
मायानगरी -22
रेस्टोरेंट में दाखिल होने के बाद पंखुड़ी ने एक कोने की टेबल पर नजर दौड़ाई और खाली पड़ी टेबल पर जाकर बैठ गई। शेखर भी छुपते छुपाते रेस्टोरेंट में दाखिल हो गया और पंखुड़ी की टेबल से लगी दूसरी टेबल पर जिस तरफ पंखुड़ी ने पीठ कर रखी थी उस कुर्सी पर कब्जा जमा लिया।
पंखुड़ी ने वहां बैठने के थोड़ी देर बाद अपना फोन निकाला और धीरे से एक नंबर डायल कर कर अपने कान से लगा लिया।
शेखर उसकी कुर्सी के इतने करीब था कि शेखर को आसानी से पंखुड़ी की और फोन पर दूसरी तरफ वाले आदमी की आवाज सुनाई दे रही थी।
” अच्छा आपको कुछ अर्जेंट काम आ गया है। ओके कोई बात नहीं। तो कितना वक्त लगेगा आपको?
सामने वाले का जवाब शेखर को सुनाई नहीं दिया लेकिन यह समझ में आ गया कि पंखुड़ी जिस से भी मिलने यहां आई थी। उसे यहां पहुंचने में अभी कुछ और वक्त लगेगा।
पंखुड़ी ने फोन रखा और एक छोटी सी अंगड़ाई लेकर अपने पर्स को साथ वाली कुर्सी पर रखकर आराम से कुर्सी पर फैल गई।
थैंक गॉड उसे अभी पहुंचने में वक्त लगेगा वैसे भी सुबह से पेट में इतने चूहे कूद रहे हैं, कि अगर ऐसे भूखे पेट उससे मिलती तो उसे मेरे चेहरे पर मेरी भूख नजर आ जाती और यह पोपटलाल भी मुझे रिजेक्ट कर के चला जाता।
सच कहती है मम्मी भगवान जी भी कभी-कभी मेरे जैसों पर तरस खा ही जाते हैं। फिलहाल मैं कुछ खा लूं जिससे थोड़ी एनर्जी तो आ जाए।
हालांकि पंखुड़ी अपने आप में बहुत धीमी आवाज में बड़बड़ा रही थी लेकिन शेखर के पुलिसिया कानों को सब कुछ साफ-साफ सुनाई दे रहा था।
शेखर इस तरह से बैठ गया था की पंखुड़ी उसे साफ साफ नजर आ रही थी । लेकिन क्योंकि पंखुड़ी की पीठ शेखर की तरफ थी इसलिए वह शेखर को नहीं देख पा रही थी। पंखुड़ी ने दूर खड़े वेटर को हाथ के इशारे से बुला लिया।
“यस मैंम?”
” आपके रेस्टोरेंट में ऐसी कौन सी डिश है जो फटाफट मुझे मिल जाए और हां जो बहुत टेस्टी भी हो..”
” मैम आप जो भी खाना चाहे हम सब आपको फटाफट बना कर देंगे।
” ओके मुझे होल व्हीट पास्ता इन पेस्टो सॉस चाहिए।”
” एनीथिंग एल्स मैम? “
” ओके, वन व्हाइट चॉकलेट वेफल्स”
” ओके मैम वन वाइट पेस्टो सॉस पास्ता विद व्हाइट चॉकलेट वेफल एंड एनीथिंग एल्स…
” एक डार्क फिल्टर कॉफी, और सुनो पास्ता स्पाइसी रखना हां।
” मैम पेस्टो सॉस उतना स्पाइसी नहीं आएगा”
” अरे नहीं आएगा तो बना देना भाई । मैं कौन सा मास्टर शेफ की जज हूं, कि पेस्टो सॉस अगर वैसा ही एक्जैक्टली नहीं बनाया तो मैं मार्क्स कट कर दूंगी। दो हरी मिर्ची पीस के डाल देना। ऊपर से थोड़ा सा लाल मिर्च पाउडर स्प्रिंकल कर देना, मैं माइंड नहीं करूंगी। और ना ही मैं फोटो खींचकर फेसबुक पर अपलोड करूंगी कि तुम्हारे वाइट पेस्टो सॉस पास्ता का मजाक बने। तो जैसा मैं बोल रही हूं वैसा बना कर ले आओ भाई। ओके!
