अपराजिता -128

अपराजिता -128

अनिर्वान दीपक के बारे में मालूम चलते ही उसे पकड़ने निकल गया..
उस बुज़ुर्ग के बताये पते पर पहुँच कर उसने इमली के पेड़ के पास वाले घर के दरवाज़े पर दस्तक देने के पहले वहाँ आसपास मौजूद लोगो से पूछताछ शुरू कर दी..

सुबह सुबह का वक्त था, बड़े कुंआ क्षेत्र में सुबह की अलमस्त चाय पीने के लिए लोगो का जमावडा एक गुमटी पर हो रहा था..।
पुराना सा मोहल्ला था ये, और यहाँ की बसाहट उससे भी पुराने लोगो की थी..। ज्यादातर काम से रिटायर हो चुके बुज़ुर्ग व्यक्ति हलके हलके टहलते हुए गुमटी पर जमा होकर बैठे चाय की चुस्कियां भर रहे थे..।
कुछ एक अख़बार पर आँख गड़ाए बैठे थे, तो कुछ लोगो से सुन सुना कर खबरे पा रहे थे..

अनिर्वान भी सिविल ड्रेस में अपनी पेण्ट की जेब में दोनों हाथ डाले टहलता हुआ वहाँ पहुँच गया… एक चाय का कप लेकर वो भी दो तीन बड़े बुज़ुर्गों के बीच बैठ गया..

“और काका, आसपास कोई घर खाली होगा क्या ?”

उसके सवाल पर वो चार जोड़ा आंखे उसकी ओर उठ गयी..

“काहे ?”

“रहने के लिए !”

“काम क्या करते हो ?”

“यहीं पोस्ट ऑफिस में नौकरी लगी है, अभी अभी.. तो बस घर देख रहे हैं.. सस्ता सा घर मिल जाता रहने के लिए !”

“नयी नौकरी के हिसाब से तो उम्र ज्यादा लग रहा है बाबू तुम्हारा ?”  अनुभवी आंखे बोल पड़ी..

“पीसीएस की तैयारी में पांच साल फूंक दिए कक्का, तब जाकर समझ आया कि हमारे बस का नहीं है। और फिर पोस्ट ऑफिस का फ़ार्म डाले और यहाँ इंटरव्यू में चुन लिए गए.. उम्र इतना भी ज्यादा नहीं है, कक्का इसी सावन उन्तीस पूरा कर लेंगे !”

“हाँ वही.. लग ही रहा, अट्ठाइस उन्तीस बरस के तो होंगे.. अच्छा अकेले हो ?”

“अभी तो फ़िलहाल अकेले ही हैं.. काहे कक्का ?”..

“खाते पीते परिवार वालो का मुहल्ला है, सिर्फ लड़को को तो शायद ही घर मिलेगा.. !”

“हाँ तो शादी करने वाले हैं ना.. लेकिन हम सुने थे कि इमली के पेड़ के पास वाला घर खाली है ?”

“कौन सा, वो लाल पत्थर वाला बंगला ?”

“हाँ हाँ लाल पत्थर ही तो सुने थे काका ?”

“कौन बता दिया जी..? काहे चौधरी, वो लाल बंगला वाली मेडम बंगला किराये पे उठा रही क्या ?”

“हमको तो नहीं पता शर्मा जी ! क्यों दुलारी तुम कुछ सुने हो क्या ?”
शर्मा जी और चौधरी जी एक साथ चाय वाले की तरफ घूम गए, उसने अनभिज्ञता से गर्दन घुमा दी..

“हाँ हाँ हम भी सुने रहे, कि लाल बंगला किराये पर उठने वाला है.. !” वहीँ खड़े गफ्फूर भाई बोल पड़े.. हालाँकि उन्हेँ इस बारे में ठीक ठाक कोई बात मालूम नहीं थी उन्होंने बस अंदाज़न ऐसा कह दिया था..

“अच्छा.. तो वो मैडम किरायेदार रखने वाली है ?”
शर्मा जी की भवें सिकुड़ गयी..

अनिर्वान ध्यान से उन्हेँ देख रहा था..

