जीवनसाथी 2/18

जीवनसाथी 2 भाग 18

    अनिर्वाण ने बाबूराव को जीप में बैठाया और तेजी से थाने की ओर भगा ले चला….
थाने में पहुंचते ही अनिर्वान तेज कदमों से सीढ़ियां चढ़ता हुआ भीतर दाखिल हो गया…
           स्टोव की आंच से परेशान लड़के अपनी कुर्सियों के साथ इधर-उधर गिरे पड़े थे… उन लोगों की हाथ की चाय जमीन पर फैली हुई थी और वह लोग इधर से उधर कराहते हुए चिल्ला रहे थे….

” देखा बाबूराव मैंने कहा था ना चाय खौल जाएगी… !

” आपने तो कहा था खौल खौल कर फट जाएगी….  और यहाँ देखकर वही लग रहा है.. !

      अनिर्वान ने उन चारों लड़कों को देखा और मुस्कुरा कर अपने केबिन में चला गया..

” चारों को लेकर मेरे केबिन में आओ.. !”

बाबूराव  से ऐसा बोल कर वो जाकर अपनी कुर्सी में बैठ गया…

  उन चारों लड़कों को साथ लिए बाबूराव अंदर चला आया.. चारों के चेहरे पर पीड़ा झलक रही थी… चारों सामने बैठे अनिर्वान को घबराई नज़रों से देख रहे थे..

“हाँ तो छोटे बैठ जा… !”

अनिर्वान ने उसी लड़के को बैठने कहा,  और उस लड़के के चेहरे पर अजीब से भाव आ गए.. वो चुपचाप खड़ा ही रहा…

अनिर्वान ने उसे आँखों से ही बैठने का इशारा किया,  और वो तब भी खड़ा रहा…

“बहुत ज़िद्दी है यार तू.. अगर मैं तुझे बैठाने के लिए उठ गया न तो पता नहीं फिर…

अनिर्वान की धमकी पूरी होने से पहले एक हवलदार ने उस लड़के को पकड़ कर कुर्सी पर बैठा दिया… और उसके बैठते ही वो लड़का तड़प कर अपनी सीट से उछल पड़ा…

“अरे मैं तो भूल ही गया था,  चाय लगता है ज्यादा खौल गयी…

उस लड़के के चेहरे पर अब भी माफ़ी वाले कोई भाव नहीं थे, वो अब भी अनिर्वान को ज़रा नाराजगी से देख रहा था..  अनिर्वान ने आगे बढ़ कर उसकी बांह पकड़ी और उसे अपने सामने बैठा दिया.. उसे देख बाकी लड़के भी जैसे तैसे बैठ गए….
    अनिर्वान ने उस पहले वाले लड़के की हथेली अपने हाथ में ले ली…

“तेरे बाप से मिल कर आ रहा हूँ, और अब अच्छे से समझ आ गया है की तू ऐसा क्यों है.. ? जब पैदाइश में ही खोट… “

“ज़बान संभाल के बात कीजिये… वो लड़का बिफर गया…

“मैं कोई काम संभाल के नहीं करता.. यहीं तो खासियत है मेरी !  और वैसे तू कौन सा सम्भला रखा है ?  जहाँ मिली बाप की अकूत दौलत निकल पड़े सुट्टा फूंकने.. अबे सालों अपना कलेजा तो फूंक ही रहे हों, अपने आसपास रहने वालो का भी फूंक रहे हों… क्या जानवर क्या इंसान…
अब आता हूँ मैं मुद्दे पर… ये ड्रग्स खरीदते कहाँ से हों.. ?

उन चारों में से किसी ने जवाब नहीं दिया…

“बाबूराव सिगरेट जलाओ भई.. बेचारों को चाय पीने के बाद तलब लगी होगी…..

बाबूराव ने आश्चर्य से अनिर्वान की ओर देखा… -“साहब.. ?”

“अरे हाँ,  सच्ची मुच्ची की सिगरेट जलाओ,  इन मम्मी के मगरमच्छो ने अपनी तशरीफ़ पर चाय पकाई है.. जल भून गए होंगे.. अब ज़रा सिगरेट फूंक लेंगे तभी तो इनके कलेजे को ठंडक मिलेगी… क्यों बच्चो, सही कहा न अनिर्वान अंकल ने.. !”

