अपराजिता -129

अपराजिता -129

कुसुम के बालों पर हाथ फेरते हुए यज्ञ का दिमाग इसी बात पर लगा हुआ था की उसकी गाडी के ब्रेक्स कैसे फेल हुए.. ?

कुसुम बहुत देर तक उसके सीने से लगी खड़ी किसी अगली बात का इंतज़ार करती रही, लेकिन जब यज्ञ ने कुछ नहीं कहा तो वो उसे पलट कर देखने लगी..

“क्या हुआ ? कुछ विचार कर रहे हैं..?”

” हां कुसुम हम सोच रहे थे हमारी गाड़ी एक दिन पहले तक बिल्कुल ठीक थी, एकदम अच्छे से चल रही थी। फिर अचानक जब अखंड भैया गाड़ी लेकर गए तो गाड़ी के ब्रेक कैसे नहीं लगे? और सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात की हैंड ब्रेक्स भी काम नहीं कर रहे थे। ऐसा लग रहा है जैसे जानबूझकर किसी ने गाड़ी से छेड़छाड़ की है।”

” लेकिन गाड़ी तो घर पर ही खड़ी थी ना? क्या कोई आपसे गाड़ी मांग कर लेकर गया था?”

कुसुम के सवाल पर यज्ञ सोचने लग गया, और सोचते हुए उसने ना में गर्दन हिला दी।

“नहीं हमसे मांग कर तो कोई नहीं ले गया था।”

” सुनिए छोटे ठाकुर, हमें एक बात याद आ रही है।”

कुसुम ने यज्ञ को देखते हुए कहा। यज्ञ कुसुम की तरफ देखने लगा।

” उस दिन जब अनंत बाबू को आपने थप्पड़ मारा था, उसके बाद वह गुस्से में घर से बाहर निकल कर गैरेज की तरफ गए थे।”

” यह तुम्हे कैसे पता?”

” क्योंकि उस समय हम सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जा रहे थे। ऊपर जाते समय सीढिओ वाली दीवार पर की पूरी खिड़की गेराज की तरफ ही तो खुलती है।  हमने आपकी गाड़ी के पास खड़े देखा था उन्हे। उस वक्त हमने ध्यान नहीं दिया और हम तैयार होने के लिए ऊपर चले गए। क्योंकि आप हड़बड़ी मचा रहे थे।”

” तो यह बात है, यह सब अनंत ने किया है।”

” सुनिए छोटे ठाकुर, आप बिना किसी जांच पड़ताल के एकदम से उन्हें कसूरवार मत ठहराइएगा, क्योंकि हो सकता है उन्होंने ऐसा ना किया। और गाड़ी के ब्रेक अपने आप खराब हुई हो।”

” गाड़ी के ब्रेक अपने आप खराब हो सकते हैं कुसुम लेकिन, तब जब बहुत समय से गाड़ी की सर्विसिंग ना हुई हो। हम तो गाड़ी की टाइम पर  सर्विसिंग के लिए भेजते हैं। और फिर ज्यादातर वक्त ड्राइवर की जगह हम अपनी गाड़ी खुद चलाते हैं, और हमें पता था हमारे ब्रेक्स बिल्कुल भी खराब नहीं है। फिर अचानक गाड़ी के ब्रेक खराब होना हमें सोचने पर मजबूर कर रहा है..।
हम अभी जाकर उस अनंत की खबर लेते हैं।”

” छोटे ठाकुर बहुत रात हो गई है, अभी घर में सभी सो गए हैं। अभी अगर आप उनके कमरे में जाएंगे तो बेकार में हल्ला मचेगा और अम्मा जी और बाबूजी की नींद भी खराब हो जाएगी।
सुबह तक का इंतजार कर लीजिए।”

यज्ञ के चेहरे पर नाराजगी नजर आ रही थी, लेकिन कुसुम की बात सुनकर वह रुक गया।

” आजकल आप ज्यादा ही समझदारी वाली बातें करने लगी है, छोटी ठकुराइन।”

यज्ञ ने मुस्कुराकर कुसुम से कहा और कुसुम धीमे से हंस पड़ी।

” अब आप भी सो जाइए, बहुत रात हो गई है।”

यज्ञ ने हां मैं गर्दन हिलाई और अपने पलंग पर पसर गया..

कुसुम भी तकिया उठाये काउच की तरफ बढ़ने लगी..

