
अपराजिता -120
अस्पताल में डॉक्टर फिर पूरी तरह से अखंड की माँ की चिकित्सा में लग गए.. अगले दिन ही उनकी एंजिओप्लास्टी कर दी गयी..
अखंड की माँ शचीरूपा के जीवन में अस्पताल शब्द ही पहली बार जुड़ा था! गांव के सबसे रईस घर की बहु, अपने मायके से भी अति सम्पन्न शचीरूपा की दोनों प्रसूति भी घर में ही हुई थी।
ठाकुर साहब गांव की डॉक्टर और नर्स को वहीँ घर पर ले आये थे, इसलिए शची को अस्पताल जाना ही नहीं पड़ा था !
सामान्य प्रसूति थी, सारा कष्ट झेल कर शचीरूपा ने दोनों लड़को को जना था !
वो खुद इस बात को समझ नहीं पा रही थी कि उस जैसी कर्मठ कार्यकुशल महिला को हृदय का रोग कैसे लग गया?
अब ऑपरेशन के बाद मिलने जुलने वाले आने लगे थे, गांव में मौजूद रिश्तेदारों ने दूर दराज़ में मौजूद रिश्तेदारों को खबर कर दी थी!
ठाकुर इंद्रभान का रुतबा ही ऐसा था कि उनके रिश्तेदार उनसे जुड़े रहना चाह्ते थे!
ठाकुर साहब के सामने अपना नाम बनाये रखने के लिए मिलने आने वाले सभी रिश्तेदार कुछ न कुछ दिखावा करने से बाज नहीं आ रहे थे..।
अस्पताल में डॉक्टर ने भीड़भाड़ करने से मना किया था, बावजूद किसी को सुनना नहीं था…
लगभग रोज़ ही दस बीस लोग सिर्फ मरीज़ से मिलने के नाम पर पहुँचने लगे थे..
अस्पताल में शचीरूपा को देखने के बाद सारे रिश्तेदार घर पर ही रुक रहे थे।
शची की देवरानी शकुन और कुसुम की हालत खराब थी। खाना बनाने परोसने के लिए लोग मौजूद थे, लेकिन इतने मेहमानों का प्रबंध तो उन्ही दोनों को देखना था।
ठाकुर साहब के दूर के रिश्ते की बहन का बेटा आया हुआ था, अनंत उसका नाम था! उसके लक्षण शुरू से ठीक नहीं थे..
ना काम काज करता था, ना पढाई ही की थी उसने ! घर पर उसके भी खूब पैसा था, और वो लड़का उस पैसे को बनाने की जगह बर्बाद करने में माहिर था..
अक्सर आते जाते वो कुसुम से टकरा जाया करता था, जाने क्यों लेकिन कुसुम को ये लड़का फूटी आँख नहीं सुहाता था..लेकिन था तो रिश्तेदार ही।
दो चार दिन बीतने के साथ अखंड की माँ की अस्पताल से छुट्टी हो गयी.. उन्हेँ घर ले आया गया !
शची के अस्पताल चले जाने से लग रहा था घर कि घर की रौनक ही चली गयी थी.. और उनके लौटने से अब जाकर घर में रौनक सी वापस आयी थी।
मेहमानों की आवाजाही बढ़ गयी थी.. कुसुम और शकुन शची की देखभाल के साथ मेहमानों को भी देख रही थी..।
कुसुम को इतना काम करने की आदत नहीं थी, लेकिन वो अपनी पूरी शिद्द्त से अपना धर्म निभा रही थी, और यज्ञ उसे देख देख कर खुश हो रहा था।
हालाँकि यज्ञ का ध्यान अनंत की कारस्तानियों पर नहीं गया था..
लेकिन कुसुम अब इस बात ध्यान देने लगी थी कि अनंत अक्सर कुसुम के आगे पीछे घूमा करता था।
जानबूझ कर उससे बात करने का बहाना ढूंढा करता था..
हालाँकि इन बातों से कुसुम को कुछ खास फर्क नहीं पड़ना था, जिस दिन उसे लगता पानी सर से ऊपर जा रहा है, वो उस लड़के का हिसाब कर देती।
ऐसे ही एक शाम सबको चाय देने के बाद कुसुम अपनी सास के कमरे में चाय लेकर जा रही थी कि अनंत उसके ठीक सामने आकर खड़ा हो गया..
