
बेसब्रियां – 7
दोपहर के वक्त अक्सर रसोई का अपना काम और खाना पीना निपटा कर पम्मी जी अपनी गुदगुदी रजाई में घुस कर दोपहर की नींद का मजा लेने चली जाती थी…
और उस वक्त रसोई पर निम्मी का राज़ होता था !
वैसे तो अक्सर कुकिंग में निम्मी ही अपनी माताश्री का हाथ बंटाया करती थी, लेकिन उसके पारम्परिक रसोई में अपना वेस्टर्न तड़का लगाने की आदत पम्मी जी को अक्सर अखर जाती थी… इसलिए अगर निम्मी को कुछ नया पकाना हो तो वो उनके सोने का ही इंतज़ार किया करती थी..
आज भी रसोई में बकलावा बनाने के बाद मफिन्स बेक करती निम्मी उसे सजाने की तैयारी में थी कि सिम्मी ऊपर अपने कमरे से नीचे चली आई… उस रात हुई अक्षत से बहस के बाद से वो अब तक सामान्य नहीं हो पायी थी… उसे रह रह कर उस उटपटांग ज़िद्दी अड़ियल लड़के पर गुस्सा आ रहा था…
उसका मन अपने लिखने पढ़ने में भी नहीं लग पा रहा था…
आज भी दोपहर के खाने के बाद से वो अपनी पसंदीदा नावेल “शादी डॉट कॉम ” लेकर बैठी थी लेकिन आज राजा और बाँसुरी के किस्से भी उसे हँसाने में नाकाम साबित हो रहें थे.. !
वो किताब पकड़े हुए ही नीचे चली आई थी…
“क्या कर रही है निम्मी.. ?”
उसने अपनी बड़ी बहन को रसोई में घुसे देखा और पूछ लिया…
“मफिन्स बना रही.. !”
“हम्म.. पर आज अचानक कैसे.. ? मतलब अभी दो चार दिन पहले ही तो बनाये थे ना.. ?”
“हाँ.. ये मोहिता जी के घर भेजने के लिए बना रही हूँ.. !”
“भेजेगी किसके हाथ.. ? मेरा पूछने का मतलब था कि उन लोगों ने तो तुझे बुलाया था ना.. ?”
“हाँ लेकिन तेरा ख़राब मूड देख कर जाने का इरादा बदल दिया है… डिब्बे को बुलाया है मैंने, उसी के हाथ भेज दूंगी.. ! मै जानती हूँ सिम्मी तुझे श्लोक का दोस्त बिल्कुल पसंद नहीं आया और उससे तेरी कुछ झड़प भी हो गयी है.. !”
“क्या बहाना बनाया… नहीं जाने का.. ?”
“मैंने कह दिया तबियत सही नहीं है.. ?”
“अरे.. ! तो उन्होंने पूछा नहीं कि जब तुम्हारी तबियत सही नहीं फिर तुम ये सब बना कैसे पाओगी.. और सुन उन्हें तो बकलावा खाना था ना.. ?”
“वो पहले ही बना चुकी हूँ… और मैंने तेरी ख़राब तबियत का बहाना लगाया है.. कहा है कि तुझे बुखार हो गया है इसलिए तू सो रही है और बाहर नहीं निकल सकती, इसलिए हम फिर कभी आएंगे… अभी बकलावा बना चुकी हूँ इसलिए भेज रही हूँ.. !”
सिम्मी ने खुश होकर निम्मी के हाथ चूम लिए…
“थैंक्स सिस्सो, उस आदमी की शक्ल देखने का बिल्कुल मन नहीं था मेरा.. ! तूने सच्ची बचा लिया यार !”
इतनी देर में बातों के बीच निम्मी ने चाय भी चढ़ा ली थी.. ! चाय पीते हुए दोनों बहने गप्पे मार रही थी कि सिम्मी का मोबाइल बजने लगा…
सिम्मी ने देखा फ़ोन उसके एक दोस्त तेजस का था… जो अब पुलिस कि अपनी ट्रेनिंग पूरी कर नौकरी में आ चुका था…
” कैसे हो तेजस… ?”
“मै तो ठीक हूँ.. तुम कैसी हो.. ?और कहाँ हो यार ?”
“बस घर पर ही हूँ… तुम सुनाओ… ? नौकरी कैसी चल रही.. ?”
“सब बढ़िया चल रहा है.. ! आज कुछ पुराने फ्रेंड्स से मिलने का प्लान बनाया है.. तुम भी आ जाओ.. सिटी 36मॉल में.. !”
“ठीक है आ जाती हूँ.. ! और कौन कौन आ रहा है.. ?”
“तुम तो आओ पहले… वहीँ मिल लेना !”
“ओके फाइन… वहीँ मिल के बात करते हैं..!”
उसी वक्त घर की डोरबेल बज गयी और सिम्मी ने बात करते हुए जाकर दरवाज़ा खोल दिया…
सामने डब्बा सिंह मुस्कुराता हुआ खड़ा था…
“अंदर आ जाऊं जी.. !”
“आइये… निम्मी, डब्बा आ गया है.. !”
