ब्रम्हभोज

  
ब्रम्हभोज

   एक एक कर तेरह दिन बीत भी गए, और ब्रम्हभोज का दिन आ गया..।
सोनाली की जिस वक्त शादी हुई थी, उसी दिन से उसे मालूम था कि उसका और विख्यात का साथ ज्यादा लम्बा नहीं हैं..।

विख्यात को एक ऐसी बीमारी थी, जिसका कोई इलाज ना था।  जैसे उसके जन्म के कुछ महीनो बाद से उसके माता पिता जानते थे कि वो, और उसका साथ क्षणभंगुर हैं, ऐसा ही सोनाली भी जानती थी.. और शायद इसीलिए विख्यात से कभी वो जुड़ ही नहीं पायी।

   उसके घर पर उसकी माँ के अलावा और दो बहने थी.. बडी बहन को पिता के बदले सरकारी दफ्तर में काम मिल गया था, और उसी कि तनख्वाह पर घर चल रहा था।
दोस्तों रिश्तेदारों के कहने पर उसकी माँ ने उसकी ही शादी पहले करने का फैसला लिया था।

उसी साल उसका अठारहवाँ जन्मदिन मना था, मना क्या था,पड़ा था..।
उनके यहाँ जन्मदिन पर कोई चोंचला नहीं होता था, इसलिए नहीं कि उसकी माँ को पसंद नहीं था। बल्कि इसलिए कि चोंचले करने के लिए उनके घर पैसे ही नहीं थे।

कुल जमा बारह हज़ार रूपये में पूरा घर चलाना आसान नहीं था, जिसमे साढ़े तीन हज़ार घर का किराया निकल जाता था।

उसके पिता किसी सरकारी दफ्तर में चपरासी थे, लेकिन उनके जाने के बाद उनकी बेटी को मिली  नौकरी में अभी प्रोबेशन खत्म नहीं होने से काट पीट कर हाथ में आने वाली तनख्वाह बस इतनी ही होती थी कि जैसे तैसे खाने को दोनों वक्त भोजन मिल जाये।

राशन की दुकान से उचित मूल्य पर चावल शक़्कर और एक लीटर तेल ही बस मिलता था, बाक़ी का नून मिर्ची मसाला सब्जी सब खरीदना होता था..
बहुत बार तो महीने के आखिर में चावल और मिर्च लहसन की चटनी खा कर ही चारों लोग गुजारा कर लेते।
इसी सब झंझटो से भागने के लिए सोनाली ने शादी कि बात पर रजामंदी दे दी..

पहला तो उसे लगा घर से एक खाने वाला कम होगा, तो बाक़ी तीनो में ज्यादा खाना बंट पायेगा। दूसरा ससुराल में चावल चटनी पे गुजारा नहीं करना पङेगा..

गरीबी और पेट की भूख से ज्यादा भयंकर और बर्बर कुछ नहीं होता।
भूख से बचने इंसान बहुत बार ऐसे निर्णय भी ले लेते जो उसके भविष्य के मुआफ़िक नहीं हो सकते..

ऐसा ही निर्णय लिया सोनाली ने।
हालाँकि सोनाली की बडी बहन रोहिणी ने इस बात का पुरज़ोर विरोध किया..

“अम्मा एकदमे पगला गयी हो का? काहे ब्याहे दे रही सोनी को, जब अच्छे से जानती हो लड़का बीमार हैं !”

“तो और क्या करे ? तीनो की तीनो को अपनी छाती ओर बैठाये रखें..?
अरे हमारा भी तो कोई पुन्न नेग समझो.. कम से कम एक लड़की भी ब्याही गयी, तो तुम्हारे बाबूजी को दान लाभ मिल जायेगा और फिर घर अच्छा है। कम से कम सोनाली को ढंग का खाना पीना तो मिलेगा.. !”

“हमारा माथा मिलेगा..। कब तक मिलेगा तुम्हारा ढंग का खाना पीना..?
ज्यादा से ज्यादा छह-सात महीना, साल भर.. और उसके बाद क्या ? दूल्हा के गुज़र जाने के बाए वो तुम्हारी लड़की को लेकर यही नहीं पटक जायेंगे क्या ?”

