
बेसब्रियां -दिल की.. -10
पिकनिक पर सब एक साथ एक गोलाकार घेरे में बैठे थे… अक्षत की पूरी कोशिश थी कि वो सिम्मी कि फैमिली से जितना दुरी बना कर बैठ सकता था उतना दूर बैठा था… |
लेकिन इसी कोशिश में वह सिम्मी के ठीक सामने बैठा था… |
इधर उधर से लोगों को हटाते हुए मोहीना अक्षत के ठीक बगल में आकर बैठ गई..
उसने अक्षित की तरफ नाश्ते की प्लेट बढ़ा दे…
और अक्षत ने नाश्ते की तरफ देख कर उसे मना कर दिया…
सामने बैठी सिम्मी ने यह देखा और उसके चेहरे पर 12 बज गए…
नाश्ता आखिर उसी की मां ने बनाया था बाकी श्लोक की फैमिली अपने साथ घर से खानसामा लेकर आई थी ! इसके साथ ही उन लोगों ने रसद का भी पूरा इंतजाम कर रखा था…!
उनका रसोईया और नौकर दूसरी तरफ चूल्हा जलाकर खाना बनाने की तैयारी में लग गये थे ….
भुना गोश्त के साथ चिकन बिरयानी और फिश कटलेट आज के मेन्यू में था…
सिम्मी के परिवार में उसकी मां भी बहुत स्वाद चिकन बनाया करती थी लेकिन जाने क्यों बचपन से ही सिमरन को नॉनवेज खाना पसंद नहीं था…
ऐसा नहीं था कि उसने आज तक नॉनवेज चख कर नहीं देखा था, लेकिन उसकी मां के 656 प्रयासों के बावजूद बचपन से ही सिम्मी के मन में चिकन के प्रति किसी तरह की कोई श्रद्धा नहीं जगह पाई थी…!
और अपने पूरे परिवार में वह अकेली विशुद्ध वेजिटेरियन थी…|
इसलिए वहां बनते खाने को देखकर कुछ देर को उसके मन में एक वितृष्णा से जागी, फिर लगा उसकी माँ नें तो वैसे भी ढेर सारे स्नैक्स बना कर रखे हैं उन्हें ही खा कर अपना काम चला लेगी…
खाना बनते तक में सभी ने यह तय किया कि आपस में कुछ गेम खेले जाएं ! पिकनिक पर खेले जाने वाले सबसे कॉमन गेम में से एक हाऊजी को चुना गया और, डिब्बा सिंह को हाउजी खिलाने की जिम्मेदारी दे दी गई |
क्योंकि हर कोई अपनी टिकट पर ही खेलना चाहता था |
यह लोग जिस वक्त पिकनिक के लिए निकल रहे थे उसी वक्त गली में टहलता हुआ डिब्बा सिंह पम्मी जी के घर के सामने से निकला और वह भी पिकनिक में बिना बुलाए मेहमान की हैसियत से टंग गया था…
अक्षत को इन सारे फिजूल कामों में बिल्कुल भी मजा नहीं आ रहा था… लेकिन श्लोक अपने बिज़नेसमैन के चोले से बिल्कुल अलग यहाँ एक समान्य आदमी की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवा रहा था..
अक्षत राज अपने मोबाइल पर लगातार किसी काम की फाइल को देखने में व्यस्त था लेकिन श्लोक के बहुत जोर देने पर उसने भी एक टिकट रख ली थी…
गेम शुरू हुआ और एक के बाद एक नंबर से बुलाने पर कभी किसी का तो कभी किसी का नंबर कटता गया |
अब तक सिम्मी और अक्षत ही ऐसे बाकी थे जिन्हें कुछ भी नहीं मिला था | फुल हाउस बचा था |
डब्बा सिंह ने एक नंबर पुकारा……_” लकी नंबर सेवन !”
