
अपराजिता -125
यज्ञ ने कुसुम को फोन लगा दिया, यज्ञ नीचे अखंड की गाड़ी की चाबी हाथ में घूमाता इधर से उधर चहल कदमी करते हुए कुसुम का इंतजार कर रहा था, और कुसुम ऊपर तैयार हो रही थी।
उसकी टेबल पर ताजा फूलों का गुलदस्ता रखा था। जो रोज सुबह वहीं के बगीचे के फूलों से उसकी खास नौकरानी बनाकर चली जाती थी।
उसमें ताजा खिले गुलाब लगे हुए थे, उस गुलदस्ते से एक गुलाब निकाल कर कुसुम ने अपने कान के पीछे पिन से लगा लिया। बालों को उसने पूरी तरह से पीछे समेट कर आज जूड़ा बनाया हुआ था। उसके लंबे घने बालों का जूड़ा भी काफी भारी बना था, जो उसकी पीठ पर टिका हुआ था। पीली और सुनहरी साड़ी में उसका सुनहरा सांवला रंग उभर कर नजर आ रहा था…
कान पर गुलाब लगाकर वह खुद को निहार रही थी कि तभी यज्ञ का फोन आ गया उसने धीरे से फोन उठा लिया…
“आज ही तैयार हो जायेंगी ना आप ?”
“आप तैयार होने देंगे, तब तो तैयार हो पाएँगे !”
“हमने कब रोका है.. !”
“हाँ तो तैयार हो लेने दीजिये !”
“ठीक है, जरा जल्दी कीजिये.. फिर बाहर जाते ही आप घर लौटने के लिए ज़िद कर देंगी !”
“हम्म.. फ़ोन रखिये !”
मुस्कुरा कर कुसुम ने फोन रख दिया, लेकिन हड़बड़ी में वह फोन काटना भूल गई। धीरे-धीरे कुछ गुनगुनाते हुए वह अपनी आंखों में काजल आंजने लगी..
“सजना है मुझे, सजना के लिए.. !”
यज्ञ ने भी फोन नहीं काटा था, उसे कुसुम का गुनगुनाना पसंद आ रहा था। वह आराम से अखंड की जीप खोलकर उसमें बैठ गया, और कुसुम का इंतजार करने लगा। उस वक्त उसका फोन बजने लगा और उसे फोन उठाना पड़ा। फोन अखंड का था..
“यज्ञ हम घर पर भी बोलना भूल गए थे, हो सकता है हमें वहां रुकना पड़ जाए अभी मालूम चला कि कुछ और भी दोस्त आ रहे हैं, और ज़ोर देकर कर रहे थे कि आज यही साथ में रुक जाएंगे। तो अगर हम वापस नहीं आते तो घर पर अम्मा और बाबूजी को बता देना..।”
“जी भैया !”
यज्ञ ने फोन काटा, इतनी देर में कुसुम बाहर चली आई। यज्ञ एकटक उसे देखता रह गया।
” क्या हुआ ऐसे क्या देख रहे हैं?”
” यह गुलाब बहुत सुंदर लग रहा है ।”
यज्ञ ने कहा और कुसुम मुंह बनाकर उसकी बगल वाली सीट पर आकर बैठ गई। दोनों ही घूमने के लिए निकल गए… ।
“सुनो कुसुम.. हम क्या सोच रहे थे, बताये ?”
“बताइये ?”
“बुरा तो नहीं मान जाओगी ना ?”
” आप तो ऐसे सवाल पूछ रहे हैं, जैसे हम हर बात का बुरा मान जाते हैं।”
” हां, अगर बुरा लगने वाली बात बोलेंगे, तो जरूर मान जाएंगे।”
” नहीं बात बुरा लगने वाली तो नहीं है, लेकिन तुम्हारे दिमाग का भरोसा भी नहीं है ना।”
” अच्छा मतलब हमारे पास दिमाग नहीं है।”
” दिमाग तो है छोटी ठकुराइन, लेकिन हम जो कहना चाहते हैं वह पता नहीं समझ पाओगी या नहीं?”
” देखिए इस तरह से पहेलियां मत बुझाइए। जो भी कहना साफ-साफ कहिए।”
” मतलब साफ-साफ कहेंगे तो बुरा नहीं मानोगी?”
