दीवान ने काफी सारी कोशिशें भी की थी कि शेखावत के बारे में शुरू से ही बांसुरी को डरा दे लेकिन यह औरत तो पूरी तरह से पागल थी…
गार्ड्स को अपने इशारों पर देखकर शेखावत और उसकी टीम अपनी जगह पर खड़ी हो गई.. शेखावत ने घूर कर बांसुरी को देखा और अपने बिखरे हुए पेपर उठाने के लिए नीचे झुक गया…
सारे पेपर समेटने के बाद उसने बांसुरी के सामने की टेबल पर एक बार जोर से उन कागजों को पटका और एक साथ करके अपने हाथ में पकड़ लिया बांसुरी की टेबल पर थोड़ा झुकने के बाद उसने बाँसुरी की आंखों में घूरते हुए उसे धमकी दे डाली….
“कल वापस आएंगे और इन कागज़ों पर चिड़िया बैठा कर ले जायेंगे… !”
इस धमकी के साथ ही वह चारों मुड़कर वहाँ से वापस बाहर निकल गए… उन लोगों के निकलते ही दिवान ने पानी से भरा गिलास बाँसुरी की तरफ बढ़ा दिया…
” मुझे जरूरत नहीं है, आप पी लीजिए..!”
” मैडम एक बात कहें… आपने सही नहीं किया..!”
” मुझे मेरे काम की ट्रेनिंग के दौरान यही सिखाया गया है दीवान जी… अपने आज तक के अपने कार्यकाल में हमेशा ही अपनी ट्रेनिंग में सिखाई बातों का ही ध्यान रखा है मैंने …
मैं जानती हूं मैंने अपने स्वभाव से हटकर बेहद बदतमीजी से बात की है जो, मेरी आदत भी नहीं है ! लेकिन अगर कोई मेरे सामने तमीज से बैठकर तमीज के साथ पेश आये तो मैं भी सामने वाले को पूरी इज्जत देती हूं…
लेकिन साथ ही इतने दिनों के कार्यकाल में फ़ील्ड में काम करते हुए यह भी समझ लिया है कि जिस इंसान को इज्जत देने की कदर ना हो उसके साथ इज्जत से पेश आने से कोई फायदा भी नहीं होता…
वह कहावत है ना भैंस के आगे बीन बजाने से खास फायदा नहीं होता.. वैसा ही कुछ लोगों के साथ है !
यह लोग अपने काम और पैसे में इस हद तक मगरूर है इन्हें इस कुर्सी की भी कोई कदर नहीं है…!
और दूसरी बात, आज भी इन जैसे मर्दों को यह बात हरगिज़ नहीं पचती कि एक औरत उनके सर पर आकर बैठ गई…
इसीलिए सोच रहे हैं मेरे सर पर खड़े होकर तांडव करेंगे, तो मैं डर के मारे इन जैसों के कदमों में झुक जाउंगी.. हरगिज़ नहीं.. सम्भव ही नहीं है… !
अगर कुछ सालों पहले की बांसुरी होती तो शायद इन लोगों की गीदड़ भभकी उसे डर भी जाती… लेकिन अब मैं राजा अजातशत्रु की अर्धांगिनी भी हूं यानी कि उनका आधा हिस्सा… और डरना तो उन्होंने कभी सीखा ही नहीं है, फिर मैं इन लोगों से डर कर उनका नाम धूमिल कैसे कर सकती हूं.. ?
खैर !! अब ये सब छोड़िये.. चलिए जनदर्शन का वक्त निकला जा रहा है.. पहले ही इन चारों ने काफी वक्त बर्बाद कर दिया है… !”
दीवान बांसुरी का आत्मविश्वास देखकर आश्चर्य से कुछ पल को खड़ा रह गया और फिर जनदर्शन की फाइल हाथ में लिए उससे आगे का रास्ता दिखाते हुए उसके साथ बाहर निकल गया….
बांसुरी और दीवान के पीछे बांसुरी के गार्ड्स भी उनके साथ चलने लगे बाहर पहुंच गए….
लोगों की भीड़ भाड़ देखकर बांसुरी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान चली आई …
बांसुरी देखा जाए तो स्वभाव से भीरु और संकोची थी.. इतनी तेजी से बात करना, किसी को भी अपशब्द कहना उसके स्वभाव का हिस्सा कभी भी नहीं था…!
