
अपराजिता -119
भावना राजेंद्र की बात सुन कर कमरे में चली आयी…
वो खुद यही सोच रही थी कि जब दोनों इतने परफेक्ट हैं, तो आखिर ये लोग तलाक क्यों ले रहे हैं.. ?
कमरे में पहुँच कर उसका ध्यान इस बात पर गया ही नहीं, की कमरे में पलंग था ही नहीं.. उसने तो अपना बिस्तर ज़मीन पर डाल रखा था..
कमरे में एक अलमारी और एक कुर्सी के अलावा और कोई फर्नीचर नहीं था..
लेकिन आज उसका इन सब बातों पर ध्यान ही नहीं था.. उसके दिमाग में इस वक्त सिर्फ यही बात चल रही थी कि इतना सुंदर जोड़ा आपस में तलाक क्यों ले रहा…
वो कमरे की खिड़की पर खड़ी थी…
जाने कितनी देर तक वो ऐसे ही खड़ी थी कि तभी कमरे का दरवाज़ा खोल कर राजेंद्र अंदर आ गया !
“अब तक सोई नहीं तुम ?”
उसने पूछा और भावना पलट गयी..
“हम्म नींद नहीं आ रही थी !”
जिस दिन से भावना इस घर में इस कमरे में रहने लगी थी उस दिन से राजेंद्र का यहां आना जाना बंद सा हो गया था..
आज जाने कितने दिनों के बाद राजेंद्र यहां आया था.. उसका ध्यान गया कि भावना अब तक ज़मीन पर सोया करती थी..
“भावना तुमने कभी कहा नहीं कि तुम्हारे लिए बेड खरीदना है !”
“कभी ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई !”
“ऐसे थोड़े ना होता है.. इस कमरे में तो कुछ भी नहीं है.. इस पुरानी खटारा सी अलमारी के अलावा !”
“जितनी ज़रूरत है उतना सामान है यहां !”
“नहीं सामान तो कुछ है ही नहीं.. आज रसोई में भी मैंने देखा तुमने एक ही कड़ाही में दोनो सब्जियां बनायीं, फिर उसी में दाल भी छौंक ली..
बर्तन भी नाम मात्र के थे…
कैसे तुम इतने कम सामान में गुज़ारा कर रही हो ? मैं तो रसोई में आता नहीं लेकिन अपनी ज़रूरत का सामान तुम्हे तो बताना चाहिए ना..
भावना चुप खड़ी रही..
और राजेंद्र को भावना की चुप्पी खल गयी…
उस रात निनाद के सामने तो वो बहुत बड़ी बड़ी बातें कर रही थी, की जिनसे शादी हुई उन्ही से निभाना है, फिर अब क्या हो गया..
राजेंद्र सोच रहा था और भावना बोल पड़ी..
“एक बात पूछे ?”
“हाँ.. पूछो !”
“आपके इन दोनों दोस्तों के बीच सब तो ठीक लग रहा फिर ये लोग तलाक क्यों ले रहे हैं ?”
” कभी कभी ऐसा होता है कि दो अच्छे लोग भी साथ मिल कर एक अच्छी ज़िंदगी नहीं जी पाते….
इसलिए कहते हैं ना इंसान में कुछ न कुछ कमी होनी चाहिए.. और हमसफ़र वही बनता है जो आपकी कमी को पूरा कर दे..”
“तो क्या उन दोनों में कोई कमी नहीं है ?”
“हो सकता है ना हो..
ज़रूरी नहीं है कि दो परफेक्ट लोग ही परफेक्ट लाइफ बना पाए.. कई बार दो इम्पर्फेक्ट लोग भी मिल कर एक परफेक्ट लाइफ जी सकते हैं !”
“हमें तो ये बड़ी बड़ी बातें समझ में नहीं आती, हमने बचपन से अपनी मां को जिंदगी की जद्दोजहद में जूझते देखा है! बाबा उनके साथ कभी थे ही नहीं, वो तो बहुत पहले ही उन्हें छोड़कर पैसे कमाने निकल गए थे ! उनके पैसे जरुर वक्त पर आ जाते थे,वो नहीं आ पाते थे..