” ओके मैम आई विल ट्राई माय बेस्ट”
” थैंक यू एंड प्लीज थोड़ा सा जल्दी करना। मैं किसी का वेट कर रही हूं । तो मैं चाहती हूं जिसका मैं वेट कर रही हूं उसके आने के पहले मैं फटाफट खाकर अपना आर्डर कंपलीट कर लूँ। गॉट इट ?
“यस मैंम। “
मुस्कुराकर वेटर वहां से चला गया और पंखुड़ी इधर-उधर अपनी नजरें दौड़ाती बैठी रही। कुछ देर बाद उसने अपना फोन निकाल लिया। ठीक उसी वक्त एक वेटर शेखर की टेबल पर उसका आर्डर लेने चला आया।
शेखर को जाने क्या खुरापात सूझी उसने पंखुड़ी का ऑर्डर पूरा का पूरा कॉपी करके वेटर को सुना दिया।
शेखर की आवाज सुनते ही पंखुड़ी ने मुड़कर शेखर को देखा और उसे देख कर मुस्कुरा उठी। हालांकि शेखर पंखुड़ी से छुपकर वहां बैठना चाहता था लेकिन पता नहीं क्यों उसे पंखुड़ी की हरकत देखकर ऐसा लगा कि इस लड़की से थोड़ी और बातचीत कर लेनी चाहिए।
” अरे आप तो वही है, जो अभी कुछ देर पहले हमारी यूनिवर्सिटी में अपनी बेटी के एडमिशन के लिए आए थे। क्या अजब इत्तेफाक है। किसी ने कहा है दुनिया गोल और छोटी है। आज लग रहा है वाकई यह दुनिया गोल और छोटी है।”
शेखर पंखुड़ी के भोलेपन पर मुस्कुरा कर रह गया।
” तो आप माया नगरी में डॉक्टर हैं।”
” जी हां यहाँ सीनियर रेजीडेंट हूं।”
” जी यह डॉक्टरी वाली पोस्ट तो मुझे समझ में नहीं आती मेरे लिए तो छोटा डॉक्टर बड़ा डॉक्टर सीनियर डॉक्टर कंसलटेंट बस इतना ही है।
” ओके तो आपकी भाषा में मैं छोटी डॉक्टर हूं।”
” पर आपने तो कहा आप सीनियर रेसिडेंट है.. इसका मतलब आप सीनियर डॉक्टर हुई ना।”
” नहीं!! असल में क्या होता है कि इंटर्नशिप के बाद जो डॉक्टर पीजी के लिए तैयारी करते हैं और अस्पताल में अपनी सेवाएं देते हैं उन्हें हम जूनियर रेजिडेंट कहते हैं। 2 साल जब उनका पीजी में सिलेक्शन नहीं होता और तब तीसरे साल जब वह फिर से वही माथापच्ची करते हैं तो उन्हें फ्रस्टेशन ना हो इसलिए उनके नाम के साथ सीनियर रेजिडेंट लगा दिया जाता है । तो मैं बस वही कर रही हूं यहां पर।
” और आपने पढ़ाई कहां से की है? मतलब मैं जस्ट कैजुअली पूछ रहा हूं अगर आपको यह सवाल पर्सनल लगे तो आप जवाब मत दीजिएगा।
” अरे नहीं इसमें क्या पर्सनल है? आप कौन सा मेरी शादी के लिए रिश्ता बता रहे हैं… वैसे मैंने मेरे ही शहर के मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई पूरी की थी इंटर्नशिप भी वहीं से करने के बाद मैं अपने घर से बाहर निकलना चाहती थी। खुलकर आजादी की सांस लेना चाहती थी। बस इसीलिए इस नई बनी यूनिवर्सिटी में चली आयीं। 2 साल से यहां जूनियर रेजीडेंट थी। वैसे यूनिवर्सिटी हमें सैलरी अच्छी देती है। इस साल मुझे प्रमोट करके सीनियर रेजीडेंट बना दिया।”
” तो आप पीजी के लिए तैयारी भी कर रही है।”
“हां असल में इंटर्नशिप के समय और उसके बाद 1 साल मैंने तैयारी की लेकिन अब मैं सिर्फ मेरी शादी के लिए तैयारी कर रही हूं। “
” मतलब!! मैं कुछ समझा नहीं, आपकी शादी लग गई है? और आप उसकी तैयारियां कर रही है?”
