जीवनसाथी 2/20


जीवनसाथी 2 – भाग 20

    ऑफ़िस के बाहर खड़े वासुकि की धड़कन अब भी सामान्य नहीं हों पायी थी, वहाँ मौजूद लोगों में एक मात्र दर्श था जो उसकी हालत समझ रहा था…
  समर ने धीमे से ऑफ़िस के दरवाज़े पर दस्तक दी और भीतर घुस गया…
  उसके पीछे ही बाकी लोग भी अंदर चलें आये….  महल की साजसज्जा से ये ऑफ़िस काफी अलग था.. महल जहाँ अब भी अपनी पुरानी वास्तुकला में सुसज्जित था वहीँ ऑफ़िस पूरी तरह से आधुनिकता के रंगो में सराबोर था…
    ऑफ़िस में प्रवेश के साथ ही एक बड़ी सी गणेश मूर्ति रखी थी… पूरी तरह काले पत्थर से बनी उस मूर्ति को देख वासुकि और दर्श पल भर को देखते रह गए…

“ये मूर्ति दक्षिण से राजा साहब को तोहफे में भेजी गई थी… वहाँ के प्रसिद्ध कालहस्ती मंदिर की तर्ज़ पर इसे बनवाया गया है… !”

   बाकी दो तरफ की दीवारों पर छत की ऊंचाई छूती आल्मारियाँ बनी थी.. जो तरह तरह की किताबों से पटी थी..
      वहीँ एक तरफ के टेबल पर एक लड़की कम्प्यूटर पर नज़र गड़ाए बैठी कुछ कर रहीं थी…
   उसे समर ने इशारे से ही कुछ कहा और उसके हाँ में सर हिलाते ही एक गलियारे नुमा जगह में चला गया.. उसी के पीछे बाकी लोग भी बढ़ गए…
  उस गलियारे के अंत में वापस एक दरवाज़ा था.. वहाँ पहुँच कर दरवाज़े पर एक हलकी सी दस्तक देकर समर अंदर दाखिल हों गया.. उसके साथ ही बाकी लोग भी एक एक कर अंदर दाखिल हों गए..

    एक बड़ी सी शीशम की टेबल के पीछे बैठा राजा उन सब को आते देख मुस्कुरा कर खड़ा हों गया.. हालाँकि उसे किसी के स्वागत के लिए खड़ा होने की ज़रूरत नहीं थी…  लेकिन राजा सिर्फ रियासत का नहीं दिलों का भी राजा था…

   वासुकि कुछ पलों के लिए सम्मोहित सा सामने खड़े उस नवयुवक को देखता रह गया जो उस रियासत का राजा होने के साथ ही प्रदेश का मुख्यमंत्री भी था… इतने बड़े पदों पर आसीन व्यक्ति का उन लोगों से मिलने के लिए अपनी जगह पर खड़े हों जाना गहन आश्चर्य में डूबा देने वाली बात थी.. !
        ये राजा कुछ अलग सा नहीं था…. !

     राजा की मनमोहिनी सूरत को देखता हुआ वो अभी सोच ही रहा था की उसकी गहन गर्जन सी आवाज उसके कानों में पड़ी…

” मेरी रियासत में आपका स्वागत है अनिरुद्ध वासुकि साहब !”

अपने नाम के साथ जुड़ा इतना सारा सम्मान वासुकि को जैसे घोर रसातल में ले गया.. उसे आजतक सामने से होकर किसी ने सम्मान नहीं दिया था.. उसे अपने लिए हर एक वस्तु दुनिया से छीननी पड़ी थी… चाहें रुपया हों ऐश्वर्य हों या हों मान सम्मान !

“राजा साहब ! मुझे आप सिर्फ अनिरुद्ध ही कहिये,  साहब लगाने की आवश्यकता नहीं है.. आपके सामने मैं बहुत ही तुच्छ.. !

वासुकि की बात पूरी होने से पहले ही राजा ने उसे टोक दिया….

“इस संसार में कोई तुच्छ नहीं है.. अगर आप तुच्छ होते तो आज हमारे महल में न बैठे होते.. ! हर एक व्यक्ति की अपनी पहचान और ज़रूरत है… इसलिए तो उस ऊपर वाले ने इतने भिन्न लोगों के साथ ये सृष्टि रची है… !”