“नहीं पटकेंगे.. तुम्हारे फूफा जी बता रहे थे, बहुत बड़े लोग हैं। कह गए हैं, अगर लड़की भा गयी तो बड़े ठाठ से रखेंगे उसे। उनके लिए ये ही उनका बेटा बेटी सब होगी। अब इससे ज्यादा खुल कर और क्या कहेंगे रोहिणी.. ?
अब हमारे पुरखौती तो कुछ हैं नहीं.. तुम्हारे बाबूजी भी क्या छोड़ गए देख ही रही हो। इसलिये तुम भी चुप्पे चाप रहो.. आगे जो होगा सोनाली की किस्मत !”

रोहिणी को दफ्तर के लिए देर हो रही थी, इसलिए बिना कुछ कहे वो निकल गयी…
लेकिन शाम को वापस आने के बाद वो सोनाली को समझाने बैठ गयी। हालांकि सोनाली को समझाना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा था। उसके दिमाग में उसकी मां और उसकी बुआ ने भर दिया था कि बहुत बड़े घर में उसकी शादी हो रही है। तीन टाइम का खाना मिलेगा, अच्छे कपड़े मिलेंगे, बस एक ही कमी है कि उसका होने वाला पति बीमार है। और जिसकी उसे सेवा करनी होगी।
इस बात पर उसे कोई एतराज नहीं था।

रोहिणी की समझाइश बेकार गई, और सोनाली हंसते मुस्कुराते शादी के लिए तैयार हो गई।
बारात आई और बड़ी धूमधाम से सोनाली को ब्याह कर ले गई। शादी का पूरा खर्चा लड़के वालों ने ही किया था।

सोनाली का चढ़ाव देखने वालों की आंखें फटी रह गई। जिन्हें दो वक्त का भोजन ठीक से नसीब नहीं था, उस लड़की के लिए दो तोले का हार, एक पतली सी चेन, एक छोटा सा उंगली का छल्ला, एक सुंदर सी बिंदिया और नथ के साथ मोटी मोटी पाजेब बहुत था।

सोनाली की मां के मन में उठती हूक भी उन गहने जेवरों को देख बह गयी..
मन ही मन उन्होंने सोनाली को झोली भर कर आशीर्वाद दिया.. ” सौभाग्यवती भव! हमारी सी किस्मत लेकर ना चलना…. !”

बिदाई के समय माँ बेटियां एक दूसरे से लिपट कर खूब रोयीं..
उनका दुख हर कोई समझने वाला नहीं था। वह चारों ही एक दूसरे के दर्द की राजदार थी, और आज एक दूसरे का दर्द अपने दिलों के अंदर महसूस कर पा रही थी।

अपने दुख दर्द और आंसुओं की गठरी को मायके की देहरी पर छोड़कर जाती हुई सोनाली के मन में एक छोटा सा उल्लास भी था।
उसका पति देखने में सुंदर था। गोरा चिट्टा, एकदम दूधिया रंग। हां दुबला पतला था, लेकिन शक्ल से लड़कपन गया नहीं था।
सोनाली इसी बात की खैर मना रही थी कि उसकी किसी बड़ी उम्र के आदमी से शादी नहीं कर दी गई थी। उसकी होने वाली सास ने भी उमर चौबीस पच्चीस ही बताई थी..

सोनाली को उसकी सास ने कार में पीछे उसके पति के साथ बैठा दिया। कार में पहली बार बैठने वाली सोनाली शर्म लिहाज सब छोड़कर कार के कांच से बड़ी-बड़ी आंखों से अपने छूटते हुए घर, अपनी मां और बहनों को देख रही थी।

लेकिन अब उसकी आंखों के आंसू सूखने लगे थे। कार की गद्देदार सीट में पीछे सर टिकाकर उसने आंखें मूंद ली।
कार में हल्की-हल्की सी खुशबू फैली हुई थी।
सामने कुछ गाना बज रहा था, और उसे यह सब कुछ बहुत प्यारा लग रहा था।

लेकिन ससुराल पहुंचते ही उसका यह सुखस्वप्न दूसरे तीसरे दिन ही टूट गया।
शुरुआती दो-तीन दिन तो मेहमानों की आवाजाही में, बहू की मुंह दिखाई, पहली रसोई जैसी रस्में निभाते बीत गई।
    लेकिन इन दो-चार दिनों की भाग दौड़ ने उसके पति के शरीर का जैसे सारा रक्त निचोड़ लिया था। तीसरे दिन ही वह बिस्तर पर पड़ गया।

