जीवनसाथी- 2/15


जीवनसाथी 2 भाग -15

      अनिर्वान ने कॉलर पकड़ कर उस लड़के को एक तरफ कर दिया…

” चलो भाई बाबूराव, इस नमूने को बनाने वाले से मिल कर आते है… !”

अनिर्वान आगे बढ़ा ही था कि वो चारों लड़के भी उसके साथ आगे बढ़ने लगें… कि उसने पलट कर उन सब को हुड़क दिया…

” मैं अकेला जा रहा हूँ तुम्हारे पालनहार से मिलने,  तब तक तुम लोग हमारी मेहमाननवाज़ी के मजे लो… बाबूराव बाकी स्टाफ को अलर्ट कर दो,  इन लोगों को किसी तरह की कमी न होने पाए.. “

अनिर्वान ने पलट कर उन लड़को को एक ज़हरीली सी मुस्कान दी और आगे बढ़ गया… बाबूराव एकदम से उसकी बात का मतलब नहीं समझ पाया…

” साहब क्या सच में इन लोगों की खातिरदारी करनी है.. ?”

” हां भाई बिल्कुल खातिरदारी करनी है, लेकिन तुम्हारे तरीके की नहीं मेरे तरीके की…. सब लड़कों को चाय पिलाओ… !”

डीन का बेटा अपने चेहरे पर गर्व की भावना लिए अपने बाकी दोस्तों को देखने लगा… उसे लगा उसके बाप का नाम सुनकर अनिर्वाण उन लोगों को चाय पिलवा रहा है…
लेकिन बाबूराव के चेहरे पर असमंजस भरे भाव थे… क्योंकि अब तक अनिर्वाण के साथ रहते हुए वह इतना तो समझ चुका था कि इन लड़कों को अनिर्वान चाय  तो नहीं पिला सकता,  उसने सवालिया नजरों से उसकी तरफ देखा और अनिर्वान मुस्कुराने लगा…

” तुम तो मेरी बात समझ ही गए होगे बाबूराव.. ?”

” साहब कुछ कुछ समझ तो गया हूं, लेकिन आप शब्दों में बोलकर बता देंगे तो और भी ज्यादा क्लियर और ज्यादा आसानी हो जाएगी.. “

” यहां आस-पास चाय तो बनती है ना.. !”

” जी हुजूर.. !”

” वहां से चाय पत्ती शक्कर दूध मंगवा लो पानी हमारे थाने में मौजूद है… !”

बाबूराम ने सारा सामान मंगवा लिया…

” अब ऐसा करो बाबूराव चारों लड़कों को एक-एक कुर्सी में बैठा दो…  प्लास्टिक की कुर्सी नहीं वह टिन  वाली कुर्सी पर बैठा दो जो नीचे से जालीदार है… अब इन चारों के हाथ में स्टील के गिलास पकड़ा दो और उन में पानी चाय पत्ती शक्कर दूध सब एक साथ डाल दो..  अब तिपाई स्टोव को चारों की कुर्सियों के नीचे फिट कर दो और उसमें आग लगा दो..
   अरे ना ना मुन्ना !! घबराने की बात नहीं है इसमें आग  बहुत तेज नहीं जलती….
   धीमे धीमे आग जलती है, और वह धीमे-धीमे जलकर कुर्सियों को गर्म करेगी.. जहां पर स्टील के गिलास तुम लोगों ने पकड़ रखे होंगे, उस  वजह से तुम्हारे ग्लास गर्म होते ही तुम्हारी चाय बननी शुरू होगी और जब चाय उबलने लगेगी तब तुम इसे पी सकते हो…
      तब तक इस हॉट एटमॉस्फियर को एन्जॉय करो… ! यही कहते हो न तुम लोग अपनी रेव पार्टियों को.. एटमॉस्फियर… !” ये कह कर अनिर्वान एक खूंखार हंसी हंसने लगा..

