गली बनारस की -46

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की.. -46

      न्यायधीश से अपने केस के सबूतों को जमा करने के लिए वक़्त मांगने के बाद साजन ने एक नज़र सुयश की तरफ देखा और फिर न्यायधीश महोदय से एक गुहार लगा दी…

” महोदय!! जैसा की यहाँ मौजूद हर एक इंसान जानता है कि शहर में चौधरी साहब का बड़ा नाम है, दबदबा है इनका… इनके सामने खड़े होने कि लोग जुर्रत नहीं कर सकते, पर हुज़ूर हमने वो ज़ुर्रत कि है..
और अब हम ये भी अच्छे से जानते हैं कि, हमारे जीवन का कोई भरोसा नहीं है..
हमने जब वकालत पढ़ी थी तभी मन ही मन एक प्रतिज्ञा ले ली थी कि क़भी किसी बेगुनाह को सूली ना चढ़ने देंगे.. बहुत से वकील हमारे जैसी सोच वाले होते हैं सच्चाई और ईमानदारी के पथ पर चलने वाले..
लेकिन बहुत बार ऐसी लड़ाईया उन वकीलों कि जान ले कर ही जाती हैं…
  हुज़ूर हम ये सब बता कर ये नहीं जताना चाह रहे कि हम किसी से डरते हैं या हमारी जान को खतरा है.. हम तो अब अपने माथे पर कफ़न बांध ही चुके हैं | बस इतना चाहते हैं कि इस केस के खत्म होने से पहले अगर हमारी जान चली जाती है, तो इस बात का यही सीधा मतलब निकाल लिया जायें कि चौधरियों ने हमें इस केस से दूर करने क़त्ल कर दिया है! जिससे बिक्रम कि बेगुनाही साबित ना हो सके…
   महोदय अगर कर सकें तो इतनी कृपा कर दीजिये कि केस के बीच में अगर हमें कुछ हो जायें… “

साजन कि बात सुन कर सुयश भड़क गया… और आधे में ही उसकी बात काट गया..

“ये कैसी बकवास कर रहे हैं आप वकील साहब ! अगर आप को किसी और वजह से कुछ हो गया तब भी आप सारा शक हमारे मुवक्किल पर पलट देंगे.. ये तो सरासर गलत है.. “

“आपके चौधरी साहब पर शक डालने हम खुद कि जान तो कतई नहीं लेंगे.. हम तो बस न्यायधीश महोदय को आपकी फितरत से वाकिफ करवा रहे थे..”

  उन दोनों कि बहस के बीच जज ने उन दोनों को ही रोक दिया….

” कोर्ट आपकी परेशानी समझ रही है, अक्सर ऐसे केस में बाहुबलियों कि ऊँची पहुँच के कारण वकीलों को अपनी जान भी गंवानी पड़ जाती है.. इतना सब जानने के बावजूद अगर आपको कुछ हो भी गया तब भी सबूतों के अभाव में कोर्ट चौधरियों पर हाथ तो नहीं डाल पायेगी इसलिए उससे बेहतर ये तरीका है कि कोर्ट आपको पुलिस प्रोटेक्शन दे दे…
   एक सशस्त्र सिपाही आपके साथ हमेशा मौजूद रहेगा ! इसके अलावा आपके रहने के लिए पूरी तरह सुरक्षित और गुप्त आवास कि व्यवस्था आज ही कर दी जाएगी.. जिसका पता आप बाहर किसी को नहीं दे सकते…. आपको केस कि तैयारी के लिए आवश्यक वस्तुएं वहीँ मुहैय्या कराने कि कोशिश कि जाएगी.. और अगर आप वहाँ से बाहर निकलते भी हैं तो पुलिस का एक सिपाही सादे कपड़ो में आपके साथ हमेशा रहेगा..
    न्यायधीश महोदय ने एक नाम और पता  लिख कर पर्ची सामने बढ़ा दी… और वो पर्ची साजन के हाथ तक पहुँच गई…
  साजन ने उसे पढ़ने के बाद झुक कर न्यायधीश महोदय को आभार व्यक्त कर दिया…
   
   न्यायधीश महोदय ने कुछ जरुरी बिंदु अंकित करने के बाद साजन की बात पर गौर किया और केस की अगली तारीख हफ्ते भर बाद की ही दे दी……

  बिक्रम ने कृतग्यता से साजन कि तरफ देख कर हाथ जोड़ दिए और पुलिस वालों के साथ बेड़ियों में जकड़ा वापस अपनी कैद काटने चला गया..
  कोर्ट परिसर से निकलते ही अनुराग ख़ुशी से साजन से लिपट गया…

“क्या बात है साजन बाबू.. आज तो हमारा भी गाने का मन कर रहा है…
   ‘देखा है पहली बार, साजन कि आँखों में प्यार !’ तुम तो भैया वहाँ एकदम ही फायर हुए पड़े थे.. सामने वाले कि बोलती बंद कर दिए.. एकदम चुप ! हमें तो बड़ा मज़ा आया उस सुयश के बच्चे को ऐसे देख कर.. !”

