
भाग 19
फ्लाइट एकदम समय पर थी.. दर्श और अनिरुद्ध काका के पैर छूकर फ्लाइट के लिए निकल गया….
कुछ घंटों में ही वो राजा की रियासत के एयरपोर्ट पर उतर चुके थे.. हालाँकि दर्श ने पहले ही एक फाइव स्टार आलीशान होटल में अपनी बुकिंग कर रखी थी और इसीलिए उस होटल से उन दोनों को लेने के लिए गाड़ी नियत समय पर वहां पहुंच चुकी थी…. दोनों अपने छोटे-छोटे ट्रॉली बैग समेटे बाहर निकलकर गाड़ी में बैठ गए और गाड़ी एक झटके से उस आलीशान होटल की तरफ बढ़ गई… अपने होटल के कमरे में पहुंचने के बाद दर्श तो लैपटॉप निकालकर कुछ जरूरी मीटिंग के पॉइंट चेक करने लगा लेकिन अनिरुद्ध एक बार फिर नहाने के लिए बाथरूम में घुस गया…
उसके नहा कर निकलते तक में दर्श ने उन दोनों के लिए कॉफी ऑर्डर कर दी थी…
” अनिर, एक बात पूछूं..? तू कुछ ज्यादा ही नहाता नहीं है.?
” जानता हूं कि मैं कुछ ज्यादा ही नहाता हूं.. लेकिन पता नहीं मेरी भी एक दिक्कत है ! वैसे तो मैं सामने वाले को उसकी गलती के लिए माफ नहीं कर पाता और सीधे सजा दे देता हूं, और कई बार मेरी सजा सीधे उसे मौत के घाट उतार देती है ! लेकिन उसके बाद अपने हाथ में लगा लहु बार-बार नहाने के बाद भी मुझे साफ होता हुआ नजर नहीं आता…
और शायद इसीलिए जिस दिन मैं किसी का खून करता हूं उस दिन मैं बार-बार नहाता हूं.. उस खून को अपने शरीर से साफ करने के लिए.. !”
” तू एक नंबर का साइको है.. ! अभी भी उस राहुल को मारने के बाद तेरे हाथ कौन सा खून से रंग गए.. ? वो इसी लायक था, ये उसकी नियति थी.. !”
” हाथ न रंगे तो क्या लेकिन मन तो रंग गया ना…! हालांकि मैं जानता हूं कि उसकी उससे आसान और कोई सजा नहीं थी… लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि भगवान जिसे पैदा करते हैं उसे सजा देने का हक भी भगवान स्वयं ही रखते हैं ! मैं भगवान और उनकी बनाई दुनिया के बीच आने वाला कौन होता हूं? लेकिन पता नहीं क्यों जब मैं किसी की इस तरह की हरकत सुनता हूं तो अपने गुस्से पर काबू क्यों नहीं कर पाता..? क्यों मेरा खून इतना तेज उबलने लगता है कि मुझे सामने वाले को मारे बिना चैन नहीं आता…? मुझे मेरे गुस्से को काबू करना सीखना होगा दर्श .. !
” लेकिन मेरे ख्याल से राहुल को मारकर तूने कुछ गलत नहीं किया..! अगर तू उसे ज़िंदा छोड़ देता तो राहुल और उसका बाप मिलकर सारिका और उसकी मां को मरवा देते और यह केस रफा-दफा हो जाता.. और एक बार फिर राहुल जैसा बलात्कारी और घटिया लड़का इस दुनिया में सरेआम सर उठा कर घूमता… एक बार ऐसी गलती करने के बाद अगर कोई लड़का सजा से बच जाता है तो उसकी हिम्मत बहुत बढ़ जाती है, और फिर उसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है..! फिर बलात्कार जैसी घटनाएं आम हो जाती है..! क्योंकि इन लड़कों के लिए यह फिर एक एडवेंचर हो जाता है…!
ऐसे दरिंदे को मारकर तुमने पुण्य का काम किया हैं अनिर ! उसे मारने के लिए अपने मन में किसी तरह का कोई गिल्ट मत रखो..!”
” दर्श मुझे राहुल को मारने का गिल्ट नहीं है, मैं तो सिर्फ सज़ा देना ही चाहता था लेकिन मैं कभी भी किसी को जान से नहीं मार देना चाहता हूं…
मैं बस इतना चाहता हूं कि सामने वाले को इस कदर सजा दी जाए कि उसे अपनी गलती का एहसास हो जाए और वह अपनी गलती को दोबारा करने से पहले सौ बार सोचे… और डर के साए में जिए लेकिन मैं अक्सर सजा इतनी बड़ी दे देता हूं कि वह सज़ा आसान हो जाती हैं..