बाबूराव और उसके साथी हवलदारों ने जैसा जैसा अनिर्वान ने कहा था वैसा ही किया… उन लोगों के बैठने के साथ ही अनिर्वान ने दीवार में ऊंचाई पर लगे कैमेरा का एंगल घुमा कर उन लड़को की तरफ कर दिया… लड़कों के हाथ पैर पहले ही उसने कुर्सी के हत्थे पर बंधवा दिए थे…

“मेरे वापस आने के पहले अगर इन लोगों की चाय नहीं बनी तो कोई इन लोगों को खोलेगा नहीं! इनकी यहाँ बैठने की शर्त यही है कि इनकी चाय बन जाए और, यह चारों लड़के अपने अपने गिलास की चाय पी जाएं |  और इनकी चाय बन गयी है तब मालूम चलेगा जब इनके हाथ में पकड़े गिलास गर्म हो जायेंगे…

सालों को पैसों की बहुत गर्मी चढ़ी है, वर्दी की गर्मी क्या होती है ये बताना ज़रूरी है इन जैसों को…

   और बिना गिलास गर्म हुए अगर ये लोग अपनी चाय ये कह कर पी गए की हमारी चाय बन गयी थी, तो इन्हे नए सिरे से नया ग्लास और पत्ती शक्कर देकर वापस चाय बनवायी जाएगी.. !  मेरी बातें मौजूद सभी लोगों को समझ में आ गई या नहीं ? अगर किसी को मेरी बात नहीं समझ में आयी और उसने मेरे बताए नियमों में कोई भी फेरबदल करने की कोशिश की तो वो  सामने लगा कैमरा इन्हीं लड़कों के ऊपर एंगल किया गया है…. जिससे मैं आराम से अपने मोबाइल पर बाहर से भी यहाँ का सारा हालचाल  देख सकता हूं…
  भई मेरे स्टाफ में मेरे जैसे सारे लोग तो मौजूद हो नहीं सकते…
     मैं मानता हूं कि मैं राक्षस हूं !  लेकिन आप सब तो इंसान हैं और वह भी बहुत बड़े दिलवाले ! तो अगर मेरे स्टाफ में किसी को भी इन लड़कों के ऊपर थोड़ा भी तरस आया और उसने इन लोगों के चाय बनवाने में कुछ भी मदद की तो वापस आकर मैं उस इंसान को भी इसी तरीके से चाय बनवा कर पिलवाऊंगा ….
    याद रखना राक्षस हूँ मैं… चलें बाबूराव.. !”

“हुज़ूर… !”

कहकर बाबूराव ने अनिर्वान को एक जोर का सैल्यूट ठोंका और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गया ! उसके आगे बढ़ते ही वहां मौजूद सारे स्टाफ ने अनिर्वान को देखकर एक बार जोर का सैल्यूट ठोंका और सारे लोग मुस्कुराते हुए उन लड़कों की चाय बनती देखने लगे अनिर्वान तेज कदमों से बाहर निकल गया….

******

पंखुड़ी और पिया बाकी स्टाफ के साथ कलेक्टर के स्वागत के लिए बाहर आ कर खड़ी हुई की कलेक्टर साहब अपनी लाल बत्ती से निकल कर बाहर चलें आये…

पंखुड़ी ने शेखर को देखा और मुस्कुरा कर रह गयी.. शेखर ने भी पंखुड़ी को देखा और मुस्कुरा कर उसके सामने हाथ जोड़ दिए…
   आगे बढ़ कर अस्पताल के बाकी स्टाफ के साथ वो अस्पताल के निरीक्षण के लिए निकल गया… पिया ने पंखुड़ी को देख उसे आगे जाने को कहा पर पंखुड़ी मुहं बना कर रह गयी….

“क्या हुआ पाखी ? तू भी जा न साथ में.. !”

“अब क्या फायदा यार.. ! उसे लड़कियों में इंटरस्ट ही  नहीं हैं … !”

“अरे हो सकता है, ये तेरा भरम हो.. !”

“लगता तो नहीं है की ये मेरा भरम है.. उधर देख सामने… “

  इस सब के कुछ देर पहले ही अनिर्वान अस्पातल के डीन से मिलने आया था… वो डीन के कमरे से कुछ बेहद ज़रूरी बात कर के निकल रहा था की सामने से आते शेखर पर उसकी नज़र पड़ी और उसने मुस्कुरा कर शेखर का अभिवादन कर दिया…
  शेखर भी इस सिरफिरे आई पी एस से पहली ही मुलाकात में खासा प्रभावित हो चुका था,  इसी से उसने भी अनिर्वान को देख उसकी तरफ हाथ बढ़ा दिया…
   अनिर्वान ने शेखर का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और दोनों ही कुछ ज़रूरी बातों में लग गए…

दूर खड़ी पंखुड़ी का मुहं लटक गया और पिया को ज़ोर की हंसी आ गयी…
पंखुड़ी ने पिया की तरफ देखा और रोनी सूरत बना ली…

“तुझे मुझ पर हंसी आ रही है.. ?”