” अब आप नहीं कहेंगे, तो हम गाड़ी से उतर जाएंगे।”
” चलती गाड़ी से उतर जाएंगी?”
“हमें चैलेंज मत कीजिए, आप अच्छे से जानते हैं कि हम कैसे हैं? कोई हमें चैलेंज कर दे, ना तो फिर हम यह तक नहीं सोचते कि उस चैलेंज को पूरा करने के लिए हमारी जान पर भी बन सकती है…।”
“अच्छा रुको.. हम बोल रहे..।”
कुसुम ने घूर कर उसे देखा..
“कुसुम हम सोच रहे, एक बार तुम्हारे भैया भाभी से चल कर मिल लो, हमें पता है,उस दिन तुम्हारी भाभी तुम्हे और हमें बुलाने आयी थी, लेकिन उस दिन तो हम जा नहीं पाए.. आज ही जाकर मिल लेते है गिट्टू से .. !”
कुसुम खुद कुछ दिनों से यही सोच रही थी, लेकिन अब तक उसे मौका नहीं मिल पाया था, उसने आंखे बडी बडी कर अपने निराले पति को निहार लिया..
ये मन की बात भी पढ़ लेते हैं क्या ?
उसने बिना कुछ बोले बस हाँ में गर्दन हिला दी….
यज्ञ ने गाड़ी मानौर से दूर्वागंज की तरफ निकाल दी..
ज्यादा दूर का रास्ता नहीं था। और फिर दोनों पति पत्नी को पहली बार एक दूसरे के साथ ऐसा समय मिला था.. ।
दोनों मुस्कुराये से शर्माए से अपनी जगह बैठे थे..।
यज्ञ गाड़ी चला रहा था, लेकिन आज आश्चर्य की बात थी कि वो कुछ गुनगुना नहीं रहा था..
“क्या बात है.. आज बड़े खामोश से बैठे हैं ! कुछ गा नहीं रहे ! आज आपके अंदर का कुमार सानू कहाँ सोया पड़ा है.. ?”
कुसुम ने यज्ञ को छेड़ दिया और यज्ञ मुस्कुरा कर उसे देखने लगा..
“मतलब मेरे गानो को पूरी गंभीरता से सुना जाता था, भले ही ऊपर से ये दिखा दिया जाता था कि हमे कोई फर्क नहीं पड़ता..
“अब कोई गायेगा और गाना कानो में पड़ेगा तो सुन तो लेंगे ही ना.. कान काट कर तो ना फेंक देंगे !”
“वाह ऐसा भी अजब होता है भला कि गाने सुनने से बचने के लिए किसी ने कान काट कर फेंक दिए !”
ये कहते हुए यज्ञ ने धीमे से कुसुम के पैरो पर अपना हाथ रख दिया और वो चिहुंक कर खुद में सिमट गयी..
यज्ञ ने अपना हाथ हटाया और रेडियो पर गाना चला दिया…
“क्या ग़ज़ब करते हो जी,प्यार से डरते हो जी।
डर के तुम, और हसीन लगते हो जी
क्या ग़ज़ब करते हो…
कदमों पे सर रख के,हम यहीं सो जाएँगे
हँस के तुम देखो तो,हम खुश हो जाएँगे
झूठ ही कह दो तुम भी,हम पे मरते हो जी
क्या ग़ज़ब करते हो…
गाना सुन कर कुसुम झेंप सी गयी, लेकिन यज्ञ के सामने वो नहीं दिखाना चाहती थी की वो शरमा रही है….
वो खिड़की से बाहर देखने लगी.. बाहर हलकी हलकी सी हवा चल रही थी… काले काले बादल आसमान पर छाये हुए थे, मौसम खुशनुमा था!
उसे खुद मालूम नहीं चला कि कब वो गुनगुनाने लगी…
यज्ञ ने उसकी गुनगुनाहट सुनने के लिए रेडिओ को धीमा कर दिया..
पड़ गई दिल पर मेरी, आप की पर्छाइयाँ
हर तरफ़ बजने लगीं सैकड़ों शहनाइयाँ
हँसके अपनी ज़िंदगी में, कर लिया शामिल मुझे
आप की नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे..
