गली बनारस की -29

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की -29

अपने पिता की बात सुन बिक्रम की आंखें छलक आई वह बुरी तरह से मजबूर हो चुका था। अभी कुछ देर पहले जहां वह धानी को इशारे से सगाई करने के लिए मना कर रहा था। वहीं अब वह खुद ऐसे रिश्ते में बंधने को मजबूर हो चुका था जिसमें बंधे बिना अब उसकी मुक्ति का कोई रास्ता नहीं बचा था…..

   भरे मन से बिक्रम नीचे हॉल की तरफ चला गया…. और उसके नीचे हॉल में पहुंचते ही कुछ देर बाद उसके माता-पिता भी नीचे चले आए…. हॉल में मौजूद ढेर सारे लोगों में से शायद ही किसी का ध्यान गया हो इस बात पर कि बिक्रम के माता-पिता के ठीक पीछे दो लोग उनसे बहुत सट कर खड़े थे… बाकी लोगों ने शायद इस बात पर ध्यान भी नहीं दिया था लेकिन बिक्रम की आंखें उन्हीं दो लोगों पर टिकी थी और उन दो लोगों की बिक्रम पर …
यह रत्न के खास गुंडे थे और जाहिर था कि बिक्रम के माता-पिता से लगकर खड़े हुए उन दोनों ने उन्हें अपनी गन पॉइंट पर कवर कर रखा था…….

   बिक्रम का दिल टूटता जा रहा था उसे मालूम था कि इस वक्त उसका कुछ भी करना उसके माता-पिता को और उनकी जान को सीधा नुकसान पहुंचाना था…. बिक्रम बार-बार उस वक्त को कोस रहा था जब उसने अपने माता-पिता को इस शहर में घुसते ही वापस क्यों न भेज दिया… हालांकि यह सारी बातें इतनी आसान नहीं होती। जब वह लोग आए थे तब बिक्रम चौधरियों की गुंडागर्दी को इस हद तक नहीं समझ पाया था। क्योंकि अगर समझ चुका होता तो वह क्यों शेर की मांद में खुद होकर घुस ता…अब बार-बार उसे अपने किए हर काम पर पछतावा हो रहा था…
   उनके साथ काम करने वाले ठेकेदार चरण दास गुप्ता ने बिक्रम को बार-बार चौधरियों के बारे में अलर्ट किया था.. लेकिन कुछ उसकी कच्ची उम्र का तकाजा था और कुछ बिक्रम की हद से ज्यादा इमानदारी जो वह चौधरियों से उलझ पड़ा और जिसका हरजाना आज उसका परिवार भुगत रहा था। सिर्फ एक उसके कारण उसके माता-पिता की जान पर बन आयी थी… दूसरी तरफ धानी बिना मर्जी के किसी अनजान लड़के के पल्ले से बंधने को मजबूर हो गई थी।

   अपने आप को बहुत मजबूत कर वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा … पन्ना स्टेज पर खड़ी उसका इंतजार कर रही थी। कुछ देर पहले ही चौधरी साहब ने इस बात की घोषणा की थी कि उनकी बेटी पन्ना और परिहार साहब के बेटे बिक्रम की सगाई होने वाली है। लोग इसी शाही सगाई को देखने के लिए पलक पावडे बिछाये स्टेज के चारों ओर इकट्ठा हो चुके थे…
    बिक्रम का एक-एक कदम उस पर बहुत भारी पड़ रहा था ! स्टेज के दूसरी तरफ नीचे खड़ी धानी अपनी मां से सटकर खड़ी थी और उसकी आंखों से आंसू बहने को थे। उसने बड़ी मुश्किल से खुद को रोक रखा था। बिक्रम आगे बढ़ रहा था कि तभी उसके कदमों से कदम मिलाता कोई उसके साथ चलने लगा। बिक्रम ने देखा उसके साथ काम करने वाला ठेकेदार चरण था…

“बहुत सही समय पर आ गए हो गुप्ता जी, आपसे एक काम था..!”

” आप आदेश करें सर!! जितना हो सकेगा, आपकी मदद करेंगे! हम तो शुरु से आप को समझा रहे थे कि यह मधुमक्खी का छत्ता है, हाथ मत डालिए यह सारे लोग आप से चिपक जाएंगे…!”