” नो नहीं ऐसी बात नहीं है। एक्चुली हमारे तरफ लड़के बहुत ज्यादा पढ़े लिखे नहीं होते, और अगर लड़की डॉक्टर बन जाए, या बहुत ज्यादा पढ़ लिख जाए तो उसे अच्छा लड़का नहीं मिलता। अपनी ज़िद से मैंने डॉक्टरी पढ़ी, लेकिन अब मम्मी पीछे पड़ी है शादी कर लो, शादी कर लो, शादी कर लो बस। इसीलिए पिजी को फिलहाल पोस्टपोन कर दिया है। कि पहले मम्मी की मर्जी से किसी पोपटलाल से शादी कर लेती हूं , फिर आराम से पीजी की तैयारी करूंगी। एम्स में जाकर पीजी करूंगी और न्यूरो सर्जन बनूंगी। एक्चुअली मेरा सपना न्यूरो सर्जन बनने का है, लेकिन फिलहाल जब तक शादी ना हो जाए अपने सपने को मैंने अपने कबर्ड में सबसे पीछे छुपा कर रख दिया है अपनी गोल्डन जैकेट के पीछे।”
पंखुड़ी की बच्चों जैसी भोली मगर सच्ची बातें सुनकर शेखर को हंसी आ गई वह उसकी बात सुनकर हंसने लगा.
” पर मेरे ख्याल से डॉक्टर साहिबा आप दोनों चीजें एक साथ भी तो कर सकती हैं। पीजी की तैयारी भी करते रहिए और शादी की भी । जो पहले हो जाए ।बाई चांस पीजी में सिलेक्शन हो गया तो आप न्यूरोलॉजी पढ़ते हुए शादी कर लीजिएगा, और शादी हो गई तो शादी के बाद पीजी कर लीजिएगा। “
” बात तो सही कह रहे हैं आप… बड़े विटी लग रहे हैं।वैसे आप हैं कौन? मैं इतनी देर से आप से बातें कर रही हूं लेकिन ना मुझे आपका नाम पता है ना आपका काम पता है ? आप क्या हो? कहां रहते हो? क्या करते हो ?इन फैक्ट आपकी बेटी का नाम क्या है? “
” जी मेरा नाम शेखर है, शेखर मिश्रा। और मैं इस शहर का नया डीएम हूँ! “
” What डीएम? आई डोंट बिलीव, आप डीएम हो? मेरा मतलब मैं कलेक्टर के साथ बैठी हूं ? शहर के कलेक्टर के साथ?”
पंखुड़ी का रिएक्शन देखकर शेखर ने उसे हाथ से इशारा कर अपने आप को शांत रखने को कहा…
” रिलैक्स डॉक्टर साहिबा रिलैक्स। डीएम भी इंसान ही होते हैं। “
” हां होते तो इंसान ही है, लेकिन सुपर कूल होते हैं। आई मीन आप को देख कर तो लगता ही नहीं कि आप कलेक्टर हो। काफी यंग दिखते हो आप। बाय द वे ,आपकी तो बेटी कॉलेज में एडमिशन लेने वाली है। आप बुरा ना मानो तो मैं आपकी एज पूछ सकती हूं? आई एम सॉरी लड़कों से तो एज पूछी जा सकती है ना? “
शेखर अपनी बात में उलझ कर रह गया था। उस वक्त उसे यूनिवर्सिटी के बारे में जानना था तब उसने पंखुड़ी के सामने बातों बातों में यही कह दिया था कि उसे अपनी बेटी का एडमिशन करवाना है। और अब उसी बात में फंस कर रह गया था। उसे एकाएक सुझा नहीं कि वह क्या जवाब दें? इतनी देर में वेटर उन दोनों का ऑर्डर लेकर चला आया…
अपने सामने रखी अपनी पसंदीदा डिशेस देखकर पंखुड़ी की आंखें खुशी से फैल गई।
” कलेक्टर साहब अगर आप इजाजत दें तो पहले कुछ खा लेते हैं।”
” हां क्यों नहीं खाने के लिए ही तो मंगवाया है।”
इसके बाद पंखुड़ी मजे से पास्ता खाने में लग गई…
” वाओ इतना टेस्टी बना है पास्ता कि क्या कहूं?
लग रहा बनाने वाले के हाथ चूम….”