कुसुम जानती थी कि यज्ञ उसे सुन रहा है, और यज्ञ समझ रहा था कि कुसुम उसे ही सुना कर गा रही है..।
यूँ ही गाते गुनगुनाते वो लोग दूर्वागंज कुसुम के घर तक पहुँच गए…
हालाँकि वहाँ पहुँचने के बाद कुसुम के अंदर संकोच भर गया, अब भी अचानक उसे अपने भाई का किया कांड याद आ जाता था, लेकिन असल में देखा जाये तो आज वो यज्ञ के साथ इसलिए तो खड़ी थी क्यूंकि उसके भाई ने ज़ोर ज़बरदस्ती से उसकी शादी यज्ञ से करवाई थी.. .. अपनी ही बेवकूफियों से वो लड़ने लगी..
उस वक्त जब वो अपनी ज़िद में पागल हुई पड़ी थी, तब उसे सिर्फ वो सही और बाक़ी सब गलत लग रहे थे! लेकिन देखा जाये तो उसके भविष्य और उसके स्वभाव के अनुसार उससे ताल मिला कर चल सकने वाला जीवनसाथी तो उसके भैया ने ही उसके लिए ढूंढा..।
वो आज डॉक्टर साहब के साथ होती, तो खुश होती, बहुत खुश होती। क्यूंकि वो उसकी पहली पसंद थे। लेकिन आज वो उसकी ज़िन्दगी में नहीं है, तब भी वो ज़िंदा है और खुश भी है..
बल्कि सही मायनो में ख़ुशी क्या होती है ये उसे यज्ञ के परिवार में आकर ही पता चला..।
एक दूसरे का सम्मान, एक दूसरे से प्रेम अपनापन ये सब उसने यज्ञ अखंड और अपनी सास से सीखा।
उसके दिल दिमाग में कोलाहल सा मचा था।
लेकिन उसके दिल में मची हलचल से बेखबर यज्ञ ने गाड़ी गेट के बाहर लगा दी..
और गेट खोल कर अंदर घुस गया..
वो सीढ़ियों तक पहुँच कर थम गया, उसने मुड़ कर देखा कुसुम अब भी गेट पर ही खड़ी थी..
“क्या हुआ.. आओ ना ?”
कुसुम ने हाँ में गर्दन हिलायी और धीर मंथर गति से पांव घर की दहलीज पर बढ़ा दिए..
बाहर आंगन में ही उसके पिता ठाकुर साहब बैठे चिलम गुड़गुड़ा रहे थे..
उनके सामने ज़मीन पर दो चार ग्रामीण उकडू बैठे अपनी उधारी माफ़ कराने की विनती कर रहे थे…
उसी समय कुसुम अपने पति के साथ दरवाज़े पर प्रकट हुई और घर की पुरानी नौकरानी भाग कर रसोई में अपनी मालकिन को बुलाने चली गयी..
और फिर एक एक कर सब आते चले गए..
ऐसे अचानक जंवाई सा का आना मतलब घर पर एक त्यौहार सा था..
कुसुम की माँ आरती का थाल लिए चली आयी..
कुसुम और दामाद बाबू को साथ लिए वो अंदर बैठक में चली आयी..
यज्ञ के साथ कुसम के बाबूजी बैठे और वो भाग कर अपने भैया से मिलने चली गयी..
शादी के बाद से यह पहला मौका था, जब उसके दिल दिमाग से उसके चंद्रा भैया के प्रति नाराजगी उतर गई थी। वह पूरे मन से आज अपने बड़े भाई के सामने खड़ी थी।
चंद्रा अब भी बिस्तर पर ही था, उसका हिलना डुलना अब भी संभव नहीं था। उसके दैनिक कार्यों के लिए एक मेल नर्स मौजूद था, बावजूद उसकी पूरी सहायता उसकी धर्मपत्नी सुजाता ही किया करती थी..।
चंद्रभान के इस तरह बिस्तर पर पड़ जाने से सुजाता के ऊपर काम का बोझ जरूर बढ़ गया था। लेकिन उस साहसी युवती ने कभी अपने कंधे ढीले नहीं पड़ने दिए।
घर के काम वह पहले भी करती आई थी, अब उसके ऊपर चंद्रभान के सभी कामों की जिम्मेदारी भी थी। मेल नर्स रात की दवा खिलाने के लिए कमरे में मौजूद जरूर रहता था, लेकिन कुर्सी पर पड़े पड़े वह उंघता रहता था, और हमेशा चंद्रा को उठाकर दवाई खिलाना सुजाता का ही काम होता था।
बहुत बार मेल नर्स के सोए रहने पर अगर चंद्रभान को फारिग होना होता था, तो वह सुजाता की तरफ ही देखा करता था। सुजाता बिना झिझक के हर बार दौड़कर चिलमची उठा कर ले आती थी।
शायद जिंदगी में पहली बार वह सच्चे मन से अपना पत्नी धर्म निभा रही थी।
और उसकी यही कर्मठता, उसकी सजगता, चंद्रभान को अंदर ही अंदर झुलसा रही थी। आज तक वह अपने पुरुष होने के दम्भ में जाने कितनी बार अपनी पत्नी को दुनिया वालों के सामने जलील कर चुका था।
लेकिन आज उसका झूठा दम्भ कमरे के एक किनारे संकोच में गड़ा अवश पड़ा था, और वो पूर्णरूपेण उसी स्त्री पर निर्भर हो चुका था, जिसे वो अपने पांव की जूती से अधिक मत्वपूर्ण कभी समझ ही नयी पाया.. ।
अपनी बहन को देख उसके चेहरे पर मुस्कान चली आयी..
