
जीवनसाथी 2- भाग -13
पिया भावेश से मिलकर अपने फ्लैट में वापस चली गई लेकिन उसके मन में रह रहकर समर का इस कदर उसे अनदेखा कर जाना खल गया…
अपने फ्लैट की बालकनी में खड़ी वह दूर तक फैले रास्तों को देखती हुई अपनी ही सोच में गुम हो गई…
कितने प्यारे दिन थे वो जब वह अक्सर अस्पताल से समर से मिलने जाने के बहाने ढूंढा करती थी, और समर भी किसी ना किसी तरीके से उससे मिलने के लिए वक्त चुरा ही लिया करता था….
यह और बात थी कि उन दोनों का प्रोफेशन ही कुछ ऐसा था कि कभी भी वक्त तय कर मिलने की सोचो तो भी कभी समर को काम पड़ जाता था और कभी पिया को लेकिन इसके बावजूद वह दोनों एक दूसरे के साथ कितने खुश थे…
उनकी सगाई तक सब कुछ तो सामान्य चलता जा रहा था… लेकिन अचानक यह शादी का मसला आया और उसके देखते-देखते सब कुछ बर्बाद हो गया… उसके पास भी तो सगाई तोड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था…
और उसकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उसने जिस कारण सगाई तोड़ी थी, वह उस कारण को ना तो अपने घर वालों से बता सकती थी और ना ही समर से…
अंदर ही अंदर घुटती तड़पती वह खुद कैसे जी रही थी यह वही जानती थी…
अगर उसकी मां ने अपनी कसम ना दी होती तो वह भावेश के लिए भी कभी हां नहीं कहती, वह तो पूरी जिंदगी समर का नाम लेते हुए ही गुजार देती..
लेकिन आखिर उसकी मां ने ही तो उसे पैदा किया था ! उसे इस लायक बनाया था कि आज वह अपने पैरों पर खड़ी थी, अपने निर्णय अपने लिए ले सकती थी… तो फिर उस मां की इच्छा का मान रखने के लिए क्या वह एक बिना मन की शादी नहीं कर सकती थी.. ?
और वही तो वह करने जा रही थी..
हालांकि उसके मन के किसी कोने से हमेशा उसे आवाज आती थी कि, नहीं पिया समर तुझे आकर रोक लेगा! तुझे भावेश से शादी नहीं करने देगा ! जब तब समर उसके सामने पड़ कर उसे यह इशारा भी दे रहा था…
… उस दिन तो लिफ्ट में वह कैसी बेशर्मी कर गया था.! उसकी बेकरारी साफ झलक रही थी जब उसने पिया को खींच कर अपने सीने से लगा लिया था…
उसकी खुशबू में मदहोश पिया भी फिर कहां उसे खुद से अलग कर पा रही थी.. बल्कि मन ही मन वह चाहती थी कि लिफ्ट का यह सफर चलता ही रहे, कभी खत्म न हो और वह ऐसे ही समऱ की बाहों में बंधी रहे |
अपने मन को कितना कड़ा करना पड़ा था उसे, खुद से समर को अलग करने के लिए ! लेकिन तब भी मन ही मन उसकी चाह यही थी कि समर उसकी कलाई पकड़कर उसे रोक ले और भावेश के सामने जाकर कह दे कि इस लड़की के बारे में सोचना छोड़ दो इससे तो शादी मैं ही करूंगा…
लेकिन आज समर का जो व्यवहार था उसने पिया को अंदर से तोड़ कर रख दिया | उसने कभी नहीं सोचा था कि समर उसे इस तरह अनदेखा कर जाएगा…
अपने ख्यालों में खोए पिया का ध्यान नीचे गेट के पास खड़े एक इंसान पर चला गया…… बहुत ही हल्के बादामी रंग की शर्ट के साथ गहरे सलेटी रंग के पेंट में किसी को देखकर अचानक पिया को लगा जैसे यह समर है… सामने गेट पर जो भी आदमी खड़ा था उसकी पीठ पिया की तरफ थी, इसलिए पिया उसका चेहरा नहीं देख पा रही थी… लेकिन पीछे से उसका डीलडौल, उसके कंधे, उसके बालों का तरीका, उसके खड़े रहने का स्टाइल सब देखकर पिया को यूं लगा जैसे यह हो ना हो समर ही है|
अपने मन की बेचैनी को संभालती पिया ने अपने पेट पर अपने दोनों हाथ रख लिये..