नौकरी में आने से पहले वह इतनी संकोची थी कि अगर कोई आगे से होकर उसे कुछ गलत कह भी जाए तो वह जवाब नहीं दे पाती थी..
क्योंकि किसी को बुरा कहने के बाद उसे अपने ही मन में आत्मग्लानि होने लगती थी ! लेकिन एक तो नौकरी का दबाव और दूसरा राजा का साथ उसे मुखर करता चला गया…
बांसुरी अब भी इतने प्रेशर में काम करने के बावजूद गुस्सैल स्वभाव की नहीं हो पाई थी ! उसका स्वभाव अब भी शांत और विनम्र ही था…
बात बात पर नाराज हो जाना, तुनकमिजाजी दिखाना और कहना की मेरा स्वभाव ही ऐसा है, मैं कुछ नहीं कर सकती वाला एटीट्यूड उसमे अब भी नहीं था…
लेकिन राजा ने उसे शेखावत जैसे लोगों के सामने कभी ना झुकने को कह रखा था….
हालाँकि इतने कठोर शब्द कहने के लिए बाँसुरी को भी अंदर से काफी हिम्मत जुटानी पड़ी थीं……
लेकिन ये सब कहते वक्त उसके चेहरे पर उसके मन में मची खलबलहाट नज़र नहीं आ रहीं थीं…..
वो बाहर फैली लोगों की भीड़ के सामने जा खड़ी हुई… सभी का अभिवादन करने के बाद वो उनके बीच लगी कुर्सी पर जा बैठी…..
सारे लोग एक एक कर उसके पास आते गए और उससे अपनी समस्या कहते गए…. साथ खड़ा दीवान उन में से जिन समस्याओं का तुरंत समाधान मौजूद नहीं था उन्हें सिलसिलेवार अपने पास रखी नोटबुक में लिखता चला गया… जिन समस्याओं का त्वरित निपटारा सम्भव था उन्हें उसी वक्त निपटा दिया जा रहा था…
ढ़ेर सारी बातों के बाद उस जनसमूह के बीच से एक लड़की जंगली फूलों का गुच्छा लिए उसके पास चली आयी… उसके हाथ से वो फूल लेने के बाद बाँसुरी ने उससे मुस्कुरा कर हाथ मिलाया और दीवान के साथ वहाँ से निकल गयी…
आज सिर्फ जॉइनिंग ही थीं, बावजूद आधे से ज्यादा दिन निकल चुका था… आज की रात ही राजा की वापसी थीं.. इससे ज्यादा देर के लिए उसका रुकना वैसे भी सम्भव न था…
यहीं सब सोच कर बाँसुरी घर वापसी के लिए निकल गयी….
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इधर शेखावत और उसके तीन दोस्त कलेक्टर परिसर से गुस्से में तमतमाते हुए निकल पड़े .. उन चारों के चेहरे भी अपमान से काले पड़े हुए थे… किसी की आपस में बात करने की हिम्मत नहीं हो रहीं थीं…
बेख्याली में वों लोग आगे अपनी गाड़ियों की तरफ बढ़ रहें थे की एक के पीछे एक, दो काली हेक्टर उन लोगो के पास आकर रुकी और उसका दरवाज़ा खुल गया…..
उन चारों के गाड़ी में बैठते ही गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ गयी… वो दो दो लोग दोनों अलग अलग गाड़ियों में सवार हो चुके थे…
बैठते ही उनका ध्यान गया की गलती से वो किन्ही और गाड़ियों में सवार हो चुके थे… जब तक वो लोग अपने आसपास देख कर अपनी गन निकाल पाते उनके चेहरों पर किसी ने काला सा नकाब डाला और गर्दन के पास से उस कपड़े की डोरियाँ कस कर गांठ लगा दी…. कुछ सेकेंड्स में ही चेहरे को ढँक देने के बाद उनके हाथों को भी पीछे मोड़ कर मोटे इन्सुलेशन टेप से कड़ाई से बांध कर छोड़ दिया गया.. चारों की तलाशी लेकर उनके साथ बैठे लोगों ने उनकी जेब से उनकी गन,कटार सब कुछ ज़ब्त कर लिया…
चारों निरुपाय असहाय से बैठे इंतजार करते रहे उसका नाम जानने का जिसने उन्हें इस तरीके से कलेक्टर परिसर के बाहर से किडनैप करवा लिया था…
उनके चेहरों को ढकने से पहले ही उन लोगों के मुंह में मोटे कपड़े को भी ठूंस दिया गया था जिसके कारण उनमें से कोई भी मदद के लिए चिल्लाने में भी असमर्थ हो उठा था…
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बांसुरी अपनी गाड़ी में सवार होकर घर के लिए निकली ही थी कि सामने से एक लंबी सी गाड़ी उसे अपनी तरफ आती हुई नजर आई..