राजा को सामने देख वासुकि वैसा ही मंत्रमुग्ध बैठा था जैसे जंगल के शेर को एकाएक अपने सामने देख लोग जड़ हों जाते हैं…

  मन ही मन रट रखी ढ़ेर सारी बातें तथ्य बिंदु सब कुछ उसके दिमाग से सरसराते हुए निकल चुके थे…. दर्श की बड़ी मेहनत से तैयार की गई सारी रिपोर्ट्स अब किसी काम की नही रह गई थी….

   राजा अब बोलना शुरू कर चुका था और जब राजा बोलता था तब बाकी लोग सिर्फ सुनते थे… उसकी मोहिनी वाणी के आगे किसी की कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं रह जाती थी..
  राजा ने अपनी उस हवेली के बारे में बताना शुरू किया, उसका राजवंशी इतिहास, उसका महात्म्य और उसका इतना ज़बरदस्त वर्णन सुनने के बाद वासुकि को खुद भी लगने लगा की वो उस हवेली को नहीं खरीद सकता….

” अनिरुद्ध साहब मैं मानता हूं कि, आप एक उद्योगपति हैं..! और उद्योगपति के लिए उसका उद्योग ही मायने रखता है! मुझे समर ने बताया था कि आप मेरी हवेली से लगकर जुड़ा हुआ होटल खरीद चुके हैं.. और उसे बढ़ाने के लिए ही आपको मेरी हवेली की जरूरत है! अब उस हवेली से जुड़ा मैं एक छोटा सा किस्सा आपको बताने जा रहा हूं…
अंग्रेजों के जमाने की बात है… वो गोरे हम भारतीयों पर तरह तरह के अत्याचार करते थे.. एक तरफ तो वह सामान्य आम जनता को अपने पैरों के नीचे कीड़ों की तरह मसल कर रख देते थे और दूसरी तरफ राजा महाराजाओं को जानबूझकर झूठी तारीफ कर सर पर बिठाए रखते थे और इस तरह से अपनी जायज नाजायज सारी मांगों को राजा और रियासतों से पूरा कर लिया करते थे….
    अंग्रेजों को हिंदुस्तान की गर्मी बर्दाश्त भी नहीं होती थी और वह हिंदुस्तान छोड़कर जाना भी नहीं चाहते थे..! इसीलिए उन लोगों ने पहाड़ों पर अपने समर रिसोर्ट बनवा रखे थे!  ऐसे ही आसपास के पहाड़ो पर हवेलियाँ बनवाने के बाद उनकी नजर देहरादून की हमारी हवेली पर पड़ी थी..
        उस वक्त हमारे दादा के पिता साहब यानी कि ठाकुर विजय राघव सा हुकुम का शासन था.. उन्हें अंग्रेजों से सख्त नफरत थी, और इस नफरत के कई सारे किस्से मशहूर भी हैं!  उन्हीं में से एक के साथ उनकी हवेली का किस्सा भी जुड़ा है..
     कहा जाता है कि बाबा हुकुम अक्सर गर्मी के समय में अपना वक्त गुजारने के लिए उसी हवेली में अपने परिवार के साथ जाकर रहा करते थे ! ऐसे ही एक बार की बात है, गर्मियों के दिन थे और राजा साहब शाम के वक्त अपने बगीचे में बैठे चाय पी रहे थे.. उसी वक्त टाउन की पेट्रन जुरी के एक अंग्रेज अधिकारी अपने दो तीन बाशिंदो के साथ वहां चले आए..
    बाबा हुकुम भी उस पेट्रन जुरी के एक मेंबर थे.. इसी से वह अंग्रेज अधिकारी बाबा हुकुम से पहले भी मिल चुका था!  वह उस दिन भी बड़ी शान से घोड़े पर सवार होकर चला आया ! आते ही बाबा हुकुम को अपने ही अंदाज में नमस्कार कर वो उनके सामने बैठ गया…..
बाबा हुकुम का गुस्सा और सनक काफी तेज माना जाता था.. और कहा जाता है कि उस समय किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि बाबा हुकुम की बराबरी में बैठ जाएं..
      उस अंग्रेज की पहली ही गलती बाबा हुकुम की आंखों में खटक गई !  इसके बाद उसने अपना धृष्ट  प्रस्ताव हुकुम के सामने रख दिया ! वह बाबा हुकुम कि उस हवेली को खरीदना चाहता था…