” अरे नहीं यार.. ! मुझे इन दोनों को देख कर हंसी आ रही है.. मतलब कसम से इतने सही लौंडे भी गे हो सकते हैं इस बात पर बिलीव करना मुश्किल है….!
  बताओ इन लोगों के बारे में जब लड़कियों को मालूम चलेगा तो वो बेचारी खून के आंसू रोयेंगी.. !”

पाखी ने पिया को घूर कर देखा…

“मतलब.. ? कहना क्या चाहती है तू.. ? और किन लड़कियों की बात की जा रही है मैडम.. ?”

” एक तो मेरे ही सामने खड़ी है.. जो ऊपर से मुस्कुराते हुए अंदर ही अंदर अपने दिल जिगर कलेजे सब से रो रही है.. अच्छा सुन अभी अभी एक कविता लिख ली मैंने…
     बड़ी सख्त सी एक बंदी थी, 
     सिर्फ खाने पे जो मरती थी, 
     मरीज़ों से भी फीस के बदले
      पानीपुरी जो मांगती थी….
    एक दिन एक बंदा आया..
लड़की ने उसको खुद सा पाया..
खुशियों के मौके वो लपक गयी..
  ढेर सारे गुलाब जामुन गटक गयी..
  पर तभी हुआ अचानक एक खुलासा
   ये तो निकला कुछ कुछ वैसा सा….
   हाय री किस्मत तेरी फूटी पाखी..
   पर बांध न देना तू उसको राखी…
   थोड़ी सी रख लेना तू होप..
   हो सकता हो जाएं स्कोप.. “

“छी छी पिया,  इतनी वाहियात कविता कहाँ से लायी है यार.. !”

“खुद लिखी है अभी अभी.. भई हम कोई साहित्यकार थोड़े न है.. डॉक्टर हैं बस ! तो अगर कोई डॉक्टर लिखेगा तो यही लिखेगा न… तुझे सच्ची पसंद नहीं आयी.. ?”

‘छी बिलकुल पसंद नहीं आयी… गुलाबजामुन और गोलगप्पे के अलावा कुछ सही नहीं था तेरी कविता में.. अच्छा सुन चल कैंटीन चलते हैं.. !”

” अरे ओ भुक्कड़ डॉक्टर ! अभी कुछ देर पहले ही तूने कॉफी चट की है.. फिर से तुझे भूख लग गयी ?  समझ में नहीं आता तू इतना खाती है, वो तेरे पेट में जाता कहाँ है ? दिखने में वैसी की वैसी है दुबली पतली सी.. ?  बकासुर कहीं की.. !”

” अब भई अपनी-अपनी कैपेसिटी है… तू जल क्यों रही है.. ?  अब तुझे खाने पीने में इंटरेस्ट नहीं है तो उसमें मैं क्या कर सकती हूं?  मेरे लिए तो मैं खाना ही जीवन है…  और जीवन ही खाना.. !
   तुझे पता है मैं अपने रूम पर यूट्यूब से देख देख कर अलग अलग डिश करती रहती हूँ.. कुकिंग करने में इतना मजा आता है ना यार कि क्या बताऊं.. ! पहले टेस्टी सा खाना बनाओ और फिर आराम से बैठकर गरमा गरम खाना खाओ, वह भी अपने मनपसंद टीवी शो के साथ…
     बस लाइफ तो मेरे लिए जन्नत है वहीं…   अब इसी के साथ एक अच्छा सा लड़का भी इस हैप्पी फॅमिली पिक्चर में इन हो जाए तो बात बन जाए… !”

” तेरे कलेक्टर बाबू को देखकर यही गाना तेरे दिमाग में घूम रहा है ना..!
    आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए तो बात बन जाए.. “

”  मेरे दिमाग में बस गाना घूम रहा है और वह अपने पार्टनर को साथ लिए घूम रहा है…  अब चल जल्दी से कैंटीन चलते हैं… वह भी कैंटीन ही गया है..  चल देखते हैं दोनों कितनी देर तक हाथ पकड़ कर बैठते हैं.. !”

“वाह बेटा!! मतलब एक तरफ तो तू सीधे से कलेक्टर साहब से अपने रिश्ते को डिनाय कर रही है, और दूसरी तरफ उन पर नजर भी रख रही है….  कमाल है.. !”

” तू भी तो यही कर रही है पिया.. !”

