
जीवनसाथी 2- भाग 8
अनिरुद्ध अपनी जगह से मुड़ कर जाने को हुआ और फिर थम कर रुक गया.. बाँसुरी की तरफ देख उसने ज़िन्दगी में पहली बार किसी लड़की से वो कहा जो आज तक उसने किसी से क़भी नहीं कहा था….
” थैंक्स सो मच !”
आज तक अनिरुद्ध ने किसी लड़की को ना ही क़भी थैंक्स बोला था और न सॉरी.. लड़कियां उसके जीवन के लिए अजूबा ही थी और उसकी ज़िन्दगी में दूर दूर तक किसी लड़की कि कोई जगह नहीं थी…
आज पहली बार उसका किसी ऐसी लड़की से सामना हुआ था जिसके सजदे पर सर झुकाने को वो खुद ब खुद तैयार हो गया था…..
मन ही मन बाँसुरी कि बातें सोचता हुआ वो वहाँ से बाहर निकला और अपनी गाड़ी में बैठने कि जगह पैदल ही वहाँ से निकल गया.. उसे पैदल चलते देख उसका ड्राइवर भी भाग कर उसके पीछे चला आया… -“साहब गाड़ी ठीक हो गयी है.. ! ले आऊँ.. ?”
“गाड़ी यही छोड़ कर मेरे साथ चुपचाप चलो.. !”
ड्राइवर कि समझ के बाहर था कि आख़िर उसके सनकी साहब के दिमाग में क्या चल रहा है, वो चुपचाप उसके साथ हो गया…
चलते चलते ही अनिरुद्ध ने दर्श को फ़ोन घुमा कर सारी बातें बता दी… दर्श उस वक़्त घर पर ही मौजूद था, वो अपने पैने दिमाग और चाक चौबंद नज़र के साथ घर की तलाशी में जुट गया और जल्दी ही उसे समझ में आ गया की उनके घर के इलेक्ट्रिसिटी पैनल में गड़बड़ी कर दी गयी है… बिजली के प्रवाहन से हुई दुर्घटना में घर के साथ साथ अनिरुद्ध और बाकि लोग भी जल गए और यही दिखाने का उन लोगों का प्रयास था..अनिरुद्ध के घर आते ही उन तीनों ने आपस में सलाह करने के बाद बाकी नौकरों के सामने कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने दिया और ऐसे बने रहें जैसे उन्हें कुछ मालूम नहीं है…
वो दोनों समझ गए थे इतना बड़ा प्लान करने वाले लोगों ने उन दोनों पर नज़र भी रखी ही होगी.. रोज़ की तरह सामान्य दिनचर्या चल रही थी, शाम ढ़लते ही ज्यादातर नौकर चले जाया करते थे, दरबान काका के अलावा सिर्फ एक ही नौकर क़भी क़भी रात में रुका करता था….
आज शाम ढलते ढ़लते वो छुट्टी की दरख्वास्त लिए चला आया.. दर्श ने उससे छुट्टी का कारण पूछा तो उसने एक वाजिब सा जवाब देकर अपने जवाब को पुख्ता करने कुछ कारण भी बता दिए.. दर्श के सवाल जवाबों के बीच आकर अनिरुद्ध ने उसे छुट्टी दे दी.. वो खुश होकर जाने लगा तब अनिरुद्ध ने उसे रोक कर उसके हाथ में कुछ रूपये रख दिए…
“साहब ये पैसे क्यों.. ?”
“तुम्ही ने तो कहा की तुम्हारी बुआ मर गयी है , और इसलिए तुम वो जिस अस्पताल में भरती थी वहाँ उनका बिल भरने जाना है , उसके बाद उनकी क्रिया भी तो करवाओगे न . !अस्पताल से ले जाने के लिए भी तो पैसे चहिये होंगे न.. !”