बांसुरी ने मुस्कुराकर अपने ड्राइवर को गाड़ी रोकने को कहा और अपनी गाड़ी से उतरकर सामने से आती उस गाड़ी की तरफ बढ़ गई…
उसमे बैठा राजा खिड़की से झांक कर बांसुरी को देख मुस्कुराने लगा.. उसने हाथ हिलाकर बांसुरी को अपने पास बुला लिया…
और बांसुरी जाकर राजा की गाड़ी में उसके साथ बैठ गई…
गाड़ी में घुसते ही शौर्य किलकारी मारकर बाँसुरी की गोद में चढ़ गया…..
उसे गोद में बैठा कर बांसुरी उससे सारे दिन भर के कामों का जायजा लेने लगी और अपनी तुतलाती हुई बोली में शौर्य उसे दिन भर का लेखा जोखा सुनाने लगा…
शौर्य बहुत सी बातों को अपनी अलग सी ज़ुबान में बोलता था.. चॉकलेट उसके लिए चौकल थीं, तो बाँसुरी उसके लिए मोमी… आलू का पराठा उसे सबसे ज्यादा पसंद था और वो उसे कहता था आलू पठाला…
अपनी मोहक बोली से अपनी माँ को मोहता वो किस्से सुनाने में लगा था और उसकी बातें सुनती बाँसुरी की ऑंखें झिलमिला रहीं थीं…
“क्या हुआ हुकुम.. ? आज का दिन कैसा रहा.. ? कुछ परेशान हो.. ?”
न में गर्दन हिला कर बांसुरी राजा के कंधे से सर टिका कर बैठ गई…
” कोई परेशानी है तो बताओ हुकुम..!”
” आज मत जाइए साहब..! मैं आपके और शौर्य के बिना नहीं रह पाऊंगी..!”
राजा ने मुस्कुराकर बांसुरी के सर पर हाथ फेरा और झुक कर उसके माथे को चूम लिया…
” आज ही से छुट्टी डाल दो और चलो हमारे साथ… ट्रांसफर करवा कर वापस लौट कर मत आना..!”
” यह कैसे कह रहे हैं आप..? मुझे मेरे कर्तव्य का ज्ञान करवाने वाले आप ही तो है, पर अब आप मुझे मेरे कर्तव्य पथ से डिगा रहे हैं..!”
” पति और बच्चे के लिए भी तो तुम्हारा कर्तव्य है ना बस तुम्हारे उस कर्तव्य को याद दिला रहा हूं…! इसलिए अगर यहां अकेले रहने का मन नहीं है कोई जोर जबरदस्ती नहीं है छोड़ दो यह नौकरी..! तुम्हारा आत्मविश्वास मेरे महल के कायदे कानूनों के बीच छिन्न ना हो जाए बस इसीलिए मैं चाहता था कि तुम प्रशासनिक में आ जाओ.. अब तुम आ चुकी हो… इसलिए अब अगर चाहो तो एक लंबा सा ब्रेक ले लो..! काम के साथ साथ छुट्टियों की भी तो ज़रूरत होती है…
“नहीं साहेब.. ! अभी मुझे छुट्टी की नहीं बल्कि गोविंदगढ़ को मेरी ज़रूरत है… !”
” क्या बात है हुकुम इसका मतलब अब तुम्हारा काम तुम्हारे बेटे और पति से बड़ा हो गया..?
बाँसुरी ने राजा को घूर कर देखा और उनके गले से लग गई…
” आप मुझे कमजोर मत कीजिए….मेरे लिए वैसे भी आप से और शौर्य से दूर रहना बहुत कठिन है..