“आप भी अपने पलंग के आधे हिस्से पर अपना हक जता सकती हैं, छोटी ठकुराइन!”
यज्ञ ने मुस्कुरा कर कहा, और कुसुम अपना तकिया उठाए तेजी से चलकर पलंग के अपने वाले हिस्से पर चली आई…

बड़े दिनों के बाद ऐसी रात आयी थी, जब वो दोनों एक साथ इस कमरे में थे, यज्ञ कुसुम को अपने बचपन की ढेर सारी बातें बता रहा था..
यज्ञ को अपना बचपन बड़ा प्यारा था.. वो एक के बाद एक किस्से सुनाता जा रहा था, और उसके किस्से सुनती हुई कुसुम कब गहरी नींद में लुढ़क गयी उसे पता ही नहीं चला..
उसने कुछ बताते हुए कुसम की तरफ देखा तो वो गहरी नींद में डूबी हुई थी….

कुसुम पर नजर पड़ते ही यज्ञ मुस्कुरा उठा, उसने बत्ती बुझा दी और खुद भी आराम से सो गया.. !

*****

रोज़मर्रा के काम भावना के लिए कोई बहुत बड़ा जंजाल नहीं था..
उसके लिए ये सब बांये हाथ का खेल था.. अपनी अम्मा को बचपन से देखती आयी थी वो.. बस वही सब आदते उसमे भी थी..।
वो राजेंद्र के अस्पताल निकालने के बाद घंटे भर में घर का सारा काम समाप्त करके कोई ना कोई नया काम तलाश करती रहती थी। उसे पढ़ने लिखने का शौक था लेकिन कॉलेज उसका छूट चुका था। घर पर बैठी बैठी वह पहले तो अखबार चट कर जाती, और उसके बाद जब कुछ नहीं बचता तो राजेंद्र की मेडिकल की किताबें निकालकर पढ़ने लगती थी। उसके पास और कोई उपाय भी नहीं बचा था..।

उस दिन घर का सारा काम निपटाकर उसने खाना बनाया और  बाहर वाले कमरे में राजेंद्र की मेडिकल की पहले साल की शरीर रचना विज्ञान की किताब खोलकर पढ़ने लगी।

पढ़ते पढ़ते जाने कब उसकी आंख लग गई। वह बाहर वाले कमरे में बैठी थी, इसलिए उसने दरवाजे पर कुंडी नहीं लगाई थी। दोपहर में खाने के वक्त जब राजेंद्र घर पहुंचा तो वहीं पर दीवार से टिक कर आंखें मूंदे बैठी भावना पर उसकी नजर पड़ गई । भावना के हाथों में शरीर रचना की किताब देखकर राजेंद्र को कुछ समझ नहीं आया, धीरे से भावना के पास जाकर उसने उसके कंधे थपथपा दिए।

“भावना ओ भावना सो गई क्या?”

भावना चौंक कर जाग गई।

“अरे आप आ गए। लगता है मुझे नींद लग गई थी।”

” हां, और यह क्या लेकर बैठी हो? मेरी किताब पढ़ रही थी?”

” हां बस ऐसे ही।”

किताब जैसी खुली थी वैसे ही टेबल पर पलट कर रख कर भावना रसोई में चली गई। राजेंद्र ने किताब उठाकर पलटी तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि भावना शुरुआती पेज पर नहीं बल्कि अंतिम पृष्ठों पर पहुंच चुकी थी ।

भावना पानी लेकर चली आई। उसने पानी का गिलास राजेंद्र की तरफ बढ़ा दिया।

” खाना परोस दें?”

” हां दोनों का ही परोस लो। आज अब हॉस्पिटल नहीं जाना है।”

“अच्छा! आज वापस क्यों नहीं जाना?”

” बस ऐसे ही, कुछ दिनों से ज्यादा ही काम कर लिया था। छुट्टियां भी नहीं ली थी। तो आज आधे दिन के लिए अपने एचओडी को बोल दिया कि आज नहीं आऊंगा। सोचा इतनी सारी शॉपिंग की है, घर को थोड़ा तुम्हारे साथ मिलकर सजा लूं। लेकिन देखता हूं कि तुमने पहले ही घर सजा लिया है।”

” नहीं, सजाया कहां है ? अभी बस सामान रखा है। हम तो खुद चाहते थे कि आपका घर है, आप अपने हिसाब से सजाए। “

“यह बात-बात पर आपका घर आपका घर बोलना कब बंद करोगी? अब रहती तो तुम भी हो, इस हिसाब से तुम्हारा भी घर हुआ। तो हम अपने घर को अपने हिसाब से सजाएंगे, ठीक है?”

” जी ठीक है।”

” अच्छा एक बात बताओ, यह किताब कब से पढ़ रही हो तुम?”