“हमको चाय नहीं पिलायेंगी का भौजी ?”
कुसुम ने उसे देखा और हाथ में रखी ट्रे उसकी तरफ कर दी..
“लो पी लो !”
“अरे ये नहीं, ये तो आप मामी जी के वास्ते ले जा रही हैं ना.. उन्हेँ ही दीजियेगा!”
कुसुम ने उसे घूर कर देखा, और अपनी सास के कमरे में दाखिल हो गयी..
वो भी पीछे पीछे चला आया..
“मामी जी आप भी ना, ऐसे कैसे बीमार पड़ गयी !”
“हाँ तो का करे, बीमारी कोई घर और आदमी देख कर आती हैं का ? हमसे पूछ कर आती तो हम मना ही ना करते, हमको कोई बीमार पड़ने का शौक थोड़े ना हैं.. ?”
“सही बात बोली मामी.. हम तो बचपन से देख रहे, कितना काम करती हैं आप ! हर वक्त काम में ही उलझी रहती हैं, पता नहीं कैसे ये राजरोग लगा बैठी ! वैसे आजकल ये हार्ट ऊर्ट अटैक बहुत हो रहा हैं लोगन को, हमारे मुहल्ले में चरणजीत कक्का रहते हैं ना, उनको पिछले साल का, गजब का अटैक आया रहा कि अब का बताये ?”
अखंड की माँ बड़े ध्यान से उसकी बात सुनने लगी..
“ठीक तो हो गए ना ?”
“अरे कहाँ ? आपके जैसे यही एनजीओ फेनजिओ करवा कर घर आ गए थे, घर वालो को लगा ठीक हो गए हैं, फिर दुइ महीना बीता के पलट कर अटैक मार दिया..घरै में चट से गिरे और प्रान त्याग दिए.. !”
कुसुम का अनंत की बतकही से जी ऊब रहा था..
उसने अनंत की तरफ घूर कर देखा, कि अब वो निरर्थक अपनी जबान चलाना बंद कर दे, लेकिन अनंत पर बातों का भूत सवार था..
“ऐसे ही हमारे वो रामधन फूफा हैं ना बाराबंकी वाले, जानती तो हैं ना मामी जी आप ?”..
“हाँ उन्हेँ का हुई गा ?”
“उनका भी तो हार्टे का पिराबलम हुआ रहा ना.. !”
“अटैक हुआ था क्या ?” यज्ञ की माँ ने धीमे से पूछा.
कुसुम को लग रहा था किसी तरह इस बड़बोले को शांत करवा दे.. इतना तो कुसुम भी समझती थी कि एक बीमारी से उठे इंसान के सामने सदा सकारात्मक बातें करनी चाहिए जिससे उसका मनोबल बढे..।
आत्मविश्वास को ध्वस्त करती नकारात्मक बातें उस इंसान को बीमारी से लड़ कर आगे बढ़ने की जगह पीछे धकेलती हैं..
लेकिन इस बात को समझे बिना बड़बोला अनंत बकता चला जा रहा था..।
“रामधन फूफा का तो पैर की नस से कुछ सीना तक नली जोड़े रहे, हमको ठीक से नहीं पता,वो कुछ करते हैं ना बाईपास वाइपास.. वइसने कुछ..
पर कहाँ बचा पाए?
चार महीना भी नहीं हुआ की टें बोल गए.. !”
“हैं मतलब !” यज्ञ की माँ की आंखे चौड़ी हो गयी थी..
अपनी मामी से बातों के बीच अनंत ने एक सिगरेट सुलगा ली…
“मतलब ऊतलब का मामी जी, भगवान को पियारे हो गए..! अरे ये हार्ट ऊर्ट का पिराबलम अच्छा नहीं होता.. एक बार हो गया तो आदमी के प्रान लेकर ही मानता हैं !”
“अब आप यहाँ से ज़रा बाहर जायेंगे, अम्मा जी को आराम करना हैं !”
कुसुम ने साफ सपाट शब्दों में अनंत से कह दिया और वो आंखे फाडे उसे देखने लगा..
