
जीवनसाथी 2- भाग 10
राजा बाँसुरी के साथ तो था लेकिन अब उसके दिमाग में कोई और उलझन चल रही थी….
बाँसुरी के फ़ोन पर आये दिन ऐसे अनजान नम्बरो से फ़ोन आते रहते थे, क़भी बात होती थी क़भी यूँ ही कट जाते थे…..
आख़िर वो जिलाधीश थी और इसी से बहुत से सरकारी कार्यालयों में उसका नंबर दर्ज़ था… बहुत से आम लोग सहायता के लिए भी उसे फ़ोन कर लिया करते थे..
इसलिए ये फ़ोन कॉल उसके लिए कोई बहुत बड़ी बात नहीं था लेकिन राजा के मन में उथल पुथल मच गयी थी… …
लगभग एक घंटा होने के पहले ही समर का फ़ोन आ गया…
“क्या मालूम चला समर.. ?”
“ये नंबर चल रहा है, बंद नहीं किया गया है | कॉल करने पर किसी बच्चे ने उठाया, बच्चा दून का रहने वाला था.. उससे ये पूछने पर कि क्या कुछ देर पहले उसने इस नंबर से कॉल किया था और क्योँ किया था, उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि वो कहीं और फ़ोन लगा रहा था और गलती से कोई और नंबर लग गया.. !
राजा के चेहरे कि चिंता इस बात से भी गायब नहीं हुई.. अपने माथे पर अपनी उँगलियों से सहलाते हुए राजा ने जवाब संतोषजनक नहीं माना.. -“और कुछ बताया बच्चे ने.. !”
“हाँ, मेरे पूछने पर कि तुम्हारे पास ये मोबाइल कब से है.. ?इस मोबाइल का तुम क्या करते हो.. ? वो कहने लगा अभी कुछ दिन पहले ही स्कूल में मिला है, आगे अच्छी पढाई के लिए दिया गया है.. !”
“समर, क्या तुम्हें लगा कि वो सच बोल रहा था.. ?”
“हुकुम पहाड़ी बच्चा था, ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पा रहा था, टूटी फूटी भाषा में उसने इतना ही बताया है.. उसके गाँव का नाम और उसका पता ठिकाना पूछ कर लिख लिया है, आप कहें तो अपने आदमी भेज कर और भी जानकारी निकलवा लेता हूँ…
हुकुम एक बात और थी… आप की दून वाली हवेली खरीदने के लिए कोई सिरफिरा लगातार पीछे पड़ा हुआ है.. मेरी उससे दो तीन बार बात हो चुकी है लेकिन वो बात को समझने कि जगह ज़िद पर अड़ा है कि हवेली के मालिक से ही बात करेगा…
वो आपसे ही बात करना चाहता है हुज़ूर.. !”
“है कौन ये.. ?”
“कोई कारोबारी है हुकुम !दून का फाइव स्टार होटल खरीद चुका है.. उसके पास ही हमारी हवेली पड़ती है उसे भी खरीद कर वहाँ कोई विंटेज रिसोर्ट बनाना चाहता है.. !”
“ठीक है उसे महल बुलवा लो.. देख लेते हैं कौन है ये.. ?”
समर अच्छे से जानता था कि दून कि हवेली राजा क़भी नहीं बेचने वाला फिर आख़िर उससे मिलना क्योँ चाहता था राजा, इस बात पर समर को ताजुब्ब था पर अपनी आदत के अनुसार बिना राजा कि बात काटे ही समर ने उस आदमी को ये सन्देश भिजवा दिया कि राजा साहब खुद उससे मिलना चाहते हैं और इसके लिए उसे महल बुलवाया है.. !
इधर अनिरुद्ध के साथ गाड़ी कि तरफ बढ़ने से पहले दर्श रुक कर उस बच्चे के पास गया और उसके हाथ में एक पांच सौ का नोट पकड़ा कर उसे कुछ बातें सीखा पढ़ा दी…
किसी का फ़ोन आने पर क्या और कैसे बोलना है, ये उस बच्चे को अच्छे से रटवाने के बाद दर्श गाड़ी कि तरफ बढ़ गया…
दर्श के आते तक अनिरुद्ध जीप में बैठा किसी पहाड़ी जंगली फूल को हाथ में थामे ध्यान से देख रहा था…
उसके आते ही अनिरुद्ध ने उससे सवाल पूछ लिया..
“वहाँ इतनी देर कर क्या रहे थे दर्श.. ?”