  साजन भी मुस्कुराने लगा… उन दोनों के बाहर निकलते ही कोर्ट के आदेश का पालन करने पुलिस के दो ऑफिसर उन तक चले आये..

“कोर्ट का आदेश मिला है सर.. आप लोगों को हमारी गाड़ी से आपके सुरक्षित आवास पर पहुँचाना है…. आइये !

  साजन और अनुराग उस पुलिस गाड़ी में बैठ आगे  बढ़ गए…
   फ़्लैट से सारा जरुरी सामान लेकर वो दोनों सुरक्षित ठिकाने कि तरफ बढ़ गए..
   निकलते वक़्त एक प्यार भरी नज़र साजन ने धानी के दरवाजे पर डाल ली.. पता नहीं ये केस उसके जीवन में कौन सा बदलाव लाने वाला था… लेकिन जो भी था, अब शायद ही वो लौट कर इस फ्लैट पर वापस आ पायेगा…
   ममता से भरी आँखों से धानी की सूनी बालकनी को देख साजन ने आंखें फेर ली…
गाड़ी आगे बढ़ गई |

बीच में एक जगह पुलिस जीप रुकी और थाने से एक दुबला पतला सा लड़का कांधे पर रायफल टांगे आकर गाड़ी में बैठ गया.. उन्हें उनके नए ठिकाने पर छोड़ कर पुलिस कि गाड़ी निकल गई…..
     ये एक छोटा सा बंगला था जो आसपास ढ़ेर सारे बड़े बंगलो से घिरा हुआ था… गेट पर भी रायफल धारी चौकीदार खड़ा था….
   बगीचे में ऊँचे ऊँचे नारियल और ताड़ के  पेड खड़े थे जिसके कारण अंदर से बाहर और बाहर से अंदर का नजारा नहीं दिखाई देता था..
   साजन अनुराग उस लड़के के साथ अंदर पहुंचे तो देखा वहाँ  पहले से एक बुजुर्ग सा आदमी मौजूद था…

” सलाम साहब हम आपके खानसामा है ज़फर !  पहले भी कई बड़े बड़े घरों में खाना बना चुके हैं.!”

साजन ने मुस्कुराकर उसे नमस्ते कहा.. और साथ आये लड़के कि तरफ मुड़ गया..

” हां भाई आपने क्या नाम बताया अपना..!”

” साहब हमारा नाम अमरनाथ  है हमारे पिता जी एस एच ओ थे…..  ड्यूटी के दौरान शहीद हो गए थे.. उन्हीं कि अनुकम्पा नियुक्ति में हम यहाँ सिपाही के पद पर आये है.. आपकी सुरक्षा कि ज़िम्मेदारी अब हमारी है साहब.. !”

“दिखने में तो बड़े कमजोर से हैं आप अमरनाथ  जी.. बुरा मत मानिएगा लेकिन क्या आप वाकई साजन को प्रोटेक्ट कर पाएंगे..!”

” साहब शरीर में ताकत भले कम हो लेकिन जिगर में हिम्मत होनी चाहिए, जो हमारे पास है… हमारे रहते साहब का बाल भी बांका नहीं हो पाएगा आप निश्चिंत रहें..!”

” निश्चिंत रहने के लिए ही हम खुद भी साजन के साथ ही आ गए हैं.. चलो कोई नहीं!  हम चार लोग एक साथ रहेंगे तो वैसे भी कोई क्या ही बिगाड़ लेगा हमारा..!”

“ज़फर साहब ! हमारे लिए बढ़िया कॉफ़ी बना दीजिये, अब हम जा रहे थोड़ा बिक्रम कि डायरी पढ़ लें….

साजन एक अकेले कमरे में जा बैठा और उसने बिक्रम कि दूसरी डायरी खोल ली….

डायरी !!!