घर में हाय तौबा मच गई। सारे मेहमान अब जा चुके थे। और सिर्फ उसके सास ससुर मौजूद थे। पति के बिस्तर पर पड़ते ही उसके ससुर जी की भाग दौड़ देखकर उसके हाथ पैर फूलने लगे।

वह तो सुबह बालों को धोकर बीच की मांग निकाल कर खूब सारा सिंदूर भरकर अपने चेहरे को देखते मोहित हुई खड़ी थी कि, यह सब हंगामा मच गया।

वह भाग कर आई और देखा कि उसके सास ससुर दोनों उसके पति की तीमारदारी में लगे हैं। वह दीवार से लगकर खड़ी हो गई। उसे समझ ही नहीं आया कि क्या करना चाहिए?
तभी उसकी सास की आवाज उसके कानों में पड़ी।

” खड़ी-खड़ी क्या देख रही है? फ्रिज मे एक वायल रखा है, उसे ले आ। तुरंत इंजेक्शन लगाना पड़ेगा।”

यह सुनते ही उसके हाथ पैर फूल गए। अपने जीवन काल में उसने कभी फ्रिज नहीं देखा था। रसोई में गई और फ्रिज को खोलकर इधर-उधर टटोलने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी सास ने उससे मंगवाया क्या है?
इतनी देर में उसकी सास वहां पहुंच गई। बहुत जोर से उसकी बाहों को पड़कर उन्होंने पीछे किया और फ्रिज में पड़ा हुआ वायल लेकर वापस भाग कर बेटे के पास पहुंच गई।

वह पूरा दिन फिर इसी तरह बीत गया। दिन में खाना ही नहीं बना, और किसी ने कुछ नही खाया।
    न नवेली बहू ने खाया, लेकिन भूखे पेट को यह नहीं पता होता ना, कि सामने कोई बीमार पड़ा हुआ है। उसे तो कसकर भूख लग रही थी।
लेकिन नए घर में किसी से कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी। शाम तक में उसके पति की तबीयत थोड़ी सुधर गई।

तब उसकी सास ने उसे फरमान सुना दिया।

” आज ऐसा करो, बस पतली खिचड़ी बना लो। हम सब वही खाएंगे।”

वह चुपचाप रसोई में चली गई। दाल चावल कहां रखा था? कुकर कहां रखा था? उसे कुछ नहीं मालूम था। एक-एक बात पूछने के लिए उसे बार-बार आना पड़ रहा था। आखिर उसके ससुर के टोकने पर उसकी सास भी अपने बेटे का हाथ छोड़कर उसके पास चली गई।
  एक-एक करके समझाने लगी…

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” सुनो बहु, सुबह मैं तुम पर जरा नाराज हो गई। मुझे उस वक्त कुछ सूझ ही नहीं रहा था। विख्यात की ऐसे ही अचानक तबियत बिगड़ जाती है। और तब फिर उसे संभालना बहुत कठिन होता है।
आशा करती हूं धीरे-धीरे तुम भी इन सब की आदी हो जाओगी।”

सोनाली को तो आज तक जाने कितनी बार रिश्तेदार डांट कर चले जाते थे। यहां तक की उसकी मां खुद अपनी गरीबी और पैसे ना होने की झुंझलाहट को आए दिन उन लड़कियों पर निकालती रहती थी। पर कभी किसी ने उससे माफी नहीं मांगी थी।

यह तो उसके पति की मां थी। उसकी सास जो उससे माफी मांग रही थी।
वह एकदम से पलट कर उनके पैरों में झुक गई।

” आप माफी मत मांगे, आपका स्थान बहुत ऊंचा है।”
सोनाली की सास में उसे कंधे से पकड़ कर उठा लिया..