राहुल को मारकर मैंने राहुल को नहीं बल्कि उसके घर वालों को सजा दी है..! क्योंकि राहुल तो मर कर एक बार मैं छुट्टी पा गया लेकिन उसकी बिलखती मां और उसके पिता के झुके हुए कंधे मुझे अफसोस करने पर मजबूर कर रहे हैं…
हालांकि मैं जानता हूं कि पालेकर जी के तीन और लड़के हैं और कहीं ना कहीं उनकी परवरिश की कमी थी जो राहुल इस कदर खोखला इंसान था…
… लेकिन फिर भी मुझे राहुल को ऐसी सजा देनी चाहिए थी जिसमें वह घुट घुट कर अपनी जिंदगी जीता और मरने के लिए बार-बार मिन्नतें करता… ! लेकिन उस वक्त उस लड़की सारिका के चेहरे पर जो भाव थे उन्हें देखकर मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने…
” कोई बात नहीं जाने दो.. हर एक इंसान के भीतर अगर एक सृजनकर्त्ता है तो एक संहारक भी हैं……
हर एक इंसान के अंदर अच्छाई और बुराई दोनों एक साथ साँस लेती हैं…
.. इसीलिए हम जैसे आम इंसान के अंदर अगर थोड़े से राम है तो थोड़ा ज्यादा रावण भी में बैठा है…
तेरा रावण गुस्से के समय तुझ पर थोड़ा ज्यादा हावी हो जाता है इसीलिए तो समझाता हूं कि योग और ध्यान किया कर… जिससे तू अपने गुस्से पर काबू पा सके!
लेकिन मैं अब भी कहता हूं कि राहुल के साथ तूने जो किया वह गलत नहीं था और उसके लिए अपने मन पर कोई भी बोझ मत रख….. !
अगर तुझे राहुल के माता-पिता का चेहरा नजर आ रहा है तो एक बार अपने मन में सारिका और उसकी मां के चेहरे को याद कर ले…
अगर तूने जो आज किया है वह नहीं किया होता तो यही सारिका और उसकी मां पता नहीं किस गड्ढे में अपनी आखिरी सांसें लेती दफन हो चुकी होती….. इसलिए अभी अपने विचारों को झटक दें.. देख मैंने लैपटॉप पर सारी चीजें सारे पॉइंट तैयार कर लिए हैं और इसके साथ ही राजमहल से हमारे लिए फोन भी आ चुका है…
राजाजी के मंत्री यानी कि समर का फोन आया था और उसने पेशकश रखी थी कि वह अपनी गाड़ी भेज देगा लेकिन मैंने रिफ्यूज कर दिया..
” सही किया..! पहले दिन से हमें किसी का एहसान नहीं लेना, हम सिर्फ यहां उनके पास व्यापार करने आये है, और इससे ज्यादा हमारा और उनका कोई नाता नहीं है….
” तो फटाफट रेडी हो जाओ मैंने नाश्ते के लिए बोल दिया है हम नाश्ता करके तुरंत यहां से निकल जाएंगे..”
कुछ देर बाद ही दोनों महल के सफर पर निकल पड़े थे…
महल का ऊँचा पूरा मुख्य द्वार आज भी अपनी उसी विशालता से आने वालों का मन मोह लेता था.. मुख्य द्वार के आजू-बाजू 20 फुट के पत्थर के बने दो द्वारपाल सज्जित थे…
दर्श और अनिरुद्ध दोनों की नजर उस मुख्य द्वार की खूबसूरती पर ही अटक कर रह गई… लेकिन उन दोनों की गाड़ी को वहीं रोक दिया गया अंदर से चलकर दो गार्ड्स बाहर निकल आए और उन्होंने गाड़ी को रोककर गाड़ीवान से पूछताछ करनी शुरू कर दी..! दर्श ने गाड़ी से नीचे उतर कर अपना परिचय पत्र उन लोगों के सम्मुख रख दिया..
.. यह परिचय पत्र अभी कुछ देर पहले ही समर ने ऑनलाइन दर्श और अनिरुद्ध के लिए भेजा था..! जिसे आते समय रास्ते से वो लोग हार्ड कॉपी के रूप में निकलवा कर ले आए थे….