  मैंने नहीं  सोचा था कि वापस कभी मुझे डायरी लिखने का मौका मिल पाएगा ! यहां जेल की चारदीवारी में सारा दिन ढेर सारे काम और अनुशासन के साथ बीत जाता है..
    लेकिन रातें नहीं कटती…
  क्या अजब इत्तेफाक की बात है कि जेलर चाचा से मुलाकात हो गई…. और उन्हें मेरे लिखने के बारे में मालूम था..
     जेलर चाचा इतने बड़े दिलवाले हैं की उन्होंने एक सजायाफ्ता मुजरिम को खुद को चाचा कहने का हक दे दिया.. समझ सकता हूँ पापा से संबंधो के कारण ही शायद ये संभव हुआ और  उन्होंने मेरी पुरानी डायरी के साथ-साथ यह नई डायरी भी मेरे हवाले कर दी कि मैं अपने बचे हुए खाली वक्त में इसे काला कर  सकूँ…
…  पन्नों को काला कर कर के अपने मन की कालिख  को मिटाना चाहता हूं…
   अपने दिल के अंधेरे को दूर कर देना चाहता हूं हमेशा हमेशा के लिए..
   लेकिन यह भी जानता हूं कि अब इस दिल से अंधेरा कभी नहीं जाने वाला… अपनी किस्मत को भी अब अपना खुदा मान लिया है मैंने | मैं जानता हूं अब मेरी जिंदगी यही चारदीवारी, यही जेल की सींखचे है.. मेरे छोटे से कमरे में सबसे ऊपर बना ये छोटा सा रोशनदान जो थोड़ी सी रौशनी देता है वो भी अब उम्मीद कि किरण नहीं जगा पाती…
.. और सच कहूं तो अब यहाँ से बाहर निकलने का मन भी नहीं करता…
   अब यही सन्नाटा मेरा जीवन है.. और शायद यही मेरी मौत !

***

आज दिल बहुत दुखी हो गया.. जेलर चाचा ने फ़ोन पर पापा मम्मी से विडिओ कॉल पर बात करवा दी.. मम्मी तो खैर माँ हैं लेकिन पापा को ऐसे रोते देख नहीं पा रहा था मैं …
   एक जवान लड़के का बाप कितना बेबस हो जाता है जब उसका बेटा बेगुनाह होते हुए भी सजा काट रहा हो.. मुझसे बड़ी सजा तो उन दोनों को मिल रही है,  अपने निर्दोष बेटे पर लगे इतने बड़े लांछन को सहने  की…
पापा को रोते देख कर और टूटा हुआ महसूस कर रहा हूँ खुद को…
  इतना लाचार इतना बेबस मैं क़भी नहीं था.. !

  कितनी सारी कसमें देकर उन्हें यहाँ आने से मैंने रोका है ये मै ही जानता हूँ.. बार बार उन्हें मना करते हुए भी दिल में चाह यही रहा था कि काश माँ कि गोद में सर रख कर एक गहरी सुकून कि नींद सो पाता..
    लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि अगर मम्मी पापा यहां चले आते हैं तो यह चौधरी खानदान उन्हें  जिंदा नहीं छोड़ेगा | मुझ से बदला लेने के लिए यह लोग सबसे पहले उनकी जान से खिलवाड़ करेंगे और अब एक और झटका सहने की मेरी ताकत नहीं बची है..

   मैं तो अब खुद यह चाहता हूं कि किसी तरह जज साहब इस केस की सुनवाई करें और मुझे फांसी की सजा दे दे | रोज रोज मरने से बेहतर मैं एक बार में एक झटके में ऊपर चला जाऊं, वही मेरे लिए सही रहेगा…

कम से कम उपर पहुंचकर पन्ना से आंखें मिलाकर यह तो कह सकूंगा कि देखो मजबूरी में ही सही अगर तुमसे शादी की तो उसे निभाया भी है मैंने….

   आज सोचने बैठता हूं तो कितना अजीब लगता है लेकिन उस वक्त जब मैं और पन्ना साथ थे तब मैंने क़भी नहीं सोचा था कि मै उससे जुडी बातें क़भी याद भी करूँगा…
   मुझे बार बार याद आता है वो पल.. जब अपने रूम का ‘की कार्ड’ लिए हम दोनों अपने कमरे की तरफ बढ़ रहे थे और पन्ना ने जानबूझ कर मेरा हाथ पकड़ रखा था.. मैंने एक दो बार छुड़वाने की नाकाम सी कोशिश भी की थी…

“पन्ना ! यहाँ तो आराम से चलो.. हाथ पकड़ने की क्या ज़रूरत है.. ?”

“आप तो शरमाने में लड़कियों को मात कर रहे हैं इंजीनियर साहब !आप पति है हमारे, हमारा हक बनता है आप पर और आपके बाजुओं पर भी.. !”

“वो सब अपनी जगह है पन्ना लेकिन मुझे सरेआम ये चिपका चिपकी पसंद नहीं.. इसके लिए हमारा बैडरूम है ना.. !”

“आप तो नाराज होने लगे.. !अरे बस हाथ ही तो पकड़ा है.. कौन सा आपको सरे आम चूम रहे हैं हम.. !”