ऐसे में आप सुबह से जिस तरह की भावुकता भरी बातें कर रहे हैं मेरा बार-बार रोने को जी चाह रहा है..!”
“कैसे कमज़ोर पड़ रहीं हो बाँसुरी…. अपना तैयारी वाला समय याद है ना.. उस समय भी यूँ ही कई बार कमज़ोर पड़ जाती थीं… लेकिन बहादुरी से तुमने हर मुसीबत का सामना किया है.. और अब भी कर लोगी.. मैं जानता हूं… !”
दोनों मुस्कुरा कर एक दूसरे का हाथ थामे बैठे रहें.. राजा ने ड्राइवर को आसपास के सुंदर पर्यटन स्थल घूमाने को कहा था…
गोविंदगढ़ भले ही जंगली क्षेत्र था लेकिन था बहुत सुन्दर.. हरे भरे ऊँचे जंगल.. कल कल बहती नदियाँ, पहाड़ो से रास्ता बना कर बहते झरने.. ढ़ेर सारे चहचहाते पंछी और शुद्ध साफ़ हवा.. यूँ लग रहा था प्रकृति खुले हाथों अपना ख़ज़ाना लुटा रही हो…
दो एक ऐसे ही सुरम्य स्थानों में घूमने के बाद वहाँ के प्रसिद्ध शिव मंदिर में ले जाकर ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी….
बाँसुरी और राजा शौर्य को साथ लिए वहाँ उतर गए…
उनके आगे पीछे गार्ड्स भी मौजूद थे…
वो लोग आगे बढ़ रहें थे की रास्ते पर बैठी फूल बेचती बच्ची कूद कर उनके सामने आ खड़ी हुई…
“साहब ये धतूरे का फूल ले जाइये.. महादेव को यहीं चढ़ता है… सिर्फ दस रूपये का है !”
राजा ने उस बच्ची को देखा और उसके हाथ से फूल ले लिया…
“साहब ये पूजा की थाली दे दूँ.. सिर्फ पचास की है.. !”
राजा ने हाँ में सर हिला दिया और वो एक थाली उठा लायी…
बाँसुरी ने उसके हाथ से थाली ले ली और पर्स से पैसे निकाल कर उसके हाथों में दे दिया…
“मेमसाब.. इत्ते मोटे नोट का छुट्टा नहीं है मेरे पास.. !”
“छुट्टा चाहिए भी नहीं.. ये सब तुम्हारा है… !”
पचास की जगह हज़ार रूपये देख कर लड़की की आँखे फट गयी थीं…
बाँसुरी ने सपना को थाली पकड़ा कर उस लड़की से सवाल पूछ लिया…
“क्या उम्र है तुम्हारी… ?”
“मैं बारह की हो गयी मेमसाहब.. !”
“फिर स्कूल क्यों नहीं जाती हो.. ? घर पर और कौन है.. ?”
“बाबा और माई है.. सब है.. दो और छोटे भाई बहन भी है.. !”
“फिर.. सारे लोग काम पर जाते हैं क्या.. ?”
“जी मेमसाब.. !”
“,घर कहाँ है तुम्हारा.. ?”
उस बच्ची ने ऊँगली एक तरफ को दिखा दी…
“वहाँ उस गली के आखिरी में.. !”
बाँसुरी ने हाँ में सर हिलाया और अपने मोबाइल पर उसकी एक तस्वीर लेकर राजा के साथ मंदिर में आगे बढ़ गयी….
“खेलने कूदने की उम्र में बच्चो को काम करता देखना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता मुझे… !”
भावुकता से भर कर बाँसुरी ने शौर्य को अपनी गोद में ले लिया और राजा ने उसके कंधे के चारों ओर अपनी बाँहों का घेरा बना लिया…
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तेज़ी से आगे बढ़ती चारों गाड़ियां उस बड़ी सी हवेली के पोर्च में जाकर खड़ी हो गयी…
उन गाड़ियों से उतर कर ऊपर से नीचे तक काली टक्सिडो में सज्जित सजीले नौजवानों ने उन चारों को एक एक कर गाड़ी से निकाला और बड़ी इज्जत के साथ अंदर ले गए…
अंदर के बड़े से हॉल की साज सज्जा पुराने यूरोपियन शैली के घरो सी थीं… एक तरफ की दीवार पर ऊपर बड़ी सी सुप्रसिद्ध “द लास्ट सपर”, तस्वीर सजी थीं…
उसके ठीक नीचे फायर प्लेस था… जहाँ अब भी हलकी सी आग जल रहीं थीं..