बाबूराव अनिर्वान की बातों और स्टाइल का इन कुछ ही दिनों में ज़बरदस्त फैन हों रखा था…

“अरे आप और अंकल..?  कहाँ साहब…?  इन लड़कों से मुश्किल से पांच छः बरस बड़े होंगे… “

“सही कह रहे हों बाबूराव….. वैसे रिश्ते में तो हम इन सबके बाप लगते है लेकिन नाम है अनिर्वान !और दूसरी बात ऐसी गलीच औलाद देख कर ऐसी उलटी आती है की दिल करता है कभी शादी ही न करें.. क्या बोलते हों बाबूराव.. ?”

“नहीं साहब ऐसी बात नहीं है.. आप जैसे सुन्दर नौजवान को शादी करनी ही चाहिए.. तभी तो आपके जैसे सुंदर सुंदर बच्चे हमें खिलाने को मिलेंगे.. !”

“बाबूराव तुम्हारा बच्चे खिलाने का बड़ा मूड होता है आजकल.. चलो आओ फिर बच्चे खिलाते है…” बाबूराव ने सिगरेट जला कर अनिर्वान के हाथ में पकड़ा दी…

अनिर्वान ने चारों को घूर कर देखा और उनमें से एक जो सबसे ज्यादा घबरा रहा था का हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया…
   
“ना मुन्ना डर मत !  तेरा हाथ नहीं जलाऊंगा.. !”

वो लड़का घबरा कर अनिर्वान को देखने लगा…

“ये तू सही नहीं कर रहा है.. अभी मेरे डैड आएंगे और….

उस पहले वाले लड़के के ऐसा कहते ही एक ज़ोरदार थप्पड़ उसका मुँह लाल कर गया…. अनिर्वान के हाथ में पहनी अंगूठी की हलकी सी छाप उसके गाल पर उभर आयी,  और एक बहुत पतली सी खून की धार बह चली……

“नाम क्या है बे तेरा… ?” अनिर्वान के सवाल पर वो उसे घूरते हुए उठ बैठा…

“पहला तो मुझसे कोई तू तड़ाक में बात करें बर्दाश्त नहीं होता, दूसरा तुम जैसे रईसज़ादे जो अपनी ज़िन्दगी में बाप का पैसा उड़ाने के अलावा और कुछ करते नहीं से मुझे टूट कर नफरत होती है…
वैसे बाबूराव, गाँधी जी क्या कहते थे मालूम है.. ?”

“साहब वो थप्पड़ वाला.. ?

“अरे नहीं जी, वो वाला नहीं नफरत मुहब्बत वाला..! गाँधी जी कहाँ करते थे पाप से घृणा करो पापी से नहीं.. लेकिन ये लोग अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आ रहे… “

अनिर्वान को धुंए के कारण हलकी सी खांसी आने लगी.. तो बाबूराव उसके हाथ से सिगरेट लेने चला आया.. और हाथ ऊपर उठा कर अनिर्वान ने उसे रोक दिया…

” वैसे बाबूराव तुमने जो बताया वो वाला भी मस्त है.. गाँधी जी कहते थे अगर कोई एक गाल पे थप्पड़ मारे तो उसके सामने दूसरा गाल भी कर दो.. अब ये उल्लू तो गाँधी जी की बात मानेगा नहीं और सीधे तरीके से नाम बताएगा नहीं, पर हम तो अहिंसा वादी है, हम मानेंगे गाँधी जी को … “

अनिर्वान ने आगे बढ़ कर उसके दूसरे गाल पर भी थप्पड़ मार दिया.. एक बार फिर उसके गाल पर एक अजीब सी छाप उभर आयी…..

“रौनीsssssss. !” वो लड़का ज़ोर से चीख कर अपना नाम बता गया… मैं रॉनी हूँ,  इसका नाम मल्हार है,  ये विलियम और वो जयेश !
  मेरे पापा मायानगरी हॉस्पिटल में डीन है, मल्हार के पापा कैबिनेट में है,  विलियम और जयेश के पापा का फार्मा का बिज़नेस है..