    बाबा हुकुम ने उससे कीमत पूछी कि वह इस हवेली की क्या कीमत लगाता है ? और उस वक्त पर उस अंग्रेज अधिकारी ने 2000 रुपयों के बदले हवेली खरीदने की अपनी मंशा जता दी… बाबा हुकुम ने तुरंत अपने पास खड़े अपने मातहत के कान में कुछ कहा.. उनकी बात सुनते ही वह वहां से भीतर चला गया और लगभग 10- 15 मिनट बाद ही वह हाथ में एक बड़ी सी चांदी की तश्तरी लिए वहां हाजिर हुआ…
     उस चांदी की तश्तरी के ऊपर लाल रंग का रेशमी कपड़ा ढका हुआ था !  अंग्रेज अधिकारी बड़े आश्चर्य से उस प्लेट को देखने लगा और उसने बाबा हुकुम से पूछ ही लिया कि आखिर उन्होंने उसके लिए ऐसा कौन सा तोहफा मंगवाया है..?  बाबा हुकुम ने मुस्कुराकर वह तश्तरी उसके हाथ में भेंट कर दी.. और कहा कि इस तश्तरी  में जितना कुछ मौजूद है वह सब कुछ वो अपने मुंह में ठूंस ले और इस हद तक ठूंस ले कि दोबारा हवेली को खरीदने की बात ही ना कर सके… !
       अंग्रेज अफसर उनकी यह बात सुनकर चौक गया और उसने तुरंत उस रेशमी कपड़े को उस तश्तरी पर से हटा दिया…
       उसकी आंखें फटी की फटी रह गई क्योंकि उस अंग्रेज अधिकारी के सामने उस प्लेट में 20000 के नोट मौजूद थे वह दोनों हाथों से अपना सर पकड़ कर बैठ गया…
   उसी समय एक गरीब औरत रास्ते से गुजरते हुए उनके मुख्य द्वार पर खड़े होकर बाबा हुकुम से मिलने की गुहार लगाने लगी..
     बाबा हुकुम ने उसे आवाज देकर अंदर बुला लिया |  वह औरत अपने साथ एक छोटे से बालक को भी रखे हुए थी |  वह अपने बालक को लेकर अंदर आई, और हुकुम के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगी  हुकुम ने उससे रोने का कारण पूछा…-” राजा साहेब अब आपसे क्या पीर कहे हम.. यह बालक बिना मां बाप का बच्चा है हम इसकी बुआ हैं और इसे पाल पोस रहें हैं… “
” अगर इसके पालन पोषण के लिए तुम्हें कुछ पैसों की जरूरत है तो तुम हमारे महल में दासी का काम कर सकती हो!”
” हुकुम अगर ऐसा हो जाए तो आपकी बड़ी दया होगी लेकिन बात और भी कुछ है..!”
” क्या बात है कहो..?”
” हुकुम इस बालक के माता-पिता ने अपनी मर्जी से ब्याह किया था.. दोनों की ही अलग-अलग जाति थी और इसी से इनके घर वाले आपस में इस विवाह के लिए तैयार नहीं हुए.. लेकिन इसके माता-पिता आपस में एक दूसरे में इस कदर खोए बैठे थे कि ना उन्होंने घरवालों की कदर की और ना समाज की सोची और बस घर छोड़कर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर भाग गए…… हजूर इस के माता-पिता यहां से भागकर दक्षिण की तरफ चले गए थे… उन्हें साथ रहते मुश्किल से आठ नौ साल बीते होंगे कि हमारे गांव के लोगों ने उन दोनों को ढूंढ निकाला.. असल में वह दोनों जहां काम किया करते थे, वहां हमारे गांव का कोई लड़का पहुंच गया था और उसने उन दोनों को देखकर पहचान लिया!  और उसके बाद आकर गांव में समाज के ठेकेदारों के सामने शिकायत लगा दी ! बस यहां से आठ दस लठैत वहां पहुंच गए और उन दोनों को मौत के घाट उतार दिया…
    यह सारी बातें सुनकर मैं बड़ी मुश्किल से वहां तक पहुंची और इस बच्चे की जान बचाकर वहां से भागकर यहां गांव वापस चली आई !  लेकिन मुझे नहीं पता था कि समाज के ठेकेदार इसके माता-पिता को मारने के बाद अब इसकी भी जान के दुश्मन बन जायेंगे !  मैंने पंचायत के सामने यह बात रखी भी, कि गलती इसके माता-पिता की थी तो इसे क्यों सजा दी जाए..?  लेकिन पंचायत के लोग इस बात के लिए तैयार ही नहीं हो रहे थे कि बच्चे को जिंदा रहने दिया जाए.. उन लोगों के अनुसार यह उनके पाप की निशानी थी और यह जितनी जल्दी  मार दिया जाए उतना ही जल्दी समाज को यह एक संदेश जाएगा कि इस तरह के ब्याह नहीं होने चाहिये… !