उस परिचय पत्र को देखने के बाद गार्ड में उन दोनों को अंदर जाने की अनुमति तो दी लेकिन उन्हें उनकी गाड़ी से उतरना पड़ गया…
पहले तो यह सिर्फ एक राज महल था लेकिन अब रियासत के मुख्यमंत्री का प्रमुख आवास भी था… इसी से सुरक्षा कारणों को मद्देनजर रखते हुए मुख्य द्वार से अंदर जाने के लिए मेहमानों के लिए भी एक विशेष गाड़ी वहां मौजूद थी…
उसी गाड़ी को ड्राइवर के साथ अनिरुद्ध और दर्श को सौंपकर गार्ड ने उनका नाम अपने रजिस्टर पर नोट किया और उन्हें आगे भेज दिया…..
महल की गाड़ी में अंदर बढ़ते हुए अनिरुद्ध वासुकि की नजर वहां के खूबसूरत बगीचे पर अटकी हुई थी…
मुख्य द्वार से महल की दूरी ही लगभग चार-पांच किलोमीटर की थी… दूर से महल बहुत सुंदर दिखाई दे रहा था ! उसके नक्काशी और उन से बने गुंबद बिल्कुल किसी विशाल यूरोपियन चर्च की तरह दिखाई दे रहे थे….
” बहुत सुंदर महल है..! कौन सी सदी का बना महल है यह..?”
आखिर दर्श से रहा नहीं गया और उसने गाड़ी चलाते ड्राइवर से सवाल पूछ लिया…! ड्राइवर भी महा उत्साही था ! उसे शायद इस महल का एक हिस्सा बनकर ही इतनी खुशी और इतना गर्व महसूस होता था कि वह हर आने जाने वाले को इस महल के क्रेडेंशियल बड़े आराम से थमा जाया करता था उसने भी बोलना शुरु कर दिया…
” हजूर ! असली महल तो इस महल के पीछे हैं! यह तो अभी वर्तमान के राजा साहब के दादा के पिता ठाकुर विजय राघव सिंह द्वारा बनवाया गया है ! कहा जाता है कि उन्हें अंग्रेजों की हुकूमत सख्त नापसंद थी, और वह अंग्रेजों द्वारा हिंदुस्तानियों को अपना नौकर बनाए जाने के बेहद खिलाफ थे.. और इसीलिए अंग्रेजों से अपने तरीके से उन्होंने बदला लिया और अंग्रेजों का राज होते हुए भी उन्होंने यूरोप से इंजीनियर बुलवाकर अपने महल का नक्शा बनवाया और सारे यूरोपियन कारीगरों से काम करवा कर अपना महल बनवाया था..! कहा जाता है कि उस समय एक भी हिंदुस्तानी मजदूर ने इस महल में ईट नहीं लगाई है..! बल्कि सारे हिंदुस्तानी कामगार नक्काशी और बाकी काम कर रहे थे और राजा साहब ने मजदूरी करने के लिए भी लगभग डेढ़ सौ मजदूर अंग्रेजों के पास से यानी यूरोप से बुलवाये थे…
उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि उन्हें एक बार यूरोप ट्रिप में रोल्स रॉयस गाड़ी बड़ी पसंद आ गई थी और वह उसे यहां लेकर आना चाहते थे लेकिन भारतीय रास्तों की दुहाई देकर गाड़ी के मालिक ने गाड़ी हिन्दुस्तान भिजवाने से मना कर दिया था… तब उन्होंने एक के बाद एक लगभग 11 रोल्स रॉयस खरीदी थी और यहाँ अपने महल के मुख्य कर्मचारियों को वह गाड़ियां मुफ्त बांट दी थी…
उसमें से उन्होंने एक भी अपने उपयोग के लिए नहीं रखी थी.. ! ऐसे ठाट थे हमारे ठाकुर विजय राघव हुकुम के…
” अभी के तुम्हारे राजा जी..
दर्श के बस इतना कहते ही ड्राइवर उछल पड़ा..