“गलती तो हो गई गुप्ता जी , क्या करें? लेकिन हमें इस गलती को सुधारना है और वह भी आज की रात..!”

“बोलिए सर क्या करना है…?”

“हमे आज रात यहां से भागना होगा.. वक्त और जगह मैं आपको बता दूँगा, बस आप एक बड़ी गाड़ी जिसका नंबर प्लेट गलत हो अरेंज करवा दीजिये..”

“हो जाएगा सर! कितने लोग भागने वाले हैं।
हमारा पूछने का मतलब है कितने सीटर गाड़ी चाहिए आपको?”

“मुझे मिलाकर हम चार लोग रहेंगे..!”

” तीन तो आप और आपके माता पिता चौथा कौन रहेगा सर..?”

“धानी..!”

चरण दास गुप्ता ने सामने खड़ी लड़की की तरफ़ देखा …

” सर एक बार फिर कह रहे हैं , इन लोगों से पंगा लेना सही नहीं है…आप बस अपने परिवार को लेकर निकल जाइए.. लड़की वङकी का चक्कर छोड़…

” वो लड़की मेरी पत्नी है..उसकी मांग में सिंदूर डाल चुका हूं…”!

चरण आश्चर्य से बिक्रम की ओर देखने लगा…

” हम कुछ करते हैं सर…!”

बिक्रम स्टेज तक पहुंच चुका था…सीढियां चढ़ कर वो पन्ना तक पहुंच गया…पन्ना की आंखों में अलग ही चमक नजर आ रही थी…

बिक्रम ने पन्ना को देखा और उसकी आंखों में खून उतर आया ……

पन्ना के पास पहुंच उसने पन्ना से धीमी आवाज़ में सवाल कर ही लिया…

” क्यों कर रही हो ये सब ?”

” तुमसे मुहब्बत जो हो गई है…

” तुम्हारी इस मुहब्बत से मुझे नफरत होने लगी है…

” हमें कोई फर्क़ नहीं पड़ता…

“पर मुझे पड़ता है…मैं जिस से मुहब्बत ना हो उसके साथ कभी जिंदगी नहीं बिता सकता …

” साथ रहते हुए तो एक कुत्ते से भी प्यार हो जाता है..यहां तक की लोगों को अपने घर की दरों दीवार से लगाव हो जाता है…जब बेज़ान चीजों से इस कदर मुहब्बत हो सकता है तो हम तो जीते जाते इंसान है..

” इंसान ही तो नहीं हो.. वरना मुझे इस ढंग से शादी करने को मजबूर ना करतीं..!”

” क्यों ? क्या किसी लड़की को अपनी जिंदगी अपने तरिके से जीने का हक नहीं है..

” बेशक है…लेकिन  अपनी खुशी के लिए दूसरों की जिंदगी दोज़ख करने का कोई हक नहीं है…ना किसी लड़की को ना लड़के को…
   और तुम ये बेचारी लड़की वाला विक्टिम कार्ड तो खेलो ही मत , समझी?”

” ज्ञानी बहुत हैं आप बिक्रम आदित्य जी..और आपकी यही अदा तो दिल ले गई हमारा ..

” अफसोस तुम्हारी रत्ती भर भी बात मेरा दिल नहीं ले जा पायी..

” ले जाएगी….अभी तो आप हमारी जिंदगी में आए है…जरा साँस तो ले लीजिए…जैसे जैसे हमारे जर्रे जर्रे को जानते जाओगे हमसे प्यार में हमारे अंदर डूबते जाओगे …

“गलत समझ रही हो…..  तैराक हूँ मैं , तुम लाख कोशिशे कर लो मुझे डूबा नहीं पाओगी…

” और अगर अपने इश्क में आपको डूबा दिया तो….

” उसका मौका ही नहीं मिलेगा …क्योंकि मैं उसके पहले ही तुम्हें मार डालूंगा …

” आप अपनी निगाहों से पहले ही हमें मार चुके हैं…

” अब जान से मार दूँगा …

बिक्रम की बात सुन पन्ना मुस्कराने लगी…..उन दोनों की धीमी बातेँ कोई नहीं सुन पा रहा था …..
  