कुसुम ने आगे बढ़ कर अपने भाई के हाथ थाम लिए..
“अब तो उठ बैठिये भैया, पुरे घर की रौनक ही चली गयी है..!”
चंद्रभान कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसके बोलने की क्षमता पर भी असर पड़ा था.. ।
चेहरे पर लगी चोट के कारण गालों की मसल्स पर असर पड़ा था और वह जो बोलना चाहता था, वह ठीक से बाकियों को समझ में नहीं आता था। उस पूरे घर में सिर्फ एक सुजाता थी, जो उसकी कही बातें समझ कर उसके इशारों को समझ कर उसकी जरूरत पूरी कर दिया करती थी।
अभी भी चंद्रभान ने लड़खड़ाते हुए कुछ शब्द कहे जो कुसुम समझ नहीं पाई। कुसुम ने अपनी भाभी की तरफ देखा और सुजाता बड़े लाड से उन दोनों भाई बहनों के पास चली गई।
” यह कह रहे हैं रौनक तो तुम्हारे जाने के कारण चली गई है। जिस दिन से तुम विदा हुई हो उस दिन से शायद ही इस घर में कोई हंसा मुस्कुराया हो। बस इसीलिए तो गिट्टू के जन्मदिन को उत्साह से मनाने का सोचा था। लेकिन उस दिन भी तुम्हारी सास की तबीयत बिगड़ गई।”
” तो क्या हुआ भाभी? हम नहीं आ पाए थे, लेकिन आप लोगों ने तो जन्मदिन मनाया होगा ना?”
” ऐसे कैसे मना लेते..घर परिवार तो अब एक ही है ना !”
“अरे भाभी ये गलत किया.. गिट्टू की ख़ुशी तो मनाना था ना.. ?”
“गिट्टू की दो चार सहेलियों को बुला कर केक कटवा लिया था कुसुम.. बाक़ी अम्मा जी ने कढ़ी गुलगुला बनवा लिया.. बस हो गया जन्मदिन.. !”
कुसुम मुस्कुरा उठी.. इसी सब के बीच यज्ञ भी आ गया था…
उसे भी चंद्रभान की हालत देख कर दुःख ही होता था, लेकिन उसके हाथ कुछ नहीं था..
वो और कुसुम वहीँ बैठे थे, तभी सुजाता ने नौकर से कह कर चाय नाश्ता ऊपर ही मंगवा लिया..
सब आपस में बातें कर रहे थे कि यज्ञ का फ़ोन बजने लगा..
एक बार फिर अखंड के मोबाइल से उसके फ़ोन पर कॉल आने लगा…
***
अनिर्वान नेहा और गीता को साथ लिए अस्पताल के लिए निकल गया..
दूसरी तरफ अस्पताल में मौजूद डॉक्टर्स ने अखंड की जेब से उसका मोबाइल निकाला और उसमें से पहला ही नंबर जो कुछ समय पहले डायल किया गया था, पर फोन लगा दिया! इत्तेफाक की बात थी कि मोबाइल की स्क्रीन टूटने के बावजूद मोबाइल फिलहाल कम कर रहा था…
पहला ही नंबर यज्ञ का था और अस्पताल से यज्ञ के पास फोन चला आया। उस वक्त यज्ञ और कुसुम बाहर घूमने गए हुए थे..
