बेसब्रियां-11

बेसबरियाँ – दिल की… -11

कभी नीले आसमां पे
चलो घुमने चलें हम
कोई अब्र मिल गया तो
जमीं पे बरस लें हम
तेरी बाली हिल गयी है
कभी शब चमक उठी है
कभी शाम खिल गयी है..

तेरे बालों की पनाह में इक सियाह रात गुजरे,
तेरी काली काली आँखे कोई उजली बात उतरे,
तेरी इक हंसी के बदले
मेरी ये ज़मीन ले ले, मेरा आसमान ले ले
साथिया साथिया….
मद्धम मद्धम तेरी गीली हँसी
साथिया  साथिया
सुन के हमने सारी पी ली हँसी….

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पिकनिक में अब अंताक्षरी शुरू हो चुकी थी, और अपनी पारी आने पर श्लोक ने बड़ी अदा से निमरत को देखते हुए अपने दिल की बात गाने की शक्ल में कह दी..
निमरत भी शरमा कर इधर उधर देखने लगी… लेकिन मोहिना को ये सब पसंद नहीं आ रहा था…

“वाह वाह !! क्या बात है बेटा जी, आप तो बड़ा खूबसूरत गाते हैं… !”

लीला आंटी को इस नवेले जोड़े की प्यार भरी ऑंख मिचौली बड़ी भा रहीं थी…

गाने तरानों की इस महफ़िल से भी एक फ़ोन कॉल पर बात करने का बहाना बना कर अक्षत सरक गया… सिम्मी ने उसे जाते देखा और राहत की साँस ली…

गाती गुनगुनाती वो शाम कई लोगों के लिए अलग अलग अनुभव छोड़ कर आखिर अपने अवसान में पहुँच गयी…

थके हारे सारे पंछी अपने नीड़ को वापस लौटने लगे वैसे ही उन सभी ने अपना अपना सामान समेटा और वापसी के लिए गाड़ी में सवार हो गए…

निम्मी और श्लोक साथ ही बैठे थे… एक एक कर लोग बस में आते गए और बैठते गए लेकिन सिम्मी को अक्षत कहीं नज़र नहीं आया…

बस चलने को हुई तो उसके मन में आया भी कि एक बार किसी से कह कर गाड़ी रुकवा दे, जाने वो सनकी कहाँ रह गया… ? और उससे भी ज्यादा उसे श्लोक को देख कर आश्चर्य हो रहा था कि उसका जाने जिगर दोस्त गाड़ी में चढ़ा नहीं बावजूद गाड़ी को रुकवाए  रखने के बजाय  श्लोक खुद में मगन बैठा है…

सिम्मी की इधर उधर व्याकुलता से घूमती नजर को कोई बड़े ध्यान से देख रहा था…

“वो पहले ही कैब लेकर वापस निकल गया है.. !”

मोहिना ये बोलते हुए सिम्मी के बगल वाली सीट पर बैठ गयी…

सिम्मी ने मोहिना की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप खिड़की से बाहर देखने लगी…

****

पम्मी जी और उनकी तीनों बेटियों के साथ लीला आंटी को भी पम्मी के घर के सामने उतार कर श्लोक कि गाड़ी आगे बढ़ गयी…

पम्मी अपनी हद से ज्यादा थकान का वर्णन करती घर के दरवाज़े की तरफ बढ़ गयी… ! और लीला डिब्बा सिंह की गाड़ी में लद कर अपने घर को रवाना हो गयी..

दरवाज़े पर लगी बेल बजाते ही उनके पतिदेव दरवाज़ा खोल कर उन्हें आँखों से ही कुछ इशारा करने लगे….
उनका इशारा समझे बिना पम्मी जी भीतर चली आयी और अंदर हॉल में बैठे ललित कुमार को देख उनका दिन भर का सारा उत्साह कहीं बह गया…..

पम्मी जी और उनका परिवार फिलहाल जिस घर में रहते  थे  वो उनके ससुर जी का था, जिसे मरने से पहले उन्होंने अपने दूसरे बेटे के नाम कर दिया था…!