“कोई गड़बड है क्या कक्का ! हमें तो मालूम चला था कि पारिवारिक लोग हैं, कितने लोग हैं वैसे उनके परिवार में?”

“दिखती तो एक ही औरत है, वो भी कभी कभी ! क्यों गफ्फूर ?”

“हाँ शर्मा जी.. एक कोई आदमी कभी कभी आता है, पर जब वो आता है तभी ये नजर आती है..। यहाँ सब्ज़ी वाले के यहाँ आती है, मछली वाले के यहाँ से मछली भी ले जाती है…लगता है उसका आदमी है..।
वह खाने कमाने के लिए कहीं बाहर रहता होगा, कभी कभार आ जाता है !”

“तब तो आप लोग पहचानते होंगे ना ? नाम सरनेम ?”

“अरे कहाँ भैया, नजर आये बातचीत करे तब ना कोई पहचाने.. ? वो औरत भी कहीं किसी से बातचीत नहीं करती.. कभी नहीं.. ।
हमारी मैडम गयी थी एक बार, मुहल्ला किट्टी ज्वाइन कर लो बोलने, लेकिन साफ मुहं पे मना कर दिया, कहने लगी नहीं करेंगे, टाइम नहीं है !”

व्यंग से चौधरी जी के होंठ तिरछे हो गए….

“अरे वो देखो, निकला कोई लाल बंगले से.. लगता है उसी का आदमी निकला है !”

अनिर्वान ने फौरन पलट कर देखा, उसे चुपचाप नाक की सीध में चलता दीपक नजर आ गया..

अनिर्वान ने अपना कप एक तरफ रखा और दीपक के पीछे बढ़ गया… दीपक के एकदम करीब पहुँच कर उसने दीपक का हाथ धीरे से पकड़ लिया..

‘”भागने या चिल्लाने की कोशिश मत करना, इस मोहल्ले में तुम्हारा ठीक-ठाक नाम है, अगर भागोगे तो यहां के लोगों के सामने तुम्हारी औरत का नाम खराब हो जाएगा।”

दीपक अप्रत्याशित सा अपने सामने खड़े अनिर्वान को देखने लगा।

उसके ऐश्वर्या की सीमा नहीं थी।

अनिर्वान यहां कैसे पहुंच गया ?

“आप यहां कैसे ?”

“बस वैसे ही, जैसे आप। चलिए अब थाने चलिए, और सुनिए सबसे पहले अपना फोन निकाल कर दीजिए।”

अनिर्वान ने दीपक के फोन को जप्त कर लिया। जिससे वह अपनी बीवी को इस बारे में कुछ ना बता सके। दीपक को साथ लिये अनिर्वान अपनी गाड़ी से थाने की तरफ बढ़ गया….

****

अखंड की छुट्टी होते देर रात हो चुकी थी, अब वो भी काफी आराम महसूस कर रहा था.. उसे वहाँ के स्टाफ ने बता दिया था कि उसे एक डॉक्टर दंपत्ति यहाँ छोड़ कर गए हैं.. ।

उसने सोचा, जाने से पहले एक बार उन दोनों डॉक्टर्स से मिलकर धन्यवाद दे देना चाहिए। वहां मौजूद स्टाफ ने उसे डॉक्टर अथर्व का नाम बता कर उनके कमरे का ठिकाना दे दिया।

इस अस्पताल की चौथी मंजिल पर डॉक्टर अथर्व का कमरा था। यज्ञ ने साथ चलने के गुजारिश भी की, लेकिन अखंड ने उसके कंधे थपथपा दिए और अकेले ही लिफ्ट की तरफ बढ़ गया। लिफ्ट से निकलकर वह कमरे को ढूंढता हुआ आगे बढ़ने लगा।

अथर्व का कमरा नंबर ढूंढ कर उस कमरे के सामने पहुंचकर दरवाजे पर उस ने देखा, वहाँ अथर्व अवस्थी नाम लिखा हुआ था.. !