” तुम्हारे किये कराये पर पानी फेर रहा था.. इस तरह से किसी औरत के फ़ोन पर मिस्ड कॉल देकर बच तो जाओगे नहीं, उसका पति पलट कर पूछताछ तो करेगा ही ना.. !”
“तो क्या हुआ ? मै किसी से डरता हूँ क्या.. ?”
“नहीं डरते हो तो सीधा उसके घर पहुँच कर उसके पति से ही उसका हाथ मांग लो.. इधर उधर क्योँ मारे मारे फिर रहे हो.. ?”
अनिरुद्ध ने एक ठंडी और गहरी साँस भरी और दर्श कि तरफ देखने लगा….
“काश वो अपनी शादी से पहले मुझे मिल जाती, या काश वो तलाकशुदा होती, या काश…
“बस अनिर ! तुम भी जानते हो इनमें से कोई भी काश वजूद नहीं रखता.. और इस सच्चाई को तुम जितनी जल्दी मान जाओ, उतना ही अच्छा होगा….
वो सिर्फ शादीशुदा नहीं बल्कि एक खुशहाल शादीशुदा मां भी है, उसके जीवन में ऐसी कोई कमी नहीं जिसे तू भर सके तो फिर आखिर वह तेरी तरफ क्यों देखेगी भला ? तू मानने और समझने की कोशिश कर कि उसकी जिंदगी में तेरी कोई जरूरत नहीं है…. तेरा यह एकतरफा प्यार तुझे दुख और तकलीफ के सिवा और कुछ नहीं देने वाला है…!”
अनिरुद्ध चुपचाप बैठा उस फूल को देखता रहा, उसके मुंह से दर्श की इस बात के बदले कोई जवाब नहीं निकला…
वह खुद भी तो पहली बार बांसुरी को देखने के बाद से ही उससे अपना मन हटाने की कोशिशों में ही लगा हुआ था…
जब बांसुरी से पहली बार मिलने के बाद वह उसके ऑफिस से निकला तो वहां उस कमरे से निकलने का उसका मन ही नहीं कर रहा था… ऐसा लग रहा था उस शहर के कलेक्ट्रेट परिसर का वह कमरा जहां बांसुरी का ऑफिस था उस कमरे की अलग सी खुशबू उसकी सांसो में रच बस गई थी….
आज तक प्यार मोहब्बत को अपनी ठोकरो के ऊपर रखने वाला वो लड़का बांसुरी के सामने कितना लाचार हो गया था…
पहली बार बांसुरी की आंखों में देखते ही जैसे उसके ह्रदय के तारों को किसी ने झनझना दिया था…
बांसुरी की आवाज सुनते ही एक अजीब सी सनसनाहट उसके सारे शरीर में दौड़ गई थी.. बाँसुरी ने उसके सामने एक पन्ने पर कुछ लिखा था और उसकी वो लिखावट ही बस जैसे उसके रोम-रोम को कंपा देने के लिए काफी थी….
अनिरुद्ध के लिए यह पहला अनुभव था जब किसी लड़की ने यूँ उसे पटखनी दे दी थी..
एक तो उसका चेहरा दूसरा उसकी अनिरुद्ध को लेकर चिंता भरी बातें, वो उसमें डूबता चला गया था..
उस दिन तो बांसुरी की बात मानकर वह अपने घर जाकर रातों-रात काका और दर्श के साथ उस घर से निकल गया था लेकिन इतनी आसानी से वो बाँसुरी से दूर नहीं जा पाया था….
उस शहर से रातों-रात निकल जाने के बाद वह और दर्श वहाँ से कई हजार किलोमीटर दूर एक नये शहर में पहुँच गये थे.. हर जगह तो उन लोगों ने प्लाट और ज़मीने कर रखी थी…
.. पैसे रुपए की उनके पास वैसे ही कोई कमी नहीं थी.. उन्होंने उस नए शहर में अपने लिए नया काम नया घर सब कुछ तैयार कर लिया था..
लेकिन इतनी ढेर सारी व्यस्तताओं के बीच भी अनिरुद्ध वासुकी कभी-कभी अचानक रात को चौक कर जाग उठता था….
पसीने से सराबोर अनिरुद्ध को उस वक्त सिर्फ और सिर्फ बांसुरी की जरूरत महसूस होती थी.. उसकी मखमली आवाज़, उसकी गहरी आँखे, उसकी खुशबु उसका एहसास… ! उसे सब कुछ चाहिए था !