दिल्ली से लगे गांव लुहार हेड़ी में उनके खेत और एक ढाबा था… वो उन्होंने निम्मी के पिता के नाम कर रखा था जिसे फ़िलहाल निम्मी के चाचा ही चला रहें थे…! निम्मी के दादा की सोच कुछ इस तरह थी कि निम्मी के पिता इंद्रवदन क्योंकि शहर में रहते थे और कॉलेज में पढ़ाया करते हैं इसलिए उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं है इसलिए दिल्ली का अपना मकान जिसमें  निम्मी के पिता अपने पूरे परिवार के साथ रहा करते थे को निम्मी के दादा ने निम्मी के चाचा के नाम कर दिया था….!
निम्मी के चाचा के दो लड़के थे और उन सब ने मिलकर गांव के उस सादे से ढाबे को काफी कुछ शहर नुमा रेस्टोरेंट में बदल दिया था…!
उनका सारा काम बढ़िया चल रहा था | कारोबार घर परिवार कहीं पर भी कोई कमी नहीं थी | और इसी देखा देखी में उनके बड़े बेटे ने ढाबे को और बढ़ाने के लिए शहर के अपने घर को बेचने का निर्णय लिया था…|

ललित कुमार निम्मी के काका के बड़े लड़के का दोस्त था | और जमीन के धंधे से जुड़ा हुआ था | इसलिए ललित कुमार से ही निम्मी के काका के परिवार की बातचीत चल रही थी | और इसीलिए ललित कुमार जब भी अपने किसी काम से दिल्ली आता वह अक्सर निम्मी के घर भी पहुंच जाया करता था…|

क्योंकि इस घर में सभी को मालूम था कि ललित कुमार की नजर इस घर पर थी, इसलिए पम्मी जी अक्सर उसे देखकर उखड़ जाया करती थी…

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ललित कुमार ने पम्मी जी को प्रणाम किया और पारी पारी से तीनों बहनों को देखकर हाथ हिला कर मुस्कुरा दिया | पम्मी जी ने उसे अंदर बैठने का इशारा किया और खुद अपने पतिदेव पर एक नजर डालकर रसोई में घुस गयी !
   निम्मी सिम्मी और विम्मी भी अपनी मां के पीछे पीछे अंदर चली गई…

” जी ये यहाँ क्या कर रहा है…?” पम्मी जी इंद्रवदन पर बरस पड़ी..

” अब यह मुझे कैसे पता होगा?” रिरियाते हुए इंद्रवदन ने सफाई पेश कर दी..

” यह आया कब..?”

” बस अभी आधे घंटे हुए होंगे..!  मैंने चाय पानी अभी तक कुछ भी नहीं पूछा..! ऐसा करो पम्मी इसे चाय नाश्ता करा कर फ़ौरन यहाँ से दफा करो..!”

” आपको कुछ लगता भी है कि नहीं ?
पूरे दिन की थकावट है मुझे !  सुबह 5 बजे  से उठकर रसोई में लगी थी | पिकनिक के लिए तरह तरह के नाश्ते बना रही थी, स्नैक्स बना रही थी, चाय बना रही थी !  और इतना सब करके आपके लिए भी खाना तैयार करके गई थी |  अभी लौटी हूं, जरा कमर सीधी नहीं हुई कि चाय नाश्ता परोसने का आर्डर आ गया आपकी तरफ से..!”

” अरे भाई !!  तुम्हारा भला सोच कर ही कह रहा था, मुझे लगा चाय नाश्ता जल्दी करवा दोगी तो यह टल जाएगा, अगर अंधेरा हो गया तो फिर बहाना लगाएगा की रात की बस नहीं मिलेगी गांव लौटने को और फिर खाना खाकर सीधा यही रुक जाएगा ! और फिर जानती हो ना अगर एक बार रुक गया तो इसकी बकवास शुरू हो जाएगी..!”

” जानती हूं, सब जानती हूं… सारे के सारे लोग मेरी ही जान के दुश्मन है..!”

पम्मी जी बड़बड़ा रही थी कि तभी सिमरन रसोई में चली आई और उसने चाय का पानी चढ़ा दिया…

” मम्मी आप टेंशन ना लो आप अपने कमरे में आराम करो | मैं ये सब देख लूंगी…

एक तरह से ज़बरदस्ती ठेल कर ही सिम्मी ने अपनी मां को रसोई से बाहर भेज दिया और फटाफट चाय चढ़ाने लगी…

बाकी लोगों के हाथ मुंह धो कर आते तक में सिम्मी ने चाय बना ली और साथ में मठरी, गाठिया और कुकीज़ निकाल कर बाहर ले आई…

ललित कुमार निम्मी और सिम्मी दोनों को ही देख कर मुस्कुरा रहा था | उसने चाय का प्याला फटाफट उठा लिया और एक बार में दो दो मठरिया उठाकर खाने लगा कि तभी वहां मौजूद विम्मी ने उसे टोक दिया…

” आराम से खा लीजिए, आप ही के लिए लाई गई है | हम सब तो अभी वैसे भी पिकनिक से आ रहे हैं तो हम सब के पेट भरे हुए हैं..!”