उसने कमरे पर धीरे से दस्तक दे दी। लेकिन दस्तक देते ही कमरे का दरवाजा हल्का सा अंदर की तरफ खुल गया। कमरे के दरवाजे को धीमे से अंदर की तरफ धकेल कर अखंड “डॉक्टर साहब” “डॉक्टर साहब” पुकारते हुए अंदर चला आया।

लेकिन अंदर उसे कोई नजर नहीं आया। तभी उसके कानों में कोई धीमी सी आवाज पड़ी।
यह आवाज बड़ी पहचानी हुई थी। उस आवाज को सुनकर अखंड को लगा, जैसे इस आवाज से उसका कोई रिश्ता है। वह उस गहरी शहद सी आवाज को ढूंढता हुआ आगे बढ़ने लगा। पर्दे हवा से हिल डुल रहे थे, और परदे के उस पार बड़े-बड़े कांच के स्लाइडिंग डोर लगे हुए थे।

कांच के दूसरी तरफ खुली बालकनी में रेशम पूर्वा से फोन पर बात कर रही थी।

परदे को हल्का सा हटा कर अखंड को रेशम की झलक मिल गई। उसने पीछे से ही देखकर रेशम को पहचान लिया। रेशम का चेहरा बाहर की तरफ था, पीछे से उसके खुले हुए बाल साफ नजर आ रहे थे। बीच-बीच में वह अपने उड़ते हुए बालों को सलीके से अपने कान के पीछे लगती जा रही थी। उसके चेहरे का जितना हिस्सा नजर आ रहा था, उसी से अखंड ने पहचान लिया था कि यह डॉक्टर रेशम थी।

कुछ पलों के लिए वह वही जम गया।

भगवान ने कैसा खेल खेला था उसके साथ कि, आज एक्सीडेंट के बाद उसे अस्पताल लेकर आने वाली डॉक्टर रेशम थी।
तो क्या रेशम ने उसे पहचाना नहीं? या पहचानने के बाद भी उसे माफ कर दिया?
उसके चेहरे पर हल्के सी मुस्कान तैर गई। लेकिन तभी रेशम की बातें उसके कानों में पड़ने लगी।
रेशम पूर्वा से कुछ बात कर रही थी..

” क्या बोलूं पूर्वा, अब यह साथ रहने के लिए बहुत जोर देने लगे हैं। और अब इनसे दूर रहना मेरे लिए भी मुश्किल हो रहा है। लेकिन तू तो जानती है मेरी परेशानी, मैं आज भी अपने उस अंधेरे अतीत से बाहर नहीं निकल पा रही हूं।
वह एक नाम अखंड सिंह परिहार आज भी मेरे दिमाग में इस कदर छाया हुआ है कि, अगर कमरे में अंधेरा भी हो जाए तो मैं घबरा कर चौंक कर चिल्लाने लगती हूं। मुझे लगता है जहां भी अंधेरा होगा, वहां वह पागल और घटिया इंसान चला आएगा।
बहुत बार कोशिश की, अथर्व को सब कुछ बता दूं, लेकिन हिम्मत ही नहीं पड़ी।

कैसे उनसे कहूंगी कि अखंड नाम के एक नीच और जलील इंसान ने मेरी जिंदगी खराब कर दी। अथर्व बहुत अच्छे हैं पूर्वा, लेकिन अब उनसे यह सच्चाई छुपाए रखना बहुत मुश्किल होने लगा है।

हमारी शादी के दिन बीते जा रहे हैं  कुछ दिन में छह महीने पूरे हो जाएंगे, और आज भी हम में पति-पत्नी का कोई रिश्ता नहीं है।
    अथर्व जब भी पास आने की कोशिश करते हैं, मेरे दिमाग में अखंड नाम का भूत मंडराने लगता है। और मैं नॉर्मल हो ही नहीं पाती। बहुत बार कोशिश की।
एक बार तो मनोचिकित्सक से भी मिल कर आ गई हूं, लेकिन कोई असर नहीं पड़ा…
पता नहीं मेरे भविष्य में क्या लिखा है पूर्वा ?
लेकिन उस आदमी से नफरत ख़त्म होने की जगह बढ़ती ही जा रही है..।
और मैं चाह कर भी अथर्व को उनका हक नही दे पा रही हूं। उन के साथ सामान्य ज़िंदगी बीता नहीं पा रही हूँ..।
पता नहीं क्या होगा मेरा.. ?”