“चलो अच्छा है, तुम्हें बुरा नहीं लगा। ऐसा करो सबसे पहले चाय चढ़ा लो। सुबह से सब परेशान थे, सर चढ़ गया है।”

सोनाली ने हामी भरी और फटाफट गैस पर चाय चढ़ा दी।
अपने अभ्यास से उसने चार लोगों के लिए चाय बनाई,  जिसमें तीन कप पानी और एक कप दूध डाला ।  काली काली मीठी सी चाय लेकर जब वह अपने सास ससुर के पास पहुंची, वह चाय का रंग देखकर सास का मुंह बन गया।

” तुम्हें एक एक चीज सीखानी पड़ेगी सोनाली। कोई बात नहीं धीरे-धीरे सीख जाओगी।”

इतनी देर में कुकर की सीटी बज गई, सोनाली ने कुकर खोलकर खाना परोस दिया।

अपने घर में जैसा बनते देखते आई थी, वैसे ही अंदाज से उसने बनाया था। खिचड़ी कम पड़ गई।
सास ससुर के साथ उसके पति ने भी खाना खा लिया था।
     वह अब अपने लिए परोसने बैठी तो कुकर खाली  था। दोबारा उसका कुछ बनाने का मन नहीं किया। बर्तनों को ऐसे ही साफ कर उसने रसोई में पलट कर रख दिया।

“सुनो सोनाली, आज तुम दूसरे वाले रूम में सो जाओ। विख्यात  को ड्रिप लगी हुई है ना! उसके साथ होगी तो कहीं नींद में उसके हाथ की नीडल पर तुम्हारा हाथ वगैरह पड़ गया, तो…”

” जी मम्मी जी, समझती हूं।”

सोनाली चुपचाप दूसरे कमरे में चली गई। यह सोनाली के शादीशुदा जीवन की शुरुआत थी। और फिर धीरे-धीरे दिन बीतते गए।

जिस खाने पीने के शौक से उसने शादी के लिए हां बोली थी, वह यहां पूरा होता कहीं से भी नजर नहीं आ रहा था। यहां आए दिन नाश्ते में दलिया या ओट्स ही बनते थे। खाने में सादी फीकी खिचड़ी या फिर रोटियां और उबली सब्जी…

लेकिन इतनी साज संभाल भी काम न आयी.. विख्यात की तबियत बिगड़ने लगी.. और एक दिन सबको रुलाते हुए वो चला गया। 

जाने के पहले चार दिन वो अस्पताल में भरती रहा.. वहाँ पर डॉक्टर्स भी उस पर प्रयोग पर प्रयोग करने लगे थे..शायद वो सब भी उस संजीवनी बूटी को ढूंढ़ नहीं पा रहे थे, जिससे उसे जिलाया जा सके।

और आखिर वहाँ मौजूद हर धन्वंतरि भी ऊपर वाले की माया के सामने हार गया, और विख्यात चला गया।

रोना धोना मच गया..।
एक एक कर लोग आते गए और थोड़ा सा सम्भलते घर के लोगो को नोच नोच कर और रुला गए।

सोनाली की समस्या विकट थी। उसने अब तलक जिस पति को ध्यान से देखा तक नहीं था, उसके बिछोह से बुरा ज़रूर लग रहा था, लेकिन ऐसा दर्द दिल में उठ ही नहीं रहा था कि वो रो पाए।

इत्तेफाक ऐसा था कि रोटी के एक एक निवाले के लिए आंसू बहा कर रोने वाली लड़की की आंखे आज जैसे मरूस्थल सी सूख गयी थी।

ऐसे में उसकी मौसी सास आकर उसके कानो में फुसफुसा गयी..

“समझते हैं तुम्हे सदमा सा लगा हैं, लेकिन दुनिया वाले ये न कह बैठे कि नयी बहु रोई तक नहीं.. !”

और ज़माने की नजरो से नयी बहु की रुसवाई छुपाने उन्होंने उसके सर से घूंघट खींच दिया..
चेहरा घूंघट की ओट में हो गया, अब कौन आ रहा कौन जा रहा, यही सोनाली को नहीं मालूम चल रहा था। लेकिन उसका रोना आवश्यक था, ये सोच कर वो बीच में सुबक लेती थी।

पिछले दो महीने से उसका खाना पीना और भी गया बीता सा हो गया था। कंधे के पास की हड्डियां निकल आयी थी..।
अपनी अम्मा के घर चावल चटनी ही सही, मिल तो जाता था। यहाँ तो बहुत बार विख्यात की तबीयत बिगड़ने पर पूरा घर ही अनशन में चला जाता था..
अब भी हालात नहीं सुधरे थे।

इसी सब के बीच उसे सबसे ज्यादा दुःख अपने सास ससुर के लिए लग रहा था..।
उन दोनों की सारी दुनिया उजड़ गयी थी..
सास तो उसकी जैसे होश में आना ही नहीं चाहती थी.. बार बार गिरती जा रही थी..
फैमिली डॉक्टर ने आकर सेलाइन लगा कर उन्हेँ चलने लायक दुरुस्त किया..
उनकी ऐसी हालत देख वो खुद साड़ी का आंचल कमर में खोंस उनके लिए कुछ बनाने रसोई में जाने लगी तो मौसी सास ने झट हाथ पकड़ खींच कर बैठा दिया..