    पन्ना की माँ  एक थाली में दो अंगूठियां रखें उन दोनों के पास चली आयी….उन्होंने आते ही दोनों के हाथो में अंगूठियां पकड़ा दी…

पन्ना ने हाथ में पकड़ रखी अंगुठी को एक नजर देख कर बिक्रम की ओर देखा और फिर अपनी माँ की तरफ़ मूड कर उनके कान में धीरे से कुछ कहा …

पन्ना की माँ ने उससे हाँ बोला और धनी की तरफ़ देख उसे आवाज़ लगा दी…

” ए धनिया,  हुआ नीचे का खड़ी हो…हियां आओ..पन्ना तुम्हारी जिज्जी है , जीजा के बाजू में आकर खड़ी हो जाओ चुप्पेचाप ..

धानी का वहाँ से भाग खड़ी होने का मन कर रहा था…
उसने पन्ना की माँ की बात अनसुनी कर दी,  लेकिन फिर से उन्होंने वहीं पुकार लगा दी…
अबकी बार पन्ना भी उनके बाद उसे बुला उठी..

” काहे कान मे  तेल डाले खड़ी हो क्या जो सुन नहीं पा रही हो…..”

अबकी बार अपने मन को कड़ा कर धानी को ऊपर चढ़ना ही पड़ा…वो पन्ना की तरफ़ बढ़ रहीं थीं कि उसकी अम्मा ने धानी को बिक्रम के ठीक बगल में खड़ा कर दिया ….

बिक्रम के बाजुओं से लग कर खड़ी धानी थोड़ा उससे दूर खिसकने को थी कि तभी हॉल की लाइट चली गई……
और बिक्रम उसका हाथ मजबूती से पकड़ कर स्टेज के पीछे तरफ़ उसे खिंच ले गया ….

” आज रात हम यहां से भाग जाएंगे ..!” उसने धानी के कानों में फुसफुसा कर कहा ..और धानी उसकी आवाज़ सुन खुद पर काबु नहीं रख पायी…

” यहाँ से कैसे भागेंगे..बहुत मुश्किल है..

” वो सब मुझ पर छोड़ो दो , बस जैसा जैसा बोलता जाऊँगा करते जाना ..

धानी ने हाँ में सिर हिलाया ,और बिक्रम ने उसे एक बार कस के गले से लगा लिया…उसके छोड़ते ही धानी
स्टेज की तरफ़ बढ़ गई…..
   कि उसी वक़्त लाइट आ गई….इन कुछ पलो में बाकी सभी लोग अपनी अपनी जगह पर ही थे…
  धानी के पीछे बिक्रम भी आ रहा था कि पन्ना ने जलती हुई नजरो से धानी को देखा और फिर पीछे घूम गई…

” बस दो ही सेकेंड में आप कहाँ गायब हो गए थे इंजीनियर साहब! हम घबरा गए थे…

बिक्रम ने उसे घूर कर देखा और बिन कोई जबाव दिए दूसरी तरफ़ देखने लगा …

” इतरा लीजिए हुजूर! हम ही तो आपको मौका दे रहे हैं, हमारे सर पर बैठने का …
..गंगा मैया की कसम अगर आपसे मुहब्बत ना होती तो आपके इस एटिट्यूड पर अब तक आपको गोली मार चुके होते …
मन ही मन अपनी बात सोचती पन्ना ने एक नजर धानी को देखा फिर थाली में से अंगुठी उठा कर बिक्रम को पहना दी…
  बिक्रम ने पन्ना को एक बार देखने के बाद बिना दुबारा उसकी ओर देखे ही उसे अंगुठी पहना दी…..

सभी तरफ़ से बधाइयों का सिलसिला चल पड़ा… धानी ने भी पन्ना को बधाई देने हाथ आगे बढ़ाया की पन्ना ने उसे गले से लगा लिया …
    धानी के कानों में धीमे से वो कुछ कहने लगी…

” ये जो तुम्हारे पास से बिक्रम की खुशबु आ रही है ना..दुबारा नहीं आनी चाहिए,वर्ना तुम अच्छे से जानती हो मैं तुम्हारा क्या हाल करूंगी…!”

” ये खुशबु तो अब हमारे मरने के बाद ही हमारे जिस्म से अलग होगी..!”

” अच्छा इतनी अकड़!  तुम्हारे लिए भी सारा इंतजाम कर दिया है….
हमारी सगाई के बाद एक छोटा सा सरप्राइज है तुम्हारे लिए…

धानी कुछ समझ पाती की पन्ना आगे बढ़ गई….

क्रमशः

aparna

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