अखंड इससे ज्यादा कुछ सुन नहीं पाया.. लड़खड़ाते कदमो से वो जैसा आया था, वैसे ही वापस कमरे से निकल गया..

उसे अचानक सब कुछ घूमता हुआ नजर आ रहा था। उसकी आँखों के आगे जैसे अँधेरा सा छाने लगा था। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अनजान शक्ति उसे खींच कर चला रही है, वरना वह अपने प्राण तो वही उसी कमरे में छोड़ आया है।

बड़ी मुश्किल से कमरे के बाहर निकल कर उसने दरवाजे को वापस खींचा और धीरे-धीरे लिफ्ट की तरफ बढ़ने लगा। लेकिन उसका सर जोर-जोर से घूम रहा था। उसके दिमाग से रेशम की बातें पल भर के लिए भी नहीं निकल पा रही थी। उसे आज तक बस यही लगता आया था कि जिसने भी यह काम किया था, उसने अखंड से बहुत बुरी तरीके से बदला लिया था। भले ही वह निर्दोष साबित हो गया था, उसके बावजूद उसके दिमाग से आज तक यह बात नहीं निकल पाई थी कि रेशम उसे गुनहगार समझती है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू इतना काला  इतना अंधेरा  था उसे नहीं मालूम था।

रेशम की जिंदगी पर तो उस दुर्घटना का बिल्कुल अलग ही असर पड़ गया था..।
उसकी शादीशुदा जिंदगी बर्बाद हो रही थी, और वह भी सिर्फ उसके खुद के नाम के कारण।

आज तक उसने कभी इस बात को नहीं सोचा था कि उसे रेशम के सामने जाकर यह बताना है कि वह निर्दोष है। लेकिन आज दिल में मलाल सा उठने लगा कि क्यों उस समय वह चुप रह गया। क्यों उसने बार-बार इस बात की कोशिश नहीं की, कि रेशम के सामने जाकर कबूल करें कि उसने ऐसा कोई गुनाह नहीं किया। जिसकी सजा उसे दी गई थी।
क्यों उसने अपनी बेगुनाही रेशम को बताई नहीं। आज उस दुर्घटना के इतने साल बाद भी रेशम का जीवन सामान्य नहीं हो पाया था। मतलब उस लड़की के दिल दिमाग पर उस दुर्घटना ने कितना बुरा असर डाला था।

यह सब सोचते हुए अखंड का माथा फटने लगा। उसने अपने सर को पकड़ लिया। आंखें बंद किए वह गिरने को था कि किसी ने उसे संभाल लिया। अखंड ने आंखें खोल दी, सामने अथर्व खड़ा था..

” अरे आप यहां कहां टहल रहे हैं ? आपको तो इस वक्त अपने बेड पर आराम करना चाहिए था।”

अथर्व ने जैसे ही अखंड से यह बात कही। अखंड उसे ध्यान से देखने लगा।

” मैं डॉक्टर अथर्व हूं। मैं ही आपको एक्सीडेंट के बाद इस अस्पताल में लेकर आया था..।”

अथर्व का चेहरा देखते ही पता नहीं क्यों अखंड के मन से सारी मनहूसियत दूर हो गई। अथर्व को अपने सामने देखकर अखंड के चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट आ गई… ऐसा लगा यही वो आदमी हो सकता है जो रेशम की साज संभाल कर सकता है..।

अखंड ने अथर्व के सामने अपने हाथ जोड़ दिए….
किसी अनजान प्रेरणा से उसकी आंखे झिलमिला गयी.. कैसा मूर्ख था वह, जो रेशम से प्यार कर बैठा था।
जबकि असल में रेशम के लायक तो यह सामने खड़ा डॉक्टर ही था।
चाहे चेहरे मोहरे में हो, गठन में हो या फिर बुद्धिमानी में। रेशम के साथ खड़ा होने के लायक सिर्फ अथर्व ही है।

वह तो अपनी नासमझी में इतना आगे निकल चुका है, कि अब उसकी वापसी सम्भव नहीं। लेकिन आज अथर्व को देख कर उसकी आंखे जुड़ा गयी..

