अपराजिता -124

अपराजिता by aparna

अपराजिता -124

और अखंड के कोर्ट केस में मुझे पता चला कि कुछ समय बाद सबूतों के अभाव में अखंड को बरी कर दिया गया..

मुझे इसी बात से राहत हो गयी कि अखंड छूट गया हैं, और फिर मैंने सोचा कि अखंड के छूट जाने के लिए भगवान का आभार तो करना चाहिए..!

अब धीरेन्द्र भी जरा ठंडा पड़ने लगा था, अखंड को वो जिस कारण रास्ते से हटाना चाहता था, वो उसने सिद्ध कर ही लिया था।  इसलिए अब उसका ध्यान अखंड पर से पूरी तरह हट चुका था..
वो अब राजनीति में पूरी तरह घुस चुका था।

अब उसका एकमात्र ध्येय था कि, उसे चुनाव लड़ने के लिए टिकट मिल जाये..।
वो पापा का दामाद बन चुका था, बावजूद उसे टिकट मिलेगा या नहीं ये पार्टी  हाइकमाण्ड ही तय कर सकते थे..। पापा ने अपनी तरफ से बहुत प्रयास किये थे कि धीरेन्द्र को टिकट मिल जाये। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी जगह धीरेन्द्र का नाम प्रस्तावित कर दिया था।
और फिर टिकट आबंटन वाला दिन आ गया, और उसे टिकट मिल गयी..
वो खुश था, बहुत खुश और तब मैंने उससे बनारस जाने कि इच्छा जताई। 

“सुनो धीरेन्द्र जो सब तुम चाहते थे, पूरा तो हो ही गया है। अब मेरी भी एक इच्छा पूरी कर दो !”

“हाँ बोलो ना.. सारी इच्छाएं पूरी कर दूंगा !”

सच कहें तो उसकी हर बात से घृणा होती थी, लेकिन और कोई चारा भी नहीं था..

“मैं बनारस जाना चाहती हूँ !”

“क्यों अखंड बाबू बनारस पहुँच गए हैं क्या ?”

उसने व्यंग से कहा और मैंने वहीँ एक किनारे रखा वास उठा कर ज़मीन पर पटक दिया, और पैर पटकती वहां से अंदर चली गयी..
उस वक्त उसका खास आदमी उसके साथ खड़ा था.. ये सब वो भी देख रहा था। उसे चलता कर धीरेन्द्र भागता हुआ अंदर चला आया..

“इतना तमाशा करने का क्या ज़रूरत थी? हम तो बस मजाक कर रहे थे !”

“मजाक तो तुमने हमारी ज़िंदगी का बना दिया, जब उसी समय कुछ नहीं कर पाए तो अब क्या करेंगे?
एक बात और सुन लो धीरेन्द्र बाबू, तुम जो चाहे कर लो लेकिन हमे अपने पैरो कि जूती समझने की भूल कभी ना करना.. वरना…”

“वरना क्या करोगी, तलाक देकर चली जाओगी ?”

“नहीं, तुम्हारे साथ रह कर पल पल तुम्हारी ज़िंदगी को नर्क बना देंगे !”

मैं वहां से निकल कर बाहर चली गयी.. उस घर में दम घुटने लगा था मेरा…
जब कुछ देर बाद बाहर की हवा खाने के बाद कुछ सुकून सा लगा तब मैं वापस चली आयी।
तब तक में घर में नौकरो को बोल धीरेन्द्र ने बनारस जाने की सारी तैयारियां करवा ली थी।

मैंने उससे फिर कुछ नहीं कहा.. अगले दिन अपनी ही गाडी में हम लोग बनारस निकल गए..
रास्ते भर हम दोनों की बात नहीं हुई, मुझे वैसे भी उससे बाए करना पसंद नहीं था।

बनारस में घाट से घाट हम घूमते रहे, मंदिर दर्शन के लिए मैं अगली सुबह चार बजे ही घाट पर पहुँच गयी।उस वक्त धीरेन्द्र या उसका कोई चमचा मेरे साथ नहीं था..

