बेसब्रियां-38

बेसब्रियां दिल की – 38

सब सोच में गुम थे, की क्या किया जायें, कैसे किया जायें..
विम्मी चली तो गयी थी लेकिन उसका जाना सबको अंदर तक हिला गया था…

मुहल्ले में रहने वाला डिब्बा सिंह जो विम्मी का परम भक्त था, मुहँ उठाये उसका हाल चाल जानने चला आया..
उसे भी विम्मी के गायब होने की खबर लग गयी थी..

“पैरी पौना आंटी जी.. और क्या हाल है.. ?”

अपने लाल हाइलाइटेड बालों में वो पक्का शुतुरमुर्ग लग रहा था..

“तुझे कैसे दिख रहें ?”पम्मी ने चिढ कर जवाब उसके मुहँ पर दे मारा…

“मुझे तो आप चंगे ही लगते हो आंटी जी.. ! एकदम मधुबाला जैसी..सही कह रहा हूँ ना आंटी जी !”

“ये लड़का इतना आंटी जी क्यों बोलता है… भाग्यश्री का फैन है क्या.. ?”

लीला उबल पड़ी…

“अरे नहीं आंटी जी.. बस ज़रा आदर सम्मान करने की बुरी आदत है मुझमें.. !
अपने से बड़ों को रिस्पेक्ट देता हूँ मैं….
उसी समय डिब्बे का फ़ोन बज गया..

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उसकी दुकान थी जहाँ से किसी ने कुछ उधारी लें रखी थी.. महीना बीत गया था और सामने वाला बंदा पैसे वापस नहीं कर रहा था.. डब्बे ने अपना आदमी उसके यहाँ भेजा था, उसी आदमी का फ़ोन था..
उसने फ़ोन लगा कर सामने वाले को पकड़ा दिया..

“कह रहा हूँ ना डिब्बे… तेरे पैसे वापस कर दूंगा… !”

“साले मेरे माथे पर क्या लिखा है बे.. ?”डिब्बा चीख उठा

“इतना पढ़ना लिखना आता तो कलेक्टर ना बन जाता डिब्बे.. काहे मजाक कर रहें.. !” सामने वाले ने जवाब दे दिया

“साले मदरबोर्ड कहीं के… मैं तुझसे मजाक करूँगा.. ? तू मेरी बीवी की बहन लगता है जो तुझसे मजाक करूँ…? आज शाम तक मेरे रूपये नहीं मिले ना तो अपनी दुकान में बैठे बैठे तुझे गोली मरूंगा जो तेरा सीना चीर कर निकल जायेगी…
आरम्भ है प्रचंड… सुना है की नहीं.. ?”

“तूने ही गाया है क्या डिब्बे ? अब तक ध्यान से नहीं सुना.. अब सुन लूंगा !”

डिब्बा सिंह सामने वाले बन्दे की कम बुद्धि पर खीझ गया..

” पानी में डूबा डूबा के मारूंगा जो आज शाम तक मेरे रूपये नहीं आये… साले.. जानता नहीं है तू, मैं कौन हूँ.. किसके खानदान से हूँ.. ?
बावरा सिंह का नाम सुना है.. ?”

“नहीं.. !”

गुस्से में डिब्बे ने अपना मोबाइल अपने ही माथे मार लिया..

“दुर्जन सिंह का नाम सुना है.. ?”

“नहीं.. !”..

“ढोली सिंह का नाम तो सुना ही होगा…. हैं.. ?”

“नहीं डिब्बे.. इनमें से किसी का नाम नहीं सुना ? ये सब हैं कौन ?”

“साले कमीने.. तू इन्हें नहीं जानता.. ? ये पूर्वज हैं मेरे.. !कुश्ती में..

“अच्छा कुश्ती खेलते थे ये.. अरे माफ़ करना भाई.. मैंने तो बस वो बहने हैं ना गीता बबिता फोगट.. उन्हीं का नाम सुन रखा है.. !”

“अबे कुश्ती नहीं खेलते थे.. खेलना चाहते थे.. पर घर परिवार की ज़िम्मेदारी भी तो कोई चीज़ है.. उसी के वास्ते नहीं खेल पाए.. !”