अथर्व ने मुस्कुरा कर उसके जुड़े हुए हाथों को थाम लिया..

“आपको धन्यवाद देने की जरूरत नहीं है, मेरी जगह कोई और भी होता तो आपको ऐसे ही अस्पताल ले आता। इत्तेफाक था कि मैं और रेशम हम दोनों ही डॉक्टर निकले, और इसलिए आपको फर्स्ट एड देकर यहां ले आए और इसीलिए शायद आपको बहुत ज्यादा तकलीफ नहीं हुई..!”

“डॉक्टर साहब आपका ये एहसान.. “

उसकी बात आधे में ही काट कर अथर्व बोल पड़ा..

“एहसान वाली तो कोई बात ही नहीं.. वैसे नाम क्या बताया आपने ?”

“अखंड… अखंड सि..” बोलते बोलते अखंड चुप हो गया..

“जाने दीजिये हम में ऐसी कोई खास बात भी नहीं कि आप याद रख सके..”

अखंड अपनी आँखों में छलकते आंसू छिपा कर वहाँ से निकल गया..

अथर्व भी वापस अपने कमरे की तरफ मुड़ गया..।
तभी उसे याद आया कि उसे अखंड से एक्सीडेंट के बारे में बात करना था कि वो पुलिस वालो को स्पष्ट कर दे कि उसकी गाड़ी से अखंड की गाड़ी नहीं टकराई थी।

लेकिन फिर सर को झटक कर वो कमरे में चला गया .. उसे जाने क्यों अखंड बहुत सुलझा हुआ समझदार सा आदमी लगा और इसलिए अथर्व ने उसे टोकना सही नहीं समझा.. !

अखंड को साथ लिए यज्ञ कुसुम और उसके ससुर घर लौट गए..।
अखंड के मरहम पट्टी करी हुई थी।

लेकिन वो लोग जब घर पहुंचे तब तक रात गहरी हो चली थी, सभी लोग सो चुके थे..।
दरबान ने दरवाज़ा खोल दिया और सब अपने अपने कमरों में चले गए..

यज्ञ कपड़े बदल कर सोने जा रहा था कि पानी का गिलास और उसकी दवा हाथ में लिए कुसुम खड़ी हो गयी..

“अभी तीन महीने तक ये दवा खानी है आपको.. भूल काहे जाते हैं !”

“जान बुझ कर !”

“वो काहे ?”

“जिससे हमारी छोटी ठकुराइन हमें याद दिला दे.. !”

मुस्कुरा कर कुसुम ने उसके हाथ से पानी का गिलास ले लिया..

“सुनिए ये सब चोंचला ना आप मर्द लोगो का ही रहता है, अम्मा जी तो अपनी दवाई खुद ही खा लेती हैं, उनको तो बाबूजी नहीं याद दिलाते !”

“हाँ उनको बाबूजी नहीं याद दिलाते क्यूंकि बाबूजी की पसंद की हुई बहुरिया बाबूजी के याद दिलाने से पहले अपनी सास का खाना पानी दवा दारू सब देख लेती हैं..”

कुसुम अलमारी में कपड़े रख रही थी और अपनी बात कहते हुए यज्ञ ने पीछे से आकर उसे बाँहों में भर लिया…
कुसुम की पल भर के लिए साँस अटक गयी.. उसके चेहरे पर हलकी सी मुस्कान चली आयी…

यज्ञ ने उसे अपनी तरफ घुमा लिया.. उसका चेहरा अपने हाथो में लेकर उसकी आँखों में देखते हुए यज्ञ ने उससे सवाल कर दिया..

“अब भी हमें छोड़ कर जाना चाहती हो ?”

कुसुम की आंखे लगातार यज्ञ को देख रही थी, ये सवाल सुनते ही उसके शरीर में झुरझुरी सी छूट गयी..

“नहीं, कभी नहीं… आपके बिना जीने से आसान मौत रहेगी हमारे लिए !”

“चुप पागल.. कुछ भी बोलती हो.. ऐसी फ़िल्मी बातें कहाँ से सीखी ?”