और तभी वहां मेरी नजरघाट पर एक किनारे सीढ़ियों पर लेटे हुए गोलू पर पड़ गयी।
लम्बी बेतरतीब दाढ़ी, कंधे पर नारंगी गमछा, बिखरे उलझे बाल… एकबारगी उसे देख मैं पहचान नहीं पायी। अच्छा था कि उस वक्त धीरेन्द्र मेरे साथ नहीं था.. मैं तुरंत गोलू के पास गयी।
मैंने उसे उठाया।
वो गंगा घाट पर एक किनारे कोई फटा पुराना सा शॉल लपेटे सो रहा था।

“गोलू… उठो.. गोलू, ये तुम ही हो ना ?”

वो आंखे मलते हुए उठ बैठा, लेकिन उसकी हालत ख़राब थी।

कोई सोच नहीं सकता उतनी उसकी हालत खराब थी। उसे धीरेंद्र के गुंडो ने इतनी बुरी तरह से पीटा था कि उसके दिमाग पर असर हो गया था। उसे बेतहाशा मारपीट कर किसी वादी से नीचे फेंक दिया गया था। उन लड़कों को लगा दुबला पतला सा गोलू उन लोगों की मारपीट से मर गया है। और वो लोग उसे जंगल घाटी में फेंक कर वापस लौट आए थे।

लेकिन कहते हैं ना जिसकी सांसे बची हो, उसे स्वयं मृत्यु भी नहीं मार सकती।

शायद चित्रगुप्त जी ने उसके हिस्से और सांसे लिखी हुई थी। इसलिए चोट खाया हुआ गोलू ऊँचे पहाड़ो में से गिरता हुआ नदी में जा गिरा, और बहता हुआ जाने कहां-कहां से होकर गंगा नदी में जा मिला और बनारस के किसी घाट पर बहते हुए आ लगा..

    वहां किसी परिवार ने उसे पानी के किनारे पड़े देखा, उन्होंने पास जाकर देखा गोलू की साँस चल रही थी.. उन्होंने उसे बचा लिया और उसे मंदिर में ले आए!

वह परिवार खुद बनारस दर्शनों के लिए आया हुआ था ! इसलिए मंदिर परिसर में गोलू की जानकारी लिखवा कर वह वापस लौट गए। लेकिन गोलू के दिमाग पर भी शायद उस मारपीट का असर हुआ था। क्योंकि वह अब ना तो लोगों को पहचान पा रहा था और ना कुछ समझ पा रहा था। इसलिए मंदिर परिसर से उसे दोनों समय खाना दे दिया जाता था।

गोलू वही घाट की सीढ़िया पर पड़े पड़े सो जाता था। और बस यही उसकी दिनचर्या चल रही थी।
वह जहां सोया हुआ था, वहीं पास में बैठे बाबा जी ने यह सारा किस्सा मुझे कह सुनाया। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर तुम इसे जानती पहचानती हो तो इसे इसके घर वापस ले जाओ। इसकी हालत बहुत खराब है। लेकिन मैं उन बाबा जी से क्या कहती? कैसे कहती उनसे कि, अगर मैं इसे पहचान कर अपने साथ ले गई तो यह जिंदा नहीं बचेगा।

मैंने उन बाबा जी के हाथ में उस वक्त पांच हज़ार रूपये थमा दिए, और उनसे कहा कि हो सके तो इसकी देखभाल कीजिएगा।
मैं समय-समय पर आपको पैसे देती रहूंगी।
अपने मन को कड़ा कर मैंने उनसे एक और बात भी कहीं…

“एक बात और है बाबाजी, कि अगर मुझे आप किसी आदमी के साथ इस मंदिर में देखें, तो प्लीज मुझे पहचानियेगा मत!”