“उतने तो हैं मेरे पास साहब !” किशोर की ज़बान लड़खड़ा गयी
“कोई बात नहीं, ये और रख लो, एक पते की बात बताऊँ, पैसा काटता नहीं हैं.. ! इसलिए जब जितना मिले रख लेना चाहिए !” और अनिरुद्ध खिलखिला कर हंस पड़ा लेकिन वहाँ से जाते हुए किशोर का चेहरा दप्प से बुझ गया… वो सर नीचे किये चुपचाप बाहर चला गया…
बाहर जाकर उसने एक सिगरेट सुलगायी और अपनी तलब का सामान लेने चल पड़ा..
दर्श ने आश्चर्य से अनिरुद्ध की तरफ देखा…
” अभी उसके हाथ में इतने पैसे रखने की क्या जरूरत थी?”
” जरूरत थी और इसीलिए रखें.. तुम बस देखते जाओ..!”
कुछ देर बाद ही अनिरुद्ध और दर्श ने काका के साथ मिलकर अपने जरूरी कागजात और रुपए पैसे समेटे और घर में बने गुप्त द्वार की तरफ बढ़ने लगे कि तभी पिछले दरवाजे पर दस्तक हुई…
काका ने दरवाजे के भीतर से ही बाहर झांककर देखा तो सामने किशोर खड़ा था…
” किशोर तुम इस वक़्त यहाँ क्या कर रहे हो ? वह भी घर के पिछले दरवाजे पर!”
” काका दरवाजा खोलिये, मुझे अंदर आने दीजिए..!”
अंदर आने के बाद दर्श और अनिरुद्ध को किशोर ने जो बताया वह सुन कर दर्श अनिरुद्ध की तरफ देखने लगा… अनिरुद्ध ने मुस्कुरा कर कंधे उचका दिए..
किशोर को ज्यादा पैसों का लालच देकर अनिरुद्ध के विरोधियों ने अपनी तरफ कर लिया था…
आज इलेक्ट्रिक पैनल की वायरिंग में गड़बड़ी करने का काम किशोर को ही सौंपा गया था…
इसलिए वो अपनी बुआ की झूठी मौत का बहाना बना कर घर से जल्दी निकलने वाला था.. और उसके बाद जब रात में सभी लोग सो जाते तब आकर बाहर से सारे दरवाजे बंद कर उसे ये काम कर के निकल जाना था | जिससे सभी को यह तसल्ली हो जाये की घर में शार्ट सर्किट से लगी आग में अनिरुद्ध और दर्श जल कर मारे गए… |
किशोर वैसे भी बहुत ईमानदार कभी भी नहीं था ! इसीलिए ज्यादा पैसों का लालच उसकी ईमानदारी को थोड़ी देर के लिए और डिगा गया…
… लेकिन आखिरी समय में जब वो घर से छुट्टी लेकर निकल रहा था तब अनिरुद्ध का उसे रोक कर थोड़े से पैसे दे जाना उसकी नियत को कुछ समय के लिए साफ़ कर गया, और उसकी ईमानदारी वापस अपनी जगह लौट आयी.. और इसीलिए वह चोरी छुपे पिछले दरवाजे से आकर अनिरुद्ध दर्श को सारी बात बता देना चाहता था…
उस के यह सब बताने के बाद अनिरुद्ध ने उसे शांति से बैठाया और एक गिलास पानी का दिया..
पानी पीने के बाद वह अपनी जगह पर बैठा था अनिरुद्ध ने उससे कहा..
” देखो किशोर ! तुमसे उन लोगों ने जो कहा है, और जैसा कहा है, तुम वैसा ही करोगे ! उन लोगों को यहां पर हम सब की लाश चाहिए थी और उन्हें यह लाशें मिलेंगी भी.. तुम उनकी मदद करने के लिए जैसे इस घर को आग लगा रहे हो वैसे ही हमारी मदद करने के लिए 2 लाशों को भी अरेंज करके लाओगे तुम ! अभी तुम्हारे पास पूरे 3 से 4 घंटे का वक्त है..!