“अरे चार दिन तो लोगो के हिसाब से चल लो, फिर तो अपनी मनमर्जी ही करना.. !”

उनसे क्या कहती सोनाली.. ज़िन्दगी ने उसके साथ अपनी मनमर्जी की थी, वो तो बस जीवन प्रवाह में बहती चली जा रही थी, वो भी भूखी..।

इन दस ग्यारह दिनों के कट्टर नियमों ने उसे अंदर से और भी खोखला कर दिया।

दिन भर में एक बार खाने का नियम, वो भी बिना नमक हल्दी तेल का खाना.. कभी कभी ये थाली देख उसे उबकाई सी भी आ जाती..।
तो कभी ऐसा होता कि जैसे ही वो खाने बैठती, कोई ना कोई मिलने वाली आकर उसे सीने में कस कर टसुए बहाने लगती, और फिर एक तरफ उपेक्षित सी पड़ी उंघती थाली में परोसी खिचड़ी पर हवा से जम चुकी पपड़ी को देख उसका ही खाने का मन नहीं करता..

उसके मायके वाले भी आये, और दिल से उसके साथ आंसू बहा कर निरुपाय लौट गए।
बेटी को लेकर जाना उनके वश के बाहर की बात थी…

सोनाली के गले लग कर सबसे ज्यादा रोहिणी रोई, और जाते जाते उसके कान में बोल गयी..

“कोई चिंता की बात नहीं हैं.. अगर यहाँ तुम्हारे साथ अच्छा बर्ताव नै हुआ और तुम्हे नौकरानी बना कर रखा इन लोगो ने, तो तुरंत सब छोड़ कर घर चली आना.. जब तक हम जिन्दा हैं, तुम्हे रोटी पानी के लिए किसी का जूठा नहीं धोने देंगे !”

कृतज्ञता से सोनाली ने अपनी बहन को देखा और उसे बिदा किया..

कठिन दिन भी पार हो जाते हैं…
उस परिवार के भी पार हुए, और ब्रम्हभोज का दिन आ गया….

धीरे धीरे घर के लोग सामान्य होने लगे थे, होना ही पड़ता हैं।
अकाट्य सत्य हैं कि जाने वाले के साथ कोई नहीं जाता..

सुबह से विख्यात की पसंदीदा वस्तुए बनवायी जा रही थी..

“उसे सूरन बहुत पसंद था, खा ही नहीं पाया, वो भी बनवा लेना !”

“मखाने की खीर बनवाना हैं?  लेकिन चावल की भी बनेगी तो भाई साहब मखाने की बनवाना हैं या नहीं.. ?”

“बनवा दो ! जो जो उसकी माँ कह रही, सब बनवा लो.. उसके नाम पर कम से कम लोग खाएंगे तो उसकी आत्मा तृप्त हो जाएगी.. !”

और वाकई गोयल परिवार ने कोई ऐसी चीज ना छोड़ी जो उनका लड़का पसंद करता रहा हो.. कुछ उसकी पसंद, कुछ खिलाने वालो की, करते करते खूब सारी चीजे बन गयी…

सोनाली को सादी सी साड़ी पहना कर उसके कमरे में बैठा दिया गया था..।
सब सुबह से इतने व्यस्त थे कि उस बेचारी को चाय तक नसीब ना हुई। इस बात पर किसी का ध्यान तक नहीं गया..
पानी तक पीने के लिए उसे रसोई तक जाना पड़ रहा था, और रसोई में आज जानी अनजानी इतनी औरते भरी थी कि, उसे बार बार वहाँ जाने में संकोच होने लगा था..
कमरे में बैठे बैठे उसे उकताहट होने लगी थी।

वही लोगो का आना, दो बातें उससे कर के खाना खाने चले जाना..
कुछ एक घर की चीफ गेस्ट सरीखी औरते तो अपनी प्लेट सजा कर वहीँ उसके कमरे में आ धमकी, और उसके इर्द गिर्द बैठ कर खाने लगी..