बाबा जी को मेरी बात पता नहीं समझ में आयी या नहीं लेकिन वह पैसे उन्होंने रख लिये। मैं वापस लौट गई।

मुझे समझ में आ गया था कि गोलू मुझे शायद नहीं पहचान पाया है। उसके बाद जब तक हम वहाँ रहे, मैं रोज सुबह शाम मंदिर दर्शन के बहाने गोलू को भी देख आती थी।

जिस दिन हम बनारस से लौटने वाले थे, उस दिन फिर मैं सुबह चार बजे वहां पहुंच गई। मैंने धीरेंद्र के पास से कुछ रुपये निकाल लिए थे। मैंने वह रुपए और अपनी चेन कंगन सब कुछ उन बाबा जी के हाथ में रख दिये।

“बाबा जी आपसे विनती करती हूं, किसी भी हाल में इस लड़के को बचा लीजिए। इसका इलाज करवाइए। इसकी याददाश्त वापस आना बहुत जरूरी है। वरना कुछ बहुत बड़ा घट जायेगा।”

बाबा जी को मेरी कोई बात समझ में नहीं आ रही थी।

” तुम कहना क्या चाहती हो बेटी ? ऐसा लगता है जैसे यह तुम्हारा कोई बहुत करीबी है।”

” हां समझ लीजिए, मेरा छोटा भाई ही है। लेकिन कुछ ऐसी मजबूरी है कि मैं इसे अपने साथ नहीं ले जा सकती। और अगर मेरे साथ रहने वाले लोगों ने इसे देख लिया, तो इसकी जान पर आफत आ जाएगी। आप बस इसका इलाज करवाइए।
आपको एक नंबर दे रही हूं। आपको जब कभी पैसों की या कोई भी जरूरत हो, उस नंबर पर मुझे फोन कर लीजिएगा।”

उसके बाद मैंने अपना एक दूसरा नंबर उन्हें दे दिया। यह मेरी दादी का फोन नंबर था, जो दादी के जाने के बाद से मेरे पास ही था, और इस सिम के बारे में धीरेंद्र को भी कोई खबर नहीं थी। उसके बाद मैं धीरेंद्र के साथ वापस आ गई।

ठीक महीने भर बाद उन बाबा जी का फोन आया।
उन्हें कुछ पैसों की जरूरत थी। मुझे समझ में आ गया कि वह बाबा जी भी कोई बहुत लालची इंसान नहीं थे। जरूरत थी इसलिए महीने भर बाद उन्होंने फोन किया था ।
मैंने उनसे उनका अकाउंट नंबर मांगा और अपनी दादी के ही अकाउंट से उनके अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर दिए।

इसके बाद धीरेन्द्र से मैंने कहा कि उसकी टिकट मिलने की मैंने मन्नत की थी,  मुझे ग्यारह बार बनारस विश्वनाथ बाबा के दर्शनों के लिए जाना है।

धीरेंद्र पहले तो भड़क गया, लेकिन फिर मान गया। जब-जब वह मेरे साथ जाता था, तब तब सुबह चार बजे उठकर मैं गोलू की खोज खबर लेने चली जाया करती थी। हम ज्यादा से ज्यादा दो या तीन दिन बनारस में रुकते थे। उसमें एक या दो बार मेरी मुलाकात गोलू से हो जाया करती थी।

कभी जब धीरेंद्र बहुत ज्यादा व्यस्त होता था, तो मुझे नौकरों के साथ ही भेज देता था। और तब मैं सही मायनो में स्वतंत्रता की सांस लेते हुए बनारस की गलियों में घूमा करती थी।

वह मेरे लिए बहुत सुहावने पल होते थे। जब मैं अस्सी घाट की सीढ़ियों में बैठकर सामने बहती गंगा जी को आंखें भर कर निहारती रहती थी।

   धीरे-धीरे गोलू के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा और एक पल ऐसा आया जब मैं बनारस से दर्शन करके लौट चुकी थी और बाबा जी का मेरे पास फोन आया। मैंने जैसे ही फोन उठाया दूसरी तरफ से गोलू बोल पड़ा। मुझे बहुत खुशी हुई। इसके बाद जब मैं बनारस दर्शनों के लिए गई, तब गोलू ने मुझे पहचान लिया।