वैसे भी उन लोगों ने हमारे सोने के बाद तुम्हें यह काम करने का जिम्मा सौंपा है, तो हमें सोने में अभी वक़्त है.. बोलो क्या मेरा यह काम करने को तैयार हो.. ?”
” मैं तैयार हूं साहब, लेकिन ये लाशें मैं लाऊंगा कहां से..?”
” पास ही में सरकारी अस्पताल की मोर्चरी है !जहां न जाने कितनी अनाथ लाशें पड़ी होती हैं, वहां इंचार्ज को थोड़े पैसे देकर वहाँ से दो लाशें निकाल सकते हो क्योंकि उन अनाथ लाशों को ठिकाने लगाना उनके लिए भी एक जटिल काम होता है..!”
” ठीक है साहब ! फिर मैं निकलता हूं, और जल्दी ही वापस लौटता हूं..!”
” हम तुम्हारा इंतजार करेंगे..! तुम्हारे लिए ये पिछला दरवाजा खुला रहेगा ! तुम यही से आना ! दोनों लाश अंदर रखने के बाद तुम इलेक्ट्रिक पैनल का काम करके चुपचाप निकल जाना ! घर में उसी तरह से आग लग जाएगी और लाशें जलकर स्वाहा हो जाएंगी.. !”
किशोर प्रसन्न था … पिछले दरवाजे से बाहर निकलते वक़्त वहाँ से जाते-जाते भी उसके दिमाग में यह बात चल रही थी कि जब अनिरुद्ध दर्श और दरबान काका यह कुल जमा तीन लोग थे, तो अनिरुद्ध ने सिर्फ दो लाशें लाने को क्यों कहा ? फिर भी अपने दिमाग पर ज्यादा जोर दिये बिना वो वहाँ से निकल गया….
उसके घर परिवार में कोई ना था | एक बुआ थी जो उसके घर वालों के गुजर जाने के बाद उसे अपने साथ ले आई थी | वह खुद भी अस्पताल में काम करती थी और साथ ही किशोर की देखभाल भी..
किशोर को ड्रग्स लेने की बुरी लत थी | जिसके कारण वह स्कूल कॉलेज की पढ़ाई को भी छोड़ चुका था, नशे की लत ने उसे यूँ पागल कर रखा था की वो आये दिन किसी न किसी से उलझा ही रहता था…
इधर उधर घूम कर छुटपुट पैसे कमा लिया करता था… एक बार पैसों को लेकर ही उसका उसकी बुआ से जोरदार झगड़ा हुआ था, जिसके बाद अपनी बुआ के सर पर कुकर से वार कर कर वो उनके पैसे छीन कर घर से भाग गया था…
भागते भागते ही वो पास के दूसरे शहर जाने वाले हाइवे पहुंच गया था और अनिरुद्ध के हत्थे चढ़ गया…
अनिरुद्ध ने उसे देख कर अपने पास काम पर रख लिया था और काम से बचे हुए समय में अक्सर उसे ड्रग्स जैसी बुरी लतों से दूर रहने की सलाह दिया करता था.. लेकिन किशोर को न क़भी उसकी बात सुननी थी न समझनी थी..
इसी बीच अनिरुद्ध ने उसकी सारी जन्म कुंडली निकलवा ली थी… कुकर के प्रहार से बुआ बच तो गयी थी लेकिन उन्होंने कसम खा ली थी की उस बदजात और नमकहराम लड़के का अब मुहँ नहीं देखेंगी.. उनके हाथ में भी कुछ रूपये छोड़ अनिरुद्ध वापस चला आया था लेकिन तबसे ही किशोर पर उसकी कड़ी नज़र थी.. |
वो अक्सर अनिरुद्ध के टेबल या दराज़ से भी पैसे चुरा कर ले जाया करता था.. इस बारे में दरबान काका उसे कई बार आगाह कर चुके थे.. किशोर की छुटपुट गलतियों को अनिरुद्ध आज तक माफ़ करता आया था..