” अभी तो हमारे राजा है राजा अजातशत्रु सिंह बुंदेला हुकुम सा ! उनकी बराबरी तो इस पूरे संसार में कोई नहीं कर सकता ! उनके जैसा राजा ना आज तक आया और ना कभी आएगा ! उनकी दादी साहेब हमेशा काम करती हैं कि, उन्हें राजा अजातशत्रु में उनके ही दादा सा की झलक दिखाई देती है…
कहा जाता है राजा अजातशत्रु की तरह ही उनके दादा सा हुकुम भी अति शूरवीर पराक्रमी, कभी किसी से नहीं डरने वाले और बुद्धिमता से हर निर्णय लेने वाले थे…
बस उन्हीं का पुनर्जन्म है राजा अजातशत्रु सा ..
हमारे राजा साहब ऐसे हैं कि उनसे जो एक बार मिल लेता है वह फिर उन्हीं का हो जाता है…
ड्राइवर का राजा अजातशत्रु पुराण सुनकर अनिरुद्ध बाहर की तरफ देखने लगा…. उसे महल की सुंदरता सम्मोहित करती जा रही थी….
ऊंची मीनारों और गुंबद से सजा महल वाकई यूरोपियन शैली का एक अद्भुत नमूना दिख रहा था… और जितना सुंदर महल था उसी से टक्कर लेती महल के सामने की बगिया थी… बगिया के बीचों बीच एक खूब सुंदर सा तालाब बनाया गया था.. जहां पर ढेरों कमल खिले थे… कई सारस इधर से उधर तैर रहे थे.. बगीचे में भी घने पेड़ों के झुरमुट में मोर नाचते हुए नजर आ रहे थे…
उस पूरे परिसर में अगर किसी का शोरगुल था तो वह सिर्फ पंछियों का था…! पंछियों का कलरव और उनका चहचहाना उस पूरे परिसर को एक अद्भुत सुंदरता और आत्मिक शांति से सराबोर कर रहा था….
ऐसा लग रहा था जैसे उस महल और उस बगीचे में एक पवित्र सुंदरता का घेरा फैला हुआ है…
अपने विचारों में गुम अनिरुद्ध की पलकें नहीं झपक रही थी…
वह महल की सुंदरता आंखों ही आंखों में पीता बैठा था, कि गाड़ी एक झटके से सीढ़ियों के सामने रुक गई…
ऊंची ऊंची सीढ़ियां लगभग 25 से 30 की संख्या में थी.. ड्राइवर ने रुक कर उन दोनों के लिए दरवाजा खोल दिया.. दर्श, अनिरुद्ध गाड़ी से नीचे उतर आए..! लेकिन उन लोगों को नहीं मालूम था कि उनके पहुंचने से पहले ही उनके स्वागत के लिए महल पूरी तरह से तैयारी कर चुका था..
दर्श को यही लगा था कि जैसे वह किसी के सामान्य क्लाइंट से मिलने जाते हैं, वैसा ही कुछ यहां भी होगा…. लेकिन वह भूल गया था कि वो राजा अजातशत्रु का मेहमान बन कर आ रहा है..
और यह महल अपने मेहमानों को हमेशा भगवान की तरफ पूजता आया है…
अनिरुद्ध और दर्श की नजर सीढ़ियों से ऊपर खड़े युवकों पर पड़ी…
वहां तीन लोग एक साथ खड़े थे और उनके पीछे खड़ी थी नौकर चाकरों कि फ़ौज…
दर्श और अनिरुद्ध ने एक दूसरे की तरफ देखा और सीढ़ियों पर चढ़ने वाले थे कि एक नौकर भागता हुआ आया और उन लोगों के सामने से एक लाल गलीचा बिछाता हुआ आगे बढ़ गया… उस गलीचे पर पैर रखते हुए वह लोग चढ़कर ऊपर चले आए….
उन लोगों के ऊपर पहुंचते ही महल के स्टाफ में से एक महिला ने आगे बढ़कर उन दोनों की आरती उतारकर उनके माथे पर तिलक लगा दिया…
यह इस महल का एक रिवाज था जो सदियों से चला रहा था.. और यह सिर्फ घर के सदस्यों ने नहीं बल्कि बाहर से आए अतिथियों के लिए भी निभाया जाता था..!
हां इसी शहर में रहने वाले अतिथि जिनका लगभग रोज का आना जाना था उनके लिए भले ही यह कायदे नहीं किए जाते हों लेकिन दूर शहर से आने वाले कुछ विशेष अतिथियों के लिए यह नियम आज भी महल में उसी तरह चलाए जा रहे थे जैसे इतने सालों से चलते रहे थे….