उसे अब भी समर की एक झलक मिलते ही पेट में तितलियां उड़नी महसूस होने लगती थी.. उन तितलियों को रोकने के लिए पिया अपने पेट को दबाए वहां से झांकती रही ! लेकिन जब उसने देखा कि वह आदमी लगातार वहां पर बैठे गार्ड से कुछ बात कर रहा है तब पिया को लगा हो ना हो यह पक्का समर ही है…
साथ ही उसे यह भी लगा कि समर उससे ही मिलने यहां आया है ! वह बराबर उस पर नजर रखे हुए थी ! लेकिन उसके देखते देखते ही वह आदमी गार्ड से बात करने के बाद गेट से बाहर की तरफ ही बढ़ने लगा, और अब पिया से वहां रुकना मुश्किल होने लगा ! वह फटाफट अपने घर के दरवाजे से बाहर निकल पड़ी | लिफ्ट से होते हुए वह भागती हुई सी मेन गेट की तरफ पहुंची, तब तक वह आदमी चलते हुए काफी आगे निकल गया था | लेकिन उसकी गाड़ी अब भी मेन रोड पर खड़ी थी… |
पिया तेज कदमों से उसकी तरफ भागती चली जा रही थी…. लेकिन इतनी तेजी से उसकी तरफ चलते हुए पिया को अचानक आभास हुआ कि अगर वह सामने चलता हुआ लड़का कहीं पीछे पलट गया और वह समर ही निकला तो पिया उसे अपनी इस तरह उसके पीछा करने की क्या कैफियत देगी, और यह सोचते हुए उसके कदम धीमे पड़ गए..
लेकिन तभी इत्तेफाक से वह नीचे झुका और अपनी शू लेस बांधने लगा.. उसी वक्त पिया ने अपने कदम थोड़े तेज़ कर दिए और इस तरह चलने लगी कि उसके बगल से निकल कर आगे बढ़ जाए..
आगे बढ़ते हुए वह एक झलक यह भी देख लेगी कि वह समर है या नहीं ? और समर इस तरह सुनसान रास्ते में उसे देखकर पक्का उसकी बांह पकड़ कर उसे रोक लेगा ! बस यही सोचकर पिया चलती हुई उस लड़के तक पहुंच गई ! उस से एक कदम आगे निकलते हुए उसने पलट कर उसकी एक झलक देखी और उदासी से उसके कदम वहीँ जम गए…
वह लड़का समऱ नहीं कोई और था…
अपने पागलपन पर पिया खुद हैरान रह गई.. सिर्फ समर की एक झलक के लिए वह पागल होकर नाइट सूट में ही चप्पल पहनकर रोड पर दौड़ी चली आई थी !
क्यों वो इतना दर्द अकेले ही झेल रही थी? क्यों वह समर से मिलकर उसे सारी सच्चाई बता नहीं देती थी? आखिर ऐसा क्या डर उसके मन में बैठा हुआ था जो वह समर से सारी बातें साफ साफ नहीं कह पा रही थी ? अपना सा मुहं लिए वह वापस अपने फ्लैट की तरफ बढ़ गई…
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समर ने दर्श को फ़ोन कर के महल में बातचीत के लिए बुलवा लिया था, और अब दून जाने का कोई ठोस कारण नहीं रह जाने से वो लोग वापस लौट गए थे…..
दर्श तो वहीं से सीधे राजा साहब के महल जाना चाहता था लेकिन अनिरुद्ध पहले एक बार घर लौटना चाहता था, उसे लग रहा था कि कहीं बांसुरी उसके शहर पहुँच तो नहीं गयी… और अगर पहुँच गयी होगी तो उसकी एक झलक से अपनी आंखे तृप्त करने के बाद ही वो निकलेगा… !