“का भौजी, हम तो अपनी मामी से बात कर के उनका मन बहला रहे हैं, और आप हमका बाहर भेज रही ? “
“हम अम्मा जी का मन बहला लेंगे, आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं हैं !”
“अरे, अरे आप तो नाराज हो गयी ! काहे भाई.. हम मामी जी का ख्याल रखने ही तो आये हैं, और आप मना कर रही हैं !”
“आप जिस तरह का ख्याल रख रहे, वैसा ख्याल ना रखें तो बेहतर हैं.. और एक बात सुनिए अनंत बाबू, आप इस कमरे में बैठ कर सिगरेट नहीं फूंक सकते.. यहाँ से बाहर जाइये !”
अनंत को अंदेशा नहीं था कि कुसुम ऐसे उसे बाहर का रास्ता दिखा देगी..
वो अचकचा कर खड़ा हो गया.. -“मामी.. जे का हैं ?”
“अरे बैठिये बैठिये अनंत !” कुसुम की सास ने चिरौरी सी की.. आखिर अनंत उसकी रिश्ते की ननन्द का बेटा था, उसे ऐसे नाराज़ नहीं किया जा सकता था..
“नहीं अम्मा जी, ये अब यहाँ नहीं बैठेंगे !”
अनंत आंखे फाडे कुसुम को देखने लगा..
“ज्यादती कर रही हैं आप भाभी ?”
“इसी वक्त यहाँ से बाहर निकलो !” कुसुम ने लगभग चीखते हुए कहा और बाहर की तरफ ऊँगली दिखाते हुए दरवाज़े पर खड़ी हो गयी..
अनंत इस अपमान से तिलमिला उठा..
उसने पलट कर अपनी मामी की तरफ देखा और गुस्से में अपनी जलती सिगरेट वहीँ ज़मीन पर फेंक कर उसे अपनी चप्पल से मसल कर बाहर जाने लगा कि कुसुम की आवाज़ एक बार फिर उसके कानो से टकरा गयी..
“ये क्या ज़हालत हैं? अम्मा जी का कमरा हैं ये, आपके शहर की गली मुहल्ला नहीं, जहाँ सिगरेट फेंक कर बुझा दी जाये !”
अनंत ने गुस्से में पलट कर उसे देखा..
“क्या कहना चाहती हैं आप ?”
“अपनी की गंदगी खुद साफ करो !”
अनंत आंखे फाडे कुसुम को देखने लगा…
“क्या बक रही हो !”
“सच कह रहे हैं.. उठाइए अपनी सिगरेट, और बाहर ले जाकर कूड़ेदान में डालिये! हम आपके नौकर नहीं हैं, जो आपकी फैलाई गंदगी समेटते फिरेंगे!”
“बहु… किसी नौकर को बुलवा कर सफाई करवा देना !” कुसुम की सास ने कुसुम को टोक दिया और कुसुम ने अपनी सास की तरफ देख खुद को भरसक कोमल बनाते हुए प्यार से जवाब दे दिया..
“इस वक्त सारे ही लोग व्यस्त हैं अम्मा जी और आपके कमरे में सिगरेट का धुंआ और सिगरेट छोड़ कर हम किसी को बुलाने नहीं जा सकते..!
इन्हे आपके कमरे में सिगरेट जलानी ही नहीं चाहिए थी…बेवकूफी भरा काम इन्होने किया हैं, अब हर्ज़ा भी खुद भुगतेंगे.. !”..
“हर्ज़ाना तो अब तू भुगतेगी सा#..!”
मन ही मन बड़बड़ाते हुए अनंत बाहर निकलने को था की कुसुम दरवाज़े पर आड़ लगा कर खड़ी हो गयी..
“हट जाइये सामने से भौजी, वरना हमने आपकी बांह पकड़ कर खींची और आपको रस्ते से हटाया तो आपको अच्छा नहीं लगेगा !”
“हाथ लगा कर देखिये हमे, आपका हाथ कंधे से उखाड़ कर फेंक ना दिया तो कुसुम कुमारी हमारा नाम नहीं !”
अनंत जितने गुस्से में कुसुम को घूर रहा था, कुसुम उससे अधिक नफरत से उसे घूर रही थी…
“आप हटेंगी नहीं ना सामने से ?”