.. और सिमी और अक्षत एक साथ अपने टिकट उठाकर बोल पड़े…
सिम्मी ने बड़े चहकते हुए कहा…
“मेरा फुल हाउस हो गया!”
” लेकिन वह तो मेरा हो गया..!”
अक्षत ने भी अपनी टिकट आगे बढ़ा दी…
डिब्बा ने उन दोनों की टिकट चेक की और दोनों को ही फुल हाउस की बधाई दे दी ..
अपने मस्तमौला अंदाज़ में वो बोल उठा…
” बहुत-बहुत बधाई हो, आप दोनों ने एक साथ मिलकर एक घर खरीद लिया है ! यह आप दोनों के सपनों का आशियाना आपको 51-51रूपये के शगुन के तौर पर मिलेगा… क्योंकि 102 फुल हाउस का अमाउंट था जिसे आप दोनों के बीच आधा-आधा बांटा जा रहा है…”!
” मुझे पैसे नहीं चाहिए इन्हें पूरे पैसे दे दिये जाए..
मैं तो बस गेम में था इसलिए मैंने अपना नंबर आने पर बता दिया..!”
अक्षत को यह 10 -20 रूपये जोड़ जोड़ कर सौ पचास की लॉटरी खुलने वाला अजीब सा गेम बेहद बेहूदा लग रहा था,ये वो गेम था जो कहीं से भी श्लोक अंबुजा और अक्षत राज खनूजा के स्टैंडर्ड से मैच नहीं खा रहा था…
इससे कहीं ज्यादा धनराशि तो वह गोवा के कसीनो में यूं ही उड़ा दिया करता था….
उसकी समझ से बाहर था कि श्लोक की आंखों पर अचानक उस मिडिल क्लास लड़की की इश्क की पट्टी इस कदर क्यों बंध गई थी कि वह खुद मिडिल क्लास बनने पर आमादा हो गया था…
उसे रह-रहकर श्लोक का निम्मी को देखते हुए खो जाना भी पसंद नहीं आ रहा था…
श्लोक और निम्मी के बीच चलती आंख मिचोली को देखकर अक्षत राज के चेहरे के बदलते हुए क्रूर भावों को सिम्मी बड़े अच्छे से समझ पा रही थी| उसे समझ में आ रहा था कि श्लोक भले ही बहुत ज्यादा जमीन से जुड़ा हुआ इंसान था लेकिन उससे जुड़े लोग निम्मी को बिल्कुल भी पसंद नहीं कर पा रहे थे |
हालांकि वह इस बात को निम्मी को समझाना भी चाहती थी लेकिन निम्मी उसे कोई मौका ही नहीं दे रही थी | जाने क्यों अक्षत राज की यह बात सुनकर सिम्मी का मन खट्टा सा हो गया | अक्षत राज ने अपनी बात कही और अपनी टिकट को फाड़कर फेंकने के बाद वहां से उठकर दूसरी तरफ चला गया | सिम्मी को गुस्सा तो बहुत आया लेकिन उस वक्त उसने डिब्बा सिंह से 102 रूपये लेकर रख लिये…
इस गेम के खत्म होने के बाद वह लोग हंसते खिलखिलाते और कौन सा गेम खेलना है इस चर्चा में लगे थे |
कि सिम्मी उठकर वहां से दूर निकल गई | वह अक्षत राज को ढूंढती हुई आगे बढ़ रही थी कि तभी कुछ दूर पर एक झील के किनारे बैठे अक्षत पर उसकी नजर पड़ गई | अक्षत खुद में गुम सामने बहते दरिया को देखता बैठा था | बीच-बीच में वह वहीं पर गिरे छोटे-छोटे पत्थरों को उठाकर उस दरिया में फेंक दिया करता था…
“यह लीजिए आपके 51रूपये.. !”
अक्षत ने सिम्मी की आवाज सुनी और चौक कर पीछे की तरफ मुड़ गया कि तभी सिम्मी ने उसकी तरफ 50 का नोट और 1 का सिक्का बढ़ा दिया…
” मैंने कहा ना तुम रख लो मुझे इसकी जरूरत नहीं है..!”