दर्श ने मालूम करने कि कोशिश भी कि लेकिन मालूम नहीं चल सका और इसलिए वो दोनों अपने शहर लौट गए…
वो दोनों जब पहुंचे तब सुबह हो रही थी…. कोई व्यक्ति किसी भी स्वभाव का हो लेकिन हर किसी को बाहर से लौटने पर अपना घर स्वर्ग लगता है.. और फिर अनिरुद्ध ने अपना आशियाना बनवाया भी ऐसे था कि उसकी हर ज़रूरत के सामान के साथ भी घर प्राकृतिक सुंदरता का सुंदर नमूना था…
घर में बड़े से हॉल से होकर ऊपर कि तरफ सीढ़ियां जाती थी जहाँ दर्श और अनिरुद्ध के कमरे थे..
उस बड़े से हॉल के एक तरफ बड़ी सी रसोई थी जिसका दरवाजा किचन गार्डन में खुलता था जहां ढेर सारी सब्जियां और फलों के पेड़ लगे हुए थे…
रसोई के बाजू से लगा एक और कमरा था जिसका मुख्य दरवाजा हॉल में ही खुलता था और यह काका के रहने का कमरा था ! वह नीचे ही रहा करते थे ! जिससे घर की देखभाल में उन्हें आसानी हो ! हॉल की दूसरी तरफ एक बहुत बड़ा सा दरवाजा था, जिसे खोल कर पार करने के बाद बरामदे में जाया जा सकता था ! उस बरामदे को पार करते ही एक खूबसूरत सा बगीचा था जहां पर प्राकृतिक झरने की तर्ज पर पूल बना हुआ था…
पुल के चारों तरफ बड़े-बड़े पत्थरों को अलग-अलग आकृतियों में सजाकर तैयार किया गया था और ढेर सारे पेड़ पौधे और लताओं से घिरा वह पूल एक नजर देखने पर किसी जंगल के झरने का आभास दिया करता था….
अनिरुद्ध का उसके बचपन के गांव, गांव में बहते झरने और जंगलों से लगाव उसके घर के इंटीरियर में देखा जा सकता था…
दर्श का पैसा भी इस घर में लगा था, लेकिन अनिरुद्ध ने दर्श के पैसों को अब तक लगभग तीन गुना कर दिया था, और इसलिए इन दोनों ही दोस्तों के बीच रुपए पैसों का कोई हिसाब किताब नहीं होता था…..
वह दोनों ही प्रकृति प्रेमी थे और इसीलिए कृत्रिमता उन दोनों को नहीं भाती थी….
अपने-अपने बैग टांगे उन लोगों ने जब मुख्य द्वार से हाल में प्रवेश किया तो काका उन दोनों को देखकर ही प्रसन्न हो गये ….
” काम हो गया, लगता है..? आप दोनों हाथ मुहं धोकर आइये मैं चाय नाश्ते का प्रबंध करता हूं..!”
अनिरुद्ध काका की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए ऊपर चला गया और दर्श वहीं सोफे पर बैठ कर काका को रास्ते का किस्सा सुनाने लग गया…
दर्श अभी काका से बात कर ही रहा था कि, उसके फोन पर नेहा का फोन आने लगा… दर्श ने चौक कर फोन उठाया तो दूसरी तरफ से नेहा चहक उठी…
” तुम लोग वापस आ गए बहुत अच्छा हुआ.. ? तुम लोगों का काम हो गया..?”
” नेहा!! तुम्हें कैसे पता चला कि हम लोग वापस आ गए हैं..?”
” उससे तुम्हें क्या लेना देना..? मैं यह बता रही थी कि मैं अभी तुम्हारे घर आ रही हूं..!”
” लेकिन क्यों..?” उस क्यों का जवाब देने के लिए नेहा ने फोन बाकी ही नहीं रखा था.. उसने फोन काट दिया था…
दर्श और काका एक दूसरे की तरफ देखकर आश्चर्य से मुंह बाए खड़े रह गए…
” काका मैं भी नहा कर आ जाता हूं… अगर वह लड़की आती है तो उसे प्लीज बैठा लेना..!”
काका ने एक नजर डरते हुए ऊपर अनिरुद्ध के कमरे की तरफ देखा और फिर वापस दर्श को देखने लगा…
” वह नाराज तो नहीं हो जाएगा ना..?”