“अच्छा… फिर… ?”

“क्या फिर ?”

“मतलब इनका नाम क्यों गिनाया डब्बे ?”

“अपना परिचय दे रहा था… वो सब छोड़ आज शाम तक मेरे पैसे नहीं पहुंचे ना तो तेरी खाल खींच के भूसा भर दूंगा.. आई बात समझ में !”

,डिब्बे ने फ़ोन काट कर जेब में डाला और एक गहरी सी फूँक छोड़ कर खड़ा हो गया..

सिमरन ने उसकी तरफ पानी का ग्लास बढ़ा दिया..

“इतना बवाल कर रहा था डिब्बा सिंह… ये तो बता की कितने लाख खा गया है वो छछूंदर तेरा.. !”

“लाख खाता तो मैं उसको जीने देता क्या लीला आंटी…?”

“हाय फिर ?”

“,दस हज़ार लिए थे उसने कहा था ब्याज के दो हज़ार डाल के बारह हज़ार देगा… अब तक ना ब्याज मिला ना मूलधन.. !”

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“ओह्हो… पैसा गंवाया तो गंवाया बेटा अनुभव तो मिला ना.. वो भी बहुत है !”

“कहाँ गंवाया लीला आंटी जी .. वसूल लूंगा.. अच्छा ये बताइये… विम्मी नहीं दिख रहीं कहीं… कहीं बाहर घूमने फिरने गयी है क्या.. ?”

पम्मी ने उसकी बात काटनी चाही.. और तुरंत ही कहने जा रहीं थी की विम्मी यहीं है लेकिन तब तक सिमरन ने सच बोल दिया…

“वो मुंबई में है…!”

“अरे कैसे ?”

“घूमने गयी है !”

“हैं… अकेले.. ?”

“नहीं… दोस्तों के साथ.. !”

“अच्छा..
कौन है वो दोस्त.. !”

“तुम नहीं जानते डिब्बे… इसलिए जाने दो.. और ऐसा करो अब जाकर अपना काम सम्भालो… !”

सिमरन ने उससे जान छुड़ाने को कहा… और डिब्बा सिंह बिल्कुल ही बेमन से लौट गया..

उसका जाने का बिल्कुल मन नहीं था.. वो कुछ देर और वहाँ बैठना चाहता था…

लेकिन सिमरन दरवाज़े के पास खड़ी उसे बुला उठी थी इसलिए लौटने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था…

मन पर बड़ा सा पत्थर रख कर वो चला गया था..

“क्या ज़रूरत थी उसे सब बताने की.. !”

उसके जाते ही पम्मी बरस पड़ी..

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“वो फ्रेन्डबुक में विम्मी की तस्वीर देख कर ही यहाँ आया था मम्मी.. उसे सब पता है की विम्मी कहाँ है किसके साथ है.. उसे ही क्या जितने लोग विम्मी से फ्रेन्डबुक पर जुड़े होंगे सब को पता चल गया होगा की वो कहाँ है !”

“हे राम इस लड़की ने तो नाक ही कटवा दी.. ! ये मुआ फ़ोन भी जी का जंजाल हो गया है !”

पम्मी एक बार फिर अपना सर पकड़ कर बैठ गयी और लीला उसे सांत्वना देती बैठी रहीं..

“सिम्मी तू तैयार हो जा ना… तुझे मिसेस सूद से भी मिलना जाना है ना !”

“हाँ… निम्मी तू भी चलेगी क्या.. ?”

“मैं क्या करुँगी यार ! तू ही जा और जल्दी से निपटा कर वापस आ जा…
मुझे किचन क्वीन वालों को मेल भी भेजना है.. मैं अचानक बिना कुछ बताये वापस चली आई हूँ ना.. अब देखो वो लोग क्या बोलते हैं.. ?”

“ठीक है.. तू अपना काम निपटा ले.. मैं मिल कर आती हूँ… देखूं आखिर क्यों मिलना चाहती है ये क्वीन एलिज़ाबेथ… !”
क्रमशः

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