गली बनारस की -33

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की -33

   देखते ही देखते वो शाम भी बीत गयीं…. और बिक्रम का वहाँ से निकल भागने का कोई प्लान पूरा नहीं हो पाया….

  आधी रात के वक्त पर बिक्रम ने धानी को उस महल के पिछले हिस्से में बुलवाया था… अबकी बार उसका प्लान यही था की किसी तरह आधी रात को धानी को लेकर वो वहाँ से भाग कर पुलिस स्टेशन पहुँच जायेगा, और वहाँ से शादी कर के उन्हेँ साथ लिए यहाँ चला आएगा, और इन ज़ालिमों की कैद से अपनी माँ और पापा के साथ धानी के माता पिता को भी छुड़ा ले जायेगा…
   उसने बड़ी मुश्किल से ये संदेश धानी तक पहुंचा दिया था…
  आधी रात के वक्त धानी चुपके से उठ कर महल के पिछवाड़े चली आयी,  वहाँ बिक्रम पहले ही बैठा उसका इंतजार कर रहा था… वो धानी को देख उसकी तरफ उसे गले लगाने बढ़ ही रहा था की इशारे से उसे रोक धानी आगे बढ़ गयीं…

“पहले यहाँ से निकलते हैं बिक्रम !”

हाँ में सर हिला कर वो उसका हाथ थामे आगे बढ़ गया… पिछवाड़े का लम्बा दालान पार करते दोनों उस ढलाई पर उतरते जा रहे थे, चौड़े चौकोर बड़े बड़े पत्थरो से बना दालान खत्म होने को तैयार नहीं था…. और वो दोनों एक दूसरे का हाथ थामे उतरते जा रहे थे…
   तभी गेट के पास खड़े सुयश पर धानी का ध्यान चला गया, वो वहाँ गार्ड्स से कुछ बात करता खड़ा था, और उसकी पीठ थी धानी और बिक्रम की तरफ…

  धानी उसे देखते ही घबरा गयीं और उसने बिक्रम का  हाथ छोड़ दिया, ठीक उसी वक़्त गार्ड के ध्यान दिलाने पर वह पीछे मुड़ गया….

” अरे बिक्रम जी, आप यहाँ कैसे.. ? और धानी तुम भी.. ?”

  उसके चेहरे पर सवालिया नज़रे देख धानी की घबराहट और बढ़ गयीं….
और सुयश उन दोनों के पास पहुँच गया… उसे पास आते देख धानी बिक्रम से जरा हट कर खड़ी हो गयीं.. और सुयश ने आकर धानी की कमर में हाथ डाल उसे अपने करीब कर लिया…

“क्या बात है भई, हमारी बीवी को भगा कर तो नहीं ले जा रहे कहीं… ” अपनी बात कह कर सुयश दुष्टता से मुस्कुरा गया और बिक्रम धानी लाचारगी से एक दूजे को देखते रह गए…

“बेबी अब तुम्हें हल्दी लग गयीं है ना, फिर अपने कमरे से बाहर क्या कर रहीं हो, वो भी इस वक़्त.. ?”

बिक्रम का दिल किया एकबारगी सब सच बोल दें…

“सुयश !! मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ.. !”

  सुयश ने एक नजर बिक्रम को देखा और फिर धानी को देखने लगा,  उसकी तीखी नजर देख धानी को वो लड़का याद आ गया जो उस पर फूल फेंक रहा था और बस इसी बात पर सुयश ने उसे मौत के घाट  उतार दिया था…
   धानी को लगा अब यहाँ से भागना तो नामुमकिन है इसलिए इस राक्षस के सामने अगर बिक्रम सब सच बोल गया तो ये बिना सोचे समझे यहीं बिक्रम को मार डालेगा,  और इसलिए बिक्रम कुछ बोले उसके पहले धानी बोल पड़ी….

“सुयश !! ये बिक्रम हमारी मम्मी के रिश्तेदार हैं.. ये पन्ना दीदी के लिए कुछ सरप्राइज़ प्लान करना चाहते थे, हम उसी में इनकी मदद करने आये थे… “

“सुयश नहीं बेबी सुयश जी कहो ! हम होने वाले पति हैं तुम्हारे.. !और औरत वहीँ सही होती है जो अपने पति को सम्मान दें उसके पीछे चुपचाप सर झुका कर चले.. आख़िर हम तुम्हारे रहबर हैं.. !”

  बिक्रम का खून  जल रहा था, पर वो कुछ नहीं कर पा रहा था..
  मन मसोस कर वो चुप खड़ा रहा और… और “आओ तुम्हें तुम्हारे कमरे तक छोड़ दें” कहता सुयश धानी की कमर में हाथ डाले एक तरह से उसे खींचता ले गया…
  बिक्रम वहीँ एक किनारे थक कर बैठा रह गया…

वो रात भी बीत गयीं…
अगला दिन सुबह से शादी ब्याह की रस्मों में बीतता चला गया और देखते ही देखते सुयश ने धानी की मांग भर दी और बिक्रम को पन्ना की मांग भरनी पड़ी….
.. हंसी ख़ुशी के माहौल में सब चहक रहे थे, एक धानी और दूसरा बिक्रम को छोड़ कर…..
   एक एक कर सारे रिश्तेदार वापस लौट गए…. सिर्फ चौधरी परिवार और बिक्रम धानी के माता पिता के अलावा…..