” मैं तो इसलिए जल्दी-जल्दी खा रहा था कि जिससे रात तक में मेरा पेट थोड़ा खाली हो जाए और आंटी जी का बनाया टेस्टी टेस्टी खाना खा सकूं…|”

वो खिसियानी सि हंसी हंसकर बोल पड़ा और…

ललित कुमार की यह बात सुनते ही पम्मी जी ने तुरंत इंद्रवदन की तरफ देखा और इंद्रवदन जानबूझकर उनकी नजरों से बचने के लिए अपने पास पड़े हुए अखबार को उठाकर उसके पन्ने पलटने लगे….

पम्मी जी को ललित कुमार पर भर भर कर गुस्सा आ रहा था लेकिन वह कुछ नहीं कह सकती थी …
ललित कुमार को भी पता था कि उनके आने से इस घर में कोई भी खुश नहीं होता था,  बावजूद इसी बात में खुश होकर वो मठरी ऊपर मठरी पेले जा रहा था…

” सिम्मी जी एक कप चाय और मिलेगी..?

“हां क्यों नहीं..! “सिम्मी उठकर रसोई में चाय का दूसरा प्याला लेने चली गई…

  सब की चाय खत्म होते ही विम्मी अपनी किताब निकाल कर अपने पढ़ने वाले कमरे में चली गई… उसके पीछे ही सिम्मी भी उसे पढ़ाने के लिए अंदर चली गई…

निमरत अपनी मां की मदद करने के लिए रसोई में चली आई…

” आज सच में खाना बनाने का बिल्कुल मन नहीं था.. इतनी थकान हो रही थी पिकनिक से आने के बाद, मैंने तो सोचा था शाम में बस खिचड़ी और रायता बना लूंगी, लेकिन यह नमूना टपक पड़ा अब इसके कारण पूरा खाना बनाना पड़ेगा…!”

निमरत अपनी मां की तकलीफ समझ रही थी उसे भी काफी थकान सी हो गई थी लेकिन वो यह भी समझती थी कि घर आए मेहमान की ठीक से खातिरदारी करना भी जरूरी है, वरना उनके गांव का और उसके पिता का नाम खराब हो सकता है…! इसलिए बेचारी चुपचाप सब्जियां साफ करने में लगी थी की तभी घर के दरवाजे पर कॉल बेल बज गयी..

निम्मी जब तक बाहर जाकर दरवाजा खोलने का सोचती इतनी देर में विम्मी अपने कमरे से निकलकर दरवाजा खोल चुकी थी ! कुछ देर दरवाजे पर खड़े रहकर उसने कुछ बातचीत की और एक बड़े से झोले को पकड़े हुए अंदर रसोई में चली आई…

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निमरत और उसकी मां दोनों आश्चर्य से विम्मी के लाये झोले को देखने लगी निम्मी ने विम्मी से पूछा..

“क्या है इसमें…?”

” अंबुजा लोगों के घर से उनका नौकर आया था… इसमें शायद कुछ खाना है और साथ में यह चिट्ठी देकर गया है…!”

निम्मी ने तुरंत हाथ बढ़ाकर उस चिट्ठी को ले लिया… और खोलकर पढ़ने लगी |  उसकी मां वही खड़ी थी | और उत्सुकता से उसे घूर रही थी | निमरत ने अपनी मां की तरफ एक नजर डाली और फटाफट चिट्ठी पढ़ने के बाद उन्हें उस चिट्ठी का सार बतला दिया…

“श्लोक जी के घर से यह खाना आया है मम्मी,  उनकी बहन मोहिता ने एक छोटी सी चिट्ठी भी साथ भेजी है | उनका कहना था कि आज हम सब पिकनिक में थक गए थे इसलिए उन्होंने पहले ही अपने महाराज से बोलकर हमारे लिए भी शाम का खाना तैयार करवा रखा था | वहीं उन्होंने जाते साथ सर्वेंट के हाथ से भिजवाया है..| “.