” हो गया लगभग महीना भर तो हो ही गया होगा।”

” कुछ समझ में भी आ रहा है?”

” शुरू में समझ में नहीं आ रहा था। हम गांव से पढे हैं ना, हिंदी माध्यम की स्कूल से। इसलिए अंग्रेजी के इतने जटिल शब्द पढ़कर समझ नहीं आ रहे थे। लेकिन साथ में तस्वीरे इतनी अच्छे से दी गई है, और तस्वीरों पर उन मसल्स और बाकी ऑर्गन्स के नाम इतनी सटीक लिखे हुए हैं कि हमें समझ में आने लगा।”

” अरे वाह, तुमने तो ह्यूमन एनाटॉमी की किताब पूरी पढ़ ली?”

धीरे से भावना ने हां में गर्दन हिला दी।

” तुम्हें यह पढ़ना अच्छा लग रहा है भावना?”

” हमें तो बहुत अच्छा लग रहा है, हम तो यह सोच रहे थे कि आपकी पढ़ाई कितनी रोचक रही होगी ना। अपने खुद के शरीर के बारे में जानना कितना अच्छा लगता है। हमें तो पता ही नहीं था कि हमारे शरीर में इतना कुछ है, अंदर भी इतने सारे अंग हैं बाहर तो सब कुछ है ही। बिल्कुल अलग सी दुनिया होती है ना, हमारे अपने शरीर की।”

” हां बहुत अलग दुनिया होती है। और अभी तो तुमने सिर्फ शरीर रचना विज्ञान पढ़ा है। शरीर क्रिया विज्ञान पढ़ोगी ना, तो और भी चीजे मालूम चलेंगी। “

“अच्छा उसमें क्या होता है?”

” उसमें हमारे शरीर के अंदर जितनी भी क्रियाएं होती हैं, उनके बारे में डिटेल्स में दिया होता है। और यह तो मेडिकल की पहली सीढ़ी है। जैसे-जैसे आगे बढ़ती जाओगी, एक से बढ़कर एक रोचक संसार तुम्हारे सामने खुलता जाएगा।”

” तब तो हम बाकी की किताबें भी पढ़ लेंगे।”

” लेकिन इन किताबों को पढ़कर करोगी क्या ? जब आगे कुछ करना नहीं है।”

” मतलब?”

” मतलब अगर इन किताबों को पढ़ना चाहती हो तो पूरे कायदे से पढ़ो।”

” पूरे कायदे से कैसे पढ़ सकते हैं इन किताबों को ?”

“पूरे कायदे से पढ़ने के लिए तुम्हें मेडिकल कॉलेज जाना होगा।”

राजेंद्र बड़ी भावपूर्ण नजरों से भावना की तरफ देख रहा था…

“बोलो जाओगी कॉलेज ?”

भावना आंखें फाड़े राजेंद्र की तरफ देख रही थी। उसने तो आज तक सपने में भी नहीं सोचा था कि वह कभी मेडिकल कॉलेज जा सकती है।

” इतना आसान तो नहीं होगा ना मेडिकल कॉलेज जाना और फिर हमने तो कॉलेज में आकर साइंस छोड़ दी। आर्ट ले लिया था।”

” लेकिन बारहवी तक तो साइंस वाली हि थी ना?”

” हां बारहवीं तक तो साइंस पढा है।”

” इसका मतलब मेडिकल एंट्रेंस दे सकती हो।”

” लेकिन वह तो बहुत कठिन होता होगा?”

” तो मैं किस दिन काम आऊंगा? पूरा साल है तुम्हारे पास। तैयारी करो। मुझे विश्वास है कि तुम सेलेक्ट हो जाओगी। इसलिए नहीं कि तुम्हारा दिमाग बहुत तेज है, इसलिए कि मैं बहुत अच्छी तैयारी करवाने वाला हूं। और मैं बहुत अच्छा पढ़ाता हूं, समझी।”

भावना मुस्कुरा उठी

“इसका मतलब अगर हम सेलेक्ट हो गए तो, हम मेडिकल कॉलेज में पढ़ने जाएंगे।”

” हां और उसके लिए तुम्हें बस जी जान से लग कर एंट्रेंस निकालना पड़ेगा।”

” लेकिन किसी दूसरे शहर में हम कैसे रहेंगे? कैसे पढ़ेंगे?”

” अरे इतना सब सोचने की जरूरत नहीं है। इस शहर में भी मेडिकल कॉलेज है। और तुम यही अपने घर से रहकर पढ़ाई कर सकती हो, समझी।”

भावना के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई ।

“डॉक्टर साहब हम सच में आगे की पढ़ाई कर सकते हैं?”