” मैं भी इतनी गरीब नहीं हूं अक्षत साहब |
और ना ही मुझे 51 रुपयों की इतनी गहरी जरूरत पड़ गयी हैं कि ना मिले तो मैं साँस ना लें पाऊँ !
यह सिर्फ एक गेम था जिसमें सब एक छोटा-छोटा अमाउंट आपस में मिलाते हैं… कंट्रीब्यूट करते हैं, और उसके बाद गेम खेलते हैं..! इस गेम को हाउज़ी कहा जाता है ! ज्यादातर रईस महिलाओं की किटी का यह सबसे खास हिस्सा होता है, और वह महिलाएं कितने भी अमीर घर की हो तब थी इसी अमाउंट से खेलती हैं! और आप को बड़ा आश्चर्य होगा यह सुनकर कि अर्ली फाइव या फर्स्ट कॉर्नर के मात्र 10 रूपये पाने के लिए भी इन औरतों में आपसी मुठभेड़ हो जाती है…
इसका यह मतलब नहीं होता कि उस 10 रूपये में पैसे पर पैसे जोड़कर कोई सोना चांदी हीरा मोती खरीद लेंगी ये लोग….
यह सिर्फ एक गेम है जिसे पूरी तरह से खेल भावना के साथ खेला जाता है..!
मैं जानती हूं कि आप बेहद रईस है आपका आप जैसे ऊँचे लोगों में उठना बैठना है, और जाहिर है कि आप के तौर तरीके आपकी पसंद ना पसंद भी उसी परिवेश की है जिस परिवेश में आप पैदा हुए हैं | आप ऐसे हैं इसमें आपकी गलती नहीं है !
आपने आज तक एक मध्यमवर्गीय परिवार को कभी देखा ही नहीं ! शायद इसीलिए आप अपने दिमाग में इतना सारा कचरा पाल कर बैठे हैं, हम लोगों के लिए……|
अक्षत ने घूर कर सिम्मी को देखा और वापस दरिया में पत्थर मारने लगा..
” बेहद जजमेंटल हो तुम ? खुद ही सब तय कर लेती हो कि सामने वाला क्या सोच रहा क्या नहीं.. !”
” लोगों के स्वभाव को देखकर ही उनके बारे में कोई राय बनाती हूं | मैं जजमेंटल बिल्कुल भी नहीं हूं |”
” तेजस को कब से जानती हो.. ?”
अक्षत राज का सवाल सुनकर सिम्मी के माथे पर बल पड़ गये..
उसे लगा इस आदमी को आख़िर उसकी ज़िंदगी से क्या लेना देना…
” आप से मतलब..?”
अक्षत ने एक बार पलट कर उसकी तरफ देखा और वापस पानी की तरफ देखने लगा…
” वह सही इंसान नहीं है, उससे दूर रहना..!”
ये तो हद हो गयी… मतलब ये अकड़ू होता कौन हैं मेरी ज़िंदगी को अपने हिसाब से चलाने वाला… मैंने तो इसे नही कहा कि ऐसे बात बात पर अपनी जबान से जहर ना उगले !
मैंने तो ऐसा नहीं कहा कि बात बात पर अपनी आंखों से तोप के गोले मत बरसाए !
फिर यह कौन होता है मुझे यह बताने वाला किससे बात करुँ और किससे बात ना करूँ !…
अजीब ही एटीट्यूड होता है लड़कों का, अगर कहीं गलती से रईस निकले तब तो पूछो मत..!
सिर्फ नाम के लिए हम लड़कियां बदनाम है कि, हम नखरा करती हैं | वरना हम से कहीं ज्यादा नखरीले और नकचड़े तो यह लड़के होते हैं…|
सिम्मी मन ही मन अक्षत के लिए सोच रही थी और अक्षत चुपचाप बैठा दरिया में पत्थर फेंक रहा था…
” इतनी ज्यादा गालियां दोगी तो कहीं ऐसा ना हो कि दरिया में गलती से गिरकर बह जाऊं..!”