पंखुड़ी ने पिया को गहरी नजर से देखा और पिया ने झेंप कर अपना चेहरा झुका लिया…

” तू खुद अच्छे से जानती है कि तू और समर एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते, लेकिन जाने ऐसी कौन सी बात तूने मन में पाल बैठी है कि, ना तू समर को वह बात बता कर अपने रिश्ते को क्लियर कर रही है… और ना ही उसे पूरी तरह से भूलकर आगे बढ़ रही है ! तुझे नहीं लगता पिया, तूने दोनों तरफ दो लोगों को लटका कर रखा है |  तू खुद सोच कर देख कि, तू समर के बिना कुछ सोच समझ नहीं पाती, दूसरी तरफ  तूने भावेश को भी हां बोल दिया है…!
  तूने अपना लव ट्रायंगल खुद बनाया है पिया.. ! मैं मानती हूं कि तेरे मन में भावेश के लिए कुछ भी नहीं है, लेकिन क्या तू यह जानती है कि इसका खामियाजा उस लड़के को कितनी बुरी तरह से भुगतना पड़ेगा….?
     तू मन ही मन आज भी समर का इंतजार कर रही है ! कल को तेरी शादी से पहले समर ने आ कर तुम दोनों के बीच की सारी गलतफहमियां दूर कर दी, तो तू समर का हाथ पकड़कर बिना भावेश की ओर एक बार भी देखे आगे निकल जाएगी..  उस वक्त सोच उस लड़के के दिल पर क्या बीतेगी..?
    अब यही अगर हम सिक्के के दूसरे पहलू पर विचार करते हैं और यह मान लेते हैं कि तेरे और समर के बीच की गलतफहमी दूर नहीं हुई और तूने भावेश से शादी कर ली तब क्या मन में समर को लिए हुए तू भावेश के साथ जिंदगी में आगे बढ़ पाएगी..?
क्या यह करना भावेश के साथ धोखाधड़ी नहीं होगी..? हर एक नए दिन के साथ, हर रोज, हर घड़ी हर पल तू उसे एक नया धोखा देगी…
   दिल में तेरे समर होगा और सामने भावेश…
पिया ऐसा मत कर प्लीज..! ऐसा करके तू सिर्फ अपनी जिंदगी से नहीं खेल रही है.. तेरे साथ भावेश और समर की जिंदगी भी जुड़ी हुई है.  इस बात को समझ..!
     और तेरे और समर के इस प्यार और झगड़े में भावेश की कोई गलती नहीं है.. प्लीज पिया उसे बख्श दे.. !”

पिया जो अब तक सामान्य दिखने की कोशिश कर रही थी, पंखुड़ी की बातों से परेशान हो गई…
अपने मन की बेचैनी वह कैसे किसी को बताती.. ?
   इन कुछ महीनों में उसने क्या-क्या झेला था और कैसे झेला था ! यह किसी से भी कहना उसके लिए कितना मुश्किल था…!
    और उस के साथ सबसे बड़ी मुसीबत यही थी कि वह यह बात ना समर को कह सकती थी और ना अपनी मां से कह सकती थी….
     वह अच्छे से जानती थी कि सगाई तोड़ने के बाद वह हर किसी की नजर में विलेन बन गई थी…. शायद समर भी अब उसे मना-मना कर थक गया था और इसीलिए उसने खुद पिया से मुंह मोड़ लिया था | बावजूद पिया उस राज़ को सबके सामने नहीं बता सकती थी, समर से तो किसी भी हाल में नहीं कह सकती थी…!
    उसकी बेचैनी उसकी तड़प समझने वाला  दूर-दूर तक कोई नहीं था | और इसीलिए अब उसे भी एक  निराशा घेरती जा रही थी |  शायद उसी निराशा और अवसाद से बचने के लिए ही उसे लगा था अपनी मां का कहना मान कर वह भावेश से शादी के लिए हां कह दे… और वह भी अपनी मां की यह बात मान बैठी…
    उसे भी लगा था कि शायद उसका मन बदल जाएगा लेकिन अब इतने दिन बीतने के बाद वह फेल हो गई थी…
    अपने मन को बदलने में फेल हो गई थी |  समर से अपना दिल हटाने में फेल हो गई थी | और अब उसे लगने लग गया था कि वह अपनी जिंदगी में ही फेल हो गई थी…|
चुपचाप भारी कदमों से वह वापस डॉक्टर केबिन की तरफ मुड़ गई और पाखी उसे आवाज देती उसके पीछे भागने लगी…