“अपनी फैलाई गंदगी हटाओ पहले !”
अनंत ने कुसुम की बांह पकड़ने हाथ बढ़ाया ही था कि कुसुम ने वहीँ फलो के साथ रखा चाकू उठा कर अनंत के सामने कर दिया..
“अरे ये का कर रही हो बहु ! रुक जाओ तुम्हे नहीं उठाना तो हम उठा देते हैं.. !”
कुसुम कि सास पलंग से उतर कर सिगरेट के अधजले टुकड़े तक चली आयी और उसे रोकने कुसुम को दरवाज़ा छोड़ कर अपनी सास तक आना पड़ा.. उन्हेँ ठीक से वापस पलंग पर बैठा कर वो जब तक मुड़ी, उस पर एक जलती निगाह डाल कर अनंत मुस्कुरा कर वहाँ से बाहर चला गया..
कुसुम झुक कर वहाँ सफाई करने लगी..
“इससे काहे लगती हो कुसुम, ये शुरू से नालायक हैं ! इससे जितना कम बोलो बतिआओ, उतना अच्छा !”
आज कुसुम सिर्फ अपनी सास के कारण चुप पड़ गयी थी! वरना वो अनंत का तीन पांच करने में पीछे नहीं रहती.. लेकिन उसने जितना सोचा था अनंत उससे भी बड़ा कमीना था..
अनंत नीचे जाकर अपने मामा जी के पास कुसुम की शिकायत लगा गया..
उसके अनुसार कुसम में अनुशासन की भारी कमी थी, उसे बात करने का तरीका नहीं था, वो एक नंबर की बद्तमीज और घमंडी लड़की थी, जिसे सही मायनों में ठाकुर परिवार में रहने का शऊर नहीं था ! वगैरह वगैरह..
ठाकुर साहब के लिए ये बहुत बड़ी शिकायत थी..
घर की बहु अगर घर आये मेहमान से बदतमीजी से बात कर रही है, तो ये मसला ठाकुर साहब के लिए गंभीर था..
उनके अनुसार तो घर की औरतों को बोलने की भी मनाही थी..
जिस घर में औरतों को बोलना मना था,उस घर की बहु अगर कतरनी सी जीभ चला रही थी तो ये बहुत बड़ा विचारणीय विषय था..
ठाकुर साहब ने तुरंत बहु के पति को तलब किया,ज़ाहिर हैं बहु में इन अवगुणो के आने के पीछे का असली कारण उसका पति था। जिसने अपनी पत्नी को दब कर रहना झुक कर रहना नहीं सिखाया, जिसने अपनी पत्नी को घर के कायदे कानून नहीं समझाये, संस्कारो की पोटली उसके गले नहीं लटकाई..
यज्ञ के साथ ही उन्होंने नौकर को भेज कर कुसुम को भी बुलवा भेजा..
कुसुम उसी समय अपनी सास को चाय पिला कर अपने कमरे में चाय लेकर बैठी थी..
यज्ञ और अखंड बाहर वाले अपने ऑफिस के कमरे में बैठे काम देख रहे थे कि नौकर यज्ञ को बुलाने चला आया…
यज्ञ ठाकुर साहब के बुलावे पर भीतर वाले आंगन में चला आया..
अनंत वहीँ बैठा था, उसे वहाँ बैठा देख यज्ञ भी एक किनारे पड़े सोफे पर बैठ गया..
“जी बाबूजी.. आपने बुलाया !”
“तुम्हारी घरवाली को बात करने का शऊर हैं कि नहीं ?”
ठाकुर साहब चीख उठे..
“क्या हुआ बाबूजी.. क्या किया कुसुम ने ?” यज्ञ के माथे पर बल पड़ गए..
“हमसे पूछिए क्या किया हैं भौजी ने.. पहली बात तो प्यार से बात करना उन्होंने सीखा ही नहीं, सिर्फ तलवारबाजी करना जानती हैं..।
और घमंडी तो ऐसी गजब कि हैं कि का बताएं.. हमसे कहती हैं नौकर सब व्यस्त हैं अपना फैलाया गंदगी खुद समेटिये.. अब बताओ यज्ञ का हम अपना काम खुदे करें का ?
भाई हमको हमारा घर में ये सब करने का आदत नहीं हैं.. हम नहीं जानते ये सब.. समझे ?'”