सिम्मी ने निम्मी को आवाज़ दी और फ़ोन रख कर उसके पास मदद के लिए चली गयी…
निम्मी ने जितनी स्वादिष्ट डिश बनायीं थी, उतनी ही खूबसूरती से सब कुछ पैक किया और एक गुलाबी से बॉक्स में सब कुछ सलीके से रख कर उसे सैटन रिबन से बांध कर उसमे एक छोटा सा कार्ड अंदर डाल कर डिब्बा सिंह के पास लें आई…
“डब्बे.. ! वो पीली कोठी है ना, शर्मा आंटी के पास वाली, ये पारसल उन्ही के घर पर देना है.. दे देगा ना.. !”
“फिकर नॉट निम्मी ! ये डिब्बा है जो कभी कहीं कुछ गलत नहीं करता.. !”
डिब्बा सिंह की अतिश्योक्ति सुन निम्मी ने हाँ में सर हिला दिया… -” बस दिन भर जुगाली करता रहता है… !”
उसी वक्त वहाँ पहुंची विम्मी भी फुदक पड़ी…
“अरे बेबी, जुगाली नहीं बोलते हैं इसे.. !” डिब्बा विम्मी को देख चौड़ा हो गया…
“क्या चबाता रहता है दिन भर तू.. ?”
विम्मी के सवाल पर डिब्बा ने जेब से निकालकर कमला पसंद का पाउच उन लोगों के सामने लहरा दिया…-” इलायची के दाने खाता हूं यार… सिल्वर कोटेड… अच्छे लगते हैं! मिसेस जोनस विज्ञापन करती हैं भाई… !”
” ओह्ह.. मुझे लगा कि तुझे कमला आंटी का नाम कुछ ज्यादा ही पसंद है क्यों.. ?”
विम्मी उसका मजाक बनाने लगी…
“देख नाम का बोलेगी तो मुझे विमल पसंद है.. ज़ुबाँ केसरी वाला, जिसका एड मिस्टर सिंघम करते हैं…. लेकिन खाता इलायची हूँ समझी … !”
अपने नाम का मजाक सुन विम्मो पैर पटकती वहाँ से बाहर निकल गयी.. और डब्बा को समझा बुझा कर निम्मी ने श्लोक के घर के लिए भेज दिया…
इतनी देर में तैयार होकर सिम्मी भी चली आई…..
“तू कहाँ जा रही सिम्मी… ?”
“तेजस का कॉल आया था ना, कुछ पुराने दोस्त आ रहें मिलने.. उन सब से मिल कर आती हूँ.. ! वैसे तुझे कुछ काम था क्या.. ?”
“ना मुझे कोई काम नहीं था… तू बस ध्यान से जाना, उन लोगो से मैंने तेरी ही बीमारी का बहाना बनाया है… !”
“ओके सिस !” सिम्मी मुस्कुरा कर अपनी स्कूटी की चाबी हाथ में घुमाती बाहर निकल गयी…..
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सिम्मी और तेजस मॉल के कॉफ़ी शॉप में बैठे बातें कर रहें थे.. सिम्मी का ध्यान बार बार अपनी घडी ओर चला जा रहा था..
“क्या हुआ सिम्मी.. ? कहीं जाना है क्या.. ?”
“नहीं… मै तो बाकी लोगो का इंतज़ार कर रही हूँ.. ! बाकी लोग नहीं आये ?”
तेजस मुस्कुरा कर सिम्मी को देखने लगा…
” सिम्मी..! दरअसल मैंने तुम्हारे अलावा किसी को बुलाया ही नहीं… ! “
“लेकिन क्यों.. ? मुझे लगा तुम्हारी जॉइनिंग की पार्टी सबके लिए है.. !”
“हाँ मै चाहता तो था, लेकिन जाने क्यों फिर मन नहीं किया.. यूँ लगा जो सही मायनों में आपके सच्चे दोस्त है सिर्फ वही आपकी सफलता से खुश हो सकते हैं….! बाकियों को कहाँ फर्क पड़ता है ?”
“हाँ ये बात तो है.. !”
” मेरे लिए दोस्ती के बहुत गहरे मायने हैं सिम्मी ! मै यूँ ही नहीं दोस्त बना लिया करता हूँ.. अगर किसी से दोस्ती करता हूँ तो जीवन भर निभाता भी हूँ… मेरे लिए मेरे मॉरल्स सबसे ऊपर है.. रुपया पैसा, रुतबा हवेली बड़ी गाड़ी ये सब आनी जानी हैं… असल किस्सा इंसानी फितरत का होता है… अगर आप सच्चे दिल के हैं तो आपके आसपास भी आप जैसे लोग ही इकट्ठा होते है….
हम हमेशा अपनी तरह के लोगों से ही जुड़ना पसंद करते हैं सिम्मी… जिनसे दिल नहीं मिलते ना, उनके साथ संबंध भी ज्यादा दिन कायम नहीं रह पाते… !”