अपनी बात पूरी करने से पहले ही पंखुड़ी रुक गई क्योंकि उसे समझ में आ गया कि सामने बैठे शेखर के सामने वह कुछ भी उल जलूल नहीं कह सकती… उसने शेखर की प्लेट देखी और फिर अपनी प्लेट देखने लगी।
” क्या हुआ डॉक्टर साहिबा आपको ऐसा तो नहीं लग रहा कि वेटर ने मेरी प्लेट में थोड़ा ज्यादा पास्ता डाल दिया है और आपके मैं थोड़ा कम?
” अरे नहीं नहीं!! कलेक्टर साहब मैं इतनी भी लालची नहीं हूं । थोड़ी भुक्कड़ जरूर हूं। लेकिन मैं यह देख रही थी कि आपका उसने नॉर्मल पेस्टो सॉस वाला पास्ता बनाया है, और मेरा इंडियन स्टाइल का बनाया है। आप टेस्ट करके देखें मेरे वाले पास्ता में जो बात है ना वह आपके वाले में नहीं होगी।”
” अच्छा यह बात है?”
और शेखर ने अपने फोर्क से पंखुड़ी की प्लेट का पास्ता टेस्ट कर लिया।
” क्या बात है डॉक्टर साहिबा आप तो कमाल की शेफ हो। आपने जो रेसिपी दी उसके एकोर्डिंग आपका पास्ता वाकई कहीं ज्यादा टेस्टी बना है। मेरा वाला तो बस एवैं है।”
” आइए इसी में से खा लीजिए, आप अपनी प्लेट रहने दीजिए”
पंखुड़ी ने आव देखा ना ताव और शेखर की प्लेट एक किनारे रख कर अपनी प्लेट ही बीच में रख दी। शेखर और पंखुड़ी दोनों मजे से एक ही प्लेट से खा रहे थे की पंखुड़ी जिस लड़के से मिलने वाली थी वह लड़का वहां चला आया।
वह आकर उनकी टेबल के पास खड़ा अपनी बाहें लपेटे पंखुड़ी को ध्यान से देख रहा था
” एक्सक्यूज मी डॉक्टर पंखुड़ी?
पंखुड़ी ने गर्दन ऊपर कर उस लड़के की तरफ देखा..
“यस ..? और यस बोलने के साथ ही वह उस लड़के को पहचान गई…
“मिस्टर परम ?
“यस आई एम परम ” अपना परिचय देने के बाद वह लड़का शेखर की तरफ घूरने लगा। शेखर भी उसी लड़के की तरफ देख रहा था। पंखुड़ी तुरंत अपनी जगह से खड़ी हुई और अपनी बाजू वाली कुर्सी में खिसक कर बैठ गई।
” आइए ना बैठे मिस्टर परम। असल में आपको थोड़ा वक्त लग रहा था और मुझे थोड़ी सी भूख लगने लगी थी इसलिए मैंने ऑर्डर कर लिया था। “
पंखुड़ी की थोड़ी सी भूख के साथ टेबल में फैला इतना सारा खाना देखकर परम की आंखें उसी खाने पर टिक कर रह गई।
पंखुड़ी ने तुरंत शेखर की एक किनारे किए हुए पास्ता की प्लेट को उठाकर परम के सामने रख दिया…
” आप भी खा लीजिए, उसके बाद हम आगे की बात करेंगे।
शेखर को समझ में नहीं आ रहा था कि पंखुड़ी इतनी रिलैक्स कैसे थी ?क्योंकि उसे यह समझ में आ गया था कि परम को पंखुड़ी का शेखर के साथ बैठे रहना पसंद नहीं आ रहा था।
साथ ही शेखर यह भी समझ गया की पंखुड़ी शेखर को खुद से उम्र में काफी बड़ा समझ रही थी और इसीलिए वह उसके साथ इतने आराम से बैठी हुई थी।
परम से आखिर सहा नहीं गया और उसने पंखुड़ी से पूछ लिया…
” यह कौन है पंखुड़ी? “
” जी ये? यह मिस्टर शेखर है, शेखर मिश्रा हमारे शहर के डीएम है। “
” अच्छा और तुम इनके साथ यहां बैठ कर क्या कर रही हो ? मेरा मतलब तुम्हारी तो आज मेरे साथ डेट थी?”