” बिल्कुल कर सकती हो।”

राजेंद्र की बात सुनकर भावना की आंखों से गंगा जमुना बहने लगी ।
उसने दोनों हाथ जोड़ लिए।

” डॉक्टर साहब आप भगवान है।” भावुकता से भावना राजेंद्र के पैरों पर झुक गई और “अरे यह क्या कर रही हो।” कहते हुए राजेंद्र ने उसे बीच में ही रोक लिया।

उसे कंधों से पकड़ कर राजेंद्र ने सीधा खड़ा कर दिया।

” यह बात बात पर मेरे पैरों में मत झुका करो, मुझे अच्छा नहीं लगता.. ।”

राजेंद्र ने धीरे से भावना के सिर पर हाथ रखा और उसके बालों को सहला दिया।

” जाओ खाना ले आओ, भूख लग गई है।”

मुस्कुरा कर हां मैं गर्दन हिलती भावना अपने आंसू पोंछती रसोई में घुस गई। आज उसके दिल में जो खुशियां मचल रही थी, वह उन्हें किससे साझा करें,

सोच रही थी।

फटाफट उसने खाना परोसा और बाहर ले आई। आज उसने कढ़ी और चावल बनाए थे। राजेंद्र को उसके हाथ की कढी बहुत पसंद थी। यह वह जानते थी, कढी देखते ही राजेन्द्र खुश हो गया।

” जानती हो भावना, मुझे तुम्हारे हाथ की कढी क्यों इतनी पसंद आती है, क्योंकि यह कढी खाकर मुझे मेरे बाबा की याद आ जाती है। बाबा बहुत अच्छी कढी बनाते थे। अपनी अम्मा का तो ठीक से मुझे ध्यान भी नहीं है। मैं बहुत छोटा था, जब वह चली गई थी मुझे छोड़कर। और बाबा ने हीं मुझे पाला पोसा है। बाबा बहुत अच्छा खाना बनाते थे ।
बाद में मुझे पता चला कि बाबा अपनी जवानी के दिनों में धूलेश्वर के बहुत बड़े फारेस्ट रेंजर अब्राहिम कोस्टा के घर खाना बनाया करते थे। जानती हो वह चिकन जब बनाते थे, तो उस मुर्गे को साफ करके उसे रात भर बाहर ओस में टांग दिया करते थे, नमक हल्दी लगाकर..।

एक बार कोस्टा जी के यहां उनके कोई मेहमान आए हुए थे, वह रात में वहीं रुक गए.. ।
रात का खाना खाने के बाद वह बगीचे में कोस्टा के साथ टहल रहे थे। तभी उन्हें वहां उसमें भीगता मुर्गा दिखाई दिया। यह देखकर उन्होंने कोस्टा जी से पूछा आपके घर ऐसे मुर्गा बनाया जाता है? कोस्टा ने कहा हां बिल्कुल तब उन्होंने कोस्टा से इसका कारण पूछ लिया। और कोस्टा ने हमारे बाबा को बुला लिया।
     तब बाबा ने कारण बताया कि रात भर ओस में भीगने के बाद जब अगले दिन मसाले में लपेटकर मुर्गे को पकाया जाता है, तब वह भीगा मुर्गा एक तो जल्दी गल जाता है, दूसरा चांदनी रात के प्रभाव से उसमें मसाले भी जल्दी अंदर तक जाते हैं। और एक अलग ही स्वाद पैदा कर जाता हैं।”

बाबा की यह बात सुनने के बाद उन मेहमान जी को उतना विश्वास नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने बाबा से कहा अगर आपकी कही बात सच निकली तो कल आपका मुर्गा खाने के बाद आपको बदले में सौ सोने की गिन्नियां देंगे..।
अगली सुबह खाने में ढेर सारे पकवान बने और साथ में बना बाबा का स्पेशल मुर्गा। कोस्टा जी के मेहमान ने बाकी चीज एक तरफ करते हुए सबसे पहले उनका मुर्गा चखा, और उसके बाद उन्होंने और किसी पकवान को हाथ तक नहीं लगाया। खाना खाने के बाद उन्होंने बाबा के हाथ चूम लिए। और सौ सोने की गिन्नी निकाल कर तुरंत उनके हाथ में रख दी। बाबा बताते हैं उस समय बाबा की शादी नहीं हुई थी, वह खुश होकर अपने गांव गए। लेकिन रास्ते में उनकी गिन्नी चोरी हो गई। वरना बाबा को वापस लौट कर वह काम करना नहीं पड़ता..।”