” अरे पिया रुक !  तेरा दिल दुखाने का मेरा कोई मकसद नहीं था |  मैं तो बस तेरा भला चाहती हूं यार ! मैं जानती हूं कि तुम समर के बिना नहीं रह सकती, और यह भी जानती हूँ, कि वह बंदा भी तेरे बिना नहीं रह सकता |  पता नहीं क्यों तुम दोनों यह लुका छुपी का खेल खेल रहे हो…  पता नहीं तुम लोग को इस सब में क्या मजा आता है.. ? मेरा तो अगर ऐसा कोई चक्कर होता ना मैं फटाफट सामने वाले को प्रपोज कर देती और चट मंगनी पट ब्याह कर लेती… !”

” अरे वाह बधाई हो!  हम भी तो जाने किस से ब्याह  करने वाली हैं आप डॉक्टर पंखुड़ी..?”

     पाखी यह पहचानी हुई सी आवाज सुनकर चौक के पीछे मुड़ गई… उसके ठीक सामने शेखर खड़ा था…
अपने सामने अचानक शेखर को खड़े पाकर वह घबरा गई…

” आप… यहां कैसे…?…  और वह,  आपके पार्टनर…. सो सॉरी…. आई मीन.. आपके साथ जो थे वह कहां गए..?”

पंखुड़ी ने अटक अटक कर जैसे तैसे अपनी बात पूरी की और शेखर हंसने लगा…

”  वो जो मेरे साथ खड़े थे आईपीएस ऑफिसर हैं  अनिर्वान भारद्वाज..!  कमाल का व्यक्तित्व हैं उनका उनसे जो मिले उनका फैन हो जाए….!”

मुस्कुराकर पंखुड़ी ने धीरे-धीरे हां में सिर हिला दिया कि उसी वक्त तेज कदमों से चलती हुई लीना वहां चली आई! लीना को देखते ही शेखर ने  खुशी से अपनी बाहें फैला दी…

” अरे मरजीना! तू इधर अस्पताल में कैसे..?”

” चिया को माँ ने एडमिट करवाया है.. मैं ऑफिस में थी कि तभी माँ का फोन आया…  बस भागती पड़ती  उसी को देखने के लिए चली आई हूँ.. !”

“ओह्ह चिया को क्या हुआ..? कल शाम जब मैं तेरे घर आया तब तो बिलकुल ठीक थी.. !”

जितने तेज कदमों से लीना भाग रही थी उतनी ही  तेजी से शेखर भी उसके साथ भागता चला जा रहा था… उन दोनों को इस तरह भागते हुए देख पंखुड़ी और पिया भी उनके पीछे हो गए…
    पिया ने पंखुड़ी की तरफ देखकर इशारों से ही ‘यह क्या चल रहा है’ पूछा और पंखुड़ी ने कंधे उचका कर ‘मुझे नहीं पता’ कह दिया…!

शेखर के सवाल पर लीना ने एक ठंडी सी सांस भरी और शेखर के सवाल का जवाब देने लगी…

” उसके साथ बचपन से ऐसा ही तो होता आ रहा है शेखर..!  पूरा दिन सामान्य रहने के बाद कब अचानक उसकी तबीयत बिगड़ जाए हमें मालूम ही नहीं चलता..
मैं जितना हो सकता है उसका ध्यान रखती हूं बहुत प्यार करती हूं… पूरी कोशिश करती हूं कि ऑफिस के बाद का सारा वक्त अपनी प्यारी सी गुड़िया को दे दूं लेकिन, पता नहीं भगवान को क्या मंजूर है..!”

शेखर ने आगे बढ़कर अपनी एक बाजू लीना के कंधे पर रख दी और उसे अपने कंधे पर टिका कर सांत्वना देने लगा….

लीना और शेखर बातें करते हुए आगे चले गए, और  उन दोनों को इतने दोस्ताना तरीके से आगे बढ़ते देख एक बार फिर पंखुड़ी का चेहरा उतर गया… उसने रोनी  सूरत बनाकर पिया की तरफ देखा…

” कलेक्टर बाबू को देखकर अब यह तो नहीं लग रहा कि इन्हे लड़कियों में इंटरेस्ट नहीं है..?”