सामने खड़े तीनों युवकों को देखते हुए अनिरुद्ध और दर्श सोच में पड़ गए थे क्योंकि वह इनमें से किसी को नहीं जानते थे.. दर्श ने उसी वक्त अपना फोन निकाला और सामने खड़े व्यक्ति से कुछ कहने ही जा रहा था कि सामने खड़े लंबे चौड़े, स्मार्ट से दिखने वाले दर्श की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया …
‘ हेलो मैं समर हूं..! शायद आप ही से मेरी बात हो रही थी आई गेस, आप दर्श हैं ! और यह हैं मिस्टर अनिरुद्ध वासुकि.. !”
” दर्श ने मुस्कुराकर हां में सिर हिलाया और दर्श और अनिरुद्ध ने बारी-बारी से समर से हाथ मिला लिया… समर के साथ ही खड़े एक दूसरे सजीले से नवयुवक ने आगे बढ़कर वासुकी की तरफ एक फूलों का गुलदस्ता बढ़ा दिया…
वासुकी को इस तरह फूलों का लेना देना अजीब लगता था, लेकिन रियासत का कायदा हो सकता है यह सोच कर उसने चुपके से उन फूलों के गुलदस्ते को थाम लिया…
” आपकी तारीफ..?
वासुकी के सवाल पर समर ने चुटकी काटी…
‘ इनकी तारीफ भी मैं ही कर देता हूं, क्योंकि यह अपनी तारीफ करने में अक्सर शरमा जाते हैं.. यह हमारे यहां के सिक्योरिटी मिनिस्टर और हेड ऑफ सिक्योरिटी हैं प्रेम सिंह चंदेल.! और इनके साथ ही खड़े हैं राजकुमार आदित्य सिंह बुंदेला ! राजा साहब के छोटे भाई हैं और फिलहाल राजा साहब का सारा फिनेंस यही देख रहे हैं… राजा साहब की कैबिनेट में भी यह मंत्री के पद पर काम कर रहे हैं.. !
दर्श समर और बाकी दोनों से पूरी तरह से इंप्रेस नजर आ रहा था… लेकिन वासुकि की नजर उन तीनों से परे हटकर महल की खूबसूरती पर ही टिकी हुई थी…
उसे वैसे भी यह पुरानी तरह की नक्काशीदार दीवारें, जालियों वाली रंगीन खिड़कियां.. रंग-बिरंगे कांच से सजे दरवाज़े, पुरानी तरह की गुंबद से सजे महल मीनारें बहुत पसंद आती थी…
… आज ऐसा लग रहा था जैसे उसका कोई पुराना सपना पूरा हुआ था…!
समर प्रेम और आदित्य ने भी इस बात को नोटिस कर लिया था कि अनिरुद्ध वासुकी का पूरा ध्यान सिर्फ महल पर ही लगा हुआ है…. समर ने मुस्कुरा कर दर्श के सामने अपने मन की बात रख दी…
” राजा साहब चाहते हैं कि हवेली के बारे में विचार करने के पहले आप लोग कम से कम एक पूरा दिन हमारे मेहमान बन कर रहे .!”
” लेकिन हमारी तो वापसी की टिकट भी हो चुकी है.. शाम 6 बजे हमारी वापसी की फ्लाइट है..!”
” वह तो बाद में देखा जाएगा… आप की कल की फ्लाइट करवा दी जाएगी.. अगर आप दोनों रुकना चाहे तो !
पर हम लोगों का यही कहना है कि अगर आप इतनी दूर से आए हैं तो इस महल को, इस विरासत को एक बार घूम कर तो देखिए उसके बाद चले जाएगा क्या पता फिर कब आना हों …?”
” वासुकी का वाकई यहां से जाने का कोई मन नहीं था.. उसे तो देख कर लग रहा था जैसे यह महल उसे किसी ना किसी बहाने से बुला रहा था ! और अब इस महल में पहुंचने के बाद वासुकि किसी तरीके से भी यहाँ से नहीं जाना चाहता…
समर की बात पर वासुकि ने मुस्कुराते हुए धीमे से गर्दन हिला कर मंजूरी दे दी और दर्श उसे देखता रह गया…
” आप लोग फ्रेश हों लें… .. राजा साहब अपने ऑफिस में आप लोगों का इंतजार कर रहे हैं..?
” अगर राजा साहब वाकई ऑफिस में पहुंचकर हम दोनों के ही आने का इंतजार कर रहे हैं, तो हम दोनों को भी कमरे में जाकर फ्रेश होने की जरूरत नहीं है..! हम दोनों ऑलरेडी फ्रेश हैं….