” डेट थी मतलब? डेट तो है , अब भी। हम अभी भी खाने के बाद बातचीत कर सकते हैं। और रही बात इनकी, यह मुझसे आज ही मेरी यूनिवर्सिटी में टकराए थे। इन्हें अपनी बेटी का एडमिशन करवाना था और बस मैंने इन्हें सारी जरूरी फॉर्मेलिटीज बता दी। उसके बाद इत्तेफाक से मैं जब इस रेस्टोरेंट में आयीं तब ये भी यहां बैठे हुए मिल गए और बस हम एक साथ बैठकर खाने लग गए । thats it..”
परम अभी पंखुड़ी के जवाब से उतना संतुष्ट नजर नहीं आ रहा था लेकिन शेखर के चेहरे पर पंखुड़ी के जवाब ने एक मुलायमियत भर दी।
कोई लड़की आज के ज़माने में भी इतनी बड़ी हरीशचंद्र हो सकती है ये उसके लिए बड़े आश्चर्य की बात थी।
वरना जिस लड़की का रिश्ता होना हो वो अपने होने वाले पति से इतनी आसानी से सब सच बोल गई ये सोचे बिना की उसका होने वाला पति उसे किसी अनजान आदमी के साथ बैठा देख कर क्या सोचेगा।
शेखऱ के चेहरे पर मुस्कान खेल गयी। और परम उसे घूरता बैठा रहा…
“खाइए न परम जी, पास्ता टेस्टी है यहाँ का।”
“मुझे पास्ता पसन्द नही है!”
“ओह्ह ! और फिल्टर कॉफी?”
“वो क्या होती है। मुझे बस एक ही कॉफी पता है।”
“कौन सी?” चिंतित सी पंखुड़ी ने परम से सवाल कर दिया।
” नेसकैफ़े!” परम का बेवकूफाना जवाब सुन पंखुड़ी का दिल किया कि वह अपना सर धुन ले लेकिन वह अपने जज्बात पर काबू करते हुए चुपचाप बैठी रही।
शेखर की समझ से परे था कि उसे वहां बैठा रहना चाहिए या अब उठ कर चले जाना चाहिए।
परम के दिल में यह चल रहा था कि वह किसी तरह शेखर को उठाकर वहां से बाहर फेंक दें लेकिन साक्षात कलेक्टर के सामने एक बैंक ऑफिसर की क्या मजाल कि वह उसे कुछ कह पाए इसलिए वह भी चुपचाप बैठा अपनी घड़ी में समय देख रहा था।
आखिर शेखर अपनी जगह से उठ गया…
” ओके पंखुड़ी जी मैं चलता हूं। मुझे जो भी जानकारी चाहिए होगी मैं यूनिवर्सिटी में आकर वहां से कलेक्ट कर लूंगा। “
पंखुड़ी ने मुस्कुराकर हां में सिर हिला दिया। शेखर के जाते ही परम ने चैन की सांस ली। वो पंखुड़ी की तरफ बहुत ध्यान से देखने लगा।
अब वह निश्चिंत होकर पंखुड़ी से सवाल-जवाब कर सकता था और उसने सवाल जवाब शुरू भी कर दिए। लेकिन कॉफी वाली बात से पंखुड़ी का जो दिल टूटा था तो अब उसे परम में कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था।
कहां तो पंखुड़ी के प्राण कॉफी में बसते थे और वह कभी फिल्टर कॉफी कभी इंस्टेंट कॉफी कभी ब्लैक कॉफी कभी कैप्युचीनो पीकर अपने आपको तरोताजा महसूस करती थी।
कॉफी की खुशबू की ऐसी दीवानी थी कि हमेशा उसके कमरे में एक कांच के छोटे से बाउल में वह कॉफी बींस रखा करती थी। और बीच-बीच में जब कभी वह अपनी पढ़ाई से थक जाती तो जाकर उस बॉक्स को खोल कर सूंघ लिया करती थी। और कहां यह आदमी कॉफी के ब्रांड का नाम बताकर उसे कॉफी का प्रकार कह रहा था। कॉफी के बारे में सामने बैठा लड़का इतना बड़ा अनाड़ी निकलेगा यह पंखुड़ी ने सोचा नहीं था और बस इसीलिए उसका दिल टूट कर चकनाचूर हो गया था।
सामने बैठे परम को भी एहसास हो गया था कि पंखुड़ी कि उसमें कोई खास रुचि नहीं है। कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद परम और पंखुड़ी भी एक दूसरे से विदा लेकर निकल गए।
पंखुड़ी अपना पर्स टांगे धीमे धीमे कदमों से चल रही थी, कि तभी उसके पास आकर एक बुलेट रुक गयी।
पंखुड़ी ने चौक कर देखा, हेलमेट लगाए एक लड़का बुलेट पर बैठा था….