“क्या काम बोल दी आपको कुसुम.. रुकिए हम खुद पूछ लेते हैं !”
“अब उनसे का पूछोगे, हम पर भरोसा नहीं हैं का ?”
अब तक कुसुम भी वहाँ आ चुकी थी.. ससुर जी के सामने वो जाती नहीं थी..
उनके सामने निकलने का आदेश भी नहीं था, इसलिए परदे कि ओट से वो सब सुन रही थी..
इन सारी बातों को सुन कर यज्ञ के शब्दों में आयी नाराज़गी भी वो महसूस कर पा रही थी, लेकिन इस भीड़भाड़ में कैसे अपनी बात रखे, वो इसी उलझन में खड़ी थी कि उसके जेठ अखंड की आवाज़ उसके कानो में किसी शीतल फुहार सी पड़ी..
“अपना काम खुद करने में कोई हर्ज़ा नहीं हैं अनंत.. हर बात को अपने ईगो ओर क्यों ले लेते हो.. ?
हम जब यूनिवर्सिटी में थे, अपने हॉस्टल के कमरे का साफसफाई खुद ही ना करते थे, यहाँ तक कि बाथरूम टॉयलेट भी हम खुद साफ़ करते थे..
तो इसमें कोई बुराई तो नहीं हैं। और अगर कुसुम तुमको तुम्हारा काम करने के लिए टोकी भी हैं तो कुछ गलत नहीं कि..
वो तुम्हारा भला चाहती हैं, इसलिए तुम्हे खुद करने कहा..।
देखो अनंत बहुत बार सामने वाला हमारे पक्ष में अगर नहीं बोल रहा हैं तो इसका ये मतलब नहीं कि वो हमारे लिए गलत सोच या बोल रहा हैं..।
दुनिया में अच्छे बुरे इंसानो की परख करना सीखो भाई, वरना अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा मान बैठोगे !”
अखंड इन सब परपंचो में पड़ने वाला लड़का नहीं था, उसने अपने मन की बात कही और वहाँ से बाहर निकल गया.. उसके निकलते ही अनंत एक बार फिर बड़बड़ाने लगा, और उसकी बड़बड़ाहट सुन कर यज्ञ के चेहरे का रंग बदलने लगा….
उसके चेहरे के तेवर बदलते देख कुसुम के चेहरे पर हलकी सी घबराहट चली आयी..
उसे मालूम था यज्ञ के लिए उसका घर परिवार नाते रिश्तेदार कितना मायने रखते हैं.. ।
वो समझ गयी कि आज यज्ञ के गुस्से का बम उसी पर फूटना हैं..
क्रमशः

ये अंनत तो बहुत ही घटिया इन्सान है मगर कुसुम ने भी खूब लताड़ा अंनत को। शानदार पार्ट 👌👌😊
❤👌👌👌👌👌
बहुत खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐
कैसा इन्सान आ गया घर,,,, एक तो घर में बीमार ऊपर से एसे दो चार लॉगआ जाएं तो कया ही कहना फिर,,, वैसे सही लताड़ा कुसुम कुमारी ने,,जोरदार
Bht hi badiya part kafi time bad kusum apne roop m ayi h ab dekhna h ki yagy kya krta h
वाह !क्या फटकार लगाई हमारी कुसुम कुमारी जी ने अनंत बाबू को। कुसुम नाम समझ के फ्लावर समझ लिए थे अनंत बाबू🤪🤪
अखंड तो हमेशा ही सही का साथ देता है,अब देखना यह है की ठाकुर जी कितना समझते हैं अपनी ठकुराइन को
पार्ट देर से आया लेकिन मन को तृप्त कर दिया।।।।लाजवाब पार्ट
👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
Outstanding excellent and wonderful part
Ye kya baat Hui bhala .. aaj yagya Babu kya kerenge ye dekhne layak hai.. abhi Tak to manbhavan se hain..
मुझे तो लग रहा है यज्ञ की झाड़ कुसुम को नही अनंत को पड़ने वाली है।
Mja aa jata ager ye mahasay kut gye hote kusum se bahut ud rhe h,…. Dekhte h yagya babu ab ky krte h.. 🤔🤔