   उसकी याददाश्त कुछ कुछ वापस आने लगी थी। वह कुछ चीजों को पहचान गया था। लेकिन कुछ चीजे अभी भी उसके दिमाग से आंख मिचोली खेल रही थी। मैंने उससे पूछा कि उसके साथ क्या हुआ था? वह टुकड़ों टुकड़ों में कुछ बता पाया  कुछ नहीं। लेकिन मुझे इतना समझ में आ गया कि धीरे-धीरे गोलू सब याद कर जाएगा।

और बाकी तीन साढे तीन साल बीतने के बाद गोलू को एक-एक बात याद आ गई।
  अब गोलू ने बनारस के अस्सी घाट पर अपनी टपरी लगा ली थी। उसने अपनी पहचान बदल दी थी। नाम बदल दिया था। और नए नाम और पहचान के साथ बनारस में रहने लगा था। मुझे भी उसका इस तरह रहना ही ठीक लग रहा था। कम से कम उसकी जान तो बची हुई थी।

गोलू बहुत सी बातें भूल गया था, लेकिन अपने अखंड भैया को नहीं भूल पाया था। वह हर बार अखंड के बारे में पूछताछ किया करता था। मैंने कहा भी कि वह अखंड से जाकर मिल ले, लेकिन उसके मन में भी वही डर था कि अगर वह अखंड से मिलने जाता है तो धीरेंद्र के आदमी उसे पकड़ लेंगे और फिर वह और अखंड एक साथ मारे जाएंगे।

हालांकि अब मुझे समझ में आने लगा था कि धीरेंद्र का अखंड की तरफ ध्यान कम हो गया था।
अब धीरेंद्र पूरी तरह अपनी राजनीति में डूब गया था। और यही  समय था जब मैं उसे उसके किए कर्म का बदला ले सकती थी। धीरे-धीरे पांच साल बीत गए।
इन पांच सालो में गोलू को भी मैंने अपनी तरफ से तैयार कर लिया…
और अब मुझे बस मौके का इंतज़ार है..”

“वो मैं आपको दूंगा गीता जी.. लेकिन एक बात बार बार मन में आ रही है.. आपने इतने साल तक कैसे खुद को काबू किया और उस जल्लाद के साथ रही.. ?”

.”सर इस आदमी ने जाने कितने लोगों का जीवन बर्बाद कर दिया। ना जाने कितनों की जिंदगी छीन ली।
ये पापी इंसान ऐसा है कि इससे इसके कर्मो का बदला लेने के लिए अगर मेरे जैसे किसी एक को अपना जीवन त्यागना भी पड़े तो वो त्याग छोटा ही होगा..

इससे बदला लेने के लिए मुझे इसके साथ रहना जरूरी था..
शादी के शुरुआती दिनों में मुझे बहुत मुश्किल लग रहा था। और तब मैंने सोचा मैं इससे तलाक ले लेती हूं। लेकिन अपने पिता की तबीयत और सामाजिक कर्तव्यों को निभाने की जिम्मेदारी के कारण मैं वैसा नहीं कर पाई।

मेरे पिता आम आदमी नही बल्की पब्लिक फिगर थे। वह विधायक थे, और मेरा पति होने वाला मंत्री.. ऐसे में मेरे कंधों पर भी अपने परिवार को सुदृढ़ दिखाए रखने की जिम्मेदारी थी।

   और सच कहूं तो सिर्फ अपने पिता को देखकर मैंने इस घटिया इंसान से तलाक नहीं लिया। हालांकि इसके साथ रहते हुए आत्महत्या कर लेने का विचार बहुत बार आया, लेकिन मैंने अपने आप को संभाल लिया।

“बखूबी संभाला, दो बच्चे भी हैं आपके ?”