तेजस कि गहरी बातें सुन सिम्मी को एक बार फिर वो ज़िद्दी सनकी आदमी याद आ गया… कितना सही कह रहा तेजस… ! वाकई हम अपने कम्फर्ट जोन में ही रहना पसंद करते है, अपने जैसे लोगो के साथ और जहाँ हमारे जैसे लोग न मिले वहाँ अक्सर मतभेद पैदा हो जाते हैं…. …
“और बताओ, तुम्हारा कैसा चल रहा है.. ?”
“बढ़िया चल रहा है.. ख़ूब सारी पढाई की है, पिछले दिनों.. अब तो इंटर्नशिप का वक्त आ गया.. !”
“बहुत बढ़िया ! तुमने पहली बार में ही सारे पेपर्स क्रैक कर लिए…अ बिग बिग अचीवमेंट यार !
ये बढ़िया है वर्ना सीए की पढाई इतनी आसान कहाँ है… ?”
उन दोनों की बातों के बीच उन्हें आभास ही नहीं हो पाया की कांच के दरवाज़े के पार खड़ा अक्षत राज उन दोनों को ही देख रहा था…
सिम्मी को वहाँ देख उसका ख़ून जल गया…
अभी कुछ देर पहले ही तो वो घर से निकला था… और उसके घर से निकलने के कुछ देर पहले ही निम्मी का श्लोक के पास फ़ोन आया था कि उसकी बहन सिम्मी को तेज़ बुखार आ गया है, जिसके कारण वो सो रही है… बाहर बारिश और ठण्ड होने के कारण सिम्मी का बाहर निकलना नामुमकिन सा है इसलिए वो बकलावा किसी के हाथ से भेज रही है.. ! श्लोक ने बड़े प्यार से हाँ कह दिया था…
श्लोक भी ना हद दर्ज़े का बेवकूफ है.. जिस किसी पर भी ऑंख मूंद कर भरोसा कर लेता है…
अक्षत राज ने सिम्मी को वहाँ देखा और उसे लगा कि सिम्मी को यहाँ आना था इसलिए सिम्मी ने निम्मी से झूठ कहलवा दिया…
लेकिन लाख कोशिश करने पर भी अक्षत राज को साथ बैठे आदमी का चेहरा नज़र नहीं आ रहा था… उसे देखने के लिए अक्षत राज उस कैफे में दाखिल हो गया…
उन लोगों से छिपते छिपाते वो ऐसी कुर्सी पकड़ कर बैठ गया जहाँ से सिम्मी के सामने बैठे उस लड़के का चेहरा वो देख सके…
बातों ही बातों में तेजस ज़ोर से खिलखिला कर हॅंस पड़ा, और उसकी वो हंसी पिघले सीसे सी अक्षत राज के कानों में उतरती चली गयी…
इस हंसी इस आवाज़ से तो वो परिचित था… ! कहाँ सुनी थी उसने ये आवाज़.. क्यों जानी पहचानी सी लग रही थी ये खिसियानी सी हंसी.. जैसे हंसने वाले को अपनी ही हंसी पर ऐतबार ना हो… या फिर बेबात की बात पर कोई हॅंस बैठा हो….
कौन था ये… आखिर कौन.. ?
अक्षत राज के लिए अब यूँ छिप कर बैठे रहना मुश्किल होने लगा था… उसे तेजस का चेहरा किसी हाल में नज़र नहीं आ रहा था और अपनी बेसब्री से निजात पाने वो अपनी जगह से उठ कर सिम्मी कि टेबल की तरफ बढ़ चला… ..
वहाँ पहुँचते ही उसने सिम्मी की तरफ देखा, और सिम्मी यूँ अक्षत राज को अपने सामने खड़ा पाकर हैरान रह गयी… उसे मालूम था कि कुछ देर पहले ही उसकी बहन ने उसकी तबियत का झूठा बहाना बनाया था…
वो एकाएक कुछ कह नहीं पायी और अपनी जगह पर खड़ी हो गयी…
“आप यहाँ.. ?”
“ये सवाल तो मुझे आपसे पूछना चाहिए था सिम्मी जी.. ?”
अक्षत का जलता हुआ जवाब सिम्मी को नखशिखांत जला गया… कुढ़ कर उसने सामने बैठे तेजस कि तरफ देखा और उन दोनों को मिलवाने के उद्देश्य से उसने अक्षत कि तरफ देख तेजस का परिचय करवा दिया…
लेकिन इतनी देर में वो दोनों ही एक दूसरे को देख चुके थे…
तेजस को घूरता हुआ अक्षत कुछ देर वहाँ चुप चाप खड़ा रहा और फिर तेज़ कदमो से पलट कर वहाँ से चला गया…
उसके जाते ही तेजस भी एक ज़रूरी काम का बहाना बना कर वहाँ से निकल गया…
सिम्मी को समझ ही नहीं आया कि अचानक ऐसा क्या हुआ जो ये दोनों लड़के एक दूसरे को देख यूँ बिदक गए…
कुछ सोचती हुई वो भी अपनी स्कूटी की ओर बढ़ गयी….
उसे नहीं मालूम था कि घर पर एक सरप्राइज उसका इंतज़ार कर रहा है…..
क्रमशः
aparna…..
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लाजबाब भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