काका का डर जायज था… यह दर्श समझता था ! क्योंकि उन लोगों की उस हवेली में आज तक कोई लड़की कभी नहीं आई थी.. और यह दर्श की ही बेवकूफी थी कि उसने नेहा को इस घर का पता ठिकाना बता दिया था….
अनिरुद्ध की अनुपस्थिति में वह एक बार इस घर का चक्कर लगाकर जा चुकी थी और उस वक्त सिर्फ काका ही वहां मौजूद थे….
अनिरुद्ध और दर्श ने अपने घर के सुरक्षा कारणों से घर के बाहर सारे बगीचे और मुख्य मार्गों पर सीसीटीवी कैमरा लगाया हुआ था.. वहीं कैमरा उन लोगों ने हॉल में भी लगा रखा था… नेहा जिस दिन घर आई, उस दिन अनिरुद्ध और दर्श दून के लिए निकल चुके थे और इसीलिए उसकी मुलाकात उन दोनों से तो नहीं हुई लेकिन इस कैमरे से जरूर हो गई…
वही रखी स्क्रीन पर स्क्रोल करके उसने कैमरे का एक्सिस अपने मोबाइल पर भी डाल लिया था…
यह सब करते वक्त उसने बड़ी चालाकी से काका को अपने लिए कॉफी बनाने रसोई में भेज दिया था और इसलिए उसके किये इस काम को काका नहीं समझ पाए थे…!
दर्श और अनिरुद्ध दून के रास्ते पर थे इसलिए उन लोगों का ध्यान भी मोबाइल पर नहीं गया था.. और उन दोनों ने ही उस दिन मोबाइल चेक नहीं किया और इसीलिए वह दोनों भी नहीं जान पाए की नेहा ने क्या किया था…
उस दिन के बाद से अनिरुद्ध की याद में तड़पती नेहा रोज ही दो तीन बार कैमरे कि क्लिप चेक कर लिया करती थी कि अनिरुद्ध वापस आया या नहीं…
आज सुबह बिस्तर पर बैठे-बैठे उसने जैसे ही मोबाइल ऑन किया और उसमें अनिरुद्ध के घर की क्लिप देखी, उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा…
उसे अनिरुद्ध और दर्श दोनों ही हॉल में नजर आ गए…. अनिरुद्ध के सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाते ही उसने दर्श को फोन लगा लिया था और उससे बात करने के बाद कूदकर बाथरूम में घुस गई थी… और वो लगभग आधे घंटे में तैयार होकर अनिरुद्ध के घर के बाहरी दरवाजे के बाहर खड़ी डोरबेल बजा रही थी..
काका ने घबराते हुए जाकर दरवाजा खोल दिया.. वह समझ गए थे कि घर के बाहर नेहा ही खड़ी है.. अनिरुद्ध और दर्श तब तक नीचे नहीं उतरे थे..
नेहा ने जैसे ही काका को देखा वह मुस्कुरा कर अंदर चली आई…
अपने पर्स को सोफे पर पटक कर काका से पूछती हुई वह सीधे रसोई में दाखिल हो गई…
” काका अगर आपको बुरा ना लगे तो आज नाश्ता हम बना दे..?”
काका की साँसे अटकने लगी थी…. क्योंकि वह अनिरुद्ध का गुस्सा अच्छे से जानते थे !
अनिरुद्ध के सिर्फ खुद के लिए ही बनाए नियम नहीं थे उसके नियम ऐसे थे जो उसके अलावा घर पर मौजूद हर किसी को मानने पड़ते थे… बल्कि वो ज़बरदस्ती मनवाता था..
काका को खुद बीड़ी पीने की बहुत बुरी लत थी, लेकिन मजाल जो अनिरुद्ध ने उन्हें इस पूरे घर की बाउंड्री के अंदर कभी भी बीड़ी पीने दी हो…
वह अच्छे से जानता था कि काका बिना बीड़ी के नहीं रह सकते और इस उम्र में आकर अब अपनी इस आदत को छोड़ना भी उनके लिए मुश्किल था..