” और तुम लोगों को ड्रग्स की सप्लाई कौन करता है… ?”

अब ये चारों लड़के एक दूसरे का मुहं देखने लगे…

“बता दो बच्चो… ?”

“हमें नहीं पता.. जब भी चाहिए होती है.. एक नंबर पर कॉल करना रहता है, वहीँ से मिल जाती है.. ?”

अब ये सारी बातें रॉनी और अनिर्वान के बीच हों रही थी.. बीच बीच में अनिर्वान की नज़र जयेश पर भी थी…
  वो कुछ ज्यादा ही घबराया सा लग रहा था…

  “वो नंबर दो… !”

“हर बार नंबर बदल जाता है… !”

अनिर्वान ने रॉनी को बड़ी प्यार भरी नजरों से देखा…

” डीन के बेटे हों लेकिन मेडिकल कॉलेज में नहीं पहुँच पाए क्यों.. ?”

“इंटरस्ट नहीं था डॉक्टरी पढ़ने में… !”

अनिर्वान के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान चली आयी…

“बेटा तेरे बस की नहीं थी डॉक्टरी, वरना तेरे बाप ने तीन साल तक पूरी कोशिश की थी कि किसी तरह तुझे मेडिकल में घुसा दें… आखिरी बार किसी नकली नाम से एंट्रेंस भी दिलवाया गया था न !”

रॉनी सकपका कर सामने बैठे अनिर्वान को देखने लगा….

” अनिर्वान भरद्वाज नाम है मेरा.. पंडित हूँ, सामने बैठे लोगों का माथा पढ़ लेता हूँ…. !”

  अनिर्वान ने जयेश कि तरफ सर घुमा लिया…

” तेरा नाम क्या बताया था बच्चे.. ?”

“जय.. जयेश सर… !”

“पूरा नाम बोल… !”

“जयेश सिक्कावाला.. !”

“गज़ब.. ! जब नाम में ही सिक्कों की खनक है, तो काम में तो खूब पैसा होगा… तेरे फादर कि फार्मा कम्पनी है… ? है न.. ?

” जी सर… !”

“दवाएं बनाते हैं और दूर दूर तक बेचते भी हैं… ?”

“जी सर !”

“अभी उनका सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट किसके साथ चल रहा है.. नाम जानता है… ?”

जयेश ने धीमे से हाँ में सर हिला दिया…

“किसके साथ… ?”

“कोई अनिरुद्ध वासुकि है… !”

अनिर्वान के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आयी और किसी के देखने से पहले ही चली गयी…

“अब एक छोटा सा पर्सनल सवाल.. जयेश सिक्कावाला से… !”

“जी सर.. !”

“तेरी गर्लफ्रेंड का नाम क्या है… ?”

जयेश आंखे फाड़े अनिर्वान को देखने लगा…

” जल्दी बता…. ?

“सर मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है… !”

“सच्ची… ?”

“हाँ सर.. ! किसी से भी पूछ लीजिये…. !”

  अनिर्वान ने बाबूराव के हाथ से सिगरेट ली और जयेश के माथे के पास के बालों को पीछे कर सिगरेट वहाँ छुआ दी.. वो तिलमिला कर चीख उठा…

“अरे मार डालेंगे क्या सर.. !”

रॉनी कि चीख पर अनिर्वान ने मुस्कुरा कर उसे देखा और बाबूराव कि तरफ घूम गया…

” देखा बाबूराव लातों के भूत बातों से नहीं मानते.. यहीं कुछ देर पहले तू तड़ाक पर था और एक छापा लगते ही सर बोलने लगा.. आई लाइक इट !”

“जी साहब ! आई टू लाइक इट !” बाबूराव भी ताल से ताल मिला गया

” बोल बेटा जयेश… अपनी गर्लफ्रेंड का नाम बता.. !”

अब तक जयेश एक बार फिर अपने को बचाने में आ गया था…

“सर बोला तो कोई नहीं….

उसका उतना कहना था कि अनिर्वान ने उसके माथे के दूसरी तरफ सिगरेट लगा दी….
वो बिलबिला कर चीख उठा…. -” अदिति… अदिति ताम्रकार नाम था सर.. !”