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उसने पिछले दो दिनों से कुछ ठीक से नहीं खाया था, लेकिन किसी को फ़िक्र नहीं थी, लेकिन उसके खुद के पेट को थी..
वो बीच बीच में गुड़गुड़ की आवाज़ निकाल निकाल कर उसे बता रहा था कि अग्नि प्रज्वलित हैं, उसमे ईंधन झोंकने का समय आ गया हैं।

एक तो भूख, ऊपर से हींग वाली कचौड़ियों की जानलेवा खुशबु..
खिड़की से लहराती हुई मेनका सी आ कर उसके मन मस्तिष्क के विश्वामित्र के छक्के छुड़ा रही थी.. ऊपर से सामने बैठी देवियों की बातचीत उसके कान पिघला रही थी..

“सुबह का मौसम देख कर सिल्क निकाल कर पहन ली, और अब देखो कैसी धूप निकल आयी..!”

“हाँ आजकल तो गर्मी के मारे जीना दूभर हो गया हैं.. !”..

इन दो कोयलों का वार्तालाप ऋतुओ पर चल रहा था कि तीसरी टहूकी

“एक तो आजकल इत्ता सारा खाना बना देते हैं.. देखो ना कित्ते आइटम रखें हैं, पूरा तो आदमी चख भी ना पाए.. !”

सोनाली देखना नहीं चाहती थी लेकिन चोर नजरो से उसने उस महानुभाव की थाली देख ली..
ठूंस ठूंस कर रखने पर भी उसकी कटोरियों के किनारो से सब्जी रायता निकल कर बाहर गिरने को उद्यत थे..
लग रहा था जैसे हर भोज्य पदार्थ में होड़ सी लगी थी कि मैं पहले इस थाली से कूद कर आत्महत्या करूँगा.. !

सोनाली ने अपनी आती हुई हंसी दबा ली.. और घूंघट और ज्यादा खींच लिया..

लेकिन अब उसकी भूख असहनीय हो चली थी..
उसने पल भर के लिए आंखे मूँद ली..

“कहाँ चले गए आप ? कम से कम आप थे तो एक आस तो थी कि कुछ न कुछ खाने मिल जायेगा.. आपके साथ वो आस भी जाती रही.. !”..

सोनाली कि आँख से पहली बूँद टपकी और उसके गाल पर आकर अटक गयी.. ठीक उसी समय उसकी बुआ सास ने उसका घूंघट उलट दिया..

“चल बेटा, तू भी कुछ खा ले !”

कचौड़ियां सोंठ की चटनी, दही भल्ले, पूड़ियाँ रायता छोले मसाले वाले चांवल बड़े खीर रबड़ी गुलाब जामुन से सजी थाली देख सोनाली की आंखे वापस भर आयी और उसकी बुआ सास ने लाड़ से उसके बालों पर हाथ फेर दिया..

“ना बेटा ऐसे रोते नहीं.. जाने वाला चला गया.. उसके हिस्से इतनी ही सांसे थी लेकिन हम सब के हिस्से जितनी साँस हैं उतना तो हम लेंगे ही ना.. तो रोते रोते जीने से अच्छा जाने वाले को याद कर मुस्कुरा कर जी ले.. ! ले कुछ खा ले.. तेरा खाया ही तो उसे मिलेगा और तू जब खा कर तृप्त होगी तभी वो खुश होगा !”

सोनाली ने कृतज्ञता से अपनी बुआ सास को देखा और उनके पीछे बैठी तितलियों कि फ़ौज पर उसकी नजर टिक गयी..

बुआजी पलटी..

“चलो री.. अब तुम सब जरा बाहर चल कर बैठो.. विख्यात की माँ को भी कुछ खिलाओ पिलाओ.. इसे यहाँ चैन से खा लेने दो !”

बुआ की डपट पड़ते ही सारी कि सारी अपनी रेशमी साड़ियां सहेजती बाहर निकल गयी..

“तेरा पानी ये रखा हैं बेटा, तू खा ले.. मैं तेरे लिए चाय लेकर आती हूँ.. !” बुआ जी समझदार थी, चुपचाप बाहर चली गयी और जाते जाते दरवाज़ा भी लगा गयी..