नेहा के ऐसा कहने पर गीता ने नेहा की तरफ देखा और फीकी सी हंसी-हंस दी।

” यह मेरे और धीरेंद्र के बच्चे नहीं है। धीरेंद्र की एक विधवा बड़ी बहन थी, जिन्हें हमारी शादी में उसने बुलाया था। वह भी उसने सिर्फ नेगचार के लिए ही उन्हें आमंत्रण दिया था। वरना तो उस जैसा आदमी किसी रिश्ते नाते में विश्वास नहीं करता था।

तब उनके दो छोटे बच्चों से मेरी मुलाकात हुई थी। धीरेंद्र की दीदी एक बहुत सरल स्वभाव की महिला थी। गांव में रहते हुए वह गांव के बच्चों की पढ़ाई के लिए काम कर रही थी। लेकिन कुछ समय बाद ही हमे पता चला कि उन्हें किसी बड़ी बीमारी ने घेर लिया है। उस वक्त उन्होंने मुझे फोन किया और मुझसे कहा कि अगर मुझे कुछ हो जाता है तो मेरे बच्चों को पाल लेना।

   बस अपने घर पर संरक्षण दे देना, तुम्हारे घर का सारा काम कर देंगे और बदले मे उनहे पढ़ा लिखा देना। बस इतना ही चाहती हूं। अपनी सारी जिंदगी मैंने शिक्षा के लिए काम किया है, इसलिए अपने बच्चों को अशिक्षित नहीं छोड़ सकती।

   मेरे ससुराल में ऐसा कोई नहीं, जो मेरे बच्चों को पढ़ा सके।”

उनकी यह बात गहरे तक मेरे दिल में उतर गई, और कुछ समय बाद ही दीदी हम सब को छोड़कर चली गई.. उस वक्त भी धीरेंद्र का मन नहीं था, उन दोनों बच्चों को लाने का।

लेकिन मैं जबर्दस्ती उन दोनों को अपने साथ ले आई। आखिर मुझे भी तो जीने के लिए एक बहाना चाहिए था। इतने बड़े से घर में सिर्फ नौकर और धीरेंद्र के भरोसे तो दिन नहीं काटे जा सकते थे।

उन दोनों बच्चों के आने से मेरा जीवन बदल गया ।उनके आने के बाद धीरेंद्र के स्वभाव में ऐसा कुछ खास बदलाव तो नहीं हुआ, लेकिन हां वह बच्चों पर कभी नाराज नहीं होता था। उन्हें देखकर बहुत खुश नही हो तो भी उन पर कभी गरजता भी नहीं था..।

“चलिए अच्छा है, आपको जीवन जीने का कोई बहाना तो मिला ? गीता जी अब मैं जैसा कहूंगा  वैसा आपको करते जाना है !”

“जी सर.. मैं तो समझ लीजिए पिछले पांच साल से यही तपस्या कर रही थी कि कब मैं अपने साथ-साथ इस आदमी के खिलाफ सारे सबूत जोड़ सकूं, और इसे कचहरी तक खींच सकूं। आप जैसा जो भी कहेंगे मैं करने के लिए तैयार हूं।”

गीता की बात पूरी हुई ही थी कि अनिर्वान का फोन बजने लगा। अस्पताल गए हुए पुलिस अधिकारी ने अनिर्वान को फोन करके एक रोड एक्सीडेंट के बारे में जानकारी दी थी। जानकारी देते समय उस पुलिस ऑफिसर ने बताया कि जिसका एक्सीडेंट हुआ है वह मानौर का सरपंच है..

“मानौर का सरपंच है ? नाम क्या है ?” अनिर्वान ने सवाल किया..

” साब इसकी गाड़ी की तलाशी में गाड़ी के जो पेपर्स मिले हैं, और ड्राइविंग लाइसेंस मिला है उसके आधार पर इस लड़के का नाम अखंड सिंह परिहार है..।”

“क्या… अखंड सिंह परिहार ? जिन्दा है ?