पिया ने अपने आंसू पोंछते हुए मुस्कुराकर पंखुड़ी को वापस छेड़ना शुरू कर दिया और पंखुड़ी ने रोनी सी  सूरत बना कर हां में गर्दन हिला दी…

” मुझे लगता है कलेक्टर साहब को सिर्फ आईपीएस अधिकारियों में ही इंटरेस्ट है… वह बंदा भी आईपीएस था और यह बंदी भी आईपीएस है ! मैं इससे पहले मिल चुकी हूं..! पर एक बात तो कहनी पड़ेगी कि बंदी यह भी कमाल है.. गजब की धाकड़ है यार! इसने  विधायक और उसके भतीजे के जो तोते उड़ाए थे कि क्या कहूं.. मज़ा आ गया था..!  मतलब इसने इस ढंग से उन लोगों को डरा दिया था कि विधायक साहब के चेहरे का रंग उड़ गया था और वह सारा सब देखते हुए मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए थे बॉस ! ये अकेली उन इतने सारे आदमियों के बीच शेरनी सी दहाड़ रही थी.. मैं तो इनकी फैन हो गयी थी… और मैंने खुद होकर इन्हे दोस्ती के लिए प्रोपोज़ भी कर दिया था.. !”

“ओह्ह थम जा पाखी थम जा.. तू ये जो बच्चो कि तरह सुपर एक्साइटिड हो जाती है ना.., उससे सामने वालों के ऊपर तेरा भी इंप्रेशन कभी गलत पड़ सकता है.. समझी!
    जैसा कि अभी मुझ पर पड़ रहा है…
    तेरी बातें सुनकर मुझे ऐसा नहीं लग रहा कि तुझे लड़कों में इंटरेस्ट है, बल्कि.. !”

“शट अप यार ! तू खुद जा कर मिल तब तुझे समझ आएगी मेरी बात.. !”

“किससे.. मरजीना से.. ?”

“मरजीना तो नहीं था, उनका नाम तो लीना है.. !”

“हाँ लेकिन शेखर हमेशा उसे उटपटांग नामों से ही पुकारता है.. लीना तो उसने कभी कहा ही नहीं.. !”

एक गोरा चिट्टा स्मार्ट सा लड़का उन दोनों के बगल से जाते हुए कह गया…

” एक्सक्यूज़ मी.. ! ज़रा रुकिए.. आप कौन.. ?”

” मैं रिदान… !”

अपना नाम बता कर वह लड़का मुस्कुराता हुआ शेखर और लीना की तरफ आगे बढ़ गया और पिया पंखुड़ी एक दूसरे को देख उस लड़के के पीछे चल पड़े…

*****

   नेहा के वहां से जाने के बाद दर्श वापस खाने की मेज पर आ बैठा और नाश्ता करने लगा….
  जबकि अनिरुद्ध खाने के उस कमरे से बाहर निकल गया….
  दर्श को समझ आ रहा था कि अनिरुद्ध इतना उदास सा क्यूँ हो गया था…
  उसकी माँ कि एकमात्र निशानी थी वो वीणा जिसे नेहा ने उससे बिना पूछे छू लिया था.. और शायद गुस्से में अंदर से सुलग रहे अनिरुद्ध ने उसके कीमती नेल्स कटवा कर उसे सजा भी दे दी थी…
   दर्श अनिरुद्ध के दिल के हालत से वाकिफ था,  वो बांसुरी के लिए उसकी तड़प भी समझ रहा था लेकिन उसके हाथ में जितना था वो उतना ही कर सकता था.. वो चुप बैठा नाश्ता कर रहा था कि उसके एजेंट का फ़ोन आ गया.. एजेंट ने बताया कि अगले दिन कि अनिरुद्ध और दर्श कि फ़्लाइट कि टिकट कन्फर्म हो गयी थी.. और वहाँ एयरपोर्ट से उनके लिए उनके रियासत में रहने तक के लिए शानदार ऑडी भी बुक हो चुकी है…
  ये सुनते ही दर्श के चेहरे पर राहत के भाव चले आये…
   वो उठ कर अनिरुद्ध को बताने चला गया… अनिरुद्ध अपनी माँ कि वीणा हाथ में लिए उसके तारों को सहलाता बैठा था.. दर्श के उसे टिकट बुकिंग कि खबर देने के बाद भी अनिरुद्ध के चेहरे पर कि उदासी दूर नहीं हुई….
  वो वीणा के तारों को आगे पीछे करता एक उदास सी धुन बजाता रहा और दर्श अपनी और अनिरुद्ध कि तैयारी के बारे में नौकर को समझा कर अपना फ़ोन उठाये समर को फ़ोन करने चला गया…

क्रमशः

aparna….




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