लेकिन मां ने कभी उनसे कोई शिकायत नहीं की! बरसात के दिनों में अक्सर बिजली चली जाती थी और उस वक्त मां हमें अकेले लिए घर पर एक मोमबत्ती जलाएं बैठी रहती थी! कोई आस नहीं कोई सहारा नहीं!
हमें समझ में नहीं आता कि हमारी मां और बाबूजी ने आपस में कैसे निभा ली..
बाबूजी भी वहां पैसे कमाने गए थे, तो जूझ कर हमारे लिए सिर्फ काम रहे थे, उनकी जिंदगी वहां कितनी कठिन थी, यह तो हमें उनके चले जाने के बाद मालूम चला!
वह भी अकेले वहां खुश नहीं थे! यहां अम्मा के पास कम से कम हम तो थे…
लेकिन बाबूजी के पास सिर्फ एक आस थी, हमारी शादी में आने की। आपको पता है, उन्होंने हमारी शादी के लिए जेवर तक जोड़ रखे थे, लेकिन बदकिस्मती ऐसी थी कि वह हमारी शादी पर आ ही नही पाए।
अपनी रौ में बहती भावना अपने मन की उथल-पुथल राजेंद्र के सामने कहती चली गई।
राजेंद्र एक तक बैठा, उसे देख रहा था। अचानक राजेंद्र ने भावना से एक सवाल पूछ लिया..
“भावना अगर तुम्हारे पिता तुम्हारी शादी में शामिल होते तो क्या तुम खुश होती ?”
“हम क्यों नहीं खुश होते, यह तो बहुत खुशी की बात होती कि वह हमारी शादी में शामिल हो पाए ।”
“तुम्हारी और मेरी शादी की बात कर रहा हूं। जिन परिस्थितियों में वह हुई, उसमें कैसे तुम्हारे पिता की उपस्थिति तुम्हें खुश कर देती..?”
भावना अचानक सोच में पड़ गई। क्योंकि इस वक्त उसके पास राजेंद्र के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। और वह शायद वाकई इस बात को सोचने लगी थी कि क्या वह सच में अपने पिता की उपस्थिति से खुश हो पाती?
उसने राजेंद्र की तरफ देखा, और वापस जमीन की तरफ देखते हुए कहने लगी..
“हो सकता है हमारे बाबूजी होते तो चंद्रभान की इतनी हिम्मत ही नहीं होती कि वह हमें इस तरह खींचकर अपनी मर्जी के मुताबिक किसी से भी ब्याह दे..।”
“सच कह रही हो, आखिर एक पंडित की बेटी का ब्याह उस पंडित के सामने किसी गैर जात के लड़के से करवा देना, शायद उस वक्त चंद्रभान के लिए भी इतना आसान नहीं होता।”
राजेंद्र की कही बात सुनकर भावना चौंक कर राजेंद्र को देखने लगी। और तब उसे अपनी कहीं बात का भान हुआ कि उसने जल्दबाजी में कितना कुछ गलत कह दिया..