पंचायत का यह फैसला सुनते ही हम रातों रात इस बच्चे को लेकर भाग खड़े हुए और आपके पास पहुंच गए हैं !  राजा साहब हमारा गांव भी आपकी ही रियासत का एक हिस्सा है !  हो सके तो इस बच्चे की रक्षा कीजिए !  यह हमारे भाई और भाभी  की एकमात्र निशानी है…!
     हम मानते हैं कि समाज की तरफ से देखा जाए तो हमारे भाई और भाभी ने बहुत बड़ा गलत कदम उठाया है ! अपनी मर्जी से ब्याह करना बहुत बड़ा पाप है ! लेकिन उन लोगों ने विवाह किया तो उसे अंत तक निभाया भी, दोनों साथ जिए और साथ चले गए… लेकिन अब इस बच्चे का इस सब में क्या कुसूर है..? हुकुम आप बताइए क्या इस बच्चे को बिना किसी  गुनाह के मार दिया जाना चाहिए..!”
” नहीं बिल्कुल नहीं इस बच्चे की रक्षा हम करेंगे!  यह हमारी इसी हवेली में पाला पोसा जाएगा.. तुम्हें तो हम यहां काम करने का मौका देते ही हैं, इसके साथ ही यह बच्चा भी यहीं रह कर अपनी पढ़ाई लिखाई करेगा!  और इसे जिस भी चीज की कमी होगी, तुम हमें तुरंत बताना हम इसकी हर जरूरत को पूरा करेंगे..!”
” राजा साहब उन पंचायत के आदमियों से हमारी सुरक्षा हो जाए और एक बच्चे का जीवन बच जाए इससे ज्यादा हमें और कुछ नहीं चाहिए.. हम और यह बालक जिंदगी भर आप की गुलामी करेंगे हुकुम..!”
” तुम जिंदगी भर चाहो तो इस हवेली में रह सकती हों,   यहां का कामकाज  तुम संभाल लेना और यह बालक पढ़ाई करेगा..!”
  इसके बाद  राजा साहब ने उस बच्चे को अपने पास बुला कर उसके बालों पर हाथ फिरा कर आशीर्वाद की मुद्रा में अपना हाथ उसके सिर पर रख दिया..!  सामने बैठा अंग्रेज अधिकारी फटी फटी आंखों से राजा साहब का यह व्यवहार देखकर आश्चर्य में डूबा हुआ था ! कहां तो एक तरफ इतने ढेर सारे रुपयों के बदले भी राजा साहब ने अपनी हवेली उस अंग्रेज के हवाले करना मंजूर नहीं किया, और उल्टा वह जितना पैसा देने वाला था उससे 10 गुना पैसा उसके मुंह पर मार दिया
    और दूसरी तरफ यह गरीब औरत और उसके बच्चे को आराम से इस हवेली में रखने को तैयार हो गए…… यह राजा, राजा नहीं कोई सनकी था… राजा साहब ने उस बच्चे के सिर पर हाथ फिराते हुए आगे कहना शुरू किया…
”  हमारा पोता भी इसी उम्र का है.. हो सकता है इस बालक से दो चार साल बड़ा ही होगा ! इसे देखकर हमें उसकी याद हो आई… वह तो इस वक्त अपने माता पिता के साथ विदेश घूम रहा है…!  पर बेटा हम तुमसे यही चाहते हैं कि हमने तुम्हारी जो मदद की है, इसके बाद तुम खुद अपनी पहचान बनाओ… पढ़ाई लिखाई करो और एक अच्छे इंसान बनकर समाज का सामना करो और उन लोगों को नाकों चने चबवा दो जिन्होंने तुम्हारे माता-पिता का अपमान करके उनकी जिंदगी छीन ली…!”
   उस बालक ने झुककर राजा साहब के पैर छू लिये..  और हुकुम ने उसे खींच कर अपने पास रखी एक छोटी सी मोढ़ी  पर बैठा दिया… अंग्रेज अधिकारी यह सब कुछ अपनी आंखों के सामने देख कर अपमान से तिलमिला गया और एकाएक अपनी जगह से उठ कर खड़ा हो गया…