लेकीन इस बार पानी सर से ऊपर निकल गया था…
किशोर के वहाँ से जाते ही अनिरुद्ध और दर्श दरबान काका के साथ वहाँ से निकल गए.. जाने से पहले अनिरुद्ध ने अपने सबसे भरोसेमंद नौकर काली को फोन किया और उसके बाद वहां से वह तीनों निकल गए…
किशोर से अनिरुद्ध ने जो जैसा कहा था किशोर ने वैसा ही किया.. मॉर्ग में पैसे देकर वो दो लाशों को वहां तक ले आया… कमरे के अंदर लाशें रखने के बाद उसने अपनी आदत से मजबूर अपनी ड्रग्स का इंजेक्शन लिया और फिर कुछ देर बाद घर के बाहर जाकर उसने पहले बाहर से सारे दरवाजे खिड़कियों को बंद किया और उसके बाद इलेक्ट्रिक पैनल में शार्ट सर्किट कर दिया…
उसे अंदर जाकर किसी एक स्विच को ऑन बस करना बाकी था, और वह करके उसे तुरंत पिछले दरवाजे से बाहर निकल जाना था | इतना करने के लिए किशोर अंदर दाखिल हुआ, लेकिन ड्रग्स के ओवर डोज़ के कारण उसकी आँखों के आगे अँधेरा सा छाने लगा.. और वो वहीँ एक किनारे दीवार की टेक लगाए बैठ गया….
कुछ देर बाद एक हल्के से ब्लास्ट के साथ ही पूरा घर धू-धू करके जलने लगा… घर पर रखे सारे उपकरण एक एक कर फटते चलें गए और साथ ही रसोई में रखा सिलेंडर भी फट गया…
हाईवे पर निकलते अनिरुद्ध दर्श और दरबान काका को बहुत दूर से निकलती आग की लपटे नज़र आ रही थी……
अनिरुद्ध कुछ पल को उन लपटों को देखता रह गया…
“बहुत मन से ये घर तैयार किया था न तुमने अनिर.. ?”
काका के सवाल पर अनिरुद्ध के चेहरे पर एक बुझी सी मुस्कान चली आई…
“मैं हर घर मन से तैयार करता हूँ काका.. लेकिन किसी घर में इतनी ताकत नहीं की अनिरुद्ध का मन अपने पास रख ले.. !”
“उस लड़की को भी थैंक्स बोल देना !आख़िर आज उसी के कारण हम ज़िंदा है अनिर !”
काका की इस बात पर वो मुस्कुरा उठा….
“वैसे मुझे मार सके ऐसा यहाँ तो कोई पैदा नहीं हुआ.. अनिरुद्ध वासुकी को मारने के लिए सिर्फ ताकत ही नहीं कलेजा भी चाहिए.. शौर्य पराक्रम और हिम्मत का कॉकटेल जो होगा वही मार पायेगा… काका बच तो हम इस आग से भी जाते लेकिन हाँ उसमे चोट ज़रूर लग जाती.. उस कलेक्टरनी ने हमें बचाया तो है लेकिन अब उसे थैंक यू बोलने के लिए उसे वहाँ बुलाना होगा जहाँ हम जा रहें हैं… क्योंकि अब यहाँ अनिरुद्ध वासुकी वापस नहीं लौटेगा.. वापस लौटेगा बस उसके नाम का कहर.. !”
तेज़ी से भागती उनकी गाड़ी फिर घने जंगलों में कहीं खो गयी….