वासुकि के ऐसा कहते ही समर ने मुस्कुरा कर हाँ में गर्दन हिला दी…
आदित्य ने आगे बढ़ कर उन लोगों को दरवाज़े कि ओर इशारा कर दिया…
“हमारे महल में आपका स्वागत हैं… !”
उन तीनो के साथ कदम मिलाते वासुकि और दर्श भी आगे बढ़ गए….
उस आलीशान महल में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना भी इतना आसान तो था नहीं.. हालाँकि महल के अंदर भी ग्राउंड फ्लोर पर एक छोटी गाड़ी की व्यवस्था थी जिसके लिए समर के पूछने पर वासुकि और दर्श ने मना कर दिया… और उन लोगों के साथ पैदल ही आगे बढ़ गए…
वो लोग आगे बढ़ रहें थे कि तेज़ी से भागता एक प्यारा सा बच्चा आया और अपनी रफ़्तार के कारण समर से टकरा गया…
“अरे कुमार.. ! सम्भल के वरना गिर पड़ेंगे.. !”
पर समर कि बात पर खिलखिला कर हँसते हुए वो उन लोगों के पीछे छिपने कि कोशिश करने लगा और आदित्य के पीछे वो जम कर खड़ा हों गया, तभी बिलकुल किसी आम माँ कि तरह उसके पीछे भागती हुई बांसुरी वहाँ चली आयी….
सुनहरी गोटा ज़री जड़ी हुई पीले रंग की पोशाक में एक हाथ से अपना लहंगा थामे शौर्य के पीछे भागती बांसुरी को देख कोई नहीं कह सकता था की ये किसी जिले की जिलाधीश थी…
अपने ऑफिस में सदा प्योर सिल्क की साड़ियों के साथ अपने स्ट्रेट बालों को खुला छोड़े एक हाथ में घडी और दूसरे में सिर्फ एक मोटा सा सोने का कड़ा पहने रहने वाली बांसुरी आज महल से मैच करते अपने वस्त्र आभूषणों में दमक रहीं थी…
कुछ पलों के लिए वासुकि की साँसे थम कर रह गई…बांसुरी को अपने इतने करीब देख कर उसकी टाँगे कांप रहीं थी….
ऐसा लग रहा था जैसे सांसो के आने जाने का मार्ग किसी ने अवरुद्ध कर दिया था.. कुछ तो था जो गले में आकर अटकने लगा था…
एक भीनी सी खुशबु उसके चारों ओर फैलने लगी थी.. और उस महक में वो डूबता चला जा रहा था…
” आदित्य उस दुष्ट को मेरे हवाले कीजिये… ये बिना खाये पिए सुबह से मुझे हैरान किये हैं.. !”
” भाभी साहेब ! ये अगर आपके हाथ नहीं आ रहा तो और किसके हाथ आएगा.. !”
आदित्य के ऐसा बोलते तक में शौर्य उन लोगों के बीच से निकाल कर आगे भाग गया और बांसुरी बिलकुल किसी साधारण माँ की तरह उसे आवाज़ देती उसके पीछे भागती चली गई….
वासुकि ने एक गहरी सी साँस ली और उसे लगा की अब उसकी जान में जान वापस आ गई…
समर और बाकी लोग आगे बढ़ गए की आगे बढ़ता दर्श थम कर वापस मुड़ा और वासुकि को आवाज़ लगा दी…
” अनिर !! आओ चलें… !”
अनिरुद्ध जैसे नींद से जाग गया… वो तेज़ कदमों से आगे बढ़ने लगा…
समर और बाकी लोगों का उस पर ध्यान नहीं था… समर उन्हीं लोगों से मुखातिब था…
” ये हमारे नन्हे राजकुमार हैं राजा अजातशत्रु हुकुम के बेटे और हमारी इस रियासत के भावी राजा… राजा शौर्य प्रताप सिंह.. !”
वासुकि और दर्श उसकी बात ध्यान से सुन रहें थे…
” और वो कौन थी… ? “,वासुकि के सवाल पर जवाब आदित्य ने दिया…
” वो हमारी भाभी साहेब हैं.. राजा अजातशत्रु सिंह की धर्मपत्नी और रियासत की महारानी रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह !
छन से कहीं कुछ टूटा और वो लोग राजा साहेब के ऑफिस के बाहर पहुँच गए….
क्रमशः
aparna……