पम्मी जी के चेहरे पर एकाएक रौनक चली आई…. उन्होंने हड़बड़ा कर तुरंत उस बैग  को खोला और अंदर चार-पांच बड़े-बड़े डिब्बों को देखकर उनकी बांछें खिल गई | एक-एक कर उन्होंने सारे डिब्बे खोल लिए… |
     खड़े मसालों में बने छोले की खुशबू पूरी रसोई में फ़ैल गई | इसके साथ ही आलू के कुलचे और पुलाव के साथ रायता भी मौजूद था…..|

“हाय!!  कितने मीठे स्वभाव के हैं यह लोग | वाकई इनके घर में अगर मेरी एक भी बेटी ब्याह जाए तो मैं गंगा नहा लूं…!”

मन ही मन अपने रब का शुक्रिया अदा करती पम्मी जी ने पल भर के लिए आंखें मूंद ली…

“अरे सुनती हो एकदम बढ़िया अदरक वाली चाय मिलेगी..?  कल के लिए लेक्चर तैयार कर रहा हूं तैयार करते-करते जरा थकान सी लग रही है..!”

अपने पति की बाहर से आती आवाज को सुनकर पम्मी ने एक नजर बाहर की तरफ देखा और व्यंग में उसके होंठ तिरछे हो गए…

” देखा, जैसे ही पता चला कि खाना नहीं बनाना है मुझे, तुरंत बाहर से एक नया फरमान जारी कर दिया..!”

निमरत ने प्यार से अपनी मां के गले में अपनी बाहें डाल दी…

रह-रहकर श्लोक के व्यक्तित्व का हर एक नया रंग उसे अपने आप में डुबोता चला जा रहा था……

सिम्मी प्राईड एंड प्रेज्यूडिस खोलकर पढ़ने की कोशिश में थी लेकिन पिछले आधे घंटे से वह एक ही पन्ने पर जमी हुई थी | रह रह कर उसके दिमाग में वही सनकी अड़ियल जिद्दी लड़का घूमने लगता था…|

कितना खराब स्वभाव था उसका | जब सबके साथ गया था तो सबके साथ वापस लौटने में उसकी शान में ऐसी कौन सी गुस्ताखी हुई जा रही थी जो पहले ही कैब लेकर निकल गया…|
और निकला भी तो ऐसे निकला कि हम में से किसी को पता भी नहीं चला, चुपके से मोहिना को बता कर चला गया..|
वैसे ठीक भी तो है मोहिना उसके ही स्टैंडर्ड की है… दोनों रईस घरों के बच्चे हैं… बचपन से एक दूसरे को जानते हैं |
   क्या पता श्लोक और अक्षत की दोस्ती के पीछे उनकी भविष्य में होने वाली रिश्तेदारी छुपी हो ? वैसे भी श्लोक जिस हिसाब से अक्षत की तरफदारी करता है,  और अक्षत जिस हक से उसके घर पर इस तरह रुका हुआ है, हो सकता है भविष्य में अक्षत ही श्लोक के घर का दामाद बनने वाला हो….

वैसे भी मोहिना कोई भी मौका कहां छोड़ती है अक्षत से चिपकने का..?

   ना चाहते हुए भी सिम्मी उन दोनों के बारे में सोचने लगी और उन दोनों के बारे में सोचते सोचते जाने क्यों उसका मन कसैला सा हो गया | वह अपनी सीट पर से उठ कर चुपचाप अपनी खिड़की पर आकर खड़ी हो गई | ठंड बढ़ने लगी थी और बाहर से ठंडी हवा के झोंके कमरे में आकर कमरे का तापमान कम कर रहे थे…|
उसने हाथ बढ़ाकर खिड़की के पट बंद करना चाहे तभी उसकी नजर दूर सड़क की दूसरी तरफ मौजूद बस्किन-रॉबिन्स  की दुकान पर पड़ गई….|

मोहिना और अक्षत दोनों के ही हाथ में आइसक्रीम के कोन थे और दोनों जाने किस बात पर हंसते खिलखिलाते आइसक्रीम खा रहे थे…

लेकिन उनका इस तरह खिलखिलाना देखकर भी सिम्मी के चेहरे पर हंसी नहीं खेली और उसने हाथ बढ़ाकर दरवाजों को कसकर बंद कर लिया…

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क्रमशः

aparna…






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Manu verma
Manu verma
1 year ago

बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻♥️♥️♥️♥️♥️💐💐💐💐⭐⭐⭐⭐⭐

Manu verma
Manu verma
1 year ago

बहुत अच्छा भाग 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻♥️♥️♥️♥️♥️♥️💐💐💐💐💐💐💐💐💐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐⭐