
अनकही….
पिया बसंती रे ….
तेज़ कदमों से जल्दी जल्दी स्कूल की ओर भागती गौरी और अनिता के कदम स्कूल के बड़े घंटे को सुन और तेज़ हो जाया करते।
दोनो अहल्याबाई शासकीय कन्या विद्यालय में बारहवीं कक्षा की विद्यार्थी थी,दोनो ने होम साइंस लिया था।
उनके गांव में स्कूल ना होने से पास के गांव दोनों पैदल पैदल ही जाया करती थी।।अब कुछ समय से डिपो की बस चलने से कुछ राहत मिल गयी थी…
उनके और आस पास के गांव के लड़कों लड़कियों के लिए राहत थी परिवहन की खटारी बस।
इधर कुछ दिनों से एक लड़का अक्सर आकर उसके पीछे की ही सीट पर बैठने लगा था। इस बात पर भी उसका खुद का ध्यान कहाँ गया था, वो तो अनिता ही थी जिसके पास एक छठी इंद्री थी जो आसपास के किस लड़के के दिमाग में क्या चल रहा है का ज्ञान उसे दे जाया करती थी।
” वो रजुआ है ना चिल्पी के पान ठेले वाला?”
” हाँ क्या हुआ उसे ?”
” सिलाई इस्कूल वाली सरिता है ना उसको चिट्ठी फेंक के मारा रहा।”
” हाय सच्ची!”
” हाँ तो और क्या! सरिता के भैया ने क्या चप्पल से आरती उतारी थी जो रजुआ की ! क्या बताएं?”
दोनो सखियां ऐसी ही रसभरी बातों में अपने गांव से स्कूल की दूरी तय कर जाया करतीं…..
सत्रह अट्ठारह की उम्र वैसे भी वो उम्र है जिसमें सारा संसार सुंदर दिखने लगता है , हर मौसम बसंत हो जाता है और हर लड़की टेसू का फूल बन खिल उठती है, हर लड़का भँवरा बन मंडराने लगता है…
” ये कौन है जो रोज़ तेरे पीछे आ बैठता है?
” हमें क्या पता?
” हम्म! हमें इसकी नीयत सहीं नही लगती, पहले हुँआ सामने बैठ जाता था वहाँ से तुम्हें घूरे रहता था, अब देखो हिम्मत कैसी बढ़ गयी है, सिद्धा पीछे ही आ बैठा। लफ़ंडर कहीं का!”
गौरी अनिता की बात सुन सिहर उठी, उसका भी कुछ कुछ ध्यान तो गया था लेकिन उसने जानबूझ कर इस तरफ ध्यान देना उचित नही समझा था….
उसे रह रह के अम्मा का गरियाना याद आ जाता…
” बिटियन के बिहाव करने की जगह उनका इस्कूल भेज रहें हैं ! कहाँ की कलक्टरनी बनवाएंगे इसे हैं? हमको तो आपका मूढ़ मति समझे में नही आता, पिछली बार दिद्दा कितना नीक रिस्ता लायी रही, बड़ी मनिहार की दुकान थी लड़के के बाप का लेकिन एक ये हैं कान मा जूँ नही रेंगी। अब उ कामता परसाद के यहाँ तो जाइये बात उत कर आइये नही ये रिसता भी हाथ से फिसल जाएगा। इक्के एक लड़का है उनका, सहर जाता है पढ़ने, देखने सुनने में बहुतै सुंदर है लछिमी कह रही थी।”
आंखों में चश्मा चढ़ाये उसके बापू बहुत बार अम्मा की चीं चीं सुन के अनसुना कर जाते और बिना मतलब ही बही खाता का किया कराया हिसाब किताब जांचते बैठे रहते।
बड़ी मुश्किल से जिद करके उसे पढ़ने जाने मिला था , वो भी बारहवीं के बाद उसका बिहाव हो ही जाना था…
वो रोज़ ही स्कूल आना जाना करती लेकिन अब उसका ध्यान उस लफ़ंडर पर भी जाने लगा था। उसने खुद ने कई बार उसे अपनी तरफ ताकते पाया था लेकिन जब भी वो उसे देखती वो बस से बाहर देखने लगता ।
उसकी नज़रों से बचने ही गौरी बस की खिड़की वाली सीट पर बैठने लगी, लेकिन अब तो तिर्यक कोण बना कर वो उसे और भी आसानी से देख पा रहा था।
” बहुतै गाली गलौच करता है उ।”
” उ कौन अन्नी?”
” अरे वही लंगूर जो तुम्हें ताकता रहता है, जबान बहुतै गंदी है , लबार है लबार । उस दिन संझा में हम अम्मा के साथ मंदिर गए थे वहीं बाहर जब हम मंदिर से निकले चप्पल पहन रहे थे तब वहीं बच्चों से काहे भीख मंगवा रहे कर के एक आदमी को लात ही लात मारता रहा खबीस ! “
” हाय राम ! ये हाथ पैर भी चलाता है?”
” हाँ तो और क्या! हाथ पैर के साथ जबान भी चला रहा था, अब बेचारे गरीब बच्चे भीख ना मांगे तो क्या खाएं भला।”
” छि कित्ता गंदा आदमी है?”
” और बताएं हमें तो लगता है कट्टा अट्टा लेके घूमता है साथ में । और हम तो इसे धुआँ उड़ाते भी देखे हैं।
अब इस बात पर गौरी क्या कहती वो खुद लाल बाजार में अपनी माँ के साथ चूड़ी खरीदते समय उसे सिगरेट फूंकते देख चुकी थी। ये और बात थी कि उस पर नज़र पड़ते ही उसने अपने हाथ की सिगरेट फेंक कर हाथों से ही मुहँ के सामने छाया धुंआ हटाने की नाकाम सी कोशिश भी की थी।
एक लड़के से ख़ौफ़ खाने लायक सारी ज़रूरी बातें अनिता ने गौरी के मन में भर दीं।
एक दिन तो गौरी के खुद के सामने वो किसी से भिड़ा हुआ था , हिकारत से उसे देख गौरी अन्नी के साथ आगे बढ़ गयी….
पता नही पीठ में इतना लंबा सा कैसा अजीब बस्ता टांगे रहता, बाद में कुछ उसके दोस्तो से चलती उसकी बात और कुछ कंडक्टर की बात सुन गौरी को समझ आया कि उनके स्कूल के आगे जो तहसील पड़ती है वहीं पॉलिटेक्निक कॉलेज से पढ़ाई कर रहा था वो…
“और आसुतोस कब तक पूरा हो जाएगा तुम्हारा पॉलीटेक्निक?” कंडक्टर के सवाल पर उसने जवाब दिया था और पहली बार उस लफंगे की इतनी मोटी गहरी सी आवाज़ उसने सुनी थी…
” बस चच्चा ! अगले साल जुलाई में दूसरा साल का रिज़ल्ट आ जायेगा और हम शहर निकल जाएंगे इंजीनियरिंग करने, और चच्चा गाना वाना भी तो बजाओ गाड़ी में।”
” अभी लगाए देतें हैं बिटवा।”
और कंडक्टर ने सदियों से बसों में चलने वाले बम्पर गानों की जुगाली करनी शुरू कर दी…
तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे
सुबह पहली गाड़ी से घर को लौट जाओगे…
” अरे छि ये का बजा दिए?”
” रुको दूसरा लगाए देते हैं…
परदेसी परदेसी जाना नही मुझे छोड़ के…
” अरे यार चच्चा फ्यूज बल्ब हो तुम, हटो ज़रा हम ये नया कसैट लाये हैं शहर से”
और उस लफ़ंडर ने आगे बढ़ कर अपना कसैट लगा दिया…..
पिया बसंती रे काहे सताए आ जा …
पिया बसंती रे काहे सताए आ जा….
गौरी अपनी जगह पर ही और भी ज्यादा सिमट गई लेकिन उस दिन के बाद से उस लोफर की निडरता कुछ और बढ़ गयी…
अब आये दिन स्कूल से लौटते वक्त की बस में वो यही गाना चलवाये रहता, उसके साथ के लड़के बिना बात हँसते और वो मुस्कुराए रहता।
एक दिन तो हद ही हो गयी, उसी के कॉलेज का लड़का था … बस में दरवाज़े के पास ही बैठा था। अपना स्टॉप आने पर गौरी अन्नी के साथ उतर रही थी कि उसने दरवाजे के ठीक सामने अपना पैर अड़ा दिया…
” पाय लागू भौजी! औ का हाल है?”
घबरा कर गौरी जब तक में उसका चेहरा देख पाती आशुतोष के हाथ का एक ज़ोरदार तमाचा उस बदतमीज के चेहरे का भूगोल बिगाड़ गया। हड़बड़ा कर उसके पैर हटाते में ही एक छलांग लगा कर गौरी और अन्नी वहाँ से भाग खड़ी हुईं….
इसके बाद चार दिन तक बुखार से तपती गौरी स्कूल नही जा पायी। पांचवे दिन ताप के साथ साथ डर भी कुछ हद तक उतर गया…
उस दिन अन्नी अपनी मौसी के घर सत्ती माता के रोट बांधने चली गयी थी इसी से स्कूल नही जा पायी थी। एस यू पी डब्ल्यू का काम था जिसके कारण गौरी को अकेले ही स्कूल जाना पड़ा।
और दिनों की तरह आज उसने बस्ता नही लिया था, बल्कि अपने कढ़ाई के नमूनों के रुमाल और सूई धागा सब एक कपड़े के थैले में डाले ही निकल गयी थी।
स्कूल में टीचर दीदी को उसके नमूने बड़े पसन्द आये थे। किसी रुमाल में कमल काढ़े थे तो किसी में कुंदा की बेल। एक रुमाल जो उसने सबसे मेहनत से काढ़ा था उसमें लाल गहरे रंग से गुलाब की कलि और फूल चेन स्टिच और गांठ स्टिच लगा लगा कर काढ़ा था । और उसी रुमाल को कक्षा में सभी को दिखा कर उसकी खूब पीठ ठोंकी थी दीदी ने। बाकी सभी ने भी तालियों से उसका खूब उत्साह बढ़ाया था।
शाम को इसी उत्साह में मगन वो स्टॉप पर बस का इंतेज़ार करती खड़ी थी कि बस आ गयी…
आज बस और दिनों से कुछ खाली ही लग रही थी…
कंडक्टर चाचा भी नही थे, लड़कियों के नाम पर अकेली वही बैठी थी।
परकास ( प्रकाश) आज अपनी पूरी टोली के साथ मौजूद था। उस दिन आसुतोस के हाथ का रेपटा खाने के बाद से आज बस में नज़र आया था और आज ही उसके साथ अन्नी भी नही थी।
उसने एक नज़र अपने आस पास दौड़ाई और फिर घबरा गई…
” हे भगवान आज तो वो भी नही है।”
मन ही मन राम जी हनुमान जी से लेकर जिन जिन देवी देवताओं की उसके घर तस्वीरें लगी थीं सभी का उसने जाप कर लिया। आज तो उसका बचना मुश्किल लग रहा था। हालांकि डिराईभर भैया तो थे लेकिन एक अकेले वो इन छै सात लड़को से कैसे निपटेंगे भला।
सोच सोच के उसका गला सूखा जा रहा था कि मैनी बाजार आ गया….दो चार इधर उधर की जो सवारियां थीं वो भी उतर गयीं।
अब इस पूरी बस में बस वो परकास और परकास के छै लौंडे इत्ते ही जन बचे थे।
उसकी जान निकल कर मुहँ तक आ गयी थी….
उसके घर अखबार नही आता था तो क्या हुआ , अकेली लड़की के साथ इत्ते सारे लड़के क्या कर सकतें हैं वो अच्छे से जानती थी।
कहीं बस डिराईभर भैया भी इन्हीं का साथ दे गए तो?
उसका डर अपने चरम पर पहुंच चुका था।
परकास और उसके दोस्त पहले तो सबसे पीछे बैठे थे फिर धीरे-धीरे उठकर इधर उधर कहीं भी बैठने लगे कोई कुछ गा रहा था कोई हंस रहा था कोई पान चबा रहा था तो कोई गुटका…
डर के मारे मन ही मन दुर्गा चालीसा का पाठ करती गौरी खिड़की से बाहर देखती जा रही थी। बस के अंदर देखने की उसकी हिम्मत ही ना थी । बाहर देखते हुए भी उसे साफ पता चल रहा था कि वह सारे के सारे लड़के उसे ही घूर रहे थे….
अपने झीने से दुपट्टे से उसने खुद को लपेट रखा था और उसका छोर ऐसे कस कर पकड़ा था जैसे उसकी सारी इज्जत इसी दुपट्टे में रह गयी थी।
हे काली माता रक्षा करो! ये अन्नी की बच्ची को भी आज ही मरना था!
वो क्यों अकेले स्कूल आ गयी। कहीं अम्मा का डर की अकेली लड़कियां स्कूल जाकर खराब हो जातीं हैं सच ना हो जाये।
अगर आज उसके साथ कुछ ऊंच नीच हो गयी तो क्या करेगी वो? गांव के पहले नाला पड़ता है ना बस वहीं कूद कर जान दे देगी!
पर हाय री खराब किस्मत! एक तो उस नाले में ज्यादा पानी होता नही दूसरा गांव की तमसा नदी में बचपन से तैरती आयी है तो पानी में हाथ पैर खुद ब खुद चलने लगेंगे।
देबी मैय्या किरपा करो, अब आगे से कभी अकेली घर से न निकलूंगी और अम्मा जहाँ कह रहीं वहीं ब्याह कर लुंगी।
मन ही मन मन्नत मानी ही थी कि चर्र की आवाज़ के साथ बस रुकी और वो आंखें फाड़े बस के दरवाज़े की ओर देखने लगी…
दरवाज़ा खुला और आशुतोष बस में चढ़ आया।
जीवन में गौरी को लगा पहली बार उसने इतनी बड़ी सुकून की सांस ली , वो उसे देख मुस्कुरा उठी, उसने गौरी को देखा और फिर प्रकाश और गैंग को और एक पल में उसे सारा माजरा समझ आ गया।
वो आगे बढ़ा ही था कि अपने बाजू में रखी थैली को गोद मे रख गौरी ने उसके अपने पास बैठने के लिए जगह बना दी।
उस जगह को देख कर भी वो बाजू वाली खाली सीट पर बैठ प्रकाश और उसके दोस्तों को एक नज़र देखने के बाद सामने हो कर बैठ गया…
” का हो दद्दा आज कंडक्टर चच्चा नही आये?”
” हाँ बिटिया भई है उसकी तो आज और कल दू दिन नही आ पायेगा।”
” आज कोई गाना नही बजाओगे दद्दा?” अबकी बार प्रकाश की खी खीं सुनाई दी। हंसते हुए उसने ड्राइवर को गाने के लिए कहा ही था कि आशुतोष ने मुड़ कर उसे घूर कर देखा और उस दिन का करारा झापड़ याद आते ही प्रकाश अपना गाल सहलाते चुप बैठ गया…
” रहने दो रहने दो। हमको वैसे भी बस अताउल्ला खाँ सुनना ही पसन्द है , वो तुम बजाओगे नही।”
आशुतोष के आकर बैठते ही गौरी की सामान्य श्वांस प्रश्वांस की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी…
अब तक जो यात्रा जीवन की कठिनतम यात्रा लग रही थी अब वही सुकून भरी प्यारी सी यात्रा लगने लगी थी।
कुछ देर में ही चौपाल पर बस रुकी और प्रकाश और उसकी मंडली वहीं उतर गई।
बस में अब गौरी और आशुतोष ही थे।
आशुतोष ने ड्राइवर से कह कर एक बार फिर वही गाना बजवा दिया ……
पिया बसंती रे काहे सताए आ जा….
गाने के बोल सुनते ही शरमा कर गौरी खिड़की से बाहर देखने लगी…
” ये सब तुमही बनाई हो”
चौन्क कर गौरी ने देखा आशुतोष के हाथ मे उसका काढ़ा रुमाल था…
” हाँ ” छोटा सा हाँ बोलने में ही उसका दिल उछल कर मुहँ तक आ गया था
” ये सब कहाँ सीखा ?”
” स्कूल में !”
” गौरी है ना तुम्हारा नाम ? हमारा नाम आशुतोष है..
” हम जानते हैं।”
” और का जानती हो हमारे बारे में?”
“यही कि तहसील के सरकारी कॉलेज से पॉलिटेक्निक कर रहें हैं आप। “
” और ?”
” और बस !
“नौ महीने बाद हमारा पढ़ाई यहाँ से पूरा हो जाएगा फिर हम शहर के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज चले जायेंगे पढ़ने।”
” अच्छा !”
” और एक बात बताएं?”
” बताइये?
” हमारे बापू का नाम कामता प्रसाद है! “
बस खचाक से डिपो में रुकी और उसके साथ ही गौरी का धड़कता दिल भी जैसे कुछ सेकण्ड्स को रुक गया।
वो हड़बड़ा कर अपना सामान समेटे बस से जल्दी जल्दी उतर कर घर की तरफ भाग चली की तभी पीछे से आशुतोष की आवाज़ उसके कानों में पड़ी….
“अरे ये एक रुमाल भूल गयीं हो?” गहरे लाल रंग से काढ़ा गुलाब वाला रुमाल आशुतोष के हाथ में था…
” आपके लिए है, रख लीजिये। “
कहती हँसती खिलखिलाती कामता प्रसाद की होने वाली बहु वहाँ से भाग गई….
aparna …..

बहुत सुंदर रचना 👌🏻
अरे ये कहानी तो सुनी हुई थी 23 जनवरी को 5:19 में प्रसारित हुई थी, बहुत ही बेहतरीन लगा था सुनकर दी और आज फिर एक सुर में पढ़ा लेकिन रेडियो वाला ही जेहन में रह गया है, बहुत अच्छा दी…💐🙏
कहानियो को अब यही सुन भी सकते हो..
अच्छा वो कैसे दी, इस सम्बन्ध में प्रकाश डालने के लिए चैनल पर एक लेख या प्रोसेस प्रकाशित ज़रूर करें, 🙏
Nice story
Too good👌👌
Hindi
Very beautiful and lovely part