बावजूद अनिरुद्ध को जब मौका मिलता वह उन्हें बैठ कर उसके नफे और नुकसान गिनाता रहता…
इसके अलावा उन्हें कई ऐसी चीजें ला कर देता जिन्हें चबाने के बाद वह अपनी बुरी सी लत को छोड़ सकें लेकिन वह भी उसे छोड़ पाने में असमर्थ थे और यह बात अनिरुद्ध भी समझता था…
इसीलिए सुबह-शाम दो बार काका घर से दूर निकल कर बाहर जंगलों में जाकर आराम से बैठ कर बीड़ी सुलगा लिया करते थे…
उन्हें आज भी वो दिन याद था जब अनिरुद्ध के बार बार मना करने पर भी उनके घर का एक बाइस साल का नौकर शराब पीकर घर में घुस आया था और बड़बड़ करते हुए वहीँ बेहोश होकर गिर पड़ा था…..
उस वक्त तो अनिरुद्ध उसे घूर कर चुप रह गया था, पर अगले दिन उसके होश में आते ही उसे अपने घर और नौकरी से उठा कर दूर पटक दिया था…
बार बार अपनी माँ की कसम खाता जब वो गिड़गिड़ाता रहा की अब वो कभी नहीं पिएगा तब माँ की कसम खाने के लिए अनिरुद्ध ने उसे कस के एक तमाचा लगा दिया था और वार्निंग दे दी थी की अब अगर उसे शराब के नशे में देखा तो उसी शराब को उसके ऊपर छिड़क कर आग लगा देगा..
अनिरुद्ध का ऐसा डर था की उस लड़के ने फिर कभी शराब क्या कोल्ड ड्रिंक्स तक को हाथ नहीं लगाया था..
बस ऐसे ही नियमों में से एक नियम था कि इस घर में कभी कोई लड़की दाखिल नहीं होगी….
और आज वह नियम टूटने वाला था हालांकि इस नियम के टूटने के पीछे ना काका खुद थे और ना दर्श और ना खुद अनिरुद्ध.. लेकिन इस ज़िद्दी और बिगड़ैल लड़की को समझाना टेढ़ी खीर थी और इसीलिए उन्होंने अपने आपको वक्त के हवाले कर दिया था…
जो भी होगा देखा जाएगा की तर्ज पर वह रसोई को नेहा के हवाले सौंप एक तरफ हाथ बांधे खड़े हो गए थे…
वैसे भी अनिरुद्ध और दर्श जो खाना पसंद करते थे, वह सब वह पहले ही बनाकर डाइनिंग टेबल में सजा चुके थे… उन्हें बस दर्श और अनिरुद्ध का इंतजार था…
” काका आलू कहां रखे हैं आप बताएंगे..?”
काका ने एक तरफ का दराज़ खोलकर उसमें नीचे रखे आलू उसे निकाल कर दे दिए…
” अब बताइए आटा कहां रखा है..?”
उन्होंने आटा भी निकाल कर दे दिया..
” मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूं..?”
” बस आप मुझे बर्तनों की जगह बता दीजिए..! मुझे कुकर, एक बड़ी कड़ाही और बेलन की जरूरत होगी..!
काका ने चुपचाप सब निकाल कर रख दिया.. लेकिन उनके दिल कि धुकधुक जारी थी…
नेहा ने कुकर में आलू उबलने रखे और आटा गूंथने लगी…
उसे रसोई में काम करने कि आदत थी, अपने कमरे में भी खाना वो खुद ही बनाया करती थी इसलिए फटाफट उसने सारी तैयारी कर ली…
कुछ देर में ही दर्श और अनिरुद्ध नीचे चले आए….
अनिरुद्ध की आवाज सुनते ही काका रसोई में खड़े हुए हड़बड़ा गए और नेहा मुस्कुराते हुए ट्रे सजाने लगी…
“हम लेकर चले जाएं… ?”
काका के सवाल पर उसने मुस्कुरा कर न में सर हिलाया और ट्रे में सारा सामान लिए बाहर चली आयी…
डायनिंग टेबल पर बैठे अनिरुद्ध और दर्श नेहा को रसोई से बाहर आते देख चौंक गए.. अनिरुद्ध ने दर्श को घूर कर देखा और दर्श ने अनजान बनते हुए कंधे उचका दिए…
“गुड मॉर्निंग अनिरुद्ध, हेलो दर्श !”