सोनाली ने थाली की तरफ देखा और झट से कचौड़ी का टुकड़ा मुहं में रख लिया..
अनंत तृप्ति से उसने आंखे मूँद ली..

“आप जहाँ भी हैं, हमेशा खुश रहिएगा विख्यात जी ! इस जन्म जितने कष्ट झेलने थे झेल लिए, अब हम दिल से आशीर्वाद देते हैं, आपका अगला जन्म सुख स्वास्थ्य से भरा हुआ हो !”

आंखे खोल कर वो फिर बिना अगला विचार मन में लाये उस थाली पर टूट पड़ी..

इति..



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Seema Kashyap
Seema Kashyap
1 year ago

Bahut achha likhati hai aap.

Neha
Neha
1 year ago

Hmm…..
To iss prakar logo ko bhukha rakh k fir 56 bhog pros diya jata h taki khane wale k dil se dua nikle😂😂😂🤣

Very nice 👏👏

Jyoti
Jyoti
1 year ago

आपकी सारी रचनाएँ बहुत ही शानदार होती है अपर्णा जी , बहुत दिनों से प्रतिलिपि पर पढ़ रही थी आपको , आपकी कई अधूरी रचनाएं देखकर पता चला कि आपने तो प्रतिलिपि को ही छोड़ दिया है , तब जाकर खोजबीन करने के बाद आप यहां मिली , बहुत ही अच्छा लगा ।

उमिता कुशवाहा
उमिता कुशवाहा
1 year ago

मेरे पापा के जाने पर रो रो 😭😭😭😭कर मर जाने का मन कर रहा था ठीक से याद भी नहीं की ढंग से खाना कब खाया था उन्होंने और ठीक उसी समय से मेरा भी कहां कुछ खाने का मन हुआ पर उनके जाने के बाद भी खाना नही खाया गया 🥺🥺पर ब्रह्मभोज के दिन बहुत रोई सबने समझाया पर आंखे दिन भर खाली नहीं हो पाई।
जैसे ही भोज शुरु हुए 2 ,3 घंटे का समय हुआ ख्याल आया की सब पापा की पसंद का है और यही सब मुझे भी पसंद है फिर खुद उठ k गई मुंह धोया और खाना शुरू किया जब तक खाया तब तक आंखे भी बरसती रही।
मन में अचानक से यही ख्याल आया था की वो हमेशा कुछ खाने से पहले मुझे पेट भर खिलाते थे हमेशा, बस वही सोच k pet bhar k खाया बिना भूख के, लगा खाना मेरे मुंह से सीधा पापा के पेट में जा रहा है सब देख रहे थे मुझे अचंभे से पर छोटा भाई समझ गया की ये क्या कर रही है फिर उसने वही सब रखा जो पापा को सबसे ज्यादा पसन्द था ।
खाने के बाद हम भाई बहन गले लग कर खूब रोए पर मन में एक सुकून भी था ।
Aj अचानक से रचना पड़ने पर याद आ गया ।😞😞😞😞😞

Ashok Garg
Ashok Garg
1 year ago

VERY NICE STORY VERY INTRESTING

Upasna
Upasna
1 year ago

Bahut achchhi kahani …ye sach hai insan kisi ke bhi aage majbur nahi hai ye to bas pet ki aag hai Jo usse sab kuchh karwa deti hai

Poonam Aggarwal
Poonam Aggarwal
1 year ago

Super storey Jevan ki sacchai 👌👌👍👍💖✍️

Meenakshi Sharma
Meenakshi Sharma
1 year ago

बहुत ही शानदार कहानी, मुंशी प्रेमचंद जी की याद दिला दी।👍🤩👌
भूख बहुत बड़ी चीज है,इसके आगे सब बेमानी है।पेट की आग दुख में सबसे अधिक धधकती है।
आखिर सोनाली को खाना मिल ही गया। ओर उसके मन से भी विख्यात के लिए आशीर्वाद मिल गया।

Deepa verma
Deepa verma
1 year ago

मार्मिक और हृदय विदारक रचना😢

Sushma
Sushma
1 year ago

Superb story…bhut khub likha h aapne…jaise aap man k bhaav likhti h vo MN ko choo jate h 👌👌👌👌