“डॉक्टर साहब हम हड़बड़ी में कुछ गलत कह गए। हमारा कहने का मतलब यह नहीं था, प्लीज हमें माफ कर दीजिए।”
“तुम्हारा कहने का जो भी मतलब हो भावना, लेकिन इतना तो मैं भी समझता हूं कि मुझसे शादी करके तुम खुश नहीं हो। यह घर तुम्हें काटने को दौड़ता है ।
और अब भी तुम्हें अपनी अम्मा के घर की बहुत याद आती है। अगर तुम्हारी सुरक्षा का सवाल नहीं होता तो मैं तुम्हें कभी यहां वापस लेकर नहीं आता। लेकिन उस गांव में तुम्हारा अकेले रहना कहीं से भी तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है।”
” डॉक्टर साहब आप इतना सोचते हैं हमारे बारे में। इतना तो आज तक हमारे किसी करीबी रिश्तेदार ने भी नहीं सोचा। मां के जाने के बाद चाचा के अलावा और कोई आया ही नहीं, जो आए सब अपनी जिम्मेदारियां गिना कर चलते बने।
कि कहीं हम उन पर बोझ न बन जाए।
हम भी समझते हैं इस बात को, कि एक अकेली लड़की की जिम्मेदारी उठाना बहुत बड़ी बात है।
और आप बिना किसी रिश्ते के हमारी वह जिम्मेदारी उठा रहे हैं।
जो काम सगे रिश्तेदार नहीं कर सके, वह काम किया है आपने। हमारी सुरक्षा, हमारी जिम्मेदारी सब कुछ आपने अपने कंधों पर ले ली। वह भी बिना किसी स्वार्थ के, जबकि हमारे बीच तो कोई रिश्ता भी नहीं है।”
राजेंद्र भावना को ही देख रहा था..
“ऐसे कैसे कह दिया कि रिश्ता नहीं है। पत्नी हो तुम मेरी।
और मेरी तरफ से जब तक तुम मुझे तलाक देकर किसी और से शादी नहीं कर लेती, तब तक तुम्हारी जिम्मेदारी मेरी ही है। और आइंदा कभी यह मत कहना कि मैं बिना किसी रिश्तेदारी के तुम्हारी जिम्मेदारी उठा रहा हूं। और यह तुम पर एहसान है।
तुम्हारे और मेरे बीच कोई एहसान वाला रिश्ता नहीं है। भावना, मैं मानता हूं जिन परिस्थितियों में हमारी शादी हुई, उस वक्त मैं भी नाराज था और तुम भी नाराज थी।
हम दोनों अपनी किस्मत से लड़ रहे थे, क्योंकि हम चंद्रभान से नहीं लड़ पाए।
चंद्रभान ने हमारी इच्छा के विरुद्ध जाकर हमारी शादी करवाई थी। लेकिन आज जब तुम्हें अपनी बीवी के तौर पर देखता हूं, तो मुझे किसी तरह का कोई अफसोस नहीं होता।
हां मैं जानता हूं मैं इतना अच्छा इंसान नहीं हूं। शायद इसीलिए तुम आज तक मुझे अपने पति की जगह नहीं दे पाई। और मैं तुम पर किसी तरह का कोई दबाव भी नहीं बनाना चाहता, जिस दिन खुले दिल से स्वीकार कर सको, मुड़कर बस एक आवाज लगा देना।
मैं यही खड़ा हमेशा तुम्हारा इंतजार करूंगा।
लेकिन एक बात याद रखो, यह घर जितना मेरा है उतना ही तुम्हारा भी है। आइंदा कभी इस घर को या मेरे किसी भी काम को एहसान में मत गिनवाना.. ।”
भावना की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे थे..
राजेंद्र ने उसे देखा और धीरे से उसके थोड़ा नजदीक सरक गया..
“मैंने कोई ऐसी बात तो नहीं कहीं ना, जिसमें तुम्हें रोना आ गया?”
“डॉक्टर साहब ये आंसू बहुत दगाबाज होते हैं, रहते तो हमारी आंखों में हैं, लेकिन बहते हमारे करीबियों के हिसाब से हैं।
अपनों के गम में भी बहने लगते हैं, और अपनों की खुशी में भी आंखें छलक आती है।
हमने कभी नहीं सोचा था कि आप जैसा इंसान हमारी जिंदगी में आएगा। हममें तो ऐसी कोई खूबी नहीं।
कभी-कभी यही सोचने लगते हैं कि भगवान ने जाने किस कलम से हमारी किस्मत लिखी है।
जब जब ऐसा लगा है कि हमारी जिंदगी के रास्ते बंद होने लगे हैं, उस वक्त आप कहीं ना कहीं से आकर हमारा हाथ पकड़ कर हमें हमारी जिंदगी के रास्ते पर आगे ले चलते हैं।
कभी-कभी लगता है, जैसे भगवान ने आपको सिर्फ हमें रास्ता दिखाने के लिए ही भेजा है।”
“यह भी तो हो सकता है कि भगवान ने हम दोनों को एक दूसरे का हाथ पकड़ कर जिंदगी के रास्ते पर आगे बढ़ने भेजा हो।
भावना तुम ऋषि और रिचा के बारे में पूछ रही थी कि वह दोनों तलाक क्यों ले रहे हैं? साल भर बाद जब हमारे तलाक की केस फाइल होगी, तब हमसे भी तो लोग यही पूछेंगे कि हमने तलाक क्यों लिया? तब क्या जवाब देंगे हम लोगों को?”
भावना अपलक राजेंद्र को देख रही थी। इसके पहले उसने कभी राजेंद्र को इतने ध्यान से नहीं देखा था। कितनी शांति थी उसके चेहरे पर, कितना सुकून था, ऐसा लग रहा था दिन भर की थकान इस चेहरे को देखकर उतर जाएगी।
भावना हल्के से मुस्कुरा उठी..
” आप हमसे तलाक लेना चाहते हैं?”
भावना के सवाल पर राजेंद्र जरा आगे को झुक कर बैठ गया, और उसी के अंदाज में उससे सवाल पूछने लगा..
“क्या आप हमसे तलाक लेना चाहती हैं?”
कुछ देर तक राजेंद्र को देखने के बाद भावना ने धीरे से ना में गर्दन हिला दी
” नहीं हम नहीं लेना चाहते।”
राजेंद्र के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आई। वह धीरे से सरक कर जमीन पर बिछे बिस्तर में एक किनारे तकिया लगाकर उस पर अपनी दोनों बाँहों को मोड करके तकिया जैसा बना कर अपना सिर रखकर बड़े सुकून से लेट गया.. मुस्कुराते हुए वह छत की तरफ देखने लगा..
” मैं भी तुमसे तलाक नहीं लेना चाहता।
मैं जानता हूं जिन मुश्किल परिस्थितियों में हमारा रिश्ता जुड़ा था, उसमें तुरंत एक दूसरे को पति-पत्नी मान लेना हम दोनों के लिए कठिन था। और अब भी शायद वक्त लगेगा।
लेकिन भावना हम अच्छे दोस्त बन सकते हैं, ना!”
उसने मुस्कुरा कर पलट कर भावना की तरफ देखा और भावना ने धीरे से हामी भर दी।
बिस्तर के दूसरी तरफ वह भी अपने तकिए पर अपना बाजू रख कर धीरे से लेट गई। राजेंद्र एक बार फिर सीधा लेटे छत की तरफ देख रहा था और करवट लेकर लेटी हुई भावना राजेंद्र को देख रही थी।
” डॉक्टर साहब कल थोड़ा सामान लेने जाना है। हमें हमारी रसोई के लिए कुछ सामान खरीदना है !”
” सिर्फ आपकी रसोई नहीं, आपके इस कमरे के लिए भी हमें सामान खरीदना है। इनफैक्ट मुझे तो ढेर सारा फर्नीचर खरीदना है। कल सुबह-सुबह लिस्ट बना लेना। शाम को जैसे ही हॉस्पिटल से आऊंगा, हम मार्केट चले जाएंगे।
फर्नीचर लेना है, अलमारियां लेनी है, किचन का सामान लेना है, कुछ गमले पौधे भी लेने हैं ,और मैं चाहता हूं…
राजेंद्र बोल पाता उसके पहले ही भावना बोल पड़ी
” एक झूला लेना है।”
यह वाक्य उन दोनों ने एक साथ बोला था। दोनों एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा उठे। राजेंद्र ने ही पूछा “बालकनी में रखने के लिए ना?”
और भावना ने धीरे से हां में गर्दन हिला दी।
खिड़की से दिखता चांद भी इस नई नवेली जोड़ी की हंसती खिलखिलाती रातों का गवाह बन रहा था…
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डॉक्टर से अखंड और यज्ञ ने पूरी जानकारी ले ली थी। उनकी मां की हालत में अब पहले से सुधार हो चुका था, लेकिन डॉक्टर के बताए मुताबिक वो लोग आगे की चिकित्सा करवा लेना चाहते थे…
आगे की चिकित्सा के लिए यज्ञ की मां को अस्पताल में भर्ती कर लिया गया था। उन्हें कमरे में शिफ्ट कर दिया गया था। अखंड वहां रुकना चाहता था। रुकना यज्ञ भी चाहता था, लेकिन अखंड ने उसे वापस घर लौटने के लिए मना लिया..
अखंड के बाबूजी भी अस्पताल में बहुत देर से बैठे-बैठे थक चुके थे। इसलिए दोनों भाइयों ने उन्हें भी किसी तरह से घर लौटने के लिए मना लिया था। अस्पताल में अखंड को छोड़कर यज्ञ कुसुम और अपने बाबूजी को साथ लिए घर चला आया।
यज्ञ के चेहरे की उदासी कुसुम महसूस कर पा रही थी। हमेशा का हंसने बोलने चहचहाने वाला लड़का कैसे एकदम से चुप हो गया था।
उसकी मां की बीमारी ने उसे अंदर तक दहला दिया था। बार-बार रह रहकर यज्ञ को डॉक्टर की कही बात याद आ रही थी कि अगर आज समय पर उसकी मां को अस्पताल नहीं लाया जाता तो उनका बचना मुश्किल था।
उस एक बात ने हीं यज्ञ को बुरी तरह से तोड़ दिया था। घर पहुंच कर वह सीधे नहाने चला गया। नहा कर निकलते ही वह घर के मंदिर में भगवान की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया। बहुत देर तक आंखें बंद किए होठों ही होठों में जाने क्या बुदबुदाता रहा। धीरे से यज्ञ की दादी ने उसे आवाज लगा दी..
“आजा बेटा, अब मत घबरा। तेरी मां अब खतरे से बाहर है। और वैसे भी जिसके माथे पर उमर लिखी होती है ना उसे मौत छूकर गुजर जाती है, लेकिन उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती समझा..।”
यज्ञ आकर अपनी दादी के पास बैठ गया। उसकी दादी धीरे-धीरे उसके बालों को सहलाती रही। कुसुम उसका खाना परोस कर ले आई..
“अभी कुछ खाने का मन नहीं है ले जाओ।”
“ऐसे क्यों कर रहे हैं? आप नहीं खाएंगे तो अम्मा जी ठीक हो जाएंगी क्या?
वैसे भी डॉक्टर साहब ने कहा ना कि अब वह खतरे से बाहर है। जो चिकित्सा बची हुई है वह कल हो भी जाएगी और उसके बाद पूरी तरह से ठीक होकर अम्मा जी घर आ जाएंगी।
ऐसे में खाना पीना छोड़ देंगे तो आप उनकी तीमारदारी कैसे कर पाएंगे..?
क्या सारी जिम्मेदारी अकेले अखंड भैया की है? वह रात में भी रुके हैं, फिर सुबह से भी वहां सब कुछ देखें। सब कुछ बस उन्हीं के ऊपर छोड़ दीजिए। आप खाना पीना छोड़कर आराम से घर पर पड़े रहिए, ऐसे में ही तो कर पाएंगे ना आप अम्मा जी की सेवा..?”