     राजा साहब ने अपनी सवालिया नजरों से उस अंग्रेज की तरफ देखा तो उसने इस सारी बात को अपना अपमान बताया और… ‘राजा साहब आपको देख लूंगा’ की धमकी देता हुआ पैर पटकते हुए अपने बाशिंदों के साथ वहां से निकल गया..
     कहा जाता है कि इसके बाद उस अंग्रेज अधिकारी ने अपने साथ के लोगों, वहां के गवर्नर और बाकी अंग्रेज अधिकारियों से बातचीत करके राजा साहब की रियासत पर आक्रमण करने की भी योजना बनाई थी… लेकिन राजा साहब से मिलने के बाद वहां के गवर्नर ने उस अंग्रेज अधिकारी को समझा-बुझाकर शांत कर दिया था ! लेकिन अपमान की आग में जलता वह अंग्रेज अधिकारी मन ही मन इतना सुलग रहा था कि उसने राजा साहब को जान से मारने की योजना बनाई और एक शाम फिर उनसे मिलने उनकी उसी हवेली में पहुंच गया…
    चाय नाश्ते के दौरान उसने राजा साहब की नजर बचाकर अपने साथ लाया विषैले सांप का जहर राजा साहब की चाय में मिला दिया… उस समय राजा साहब किसी जरूरी दस्तावेज को पढ़ने में व्यस्त थे और इसीलिए उनका ध्यान नहीं गया !  उनके आसपास खड़े लोग भी व्यस्त थे और इसीलिए अंग्रेज अधिकारी वहां मौजूद लोगों की आंखों में धूल झोंक गया…
.. लेकिन इस सबके बावजूद वही उद्यान में एक तरफ पौधे की देखभाल करता वह 12 साल का बालक अपनी आंखों से सब देख रहा था…
राजा साहब ने जैसे ही उस चाय को पीने के लिए कप  अपने हाथ में लिया उस बालक ने आकर चाय छीन ली..
” राजा साहब आप यह चाय नहीं पी सकते,  इस चाय में इस गोरे ने कुछ मिला रखा है..!”
उस बालक की यह बात सुनकर सामने बैठा अंग्रेज अधिकारी वापस तिलमिला गया… क्योंकि उसका बनाया प्लान उसके सामने ही पूरी तरह से फेल होने जा रहा था ! उसने भी उसी अकड़ के साथ राजा साहब से कह दिया कि उसने इस चाय में कुछ भी नहीं मिलाया है.. ! तब उस निर्भीक बालक ने राजा साहब और उस अँगरेज़ अधिकारी के सामने इस बात को साबित करने के लिए कि इस चाय में कोई ना कोई जहरीला पदार्थ मिलाया गया है, खुद पूरा का पूरा कप चाय पीकर खाली कर दिया…
     वो अंग्रेज अधिकारी सुदूर पहाड़ों पर गुफाओं में बैठे बाबाओं के पास से सबसे विषैले नागों का जहर इकट्ठा करके लाया था !  चाय के कप की आखरी बूंद पीते ही उस बालक की आंखें पलट गई, और वह बेहोश होकर वहां गिर पड़ा.. ! तुरंत उसके मुंह से झाग निकलने लगा और आसपास मौजूद लोगों को समझ में आ गया कि चाय के कप में जहर था !  राजा साहब का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया | उन्होंने अपनी शेरवानी की जेब में रखी कटार निकाली और सामने बैठे अंग्रेज अधिकारी का गला काट दिया |  इसके साथ ही बच्चे को लेकर तुरंत वैद्य के पास ले जाया गया |  वैद्यराज ने आसपास मौजूद जड़ी बूटियों का अर्क उसकी नाक में टपकाया, कुछ विशेष तरह का काढ़ा बनाकर उसे पिलाया और पूरे 24 घंटे बेहोश रहने के बाद आखिर उस बालक ने अपनी आंखें खोल दी…
हमारे बाबा हुकुम ने उस बच्चे को प्यार से अपने गले से लगा लिया, क्योंकि अगर आज बाबा हुकुम जिंदा थे तो उसके पीछे यही बालक कारण था..
  उसे प्यार से अपने सीने से लगाने के बाद उन्होंने उसे अपने से कुछ दूर किया और उसके माथे पर आशीर्वाद का हाथ रखकर उसका नया नामकरण किया… जानते हैं अनिरुद्ध साहब हमारे बाबा हुकुम ने उस बालक को  क्या नाम दिया..

   उस बालक का नाम रखा गया वासुकी!!

      कैसा अजब इत्तेफाक है कि एक बालक वासुकी उसी हवेली में पला बढ़ा,   शिक्षा ग्रहण की और बाद में दक्षिण भारत के ही किसी जगह पर जाकर उसने अपना काम जमा लिया… उनकी शादी हुई, बालक भी हुआ और उसके बाद कुछ समय बाद उनकी हत्या कर दी गई..! खैर इतनी सारी कहानी सुनाने का हमारा मकसद सिर्फ यह है कि वह हवेली हमारे लिए ईंट चूने गारे से बना हुआ एक भवन नहीं बल्कि कई सारी भावनाओं का किला है…

   हमारे बाबा हुकुम यूं ही रियासतों में प्रसिद्ध नहीं रहे हैं… उसके पीछे उनकी एक एक करनी भी शामिल है !  उस हवेली से सिर्फ मैं ही नहीं  मेरी दादी साहिब भी बहुत जुड़ी हुई हैं.. और इसीलिए मेरे जिंदा रहते वह हवेली मैं किसी के हवाले नहीं कर सकता |  हां यह बात और है कि मेरे मरने के बाद…

”  शुभ शुभ बोलिए हुकुम !  आपके लिए तो यहीं कहूंगा जीवेत शरद शतम् !”

राजा अजातशत्रु की बात को समर ने बीच में ही काट दिया और उनकी पूरी कहानी सुनने के बाद दर्श और अनिरुद्ध  एक दूसरे की तरफ देखने लगे ! अनिरुद्ध ने खड़े होकर हाथ जोड़ दिए…..

” मुझे माफ कीजिएगा हुकुम! मैंने गलती से आपकी अमानत पर नज़र डाल दी…  यकीन मानिए अगर मुझे पहले मालूम होता कि वह आपकी अमानत है, तो मैं कभी उस पर नजर डालने की हिम्मत नहीं कर सकता था… लेकिन दिल ही तो है क्या किया जाए ? इस दिल का..?  कमबख्त  मेरे बस में जो नहीं है..!  आपसे वादा करता हूं कि आपकी अमानत पर अब कभी नजर नहीं जाएगी लेकिन यह भी है कि मेरे दिल से वो कभी उतरेगी भी नहीं….
   आज तक ऐसी पाक खूबसूरती कहीं नहीं देखी और शायद इसलिए सीधा दिल पर उतर गई….”

” कोई बात नहीं !आपको मालूम भी तो नहीं था..! लेकिन आप आदमी बड़े दिलचस्प हैं अनिरुद्ध साहब.. आपसे मिलकर वाकई खुशी हो रही है…अगर आपको कोई परेशानी न हों तो आज हमारे मेहमान बन कर रहिए यहां, और महल को आपका स्वागत करने का मौका दीजिए..!”

” मेरे जैसे छोटे आदमी के लिए यह बहुत बड़े सम्मान की बात है राजा साहब..!”

” कौन किस हिसाब से छोटा और बड़ा है यह विचार करने वाले या तय करने वाले हम और आप कौन होते हैं अनिरुद्ध साहब..!  हर एक जीव का अपना महत्व है जिसे भगवान ने इस धरती पर भेजा है….
   आपको भी भगवान ने धरती पर भेजा है किसी महत्वपूर्ण कार्य को करने के लिए और बहुत महत्वपूर्ण किरदार में आप हैं भी इस बात को भुलिएगा मत…!”
 

बातें चलती रहीं और इन ढ़ेर सारी बातों में दोपहर के खाने का वक्त हों चला…
  वही राजा जो कभी महल के इन नियम कायदों के  सख्त खिलाफ था.. अब रानी मां के जाने के बाद उनके बताए नियमों को पत्थर की लकीर की तरह मानकर चला करता था और इसलिए खाने का वक्त होते ही वह अपनी जगह से खड़ा हो गया और सब को साथ लिए खाने के कमरे में पहुंच गया…!

खाने के उस विशाल कमरे में बड़े से शीशम के नक्काशी दार डाइनिंग टेबल के चारों ओर पूरा राज परिवार एक ही छत के नीचे सिमट आया था…..
राजा साहब का स्वास्थ्य अब ऊपर नीचे रहने लगा था इसलिए उनके और दादी साहब के लिए खाना उनके ही कमरों में भिजवा दिया जाता था.. बांसुरी जब भी महल में होती दादी साहब का खाना वह खुद उनके कमरे में लेकर जाती और उन्हें अपने हाथों से खिला पिला कर ही वापस लौटती थी….
     ठीक इसी तरह राजा साहब को खाना खिलाने की जिम्मेदारी युवराज ने अपने कंधों पर ले रखी थी…
घर के बुजुर्गों के खा चुकने के बाद महल के बाकी सदस्य खाने के लिए बैठे राजा अजातशत्रु का इंतजार कर रहे थे…
    राजा आज भी डाइनिंग टेबल की अपनी पहले वाली कुर्सी पर ही बैठा करता था !  राजा साहब की कुर्सी पर अब युवराज सा बैठने लगे थे…
        एक तरफ की कुर्सियों पर मर्दों के बैठने की व्यवस्था थी और उनके ठीक सामने की कुर्सियों पर महिलाएं बैठा करती थी… बच्चों का खाना पीना निपट चुका था और वह अपने कमरे में जा चुके थे | लेकिन शौर्य अब भी बांसुरी को परेशान कर रहा था…
    राजा और बाकी लोगों को आते देख वहां मौजूद सभी के चेहरे पर प्रसन्नता छा गई | समर ने अनिरुद्ध और दर्श के लिए कुर्सियों की तरफ इशारा कर दिया अनिरुद्ध और दर्श भी चुपचाप बाकी लोगों के साथ वही बैठ गए……
     शौर्य को खिलाने के चक्कर में बांसुरी महिलाओं की तरफ सबसे आखिर की कुर्सी पर थी, जबकि राजा पुरुषों की तरफ सबसे सामने की कुर्सी में… आखिर  राजा का मन नहीं माना और वह अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ..

“क्या हुआ कुंवर सा.. ? आप खाने की मेज से अचानक उठ कैसे गए.. ?”

रूपा के इस सवाल पर राजा चौक गया क्योंकि इस तरह से सबके बीच उठकर अपनी पत्नी के बाजू वाली कुर्सी पर जाकर बैठना आज भी उसके लिए थोड़ा कठिन था और इसके लिए उसे कोई बहाना बनाना जरूरी था…

” भाभी साहब इस कुर्सी में कुछ परेशानी है..!”

” क्या परेशानी है..?

” पता नहीं बैठने पर लगा.. जैसे हिल रही है!”

” अब आप रोज वर्जिश कर करके अपना वजन इसी तरह बढ़ाते रहेंगे तो कुर्सियां ऐसे ही तो चकनाचूर होंगी… वैसे छोड़िए आपके लिए हम दूसरी कुर्सी यहीं  पर लगवा देते हैं… इसे कारपेंटर को बुलाकर दिखा देंगे..!”

” अरे नहीं आप क्यों कष्ट करेंगी.. ? मैं उधर खाली कुर्सी है ना उस पर चला जाता हूं..!”