    गुल्ली नौकरों के साथ इधर से उधर डोलती फिरती तीनो जोड़ो के कमरे सजवा रहीं थी….
सज धज भी पूरी हो गयीं….
   धानी एक कमरे में अपनी माँ के पास बैठी आँसू बहा रहीं थी, आधे घंटे बाद ही उसकी माँ और पापा को वापस निकलना था…
    धानी को फेरों के वक्त से ही अजब सी घबराहट हो रहीं थी.. फेरों के समय जब सुयश ने उसका हाथ पकड़ा तब उसकी चौड़ी हथेलियों में धानी की नाजुक उँगलियाँ सिसक कर रह गयीं.. और सुयश की पकड़ और गहरी होती चली गयीं….
देखते ही देखते बिदाई का भी समय आ गया….
अजीब सी बिदाई थी,  लड़की रुक रहीं थी और उसके घर वाले बिदा हो रहे थे, यही हाल बिक्रम का था.. उसे रत्न अपने साथ ले गया था…

” जमाई बाबू हमारे चौधरी परिवार में आपका स्वागत है.. अब जब ब्याह निपट ही गया है तो आपके माता पिता को आजाद कर दें सोच रहे हैं.. क्या कहना है आपका.. “

बिक्रम बिना कोई जवाब दिए बैठा रहा… उसका चेहरा नीचे था और अब भी उसके दिमाग में यही चल रह था कि किसी तरह यहाँ से निकल कर भाग सकूँ..

” चलिए अपने अम्मा बाबूजी से एक बार मिल लीजिए फिर हम उनको लेकर एयरपोर्ट निकल जाएंगे…”

बिक्रम बुझे मन से रत्न  के पीछे चला गया,  अपनी मां के पैर छूने के बाद उनके गले से लग गया… अपने पापा के पैर छूने के बाद उनके गले से लगा उनके कान के पास धीरे से फुसफुसा उठा…

    “यहां से निकलते ही  आप और मॉम सीधे अमेरिका मामा जी के घर निकल जाना, मेरी भी कोशिश यही रहेगी कि मैं भी वहीँ पहुंच सकूं!”

बिक्रम के पिता ने बिक्रम के सर पर हाथ रखा और उसे गले से लगा लिया……

   लगभग एक ही साथ बिक्रम के माता-पिता और धानी के माता-पिता की वहां से विदाई हो गई…

धानी उदास सी उसी कमरे में अब भी बैठी थी कि एक नौकरानी आयी और धानी के हाथ में कुछ रख गयीं.. एक बार फिर बिक्रम का संदेश था….
     ” धानी !! रात में सुयश के सोते ही कमरा खोल कर नीचे चली आना.. यहाँ से निकलने के लिए गाड़ी का भी इंतजाम हो चुका है.. बस बिना डरे बारह बजे किसी तरह नीचे उतर आना, बाकी सब मैं संभाल लूंगा.. !”
   धानी भरी आँखों से पढ़ ही रहीं थी की गुल्ली चली आयी…..

“अब यहाँ काहे बैठी है भाभी, चलिए आज आप की सुहागरात है !”

धानी की बाँहों  को पकड़कर गुल्ली उसे अपने साथ ले चली..  बीच-बीच में उसके कंधों को अपने कंधे से मारती, मुस्कुराती उसके गालों को इधर-उधर चींटी काटती उसे चिढ़ाती  रही….
      धानी का बदन थरथरा रहा था,  उसे बार-बार सुयश का चेहरा याद रहा था, और वह कांप कर रह जा रहीं थी….
   इससे ज्यादा डर आज तक उसे अपनी जिंदगी में कभी नहीं लगा था…  काश कुछ ऐसा हो जाता कि वह उस कमरे में जाने से बच जाती लेकिन उसे पता था अब उसके बचने का कोई रास्ता नहीं था…

    कमरे के दरवाजे पर उसे खड़ी करके गुल्ली  दरवाजा छेक कर खड़ी हो गई…

” ना ना ना ऐसे अंदर नहीं जाने देंगे जब तक हमें नेग  नहीं मिलेगा तब तक आप नैकी  दुल्हन को छू भी नहीं सकते..!”

   दरवाजे पर खड़ी धानी अचानक समझ नहीं पाई , लेकिन गुल्ली की  बात  सुनकर उसे समझ आ गया कि उसके पीछे सुयश खड़ा है…..
   सुयश ने एक हाथ से नोटों की गड्डी गुल्ली की तरफ बढ़ाई और दूसरे हाथ से धानी की कमर से पकड़ उसे उठा लिया और कमरे के अंदर चला आया…
  गुल्ली हंसती हुई भाग गयीं और धानी की साँस रुकने लगी.. वो चाह कर भी अपना थरथराना रोक नहीं पा रहीं थी…
  कमरे का दरवाजा बंद कर सुयश ने उसके कंधे पकड़ कर उसे खुद से जरा दूर किया और उसे देखने लगा..