कुसुम का ताना सुनकर यज्ञ उसे देखने लगा। और यज्ञ ने जैसे ही कुसुम को घूर कर देखा, कुसुम धीरे से मुस्कुरा उठी। उसने एक हाथ से अपने कान को छू लिया।
“माफ कीजिएगा लेकिन ऐसी बातें कहने का कारण सिर्फ यह था कि आप कुछ खा ले।
आप खुद ही सोच कर देखिए, रात भर अखंड भैया वहां रहेंगे। ठीक से सो भी नहीं पाएंगे। ऐसे में सुबह उनका घर लौट कर आराम करना बहुत जरूरी है। और वह घर लौटकर तभी आराम कर पाएंगे जब सुबह-सुबह आप वहां पहुंच जाएंगे।
आपके सुबह वहां पहुंचने के लिए अभी खा पी कर आपका सो जाना जरूरी है। हमने कुछ गलत बोला क्या दादी अम्मा बताइए?”
“बहुरिया तुम तो हमेशा सच कहती हो, हां कभी-कभी कुछ ज्यादा सच कह जाती हो, इसलिए कड़वा हो जाता है। पर कहती सच ही हो..।”
कुसुम ने दादी की बात सुनकर यज्ञ की तरफ वापस देखा और उसके सामने थाली रख दी। यज्ञ चुपचाप खाना खाने लगा..
” तुम भी तो कुछ खा लो, तुमने भी सुबह से कुछ नहीं खाया है।”
यज्ञ के ऐसा कहने पर कुसुम ने हामी भरी और रसोई की तरफ मुड़ गई लेकिन जाते-जाते अचानक वह रुक गई। और वापस लौट आई।
” आप खा लीजिए पहले, हम खा लेंगे।”
यज्ञ ने उसकी तरफ देखा और वापस खाने लगा। दो रोटियां उसने परोसी थी।
यज्ञ ने जैसे तैसे बस उन रोटियों को खत्म किया था। सब्जियां वह नहीं खा पाया था।
कुसुम उस थाली को लेकर रसोई में चली गई। अपने लिए दो रोटियां उसी थाली में परोस कर वह बाहर आई और टेबल पर खाने बैठ गई।
घर के सभी बड़े खाना खा चुके थे। उसके ससुर जी दिन भर से थके थे, वह सोने चले गए थे।
काकी सास भी अपने कमरे में आराम कर रही थी।
यज्ञ दादी के पास बैठा था। वीर का अब तक कोई अता-पता नहीं था।
रसोई समेट कर कुसुम अपनी थाली लेकर बैठी थी। आज पहली बार वह अपने पति की थाली में खा रही थी।
पहला निवाला खाते ही उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान चली आई..
खाना भी कितनी सफाई से खाते हैं छोटे ठाकुर!
अगर सामने वाले को पता ना हो तो उसे लगेगा कि थाली धुली पूछी रखी है।
सोच कर कुसुम के चेहरे पर हल्की सी हंसी चली आई। वह धीरे-धीरे खाना खाते हुए सामने दादी के पास बैठे अपने निराले से पति को देखती रही…
बाहर कहीं गेट पर बैठे गार्ड के रेडियो पर चलती धुन धीमे से अंदर तक चली आयी..
सलोना सा सजन है, और मैं हूँ
जिया में इक अगन है, और मैं हूँ
तुम्हारे रूप की छाया में साजन
बड़ी ठण्डी जलन है, और मैं हूँ…
क्रमशः
aparna..

Bahut hi Khubsurat and Shandaar n Bahtareen part.
बहुत ही सुंदर भाग हमेशा की ही तरह।👌👌
बहुत खूबसूरत भाग 👌🏻👌🏻👌🏻
Very nice
Nice part
Bahut pyara bhag tha. Ek taraf to Amma ki tabiyat kharab Hui kusum samay pay hospital le aayi unki jaan Bach gayi.kusum ko uska inaam bhi mil gaya , pahli baar yagya ne use seene se lagayaa. Ab khush ho kar uski chhuwan mahsus kare ya kya kare use kuch samajh nahi aa raha hoga. Kusum ko yagya ke kareeb aane ka mauka mil raha hai .
Please upload next part
excellent
Excellent part👌👌👌👌
Bahut khoob