अनिरुद्ध उसे देखने के बाद अपनी डायनिंग टेबल के कांच को घूरने लगा और नेहा मुस्कुरा कर उसकी प्लेट में आलू के पराठे परोसने लगी… उसने जैसे ही दही कटोरी में निकाल कर उसकी तरफ बढ़ाया उसने हाथ उठा कर मना कर दिया…
“क्या हुआ.. ?आप दही नहीं पसंद करते .. ?”
“मै बहुत सी चीजे पसंद नहीं करता.. !”
अनिरुद्ध ने सामने खड़े काका कि तरफ देखा और वो निरर्थक इधर उधर बर्तनों को करते व्यस्त दिखने का बहाना करने लगे…
उन्हें समझ आ गया था कि इस लड़की के यहाँ से जाते ही आज उनकीं खैर नहीं थी…
नेहा ने दर्श कि प्लेट परोसी और अपनी परोस कर ठीक अनिरुद्ध के बाजु वाली कुर्सी में आ बैठी….
अनिरुद्ध के पास आते ही उसने एक गहरी सी सांस खींची और आंख बंद कर ली.. कुछ देर बाद ऑंखें खोल वो अनिरुद्ध को देखने लगी…
“कौन सा परफ्यूम लगाते हो.. ?”
अनिरुद्ध उसके इस सवाल पर चौंक कर उसे देखने लगा…
“अच्छा है, इसलिए पूछा.. !”
काका कि डर से धड़कन इतनी तेज़ हो गयी थी कि वो किसी तरह खुद को संभाल कर रसोई में चले गए.. दर्श उनके पीछे जाने को था कि अनिरुद्ध ने उसे घूर कर वहीँ बैठा दिया… उसी वक्त कुछ ऐसा हुआ कि दर्श और अनिरुद्ध दोनों के मुहं खुले के खुले रह गए…
नेहा ने अपनी प्लेट से एक निवाला उठाया और अनिरुद्ध के होंठो के आगे रख दिया…
” खाते हुए कुछ सुनना पसंद करेंगे.. मै गा भी लेती हूँ.. !”
ये लड़की पूरी पागल थी क्या.. एक तो शेर कि मांद में अकेली चली आयी थी उस पर उसके जबड़े को खोले उसके दांत गिनने कि कोशिश कर रही थी… उसकी बात पर दर्श भी अब घबरा उठा…
वो अनिरुद्ध कि तरफ देखने लगा, अनिरुद्ध भी उसे ही देख रहा था… अनिरुद्ध अभी दर्श को घूर रहा था कि नेहा वहाँ से उठ कर कब वहाँ एक तरफ रखी वीणा तक पहुँच गयी.. वो दोनों नहीं जान पाए…
नेहा कि मीठी सी आवाज कानों में पड़ी और दर्श अनिरुद्ध के साथ साथ चौंक गया..
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके..
नैना मिलाइके, मोसे नैना मिलाइके…
सब कुछ मोरा छीनी रे मोसे नैना मिलाइके….
लेकिन उसके गीत में कुछ तो था जो अनिरुद्ध सब भूल कर बांसुरी कि याद में खो गया…..
खुसरो निज़ाम के बलि बलि जै हैं..
खुसरो निज़ाम के जान लूटै हैं..
मोहे सुहागन किन्ही रे मोसे नैना मिलाइके……
अनिरुद्ध उसका गाना सुनते हुए उस तक पहुँच गया… कांच के बड़े से दरवाज़े के पार गिरती बारिश में झरना कल कल कर रहा था और नेहा पीछे से बांसुरी के होने का एहसास जगा रही थी….
कानों में झूलता झुमका,उस झुमके से उलझती बालों की लट, सफेद कुर्ते पर रंगीन जामदानी ओढ़नी.. बिलकुल ऐसी ही तो वो उस दिन नज़र आ रही थी, जब वो उसके ऑफिस के बाहर से निकल रहा था और वो वहाँ से एक तरफ किसी वृक्षारोपण कार्यक्रम की मुख्य अतिथि बनी पौधा रोपने जा रही थी…
प्रेम भटी का मदवा पिलाई के
मतवाली कर दीन्हि रे, मोसे नैना मिलाई के..
अनिरुद्ध ने जाकर पीछे से नेहा को बांहों में भर लिया….
क्रमशः
aparna….