उसके ठीक सामने महोगनी और चमड़े का मिलाजुला फर्नीचर रखा था जो उस कमरे की राजसी शोभा बढ़ा रहा था….
पूरे हॉल में अभिजात्य के सुस्पष्ट हस्ताक्षर मौजूद थे…
उन सजे धजे लड़कों ने इन चारों आदमियों की आंखों से पट्टियां खोल दें और उनके चेहरे पर का मास्क हटा दिया…
आंखों को मलते हुए शेखावत और बाकी तीनों चारों तरफ देखने लगे….
“वासुकी… !”
शेखावत के साथ ही उन तीनों के मुहं से भी निकल पड़ा.. वो जगह सबकी जानी पहचानी सी थीं…..
उन चारों के पीछे खड़े युवकों ने उन लोगों को सामने बिछे चमड़े के सोफे पर हल्के से धक्का देकर बैठा दिया….
उनके बैठते ही सीढियों के ऊपर अचानक एक आकृति प्रकट हुई…
उन्होंने चेहरा ऊपर उठा कर देखा.. सीढ़ियों में अपने बूट बजाते हुए धीमी गंभीर चाल से चलता हुआ अनिरुद्ध वासुकी उन लोगों के सामने आकर खड़ा हो गया….
उस बड़े लेदर सोफे के ठीक सामने एक बड़ा सा महोगनी का टेबल था जिसके दूसरी पार अनिरुद्ध वासुकी की लेदर की ऊंची सी रिवाल्विंग चेयर रखी थी….
वासुकी जाकर अपनी रिवाल्विंग चेयर में बैठ गया और मुस्कुरा कर उन लोगों के चेहरे देखने लगा….
पिछले कुछ दिनों से अनिरुद्ध अपने कामकाज से ज्यादा अपने भ्रमण पर अपना समय जाया कर रहा था और उसके व्यापार और उसकी बिरादरी में इस बात की हवा उड़ गई थी कि वासुकी को किसी लड़की से प्यार हो गया है और इसीलिए वह अपने कारोबार को समेट कर सारे काले धन को सफेद करने के बाद कॉरपोरेट में पूरी तरह से शामिल होने की तैयारी कर रहा है.. और बस इसीलिए इन सारे लोगों के ऊपर से अनिरुद्ध का डर कम होने लगा था…
अनिरुद्ध ने मुस्कुराकर एक गहरी सी नजर उन चारों पर डाली और उसकी नजर की चाबुक इतनी तेज पड़ी कि वह चारों सिर्फ उसके आंखों की जलन से ही हुलस कर रहे गए.. …
” तुम चारों में से वह कौन था जिसने कलेक्टर साहिबा को गन दिखाने की ज़ुर्रत की है…?
उन चारों के ही दिल शताब्दी को होड़ देते हुए धड़क रहे थे… पर चारों ने अपने चेहरे से यह जाहिर नहीं होने दिया कि उन्हें सामने बैठे उस महामानव से थोड़ा सा भी डर लग रहा था…
वह चारों अपने चेहरे पर आत्मविश्वास दिखाते उसी तरह बैठे रहे…
” अगर साफ और सही जवाब दे दिया तो सिर्फ मेरी गन की एक ही गोली खत्म होगी और अगर 5 मिनट के भीतर तुम चारों ने जवाब नहीं दिया तो मेरी गन की हर एक गोली यहां ज़ाया हो जाएगी…
याद रखना मरने के बाद लाशें माफी नहीं मांगती…
इसलिए जिंदा रहते में ही माफी मांग लो और उसका नाम बता दो.. इसी में तुम चारों की भलाई है..!”
चारों के चेहरे पर हल्का सा पसीना छलक आया और वह चारों एक दूसरे को देखने लगे….
क्रमशः
aparna….
“
अगले एपिसोड की झलक….