अनिर्वान ने मुस्कुरा कर सिगरेट बाबूराव के हाथ में वापस दें दी….

“ये वही लड़की है न जो मायानगरी मेडिकल हॉस्टल में मरी पायी गयी थी… !”

“लेकिन साहब वो केस तो सुलझ गया था… ?” बाबूराव के ऐसा कहते ही अनिर्वान ने उसकी तरफ देखा…

“पूरी तरह नहीं सुलझा था बाबूराव ! तभी तो मुझे बुलाया गया है…. अब अनिर्वान भरद्वाज आ गया है.. अब सिर्फ यहीं नहीं बाकी के केस भी सुलझते चलें जायेंगे… !”

“इन चारों का क्या करना है सर.. ?”

“इनके बाप लोगों के जमानत लेकर आते तक में ठूंस दो सालों को कोठरी के अंदर…. बहुत गर्मी है न इनके अंदर अब हमारे थाने की गर्मी इनकी गर्मी बाहर निकाल देगी… ! तुममे से किसी के हाथ में खुजली मची हों तो हाथ साफ कर लो.. !”

  उन चारों को हवलदार अपने साथ बाहर के गया… उन सब के बाहर जाते ही बाबूराव अनिर्वान की तरफ घूम गया…

“अब समझ आया साहब, की आप इन लोगों को ऐसे टॉर्चर क्यों कर रहे थे.. वही मैं सोचूं की सिर्फ ड्रग्स लेना ऐसा कौन सा गुनाह हों गया…

“सिर्फ ड्रग्स लेना भी बहुत बड़ा गुनाह है बाबूराव.. आपको अगर ऊपर वाले ने मानव शरीर दिया है, तो किसी इंसान के या समाज के काम आना आपका फ़र्ज़ हों जाता है.. चलो आप किसी के काम नहीं भी आ रहे तो कम से कम भगवान के दिए इस अनमोल उपहार का मान तो रखो… इसी की साज संभाल कर लो.. पर नहीं.. ये लड़के पैसों की जगमगाहट में खुद को खो बैठते हैं… और ये साले सिर्फ खुद ड्रग्स लेते हैं ऐसा नहीं है ये ड्रग पेडलर भी है.. और यहीं बात मेरा पाव भर खून जला गयी….
   अब इस खून की भरपाई के लिए… !”

“खून पिएंगे क्या सर… ?” बाबूराव ने मज़ाक में हँसते हुए कहा और अनिर्वान की एक भौंह ज़रा ऊपर को उठ गयी…

“आइडिया तो ज़बरदस्त दिया है बाबूराव ! लाओ भई स्ट्रा लेकर आओ.. अब ड्रैकुला की तरफ उन लड़कों की गर्दन पर दांत गड़ा दूँ अच्छा भी तो नहीं लगेगा न…

  अनिर्वान की बात पर बाबूराव और अनिर्वान के कहकहे बाहर तक गूंजते चलें आये और बाहर खड़े चारों लड़के सहम कर एक दूजे को देखने लगे…..
  उन लोगों ने सामने खड़े हवलदार को देखा, वो न में गर्दन हिलाने लगा…

“कोई भरोसा नहीं है.. बहुत बड़ा सनकी है ये…. पिछली बार दो लड़कों कि उँगलियाँ समोसे कि जगह तल कर खा गया था.. !”

ये बात सुन कर जयेश को उबकाई सी आने लगी…  वो एक तरफ को झुकने को था कि एक दूसरा हलवलदार उसे खींच कर दरवाजे से बाहर ले गया…

रॉनी ने आंखे फाड़ कर हवलदार की ओर देखा…

“तुम पागल हों गए हों क्या… ?”