लेकिन वो जानता था कि बाँसुरी परायी थी, इतनी आसानी से बांसुरी उसकी जिंदगी में नहीं आ सकती…
और इसीलिए उसे भूलने के लिए अनिरुद्ध ने प्रयास करने शुरू कर दिए थे…
अपने मन की डोर को कसे रखने के लिए वो अपने शरीर पर भार बढ़ाता जा रहा था..
मन कि शांति के लिए उसने अपने शरीर को तपाना शुरू कर दिया था….
पहले जहाँ एक घंटे कि कसरत और सैर ही उसके लिए काफ़ी होती थी, अब घंटो जिम में पसीना बहाता वो सोचने लगा था कि इस पसीने के साथ ही उसकी यादें भी दूर बह जाएँगी…
घंटो की कसरत के बाद नहा धोकर वो अपने घर के मंदिर में महादेव की पूजा में भी व्यस्त होकर अपने मन को बांधने का प्रयास कर रहा था..
शिव तांडव स्त्रोत के जप के साथ वो मन में अपने इष्ट देव त्रिपुरारी को स्मरण करता मन ही मन उनसे भीख मांगने लगा था की उस लड़की को उसके मन से उठा कर दूर फेंक दे…
लेकिन मुंडमाला धारी हिमालय पर बैठें जाने किस तपस्या में लीन थे जो उन्होंने अपने भक्त की तरफ से आँखे फेर रखीं थी…
शराब और सिगरेट को उसने क़भी हाथ तक नहीं लगाया था, लेकिन बाँसुरी को भूलने के लिए उसने अपनी ही प्रतिज्ञा तोड़ कर मय का प्याला भी होंठो से लगा ही लिया था !
लेकिन जिस गले को सामान्य से सॉफ्ट ड्रिंक कि भी आदत ना थी वो व्हिस्की का डबल शॉट कैसे झेल पाता…
उल्टियाँ कर कर के अनिरुद्ध का हाल बेहाल हो गया था.. और उसकी बिगड़ती हालत देख कर दर्श का !
उस रात जब बिस्तर पर पड़े खाली खाली आँखों से छत को घूरते अनिरुद्ध को कमरे के बाहर खड़े दर्श और काका ने देखा तब काका ने दर्श के कांधे पर हाथ रख उसे समझना शुरू कर दिया था…
“मेरी बात को समझने कि कोशिश करना दर्श, जैसे एक औरत को समाज में सर उठा कर जीने के लिए मर्द कि ज़रूरत होती है वैसे ही मर्द कितना भी ताकतवर हो उसे भी एक औरत कि ममता भरी ठंडी छाँव की उतनी ही ज़रूरत होती है.. !”
“लेकिन काका अनिर कि चाह पूरी करना मुश्किल है.. ! वो जिस लड़की को चाहता है वो शादीशुदा है !”
“बेटा मुझ बुज़ुर्ग कि बात का बुरा मत लगाना, लेकिन क्या कोई और औरत अनिर कि ज़िंदगी नहीं संवार सकती… अभी अपने पागलपन में उसे ऐसा लग रहा है लेकिन जैसे ही उसे किन्ही कोमल बाजुओं की गर्माहट का सहारा मिलेगा वो उस लड़की को पूरी तरह भूल जायेगा… “
काका कि कही बात समझ कर दर्श झेंप कर अपने बालों पर उँगलियाँ फिराता वहाँ से बाहर निकल गया था….
अपने प्राणप्रिय दोस्त के लिए अब वो किस तरह से और क्या मदद कर सकता था… ?
आख़िर इधर उधर से पता करने के बाद वो एक शाम अनिरुद्ध को साथ लिए शहर के सबसे नामी गिरामी पब लाउंज में ले गया था…
पीना तो दोनों को ही नहीं था, तेज़ बजता म्यूजिक, और सिगरेट के छल्लों के बीच वहाँ झूमते लड़के लड़कियों को जो बात माहौल लग रही थी वही अनिरुद्ध के सर दर्द का कारण बन रही थी…
ऐसा नहीं था कि पीने पिलाने से उसका वास्ता क़भी नहीं पड़ा हो.. उसका काम ही ऐसा था कि अक्सर अपने टेंडर पास करवाने या काम निकलवाने के लिए उसे ठेकेदारों या बाकियों को इसी तरह कि रिश्वत परोसनी पड़ती थी, उनके पीते खाते में वो अक्सर साथ ही बैठता था पर मजाल जो क़भी मजाक में ही सिगरेट का कश लगा लिया हो या एक घूंट भी अंदर धकेली हो…
नारियल पानी का गिलास थामे बैठें अनिरुद्ध को देख कर भी बाकी लोग उसके डर से उसका परिहास नहीं कर पाते थे…
लोगों के लिए ये बड़े आश्चर्य कि बात थी कि उस जैसा बिगड़ैल ज़िद्दी गुंडा शराब सिगरेट और औरतों के मामले में कैसे इतना परहेजी था….