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झनक और रंगोली वेलकम पार्टी की तैयारियों में मगन थी। वेलकम पार्टी हो जाना मतलब बहुत सारे बंधनों से कॉलेज में मुक्ति मिल जाना था । नीले कुर्ते और सफेद सलवार के साथ थ्री पिन किये दुपट्टे से मुक्ति। दो चोटियों को तेल लगाकर ऊपर की ओर लाल रिबन में बांधने से मुक्ति एप्रन की थर्ड बटन में गर्दन झुकाए झुकाए गर्दन में उठ जाने वाले भयानक दर्द से महा मुक्ति।
ये एक साधारण वेलकम पार्टी नहीं बल्कि महा मुक्ति का जश्न था, जो रैगिंग झेला हुआ एक मेडिको ही समझ सकता था।
प्राची बालकनी में खड़ी सिगरेट फूंकती उन दोनों को देख रही थी कि तभी उसके फोन पर अधिराज का मैसेज आ गया….
” गाड़ी का नंबर ट्रेस कर लिया है। यह हमारे फिजियोलॉजी डिपार्टमेंट की लैब टेक्नीशियन मैडम के हस्बैंड की गाड़ी थी। पुरोहित मैडम की गाड़ी। “
प्राची ने उस मैसेज को देखा और फोन बंद करके रास्ते की तरफ मुड़ गई और वापस सिगरेट फूंकने लगी।
अंधेरा काफी हद तक घिर चुका था और अभिमन्यु अधीर के साथ रंगोली के कमरे की बालकनी के सामने वाली रोड की टपरी पर खड़ा चाय की चुस्कियां ले रहा था।
वह उस रास्ते से निकल रहा था कि रंगोली की एक झलक पाने को वहां खड़ा हो गया।
उसे बालकनी पर खड़ी एक आकृति नजर तो आ रही थी लेकिन चेहरा नहीं दिखाई दे रहा था। बस दिखाई दे रहा था उस लड़की के हाथ में सिगरेट और उसके मुंह से निकलते धुंए के छल्ले…
” मान गए गुरु भाभी जी तो मस्त छल्ले निकालती है धुँए के। “
अधीर की बात सुन अभिमन्यु ने उसकी गर्दन पकड़ ली…
” साले तुम ऐसे ही बकवास करामातों पर तारीफ की बूंदी छानो। एक तो बंदी को ऐसे भकाभक सिगरेट फूंकते देख कर मेरा कलेजा फूंका जा रहा है और तू साले उस जले पर टाटा का नमक छिड़क।”
“अबे सुनो अभिमन्यु। तुम शादी से पहले भाभी जी को गंगाजल से कुल्ले करवा लेना यार। “
“अबे उसके पहले तो ये सोचना है कि अम्मा से कैसे मिलवाऊंगा । और उसके भी पहले मैं ये सोच रहा हूँ कि ये पढ़ी लिखी डॉक्टर सिगरेट के डिब्बे में लिखी वार्निंग काहे नही पढ़ लेती है बे। “
“और मैं ये सोच रहा हूँ कि तुम दोनो की सुहागरात निराली ही होगी। हैं !!! दूल्हा शरमाया सा पलंग पे बैठा होगा और दुल्हन धुएं के छल्ले उसके मुहँ पर उड़ाती उसे उसकी ही हड्डियों के नाम बता रही होगी।”
“बस तुम से यही उम्मीद थी । वो एड तुम्हारे लिए ही तो बना है हर एक फ्रेंड कमीना होता है। साले सीधे मेरे बैडरूम तक पहुंच गए उसे लेकर, जहाँ अब तक मेरी इमेजिनेशन नही पहुंची। “
” ओ चलते पुर्जो चलो कट लो यहाँ से, दुकान बढ़ा दी है मैंने। “
टपरी के मालिक ने दुकान बंद कर ताला लटकाया और अपनी बाइक उठाये निकल गया।
“साला मेडिकल के सामने क्या दुकान लगा ली खुद को डॉक्टर का अब्बा समझने लगा है। ” अधीर ने गाड़ी स्टार्ट की और अभिमन्यु उसके पीछे बैठ एक बार बड़ी हसरत से रंगोली की बालकनी देख अपने होस्टल के लिए निकल गया।
क्रमशः
aparna….