इस बात को महीनों बीत गए, बाँसुरी उस आदमी को भूल भी गयी लेकिन वो उसे भूल नहीं पाया…
उस घटना के अगले दिन हर बड़े अख़बार में अनिरुद्ध वासुकी की अपने ही घर में हुए हादसे में मौत की खबर छ्पी | उसके साथ ही उसके खास दोस्त दर्श और दरबान काका की लाश भी वहाँ से बरामद की गयी.. लाशें इस कदर जल चुकी थी की उनका परिक्षण करने को कुछ बाकी नहीं बचा था…
इस हादसे के बाद अनिरुद्ध के विरोधियों ने जम कर खुशियाँ मनाई और एक बार फिर अपने दो नंबर के कामों में डूब कर रह गए…
लेकिन इसके बाद जाने ऐसा क्या हुआ की इन सभी की जन्म कुंडली एक-एक कर कलेक्टर साहिबा के पास मय सबूत पहुंचने लगी..
इनके किए कार्यो का लेखा-जोखा कुछ इस तरीके से कलेक्टर और कमिश्नर के पास पहुंचा कि उन सबूतों के साथ कमिश्नर ने धरपकड़ शुरू कर दी, और एक एक कर उन व्यापारियों पर नकेल कसी जाने लगी….
लेकिन इसी सब के बीच बाँसुरी का तबादला हो गया और वो मंत्रालय पहुँच गयी… कमिश्नर साहब की भी जगह बदली हो गयी और उन्हें भी वहाँ से जाना पड़ा…
शहर के जानने वाले लोगों का कहना था, ये तबादले उन्हीं रसूख दरों के कहने पर करवाए गए थे |क्योंकि ये नयी कलेक्टर और कमिश्नर रिश्वतखोर नहीं थे| ईमानदार थे और इसलिए इनसे बचने के लिए ही इन्हें वहाँ से हटवाया गया था…
बात जो भी रही हो, लेकिन बाँसुरी और कमिश्नर के तबादले के बाद एक बार फिर इन व्यापारियों का मनमाना खेल शुरू हो चुका था, लेकिन अभी ये खेल और रंग दिखता उसके पहले ही एक एक कर जाने कैसे ये लोग किसी न किसी हादसे का शिकार होते चले गए…
किसी का बिज़नेस मीटिंग में जाते वक़्त चॉपर दुर्घटनाग्रस्त हो गया तो किसी की गोल्फ खेलते वक़्त सेहत ऐसी बिगड़ी की स्वर्ग सिधार गया….
शहर के पुरानी बसाहट के लोगों में दबी ज़बान में सुगबुगाहट सी होने लगी की इन व्यापारियों की मौत के पीछे कहीं न कहीं उसी वासुकी का हाथ है.. हो न हो वो यहाँ से ज़िंदा निकल गया था और अब इन लोगों से आकर अपना बदला ले रहा है..!उसी ने पहले इनके काले कारनामों से प्रशासन को परिचित करवाया पर जब वहाँ काम बनते न दिखा तो अब खुद ही सब को सजा दे रहा है… !
कुछ लोग इस सब के पीछे अनिरुद्ध की आत्मा होने का दावा भी करने लगे थे…
“जवान जहान लड़का ऐसी बेज़ार मौत मरा है, उसकी आत्मा अतृप्त रह गयी होगी और अब वही घूम घूम कर अपना बदला चूक रहा है… उसके तो नाम में भी सांप था! साक्षात् महादेव के कंठ का नाग.. ! भला कैसे इन चोरों को ज़िंदा छोड़ता.. अच्छा है चुन चुन कर इन्हे डंस ले वो.. !”
जितने मुहँ उतनी बातें…
बातें थी, अफवाहे थी.. उन पर क़भी न क़भी विराम लगना ही था…. एक के पीछे एक होती मौतों का तांडव उन व्यापारियों के आखिरी साथी की मौत पर जाकर थमा.. ये नकली दवाओं का विक्रेता था और इसकी मौत भी नकली दवा के अति मात्रा में सेवन से ही हुई थी…
उस शहर का एक काला अध्याय चुपचाप गुमनामी में डूब गया था… ! लेकिन अनिरुद्ध वासुकी का नाम अब भी वहाँ शान से लिया जाता था.. !