अनिरुद्ध को दर्श वहाँ किसी बिज़नेस डील की बात कह कर लाया था, लेकिन पंद्रह मिनट बीत जाने पर भी अब तक कोई वहाँ नहीं पहुंचा था…
” कौन आने वाला है दर्श.. ?”
“अरे वो बिंदल से बात हुई थी, उसी को आना था, पर अब तक नहीं पहुंचा, नालायक ! तमीज ही नहीं है इन लोगों के पास और ना ही किसी और के वक्त की कदर है| उसे अच्छे से मालूम है कि तुझे इस तरह का माहौल पसंद नहीं आता फिर भी हमें यही मिलने के लिए बुलाया..!”
” अरे कोई बात नहीं, मुझे पब से ऐसी भी कोई खास एलर्जी नहीं है..! तू तो जानता ही है शुरू से गांव का आदमी रहा हूं, इसलिए शहर की हाई-फाई बातें मेरे समझ में नहीं आती!”
वह दोनों बात कर रहे थे कि तभी एक सामान्य ऊंचाई की दुबली पतली सी लड़की घुटनों तक की फ्लोरल स्कर्ट पर काली जैकेट पहने उन दोनों के करीब चली आई..उन दोनों के बीच की जगह पर खुद को एडजस्ट करती हुई उस लड़की ने वहाँ खड़े लड़के से अपने लिए ड्रिंक मांग ली…
उसके बीच में घुसते ही अनिरुद्ध ज़रा दूर सरक गया.. लड़की ने बड़ी अदा से अनिरुद्ध को देख कर अपना हाथ हिला दिया..
अनिरुद्ध मुस्कुरा कर डांस फ्लोर की तरफ देखने लगा..
लड़की ने दर्श की तरफ देखा और दर्श के धीरे से गर्दन हाँ में हिलाते ही लड़की ने अपने हाथ की ड्रिंक सिप कर के अनिरुद्ध की ओर बढ़ा दी.. अनिरुद्ध के मना करते ही लापरवाही से कंधे उचका कर उस लड़की ने अपनी चेयर को हवा में गोल घुमाया और उसके हाथ की ड्रिंक अनिरुद्ध की शर्ट पर छलक गयी…
सॉरी सॉरी की रट लगाए वो लड़की वहीँ रखें टिश्यू से उसकी शर्ट साफ़ करने लगी, अनिरुद्ध ने मुस्कुरा कर उसका हाथ अपनी कमीज़ से दूर किया और दर्श को इशारा कर वाशरूम की तरफ निकल गया.. वो लड़की भी अपनी ऊँची हील्स खटकाती उसके पीछे निकल गयी….
वाशरूम के सींक पर पानी लेकर अपनी शर्ट साफ करते अनिरुद्ध की जैसे ही दरवाजे पर नज़र पड़ी वो चौंक गया.. वो लड़की दरवाजे पर से अंदर आने को थी की अनिरुद्ध ने उसे रोक दिया…
“ये जेंट्स वाशरूम है.. ! प्लीज़ स्टे अवे !”
“सॉरी, मै आपको देखने की धुन में भूल गयी थी.. !”और वो बाहर खड़ी उसका इंतज़ार करने लगी.. अनिरुद्ध के बाहर आते ही वो एक बार फिर शुरू हो गयी..
“आई एम सो सॉरी, मेरे कारण आपके कपड़े बिगड़ गये!”
“कोई बात नहीं, मै वापस ही जाने वाला था.. !”
“अरे प्लीज़ ऐसा मत कीजिये वरना मुझे लगेगा मैंने आपका क्वालिटी टाइम स्पॉइल कर दिया.. !”
“अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं.. मुझे वैसे भी बहुत सारा काम है घर पर.. !”
” शक्ल से इतने बोरिंग तो नहीं लगते आप कि पब जैसी जगह से इतनी जल्दी यानी वक्त से पहले ही वापस लौट जाए, वह भी काम का बहाना करके?”
” मेरी शक्ल पर मत जाइए, मैं शक्ल से जैसा दिखता हूं वैसा अंदर से हूँ नहीं.. !”
” फिर कैसे है अंदर से.. ?
अगर मैं ये कहूं कि मैं जानना चाहती हूं तो..? क्या आप दोस्ती करेंगे मुझसे.. ?”