” मैंने कब गाली दी..?”
“सच बोलना……! मुझे गालियां नहीं दे रही थी…?”
अक्षत अब भी सिम्मी की तरफ नहीं देख रहा था.. उसकी पूरी नजर सामने बहते दरिया के पानी पर ही थी और उसकी बात सुनकर सिम्मी के चेहरे पर अचरज के भाव चले आए थे..
अंतर्यामी था क्या यह सनकी जो उसके मन में चल रही बातों को भी पढ़ लिया…
” लगता है उधर से कोई आवाज दे रहा है शायद लंच के लिए बुलाया जा रहा है…!
आपके लिए तो स्पेशल गोश्त चिकन मटन और जाने क्या-क्या पक रहा है तो चलिए खा लीजिए…
उसे बोलने के बाद सिम्मी वापस अपनी मंडली की तरफ आगे बढ़ गई…
कुछ देर में ही निम्मी सिम्मी और मोहिता ने मिलकर सबके लिए प्लेट लगा ली… ..
निम्मी एक प्लेट उठाकर श्लोक के पास चली आई…
उसने श्लोक की तरफ प्लेट बढ़ाई और मुस्कुराकर श्लोक ने वह प्लेट थाम ली…. -“आप भी यहीं अपनी प्लेट ले आईये !”
” जी आप शुरू कीजिए मैं लेकर आती हूं!”
प्लेट्स एक दूसरे को पकड़ाने के चक्कर में श्लोक की उंगलियां गलती से निम्मी की उंगलियों से छू गई और दोनों को ही यूं लगा जैसे उनके सारे जिस्म में एक करंट दौड़ गया हो !
घबरा कर निम्मी अपनी प्लेट लेने चली गयी…
सबकी प्लेट्स परोसने के बाद सिम्मी खुद के लिए अपनी माँ के बनाये स्नैक्स निकालने जा रही थी कि श्लोक के रसोईया ने अलग से रखें भगोनो की तरफ इशारा कर दिया और खुद जाकर उसकी प्लेट लगाकर उसके पास लें आया…
उस प्लेट में आलू मेथी, मटर पनीर और वेज पुलाव देखकर निम्मी की आंखें आश्चर्य से फटी रह गई…
” अरे यह कैसे? सिर्फ मेरे अकेले के लिए वेज खाना बनवा दिया आपने?”
सिम्मी आश्चर्य से श्लोक की तरफ देखने लगी और श्लोक उसकी बात सुनकर हां में गर्दन हिलाते हुए मुस्कुरा उठा…
” आपकी ही तरह एक और है जो नॉनवेज नहीं खाता… मेरा दोस्त अक्षत राज..!
मैं उसे प्यार से राज ही बुलाता हूं ! और आप लोग भी चाहे तो राज बुला सकते हैं ! वैसे उसकी और आपकी पसंद नापसंद बेहद मिलती-जुलती है | “
” पसंद नापसंद मिलने से क्या फर्क पड़ जाता है भैया..!”
श्लोक की बात सुनकर मोहिना बीच में कूद पड़ी ! उसे सिम्मी और अक्षत के बारे में कही गई श्लोक की बातें बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी | उसे सिम्मी शुरू से ही नापसंद थी और जब से उसने हाउजी के वक्त इस बात को नोटिस किया था कि अक्षत लगातार दूसरों से नजर बचाकर सिम्मी को देख लिया करता था, तब से मोहिना के दिल में सिम्मी के लिए और भी ज्यादा कड़वाहट भर गयी थी ..
क्रमशः
aparna…
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बहुत खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻♥️♥️♥️♥️♥️⭐⭐⭐⭐⭐