यज्ञ की बात पर कुसुम मुस्कुरा कर रह गयी..

“प्रेक्टिकली देखा जाये तो जोड़े में से किसी ना किसी को पहले जाना ही पड़ता है कुसुम, और उसके बिना रह जाने वाला चाह कर भी साथ नहीं जा पाता…। इसलिए जब तक जियो ऐसे जियो की वो हर एक पल इतना सुहावना, इतना शानदार हो जाये कि जाने वाले के बाद अकेले रह जाने वाला उन शानदार पलों को याद कर हर वक्त मुस्कुराता रहे.. !”

“कुछ भी बोलते हैं आप.. आइंदा हमारे सामने ये मरने मारने वाली बात नहीं करेंगे आप.. हमें ऐसी बातें बिलकुल पसंद नहीं !”

यज्ञ के सीने पर अपनी उंगलियों से अपना नाम लिखती कुसुम छोटी बच्ची सी मचल पड़ी और उसकी इस बात को सुन अचानक यज्ञ को गाड़ी के ब्रेक्स फेल होने की बात याद आ गयी..
और उसका दिमाग उसी तरफ घूमने लगा..

क्रमशः

4.8 40 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

59 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Archana Singh
Archana Singh
1 year ago

Behtareen part 👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻👍🏻

Manu verma
Manu verma
1 year ago

बहुत खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️⭐⭐⭐⭐⭐⭐

Rajkumar
Rajkumar
1 year ago

Excellent superb fantastic part ❤️😍😍😍😍😍😍😍

Neeta
Neeta
1 year ago

🙏🙏🙏🙏🙏resham bhi akhand ki sachai jn le 🙏👌👌👌👌ab aayega deepak ko majjja… Pr woh ladki koun h… Khi deepak hi toh ladki bn k nhi rhta??????????????

Ritu Jain
Ritu Jain
1 year ago

Wonderful story moving towards end. You have added all the emotions in Aprajita which makes it close to heart and our life. You are a superb storyteller. It always feels like to read your stories without any interruption. I have read most of your stories,be it shadi dot com, Jeevansathi, samidha. Reading Mayanagari and latest Jeevansathi as well. Thank you so much for writing these stories. Keep writing and entertaining is.

Vandana Bairagi
Vandana Bairagi
1 year ago

Beautiful part 👌🏻👌🏻

Meera Patel
Meera Patel
1 year ago

दीपु को पकड़कर मजा आ गया , और छिपा भी ऐसे था उसको होगा की पकड़ा नही जायेगा, पर अनिर्वान से कोन बचेगा,
अखंड को ये सब पता चलना की रेशम की उसके बारे क्या राय रखी है , बहोत दिल दुखा होगा , अथर्व को देख तसल्ली भी की के रेशम के लायक लड़का मिला है रेशम को ,
अब अखंड क्या रेशम की गलतफैमी दूर करेगा की नही !! यज्ञ और कुसुम को देख दिल में ठंडक हुई की चलो एक और जोड़ी आगे बढ़ रही है , राजी और भावना की तरह ,
बहोत ही बढ़िया पार्ट था ।
आगे के इंतज़ार में…

Hetal shah
Hetal shah
1 year ago

😟😟 aaj Resham ki baate sun Akhand ka dhyan iss taraf gaya ki usse Resham ki galatfahami dur karani chahiye thi.par jo kuchh huaa tha uss mae Akhand khud bhi toh kahi kho gaya tha.Resham ki jindagi se wo kala andhera abhi tak hata nahi hai ye jaan Akhand ko bahut bura feel ho raha hai.Dr.Atharv se mil kar wo he Resham ke qabil hai aisa bhi usane socha.ab Akhand Resham ki jindagi ke andhere ko kaise dur kar payega??? ki Anirwanbabu isaka shrey le jayenge Dipak ko achcha lapet liya hai…..

Gurpreet Kaur
Gurpreet Kaur
1 year ago

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍

Priyanka Shukla
Priyanka Shukla
1 year ago

बहुत ही सहज , सरल भाषा में लिखती है आप । मन को स्पर्श करती गहरी बातें भी होती है आपकी कहानियों में ।