बाँसुरी ने वहाँ से मंत्रालय आने के बाद राजा को वहाँ के बारे में कुछ थोड़ा बहुत बताया लेकिन उस वक़्त दोनों ही नयी ज़िम्मेदारियों में डूबे थे…
राजा के लिए नया मंत्रालय था और बाँसुरी के लिए नया ऑफिस !इसके साथ ही माता पिता बनने की ख़ुशी भी थी.. इन्हीं सब के बीच अनिरुद्ध वासुकी के बारे में राजा को बताने में बाँसुरी चूक गयी….
…उसे उस वक़्त मालूम ही कहाँ था की, उसकी ये चूक भविष्य में उसके लिए कितनी खतरनाक साबित होने वाली थी…
*****
पिया अस्पताल से निकल कर फ़ोन पर अपनी माँ से बात करते हुए पार्किंग की तरफ जा रही थी की भावेश की गाड़ी आकर उसके पास रुक गयी.. अब तक पिया पार्किंग से अपनी स्कूटी नहीं निकाल पायी थी.. भावेश को देख वो चौंक गयी..
“आइये पिया जी आपको घर छोड़ दे.. !”
“नो थैंक यू ! मैं मेरी गाड़ी लेकर आई हूँ.. !”
“अरे यहीं पार्किंग में रहने दीजिये न ! यहाँ से कौन ले जायेगा .. ?कल आकर वापस ले लेना.. !”
“लेकिन कल मैं अस्पताल आउंगी कैसे.. ?”
“,हम सुबह सुबह आपको लेने आ जायेंगे.. !”
“क्यों आपके पास और कोई काम नहीं है.”. पिया ने मन ही मन ये सोचा ज़रूर पर कह नहीं पायी.. वो निकलते वक़्त अपनी माँ से फ़ोन पर बात कर रही थी, भावेश को देखते ही उसका मुहँ उतर गया लेकिन उसने उस पर ज़ाहिर नहीं होने दिया, फ़ोन पर दूसरी तरफ मौजूद उसकी माँ को भी समझ में आ गया था की भावेश पिया से घर छोड़ने की ज़िद कर रहा है…..
“पिया ! बदतमीज़ी से बात मत करना.. !”
“हम्म !” छोटा सा जवाब देकर पिया ने भावेश को देख कर धीमे से सर हिला दिया और आकर उसकी गाड़ी में बैठ गयी…
” और पिया जी क्या चल रहा है.. ?”
पिया ने एक नज़र उसे देखा और बोलना शुरू कर दिया…
” आज सुबह से ओपीडी में कई मरीज़ आये, इन्हें देख रही थी की इंटरनल मेडिसिन से मुझे कॉल आ गया, वहाँ पहुंची तो मालूम चला की डेक्सोना स्टॉक में से ख़त्म हो चुकी है, चूँकि इस हफ्ते स्टॉक मेंटेनेंस की ज़िम्मेदारी मुझ पर थी, मैंने फ़ौरन बची हुई स्ट्रिप्स जोड़ी और बाकि दवाओं के लेवल जांचने लगी.. उस काम से निपटी ही थी की इमजेंसी से कॉल आ गया.. भागती हुई वहाँ पहुंची तो देखा एक कॉम्प्लिकेटेड डिलीवरी आई हुई थी.. हमारी गायनेक उसे ट्रीट करने तैयार हो रही थी, और मुझे उनका साथ देना था.. हम ने मिल कर ओ टी रेडी करने को कहाँ और खुद तैयार होने लगे…
केस बहुत बिगड़ा हुआ था, उस औरत का बीपी काफ़ी शूट हो रखा था, पैरोे में स्वेलिंग भी थी.. प्री एक्लेम्पशिया की मरीज थी वो…
पिया के कानों में ब्लूटूथ लगा था.. उसकी माँ ने उधर से उसे टोक दिया…
“पिया आख़िर तुमने बदतमीज़ी शुरू कर ही दी न.. आख़िर चाहती क्या हो.. अभी के अभी उसे सॉरी बोलो.. !”