” बताइए भला..! रियासत के राजा के लिए अगर हम दूसरी  कुर्सी लगवा देते हैं तो यह कष्ट होगा भला.. ?  यह इतनी ढेर सारे नौकरों की फौज क्या सिर्फ हमारी सेवा के लिए है..?  तीरथ जाइए वो कुर्सी उठाकर इधर ले आइए..!

रूपा अभी अपनी बात पूरी कर पाती, उसके पहले ही राजा तेज कदमों से चलते हुए गोल घूम कर बांसुरी के पास वाली कुर्सी पर चला आया….. और आराम से बैठ गया…
   रूपा ने राजा की तरफ देखा और फिर जया की तरफ देख कर मुस्कुराने लगी…

” आपको अपनी हुकुम के साथ ही बैठना था तो पहले कह देते..? इतना सब नाटक करने की क्या जरूरत थी..? हमें तो सच में लगा की कुर्सी खराब हो गई है..!”

    बांसुरी ने राजा की तरफ देखा और उसकी शरारत पर धीमे से मुस्कुराते हुए ना में गर्दन हिला दी… उन दोनों के ठीक सामने बैठे  वासुकी ने चुपचाप गर्दन झुका ली…..
     अनिरुद्ध की नजर रह-रहकर शौर्य पर भी चली जा रही थी…वो बच्चा भी उसे मोहित कर रहा था..
   बाँसुरी अपनी गोद में बैठे शौर्य को अपने हाथ से खाना खिला रहीं थी और वो बार बार इधर उधर मुहं घुमा कर खाने से मना कर रहा था….. एक हाथ से शौर्य को पकड़ कर दूसरे से उसे खिलाने में बाँसुरी को परेशानी हों रहीं थी.. और यहीं देख राजा ने शौर्य को अपनी गोद में बैठा लिया…
   अब बाँसुरी आराम से शौर्य को खिला पा रहीं थी.. उसका दूसरा हाथ टेबल के नीचे था.. अचानक राजा ने उसका वो हाथ पकड़ लिया और बाँसुरी चौंक गई..

“क्या हुआ बाँसुरी.. ?” तुम चौंक क्यों गई.. ?”

जया के सवाल पर बाँसुरी से एकाएक कुछ कहा नहीं गया… वो राजा की पकड़ से अपनी कलाई छुड़ाने की कोशिश करने लगी… तभी रूपा भाभी अपनी जगह पर खड़ी हों गई…

“आप सभी से एक निवेदन है.. आज शाम हम सोच रहें हैं, पीछे गार्डन में डिनर और बारबेक्यू की व्यवस्था करवा ले… आज मेहमान भी मौजूद हैं और फिर दो दिन बाद ही बाँसुरी को नयी जगह जाना भी है…
अब कल तो कलेक्टर साहिबा पूरा दिन व्यस्त रहेंगी तो आज रात इनका एक छोटा सा फेयरवेल हों जाएं.. आप सब को मंजूर है.. !”

सभी ने हामी भर दी..

“कुंवर सा ! आप भी समय से पहुँच जाइएगा.. अपनी दूसरी पत्नी के साथ गायब न हों जाइएगा… ! ” रूपा ने राजा को टोक दिया..

“दूसरी पत्नी !” दर्श इतनी ज़ोर से चौंक उठा की उसके मुहं से न चाहते हुए भी निकल गया..

” जी हाँ इनकी दूसरी पत्नी भी है… और अगर आप भी मिलना चाहते हैं तो आज रात हमारे गार्डन में आपका स्वागत है.. !”

“जी हमें बुलाने के लिए आभार रानी साहेब.. !”

दर्श ने उठ कर रूपा को प्रणाम किया और वापस बैठ कर खाने लगा…

  बाँसुरी आँखों ही आँखों में राजा से कलाई छोड़ने की इल्तिज़ा कर रहीं थी और दो दिन बाद उसे छोड़ कर जाने वाली बाँसुरी को अभी राजा एक पल के लिए भी नहीं छोड़ पा रहा था…

  अपनी आँखों के सामने ये सब देखते बैठे अनिरुद्ध के अंदर कोई गर्म लावा सा पिघल रहा था… अपने मन को बांधने के लिए उसने एक गहरी सी साँस भरी और अपनी थाली और चम्मच से निरर्थक खेलने लगा…

क्रमशः

aparna…..

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