ये पहला ही मौका था जब कोई लड़की खुद से आगे बढ़कर अनिरुद्ध के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ा रही थी… उसे एकाएक कुछ समझ नहीं आया.. लड़कियों से बात करने के मामले में वह अनाड़ी ही था, लेकिन उसे लड़कियों से बात करने की कर्टसी भी मालूम थी! इस तरह अचानक किसी लड़की को ठुकरा कर निकल जाना भी उसे सही नहीं लगा…
” मेरे बारे में ऐसा कुछ भी इंटरेस्टिंग नहीं है, जो जानकर आपको अच्छा लगेगा..?”
” पर मैं बहुत इंटरेस्टिंग हूं…बिलीव मी.. !आप एक बार दोस्ती का हाथ बढ़ा कर देखिये, आप निराश नहीं होंगे.. !”
अनिरुद्ध बड़ी अजीब सी उलझन में फंस गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस लड़की से वह कैसे पीछा छुड़ाएं….
“ओके, लेकिन मै जानता हूँ मेरी दोस्ती आपको ज़रूर बहुत निराश करेगी.. !”
“आपके साथ के लिए मैं निराश होने को भी तैयार हूं मिस्टर… ?
” अनिरुद्ध…. अनिरुद्ध वासुकी है मेरा नाम!”
” क्वाइट इंटरेस्टिंग! आप तो कह रहे थे आप बहुत बोरिंग है, आपका तो नाम भी बहुत इंटरेस्टिंग है.. वैसे इसका मतलब क्या होता है..?”
” छोड़िए ना ! हर बात के पीछे मतलब छुपा हो यह जरूरी तो नहीं..”
” हां यह भी बात सही है, लेकिन यह वासुकी नाम का टाइटल मैंने कभी सुना नहीं..वैसे मेरा नाम नेहिका है, पर मेरे दोस्त मुझे नेहा बुलाते हैं.. !”
अनिरुद्ध ने बिना कुछ कहे हां में सिर हिला दिया…
नेहा ने गौर से उस लड़के को देखा यह वही लड़का था जिसके लिए आज सुबह दर्श का उसके पास फोन आया था….
काका की बात सुनने के बाद दर्श की समझ से बाहर था कि आखिर अनिरुद्ध के लिए वह कहां से लड़की का प्रबंध करें? और इसीलिए उसने इधर उधर से मालूम कर के सोचा कि किसी एस्कॉर्ट से ही बात कर ली जाये.. लेकिन फिर अपने इकलौते दोस्त के लिए उसे खुद को ये बात पसंद नहीं आई और उसने अपने साथ पढाई कर चुके अपने साथ के एक लड़के को फ़ोन किया… उस लड़के कि दोस्त इसी शहर में नौकरी किया करती थी और अकेली रह रही थी…
दर्श को उस लड़के ने उस लड़की नेहा का फ्रेन्डबुक लिंक भेज दिया था…
एक झलक उसकी तस्वीर देख कर दर्श एकबारगी चौंक सा गया था क्योंकि ये अजीब इत्तेफाक था कि पहली झलक देखने पर उस लड़की के शरीर कि लम्बाई चौड़ाई बनावट कुछ कुछ बाँसुरी से मिलती जुलती सी थी…
कपड़ों का पहनावा और बाल अगर बाँसुरी कि तरह बना दिए जाये तो वो काफ़ी हद तक बाँसुरी जैसी लग सकती थी…
और शायद इसलिए उसने झट से उस दोस्त से एक झूठी सी कहानी बना कर नेहा से बात करने कि इच्छा जताई थी…
नेहा को भी फ़ोन पर उसने एक भावुक और उलझी सी कहानी सुना कर अपने मानसिक रूप से कमज़ोर दोस्त कि मदद के नाम पर इस पब में बुला लिया था..
नेहा सामान्य लड़कियों की तरह भावुक जरूर थी लेकिन आजकल के जमाने की तरह प्रैक्टिकल भी थी ! अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए और पैसे कमाने के लिए ही वो अपने घर से इतनी दूर इस शहर में पड़ी एक साधारण सी नौकरी कर रही थी…
इसीलिए जब दर्श ने अपने दोस्त की मदद के लिए उसे अच्छी खासी मोटी रकम ऑफर करी तो वो उस बात को ठुकरा नहीं सकी और शाम ढलते ही पब पहुँच गयी..
हालाँकि यहाँ अनिरुद्ध से मिलते ही उसकी खुद कि धड़कने बेकाबू होने को तैयार थी.. और अब उसे खुद इस काम में मजा आने लगा था…
क्रमशः
aparna……