“हम नहीं वो जो अंदर बैठा है न वो पागल है पूरा पागल !. महादेव का भक्त है.. अवधूत है पूरा.. सुना है रात रात भर मसान में धूनी रमाता रहता है इसलिए देखा नहीं कैसा कद्दावर है… अगर तुम्हारा चेहरा अपनी एक हथेली में पकड़ कर दबा दिया उसने न तो तुम्हारे उस चेहरे का कचूमर बन जायेगा…
   सुना है कोई बहुत बड़ा मुजरिम इन की कैद से भाग निकला था… उसे 24 घंटे के अंदर पकड़कर सजा दिलाने की इसने कसम खाई थी, और उसके बाद जब तक इन्होने उस मुजरिम को पकड़ नहीं लिया, खाना पीना छोड़ दिया था… और उस 24 घंटे के अंदर अंदर इन्होने उस मुजरिम को पकड़ा और गुस्से में उसे अपनी बाहों से किस कदर लपेटा की उस की हड्डियां चटक गई…
    सुनने में तो यह भी आया था कि, इसने अपने दोनों हाथों से उस मुजरिम के शरीर को बिल्कुल गीले कपड़े की तरह निचोड़ कर रख दिया था, और उसके बाद उसे जेल के हवाले कर दिया… अब उस मुजरिम की हालत यह है कि ना उसकी गिनती मुर्दों में है और न ज़िंदा में….
इस से पंगा लेने वालों का यही हाल होता है… पुलिस डिपार्टमेंट में अफवाह है की ये ड्रैकुला का पुनर्जन्म है……
    दिखने में ही बस सुन्दर है, पर है बहुत खतरनाक… इसके बारे में यह भी कहा जाता है, की ये एक बार जिस मुजरिम के पीछे पड़ गया उसे ऐसे ऐसे तरीको से तंग कर देता है की वो खुद मौत की भीख मांगने लगता है… “

“डरा क्यों रहे हों अंकल.. !”

जयेश ने बड़ी मुश्किल से अपने सूखे गले को तर करते हुए कहा…

“मैं क्यों डराउँगा भाया.. हम सब खुद डर के साये में जी रहे हैं कि कब ये अघोरी कोई नया कांड कर दें… !”

उसी वक्त बाबूराव बाहर चला आया….

“क्या गणपत बच्चो को डरा रहा है क्या… समोसे के साथ ऊँगली वाला किस्सा मत सुना देना… !”

बाबूराव बोलते बोलते बाहर निकल गया… -“ए छोटू !!बढ़िया चाय ले आ साहब के लिए.. ! एकदम कड़क लाना बिलकुल साहब के जैसी…. !”

बाबूराव ने पलट कर देखा.. सलाखों के भीतर उन चारों के चेहरे पर डर साफ़ झलक रहा था….
  और साथ ही झलक रह था रॉनी के गाल पर एक अजीब सा निशान !!

******

   अनिरुद्ध और दर्श घर आ चुके थे…. उन लोगों कि निकलने कि पूरी तैयारी थी कि अनिरुद्ध ने दर्श को इशारा किया और अनिरुद्ध कि बात को समझ कर दर्श ने कहीं फ़ोन घुमा दिया….

  कुछ ज़रूरी बातें करने के बाद उसने फ़ोन रख दिया… कि थोड़ी ही देर में अनिरुद्ध के नंबर पर फ़ोन  आने लगा…
    अनिरुद्ध बाहर से आने के बाद नहाने चला गया था… नहाकर सफेद शर्ट ब्लू डेनिम पर पहने वो  सीढ़ियों से उतर रह था,  उधर से उतरते हुए वह अपनी कमीज की बाहें को कुहनी तक मोड़ता भी जा रहा था.. कि तभी नीचे रखे उसके मोबाइल पर किसी का फोन आने लगा,!  उसने काका को आंखों के इशारे से फोन उठा लेने को कहा और काका ने फोन उठा लिया…
फोन पर बात करते ही  काका के चेहरे का रंग उड़ गया… उन्होंने एकदम से दर्श की तरफ देखा और फिर अनिरुद्ध की तरफ देखने लगे…

” पालेकर के घर से उनके सेक्रेटरी का फोन था, उनका बेटा नहीं रहा..!”

अनिरुद्ध ने हां में सर हिलाया और दर्श को देखकर आगे बढ़ गया…
  दर्श भी गाड़ी कि चाबी उठाये उसके साथ निकल गया… उन दोनों के साथ काका भी निकल गए

कुछ देर में ही वह लोग पालेकर के घर के गार्डन में थे..
तेज कदमों से आगे बढ़ते हुए अनिरुद्ध पालेकर के पास पहुंच गया..
पालेकर के चेहरे पर नाराजगी के साथ ही दुख भी झलक रहा था.. उसके बाकी के लड़के उसके आसपास ही मौजूद थे… पूरे घर भर में लोगों की भीड़ मौजूद थी…
अनिरुद्ध ने जाकर पालेकर के कंधे पर अपना हाथ रख दिया… 
   पालेकर ने अनिरुद्ध की तरफ एक गहरी नजर से देखा और अपना सर झुका लिया….