“पर क्यों.. ?”
भावेश पिया का “पर क्यों” सुनते ही उसे देखने लगा..
“पिया जी कहीं कॉफ़ी पीने चलें.. ?”
“पिया हाँ बोल दे ! और जा बेटा उसके साथ कॉफ़ी पी, तभी तो भावेश को समझ पायेगी.. !”
पिया ने अपनी माँ का कॉल कट किया और भावेश को देख कर हाँ में सर हिला दिया…
“वो सॉरी भावेश जी, मैं आज कुछ ज्यादा ही थक गयी थी, इसलिए शायद अस्पताल की सारी टेंशन आप पर निकाल दी.. !”
“अरे नहीं कोई बात नहीं !ऐसा होता है क़भी क़भी.. वैसे किस कैफे में चलें.. ?”
“बरिस्ता चलें.. मुझे वहाँ की कॉफ़ी बहुत पसंद है.. !”
“वाओ !ये हलकी हलकी सी बारिश और बरिस्ता की कॉफ़ी.. मजा ही आ जायेगा.. !वैसे हमें कॉफ़ी से ज्यादा चाय पसंद है.. !”भावेश की बात पर पिया ने भी हामी भर दी..
“ओह्ह ऐसा है तो कहीं चाय पी लेते हैं… मुझे भी ऐसी बारिश में किसी टपरी पे खड़े होकर चाय पीना पसंद है… !
भावेश ने गाड़ी आगे बढ़ा दी….. लम्बी सी धुली धुली सी सड़क पर एक तरफ एक चाय वाला खड़ा था.. उसकी टपरी पर जाकर भावेश ने गाड़ी रोक दी..
दो कप चाय के लिए बोल कर वो दोनों सामने रखी बेंच पर बैठ गए… बेंच पर बैठें वो लोग सामने गिरती झमाझम बारिश को देख रहें थे, पिया ने धीरे से अपना हाथ शेड से बाहर निकाल दिया, बारिश की बुँदे उसकी हथेलियों पर गिर रहीं थी.. उसे अचानक ही समर की याद आ गयी…
उस दिन जब समर ने उसे फ़ोन कर के उसके घर मिलने आने की बात कही थी और वो गिरते पड़ते भागती हुई सी अपने फ्लैट में पहुंची थी..उसके घर पर पिछले चार दिन से बाई भी नहीं आई थी, और ऐसे में अस्त व्यस्त घर को सही करने के पहले ही समर ने पहुँच कर डोरबेल बजा दी थी…
और उसके बाद मंत्री जी पूरी मुस्तैदी से उसके घर को चमकाने में लग गए…
समर और पिया ने मिलकर साफ़ सफाई कर के उसके फ्लैट को चमका दिया था….
दोनों के लिए कॉफ़ी बना कर उसके लाते में मंत्री जी साफ सुथरे से फ़्लैट में सोफे पर पसरे मोबाइल पर कुछ देख रहें थे की उनका फ़ोन बज गया था…
और पिया के माथे को चूम कर जल्दी वापसी का प्रॉमिस कर वो बिना कॉफ़ी पिए ही निकल गया था…..
“क्या हुआ बारिश देख कर मुस्कुरा रही हो.. ?”
भावेश के सवाल पर पिया चौंक कर वर्तमान में चली आयी, और हाँ में गर्दन हिला कर उसने अपने हाथ में पकड़ रखा कप उठा कर मुहँ से लगा लिया….
उसी टपरी में रेडियो पर कोई गीत चल रहा था…
जाने क्या चाहे मन बावरा
अंखियन मेरे सावन चला…
सजन अंसुवन में क्या जोर होवे….
क्या जोर होवे अपने जिया पे,
मन तो मेरा ये मनचला……
क्रमशः
aparna…..