“हाय !!अपनी सुन्दर सी बीवी को जरा मन भर कर देख तो लें.. “

धानी की ऑंखें जल रहीं थी…. उसके होंठ कम्प रहे थे…

“इतना घबरा काहे रहीं हो,  इंसान ही हैं हम जल्लाद नहीं है,  और फिर तुम्हारे तो पति हैं,  प्यार से रखेंगे तुम्हे… आओ यहाँ हमारे पास आओ… “

धानी घबरा कर आगे बढ़ गयीं.. धीरे से आकर वो भी उसी पलंग पर बैठ गयीं….
  सुयश की उँगलियाँ उसके चेहरे पर रेंगने लगी और धानी को लगा वो चकराकर गिर पड़ेगी..
..लेकिन ना वो गिरी ना बेहोश हुई, और एक एक कर सुयश अपनी मनमानी करता चला गया…

   इस बीच धानी ने हाथ में पकड़ रखें उस पर्चे को वहीँ पलंग के गद्दे के नीचे छिपा दिया ….
   ना सुयश रुकने को तैयार था ना धानी के आँसू…..  धानी को आश्चर्य इसी बात का था की उसके रोते रहने के बावजूद सुयश को कोई फर्क नहीं पड़ रह था…. बल्कि शायद उसे ज्यादा अच्छा लग रहा था….

अपना काम निपटा कर वो एक तरफ हो गया….

” सैडिस्ट जानती हो क्या होता हैं धानी.. ?”

धानी से उसकी तरफ देखा नहीं जा रह था,  उसने कोई जवाब नहीं दिया…

” हमारे साथ रहते रहते जान जाओगी… !सैडिस्ट हैं हम !!  लेकिन उसका ये मतलब नहीं की तुम्हे हमेशा रुलाते रहेंगे… यक़ीन मानो अगर जैसा हम कहेंगे वैसे रहीं तो हमसे तुम्हें कोई कष्ट नहीं मिलेगा लेकिन कहीं अपनी चलाने की कोशिश की तो हमसे बुरा भी कोई नहीं होगा…. वैसे तुम हो बहुत सुन्दर और प्यारी..
   हम कोशिश करेंगे की तुम हमारे साथ खुश रह सको.. !

सुयश ने उसके बाद धानी के पास आकर उसके होंठ चूम लिए और पलट कर गहरी नींद सो गया….
   रोती बैठी धानी को अब खुद पर गुस्सा आने लगा था…उसने छिपा रखी उस पर्ची को निकाला और खिड़की के पास पहुँच गयीं….
    अब जो उसकी हालत थी,  वो अब खुद को इस लायक नहीं मान पा रही थी बिक्रम के साथ भाग जाये…
  उसने एक नजर सोते हुए सुयश को देखा, उसके पास इस वक्त पूरा मौका था क्योंकि सुयश गहरी नींद सोया हुआ था,  बाहर भी सुनसान था… शादी की थकान से अधिकतर नौकर भी सो चुके थे… उसके पास अब मौका था, की वो बिक्रम के साथ भाग जाये..
    पर अब…… सुयश के रौंदे जाने के बाद अब वो अपने इस छलनी तन मन के साथ बिक्रम के पास जाने के लिए खुद ही तैयार नहीं थी…
   मन मार कर वो वापस पलंग पर आ बैठी.. उसे फिर रोना आने लगा था… पलंग पर एक तरफ को बैठी वो आँसू बहा रहीं थी की सुयश की बाँहों ने उसे अपनी तरफ खींचा और उसे अपनी बाँहों में लेकर सो गया…

” रोओ मत धानी, तुम्हारी रोने  की आवाज़ से हमारा फिर मूड होने लगेगा… चुप हो जाओ !”

  डर से धानी चुप होकर सोने की कोशिश करने लगी और उसके बालों पर अपना चेहरा घुसाए सुयश ने उसे वापस चुम लिया… “गुड गर्ल, अब सो जाओ !”
कुछ देर में ही सुयश वापस गहरी नींद में था और उसकी बाँहों में पड़ी धानी ना रो पा रहीं थी ना सो पा रहीं थी….

गेट के पास घंटे भर से अकेले खड़े बिक्रम के पास कोई उपाय नहीं बचा था की वो धानी से सम्पर्क कर सके,  वो उसे फ़ोन नहीं करना चाहता था पर धानी को ना आता देख थक कर उसने फ़ोन  लगा ही दिया….
  फ़ोन की घण्टी बजते ही धानी ने फ़ोन देखा और तुरंत काट दिया…. फ़ोन काटते ही उधर से बिक्रम ने वापस दुबारा रिंग कर दिया….
  उस बार फ़ोन की आवाज़ होते ही कसमसा कर सुयश ने एक अंगड़ाई ली और पूछ बैठा…

“कौन आधी रात के वक्त तुम्हें फ़ोन कर रहा हैं जान .. ?  लाओ दिखाओ तुम्हारा फ़ोन…. ?
  ये सुनते ही धानी के चेहरे का रंग उड़ गया और….

क्रमशः

aparna……
    

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