” मैंने तुमसे कहा था ना वासुकि,  वह लड़की बहुत चालाक है… पुलिस थाने गई थी और उसी के भड़काने पर इतना सब हुआ…!”

” आपसे किसने कहा..?”

” थाना इंचार्ज ने कहा कि वह लड़की अपनी मां के साथ आई थी और राहुल के खिलाफ उटपटांग अनाप-शनाप बकने लगी.. राहुल गुस्से में आ गया उसने पुलिस वाले की गन निकाली और उसी हाथापाई में राहुल के ही हाथ से चली गोली से वह खुद…
इसके आगे पालेकर कुछ नहीं कह पाया… वासुकी ने वही सामने खड़े थाना इंचार्ज की तरफ देखा.. थाना इंचार्ज हाथ बांधे चुपचाप उसे ही देख रहा था…

” ऊपर वाले के इंसाफ के आगे हम सब नतमस्तक हैं…
जो जैसा बोएगा वैसा ही काटेगा आप धैर्य रखें पालेकर जी अब मैं निकलता हूं, मेरी फ्लाइट का समय हो गया है….!”

  पालेकर  ने बिना वासुकी की तरफ देखे ही अपने हाथ जोड़ दिए…
   उनके कंधे पर हाथ रखकर वासुकी और दर्श वहां से बाहर निकल गए….

” दर्श यहाँ से सीधे एयरपोर्ट की तरफ गाड़ी ले लेते हैं..!”

”  काठी से लौट रहे हैं आप लोग… घर चल कर नहाएंगे नहीं…?”

काका भी दर्श अनिरुद्ध के साथ थे…  उनके सवाल पर अनिरुद्ध ने उन्हें देखा और मुस्कुरा उठा…

” मैं तो घर से नहा कर ही निकला था,  और यह दिन भर में 1 बार नहा लेने के बाद दोबारा पानी और साबुन को अपने ऊपर बर्बाद नहीं करता, क्यों दर्श… ?”

” लेकिन काठी से लौटने के बाद नहीं नहाने से कहा जाता है कि भूत चिपट जाते हैं..!

” हम दोनों खुद भूत हैं… अगर हम किसी से चिपक जाए तो वह अगले किसी जन्म में पैदा ही नहीं होना चाहेगा..!  इसलिए कक्का डरो मत,आप एयरपोर्ट की तरफ गाड़ी भगा दो…

काका ने “तुम दोनों का कुछ नहीं हों सकता” वाले भाव से ना में गर्दन हिलाई और गाड़ी चलाने लगे…
उसी वक्त अनिरुद्ध का फोन बजने लगा.. उसने देखा किसी अननोन नंबर से फोन आ रहा था उसने फोन उठा लिया दूसरी तरफ नेहा थी….

” वासुकी मैं नेहा बोल रही हूं…!”

अनिरुद्ध वासुकि के चेहरे पर एक गहरी सी शातिर मुस्कान छा गई…

” बड़ी देर कर दी फ़ोन करने में… !”

” तुमसे अभी मिलना चाहती हूं..!”

” कहीं बाहर जा रहा हूं, नहीं मिल सकता…  वापस आने के बाद मिलता हूं..!”

” पक्का..!! मिलोगे ना..!”

“हम्म !”

वासुकि ने फ़ोन रखा और दर्श और वो एक दूसरे को देख मुस्कुरा उठे….

रास्ता लम्बा था, दर्श ने रेडियो ट्यून कर दिया और अनिरुद्ध ने पीछे सर टिका कर आंखे मूंद ली…

     देखो छोड़ के किस रस्ते वो जाते हैं
     सारे रस्ते वापस मेरे दिल को आते हैं
      नहीं सामने, ये अलग बात है……
     मेरे पास है तू, मेरे पास है…
      मेरे साथ है……

क्रमशः

aparna…..

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