“आप अपने बाबा को बहुत याद करते हैं ना?” भावना ने खाना खाते हुए राजेंद्र से सवाल कर लिया।

” बहुत याद करता हूं, क्योंकि उनके अलावा घर परिवार में और कोई है भी तो नहीं जिसे याद कर सकूं..।”

“अरे इसी बात पर याद आया, सरना भैया भी बहुत दिन से आए नहीं है।”

” हां उसके खेत लग रहे हैं, इसलिए अभी उसका आना मुश्किल होगा। बल्कि सोच रहा हूं किसी छुट्टी वाले दिन हम दोनों ही चलते हैं। तुम्हारा घर भी बीच-बीच में  देख लेना चाहिए, वरना बंद पड़े घर कब खंडहर में तब्दील हो जाते हैं, हमें पता भी नहीं चलता।”

” ठीक है..।”

बातों ही बातों में खाना खाते हुए दोनों को बड़ी अबेर हो गई ।

“देखो कहां मैं रोज दस मिनट में खाना खाकर हॉस्पिटल निकल जाता हूं, आज छुट्टी ली तो खाना खाने में 1 घंटे निकल गया।”

” लेकिन अच्छा भी तो लगा, इतनी ढेर सारी बातें जो कर ली।”

भावना ने मुस्कुराकर बर्तन समेटे और रसोई में चली गई। राजेंद्र ने खड़े होकर एक अंगड़ाई ली और खिड़कियां खोल दी।

“आओ भावना चलो सोफे यहां पर ठीक से अरेंज कर लेते हैं ।”

भावना भी राजेंद्र की बात पर बाहर चली आई। दोनों ने मिलकर सारे सामान को जमाना शुरू कर दिया। कुछ सामान भावना खोल चुकी थी, और कुछ अब भी वैसा ही पैक पड़ा हुआ था। एक-एक कर दोनों सामानों को खोलते जा रहे थे, और जिस जगह जो चीज सही लगती वहां सजाते जा रहे थे। एक बहुत खूबसूरत लंबे से लैंप को राजेंद्र ने सोफे के एक किनारे पर रख दिया। उसे कनेक्ट करके उसने जैसे ही ऑन किया एक बहुत खूबसूरत पीली सी रोशनी पूरे कमरे में फैल गई। और उस रोशनी के फैलते ही कमरे का नजारा ही बदल गया।

“अरे वह सिर्फ इस लैम्प से ही कितना कुछ बदल गया कमरे में।”

” हां ऐसा होता है, कभी-कभी एक छोटी सी रोशनी भी पूरे जीने का नजारा बदल देती है।”

भावना को बड़े ध्यान से देखते हुए राजेंद्र ने बात कही और भावना उसकी बात को समझते हुए भी नासमझी का इशारा देती हुई रसोई में चली गई….

क्रमशः

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Savita Agarwal
Savita Agarwal
1 year ago

Very interesting and Fantastic n Fabulous part

Riti
Riti
1 year ago

Hello ma’am , hope everything is fine with you.waiting for the next part

Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Very nice part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

Nancy
Nancy
1 year ago

Dii aprajita ko khtm kr dijiye na pehle please 🥺

Tripti
Tripti
1 year ago

Twist and turn very intresting.khani me aap khaane ki cheezo ka bhut achha detail deti hai….kadi chawal aur bhut kuch bhook lg jaati hai…bhut jalan hoti hai aapki khaanio me hi romance ko jeete hai….real me aise log hote hai kya??aapki luv marriage hai ye to confirm hai.akhand ke nirdosh hone ka intizaar hai 🥰

Ila
Ila
1 year ago

👏👏👏
Why next part is taking too much time ma’am?
waiting eagerly

Vandana
Vandana
1 year ago

Bhavna aur rajendra ki duniya ab ek dusre se hi h …rajendra ne bhavna ka interest dekhte hue use padhai karwane ka kaha h …ek tarah se bhawna ki Amma ka sapna pura ho rha h ….woh bhi toh aise hi kisi ladke se bhavna ki shaadi karwana chaheti thi ..
Kusum ne Shaq sahi dala h ….yagya ki gadi se chedchad anant ne hi ki h
Ab toh yagya pta kar ke hi rahega

Manu verma
Manu verma
1 year ago

लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻♥️♥️♥️♥️♥️⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐🙏🏻💐💐💐💐

कमल जैन
कमल जैन
1 year ago

बेहतरीन

Meenakshi Sharma
Meenakshi Sharma
1 year ago

nice part 👌👍