यज्ञ चंद्रभान के सामने बैठा था और फ़ोन बजने लगा.. फ़ोन यज्ञ ने उठा लिया..
लेकिन दूसरी तरफ से अखंड की जगह किसी और की आवाज़ सुन यज्ञ ज़रा चौंक गया..
“हेलो कौन बोल रहा हैं ?”
“हम यज्ञ बोल रहे हैं ! लेकिन ये तो हमारे भैया का फ़ोन नंबर हैं !आप कौन बोल रहे हैं ?”
“मैं हॉस्पिटल से बोल रहा हूँ.. ये जिनका भी नंबर हैं उन्हेँ अस्पताल में भरती किया गया हैं,उनका एक्सीडेंट हुआ हैं !”
“क्या ?” यज्ञ घबरा कर खड़ा हो गया..
दूसरी तरफ से डॉक्टर ने बताया कि अखंड का एक्सीडेंट हो गया हैं..
ये सुनते ही यज्ञ घबरा कर निकलने को था कि कुसुम भी उसके पास आ गयी..
“क्या हुआ ?”
‘अखंड भैया का एक्सीडेंट हो गया हैं.. हम हॉस्पिटल निकल रहे हैं !”
“हम भी चलेंगे !”
“तुम यहां रुको न .. !”
“नहीं.. हम साथ चलेंगे !” फटाफट अपने मायके वालो से मिल कर कुसुम भी यज्ञ के साथ अस्पताल के लिए निकल गयी..
क्रमशः

Bahut sundar part
आज के भाग में कुसुम और यज्ञ का एक दूसरे के प्रति अब सच्चा प्रेम दिखा, अब ऐसा लगा कुसुम अपनी हर पिछली बात को भुलाकर बस यज्ञ की ही हो गई,।
सच में हर औरत अपराजिता है कुसुम ने अपनी सास और यज्ञ को बचाने की जो. हिम्मत दिखाई सही में काबिले तारीफ थी और कुसुम की भाभी जो कभी चंद्रभान के सामने बोलने की हिम्मत नहीं रखती थी, जिसे चंद्रभान ने हमेशा अपने पैर की जूती ही समझा आज वही सुजाता जी -जान से चंद्रा की सेवा में लगी है,।लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💐💐💐
Bahut Sundar part ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
Beautiful part bas अखंड को ठीक कर देना
बेहतरीन लेखन
बहुत बहुत ही खूबसूरत पार्ट 👌👌👌👌
कुसुम तो आज़ अपने सजना के लिए पुरी सजधज के तैयार हुई है और गाते हुए उसे बता भी रही है। यज्ञ भी बहुत अच्छे से समझ रहा कुसुम की हर हरकत को। दोनों की नोक झोंक में बडा मजा आ रहा है।
चंद्रा को अब समझ आ रहा है कि उसने सुजाता के साथ कितना बुरा व्यवहार किया है फिर भी वो उसकी इतने मन से सेवा कर रही है।
अखंड की खबर मिलते ही यज्ञ और कुसुम अस्पताल जाने के लिए निकल गए हैं और उधर अनिर्वान और गीता भी निकले हैं। रेशम तो पहले से ही वहां मौजूद है। सबका आमना सामना एक साथ होने वाला है। अब शायद रेशम के सामने सबकुछ क्लियर हो जाएं और रेशम की ग़लत फहमी दूर हो जाएं।।्
Kusum aur yagya ek dusre ki takkar ke h….ram milyi Jodi h ……..sawal Jawab me koi bhi kam nhi h …..dono ek saath jachte h….akhand ka accident hona resham ka use hospital lekar aana …..lagta h ab sach samne aane ka time ho gya h
यज्ञ और कुसुम के लिए अच्छा लग रहा है और अखंड भी हीरो है और हीरो का कोई एक्सिडेंट होता है क्या?🤔🤔🤔
हिंदी फिल्में भी देखती आप? हीरो को चोट भी भी लगती।😂😂😂
Bahut jada excited h ki kb akhand ki sachai resham ko pta chalegi…..or sbki life sahi raste pr aegi
कुसुम और यज्ञ के लिए खुश है, पर अखंड के लिए परेशान है ,। अपनी समीक्षा उधार रही।
आगे के इंतज़ार में