“मै ना टोकूं तो शायद आप वो भी कर जाएँगी.. !”

“ओहो अब तो यूँ लग रहा जैसे आप मना नहीं कर रहे बल्कि ऑफर दे रहे हैं.. !”
और पन्ना ने बिक्रम का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया..

“स्टॉप ईट पन्ना, बिहेव योरसेल्फ!  वो देखो हमारे कमरे के ठीक ऊपर ही सीसीटीवी कैमेरा लगा है,, सब कुछ उस में रिकॉर्ड हो रहा है… तुम्हें सब कुछ मजाक लगता है….

हंसती खिलखिलाती पन्ना बिक्रम से दूर हट गई थी…. और कमरे का दरवाजा खोल कर वो दोनों अंदर चले गए…

“साहब आपकी कॉफ़ी.. !”   ज़फ़र ने आकर साजन का ध्यान भंग कर दिया…

साजन ने चौंक कर उसे देखा और मुस्कुरा दिया…

“शुक्रिया ज़फ़र साहब !आप उम्र में मुझसे काफी बड़े हैं, आप साहब न कहा करें.. !”

“फिर क्या कहें साहब ?”

“आप हमारा नाम ही लीजिये.. हमारा नाम बहुत खूबसूरत है बिलकुल हमारी तरह.. साजन !”

अनुराग भी हँसते हुए अपनी कॉफ़ी लिए वहीँ चला आया… और उसके बैठते ही साजन ने उसके सामने अपने मन की बात रख दी..

“अनुराग ! एक जबरदस्त क्लू मिला है.. !”

“क्या ?”

“बिक्रम और पन्ना जिस होटल में रुके थे, वहाँ उनके कमरे के ठीक बाहर सीसीटीवी कैमेरा फिट था.. अब तक जाने पुलिस का उस बात पर ध्यान क्यों नहीं गया.. लेकिन हमें लगता है पन्ना के मर्डर वाली रात का फुटेज अगर हम लोग निकलवा कर  देख पाए तो केस में काफी सारी क्लियरिटी आ जाएगी.. !”

“ठीक है तो हम कल ही कोशिश करते है की हम दोनों का टिकट हो जायें.. “

“नहीं हमारे जाने के लिए काफी सारी  फॉर्मेलिटीज की जरूरत पड़ेगी और उस सब में 1 हफ्ते का समय निकल जाएगा और हम जल्द कोर्ट के सामने कोई सबूत पेश नहीं कर पाएंगे…
    बिक्रम के माता-पिता इंडिया से बाहर है, उसके पिता से बात करके हमें यह कोशिश करनी होगी कि किसी तरह से वहां से सीसीटीवी की उस दिन और रात की रिकॉर्डिंग निकलवा कर हमें भेज दे..  यह काम उनके लिए हमारी तुलना में कहीं अधिक आसान होगा…
     बाकी एक बात हो सकती है कि होटल वाले अपनी प्राइवेसी पॉलिसी के कारण सीसीटीवी की फुटेज हमें देने से इंकार कर सकते हैं तो उसके लिए हम आज के आज पुलिस में आवेदन लगाकर उनका सहमति पत्र मंगवा लेते हैं और तुरंत ही यह सारे  जरूरी कागजात बिक्रम के पिता को मेल कर देते हैं…”

” तो चलो फिर काम में लगा जाए..! हमारे पास जेलर साहब का नंबर है, उनसे हम बिक्रम के पिता का नंबर लेकर एक बार उनसे बात करते हैं.. तब तक तुम ऐसा करो कि थाने के एस एच ओ से बात कर के अनुमति पत्र मंगवा लो.. !”

“सही है.. ! एक बात और थी अनुराग,  बिक्रम के हाथ में जो गन बरामद हुई थी, वो किसके नाम पर रजिस्टर्ड है, ये भी मालूम करवाना है.. हमें लगता है तिवारी जी ने उस बारे में शायद कोई जाँच पड़ताल कर रखी हो.. एक बार उनसे पूछ लिया जायें.. और अगर उन्होंने नहीं पता करवाया है , तो ये डिटेल्स भी निकलवानी होंगी.. “

“वो हम निकलवा देते है..पर उसके लिए हमें थोड़ी देर के लिए जेलर साहब से मिलने जाना पड़ेगा.. आख़िर ज़ब्त किया सामान उन्हीं की कस्टडी में लॉकर में रखा होगा.. “

अमर की बात पर साजन अनुराग दोनों ने हामी भर दी..

साजन और अनुराग अपने अपने फोन में लग गए, अमर अपनी फटफटी उठाये बाहर निकला और ज़फ़र खाना बनाने रसोई में चला गया….

क्रमशः

aparna…..



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