अखंड का नाम सुनते ही अनिर्वान भी चौंक उठा। रोड एक्सीडेंट के बारे में उसे जैसी सूचना उस पुलिस अधिकारी ने दी थी, उसके बाद अनिर्वान का यह सवाल बिल्कुल जायज था।

क्योंकि उस पुलिस अधिकारी के अनुसार रोड एक्सीडेंट बहुत भयानक हुआ था। उसने जैसे ही अखंड जिंदा है या नहीं यह सवाल किया, गीता अपनी जगह से खड़ी हो गई।

और विस्मय से अनिर्वान की तरफ देखने लगी। अनिर्वान खुद फोन पर बात करते हुए खड़ा हो चुका था। और आगे बढ़ते हुए उसने नेहा और गीता को साथ आने का इशारा कर दिया।

गीता ने एक बार अपने साथ लाए हुए हिजाब की तरफ देखा और फिर उसे वहीं छोड़कर अपना चेहरा बिना ढके वह नेहा के साथ अनिर्वान के पीछे चल पड़ी।

“सर मैं भी आपके साथ चलूंगी, मुझे भी अखंड से मिलना है..क्या हुआ अखंड को.. ?”

इतनी देर में पुलिस वाले ने अनिर्वान को बता दिया था कि अखंड का इलाज चल रहा है..

अनिर्वान नेहा और गीता को साथ लिए अस्पताल के लिए निकल गया…

क्रमशः

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Manu verma
Manu verma
1 year ago

लाजवाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻♥️♥️♥️♥️♥️♥️💐💐💐💐💐💐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐

कांति
कांति
1 year ago

अखंड का इतना खतरनाक एक्सीडेंट, पर बचाया भी किसने जानें अनजाने जो सबसे ज्यादा नफरत करती हैं रेशम और उसके पति अथर्व ने।
गीता ने पांच साल तक झेला धीरेन को सिर्फ उससे सिर्फ बदला लेने के लिए

Neeta
Neeta
1 year ago

🙏🙏🙏🙏🙏sab thik krna Dr Sabina
Itni jaldi khatam na krna 🙏🙏🙏🙏🙏

Deepali
Deepali
1 year ago

Bahut jabardast part. Ab jaldi hi Dheeren ko uske liye ka fal milega. Badmash insaan ne kitni ki life ka mazaak bana diya. Uske Karan resham abhi Tak apni married life me age badh nahi saki.Akhand ka to jeevan hi narak ban gaya.Geeta to jeete ji narak hi jhel rahi hai. Golu ko to pagal hi kar diya tha.

Sonal Bajpai
Sonal Bajpai
1 year ago

Superb nd interesting part 👏👏

Iti
Iti
1 year ago

वाह रे ऊपर वाले का न्याय और आपकी सुलझी हुई सोच

Veena
Veena
1 year ago

Very interesting and wonderful part

उमिता कुशवाहा
उमिता कुशवाहा
1 year ago

इन सब में गीता का संघर्ष बहुत बड़ा रहा उसे बेचारी ने तो एक कठोर तपस्या की है अपने रावण जैसे पति को सजा दिलाने के लिए।
गीत आना दिल पर पत्थर रखकर ही उसे गवार इंसान के साथ 5 साल बिता दिए और उसने गोलू की शुध ली और उसे ठीक करने में भी पूरा सहयोग किया और भारतीय नारी तो होती ही है जो अपने पति के अच्छे बुरे कर्मों में सभी में उसका साथ देती है पर गीता जैसी लड़की बहुत कम ही मिलती हैं जो अपने घटिया पति के कर्मों की सजा दिलाने के लिए आज भी तैयार है।😐😐😐

Varsha
Varsha
1 year ago

Very nice part

Jagriti
Jagriti
1 year ago

Ek accident ने सारा ग्रुप अलग कर दिया और एक एक्सीडेंट सबको एक बार फिर साथ ला रहा है अब रावण की लंका लगने से कोई नहीं बचा सकता है देखते हैं रेशम का क्या प्रतिक्रिया होती है अखंड को लेकर साथ ही उसकी प्रतिक्रिया पे उसके पति का रिएक्शन क्या होगा रेशम के भूत से