
तू बन जा गली बनारस की… -52
साजन को जाने कब से इसी बात का इंतज़ार था…
उसने लपक कर सुयश का फ़ोन उठा लिया…
और फटाफट जज साहब की तरफ बढ़ गया…
साजन -“माननीय जज साहब से निवेदन है की सुयश सिंह के फ़ोन पर कुछ ऐसा मौजूद है जो हम यहाँ पब्लिकली नहीं दिखा सकते.. उसके लिए अगर जज साहब किसी अन्य जगह पर हमारे साथ सिर्फ पांच मिनट के लिए चल सकें तो हमें आसानी होगी… “
सुयश ने माथे पर सिकुड़न चली आयी… और एकदम से उसके दिमाग की नसे फटने लगी… उसे लगा फ़ोन किसी और के हाथ में देकर उससे बहुत बड़ी बेवकूफी हो गई है.. हालाँकि उसे अगले ही पल ये विचार भी आया की उसके फ़ोन में मौजूद धानी की क्लिप्स के बारे में साजन को वैसे भी क्या ही मालूम होगा जो उसके हाथ में जाने से कोई दिक्कत होनी है.. लेकिन फिर ये सिरफिरा वकील उसके फ़ोन पर ऐसा क्या कॉन्फिडेंशियल सा पा गया है जो जज को अलग से दिखाने जाना चाहता है..
उसी वक़्त जज साहब ने साजन को साथ लिया और कोर्ट रूम से लगे एक छोटे चैंबर की तरफ बढ़ गए.. वहाँ पहुँच कर वीडियो फोल्डर खोल कर साजन धानी की वीडियो ढूंढने लगा.. एक पल को उसका मन कांप गया, उसकी हिम्मत नहीं हुई की वो उस वीडियो को ढूंढ़ पाए…
… आख़िर आज तक धानी चुपचाप सब कुछ इसलिए ही तो सहती आ रही थी की उसकी ऐसी वीडियोस कोई और न देख ले.. वरना अगर वो अपनी बदनामी से नहीं डरती तो खुद पुलिस स्टेशन जाकर ये विडिओ दिखा कर सबूत पेश कर सकती थी.. पर बात वही थी..
सबूत पेश कर देने पर पुलिस वकील जज सब की सहानुभूति भले ही धानी की तरफ हो जाती लेकिन ये सारे ही लोग जाने कितनी बार उन विडिओस को देखते और मन ही मन चटकारे लेते.. उस सब के बाद वो कैसे दुनिया के सामने खड़ी होती…
अपनी इज्ज़त बचाने के लिए ही सही एक बार ही सही वही इज्ज़त इस तरह सारे आम उतर ही जाती…
दुनिया भर की नज़रों में इज्ज़त बचाये रखने के लिए ही तो उसने घर पर अपनी अस्मिता के साथ होते खिलवाड़ को मंजूर कर लिया था…
जो भी उसके साथ हो रहा था एक चारदीवारी के भीतर हो रहा था, और करने वाला भी उसका पति ही था…
इन्हीं सब बातों में उलझे साजन ने ये सारी बातें जज साहब को बता दी…
“लेकिन मिस्टर साजन ये केस अभी पन्ना मर्डर का चल रहा है इसके बीच में सुयश की पर्सनल लाइफ के बारे में हम क्यों डिस्कस कर रहे हैं.. ?”
“सर क्योंकि एक बार ये केस सॉल्व हो गया फिर सुयश की पत्नी को वापस कोई मौका नहीं मिलेगा सुयश की दरिंदगी सामने लाने का.. सर आप धानी की पिता के उम्र के हैं, आप ही इस फोल्डर में वो वीडियोस एक बार देख लीजिये क्योंकि हमसे देखा नहीं जायेगा… आपको अलग से अंदर बुला कर दिखाने का कारण भी सिर्फ इतना ही था की बाहर ये विडिओस दिखाने का मतलब था इन्हें एक तरह से पब्लिक कर देना…पुलिस से लेकर आम आदमी तक वहाँ इन्हे देख पाता और भले ही सामने सभी को धानी से सहानुभूति होती लेकिन आंखों ही आंखों में चटकारे तो ले ही लिए जाते हैं.. यही तो हमारे समाज के सभी लोगों की विडंबना है सर.. और इसी सब से बचने के लिए जाने कब से औरतें घरेलू हिंसा मारपीट और मैरिटल रेप जैसे दंडनीय अपराध को भी चुपचाप सहती आई है…
इससे ज्यादा बुरा किसी औरत के लिए क्या हो सकता है कि उसकी लाज ढकने वाला इंसान उसका पति ही उसके ऐसे वीडियो निकाल कर रखें जिससे वह समय आने पर उसे बार-बार ब्लैकमेल कर सके….
साजन के बताते में जज ने विडिओ देख लिए.. उनमें चीखती चिल्लाती धानी की आवाज़ ही साजन के गुस्से को बढ़ाने के लिए बहुत थी…
“ये आदमी तो दरिंदा है.. इस पर कोई लीगल एक्शन लेना ही पड़ेगा.. तुम इसकी वाइफ से कहो की अपने मामले को सेशन कोर्ट में डाल दे… कम से कम अपने क्षेत्र की पुलिस या फिर महिला थाने में उसे रिपोर्ट डालने कह दो… रिपोर्ट होने के बाद कम से कम उसे अपने जल्लाद पति से अलग रहने का मौका तो मिलेगा… “
“जी हुज़ूर !”
अब तक कोर्ट रूम में मौजूद सुयश और बाकि लोग इसी विचार में थे की आख़िर साजन जज साहब के साथ अकेले कर क्या रहा है…,
कुछ देर में ही साजन और जज साहब वापस आ गए और कोर्ट ट्रायल वापस शुरू हो गया…
इसी सब के बीच रॉकी को गवाही के लिए बुलाया गया…
साजन -” रॉकी तुमने जो सब सच्चाई हमें बताई थी अब उसी बात पर अदालत में रौशनी डालो..
साजन ने वापस आकर फ़ोन सुयश को दिया और उसे घूर कर रॉकी की तरफ मुड़ गया…
सुयश की समझ से बाहर था की ये पागल वकील उसके फ़ोन पर पिछले दस मिनट से क्या बातें जज के साथ करता रहा..
सुयश इस बात के लिए पूरी तरह से आत्मविश्वासी था कि उसके फोन से ना ही कमल गुप्ता और ना रॉकी किसी को भी कोई फोन नहीं गया था और इसलिए उसका बाकी की बातों की तरफ कोई ध्यान ही नहीं गया…
उसके दिमाग में एक पल को भी नहीं आया कि साजन ने उसके फोन में से उसके हिंसक वीडियो जज साहब को दिखाए होंगे..
उसने अपना फोन मिलते ही सबसे पहले स्क्रीन हिस्ट्री चेक करनी शुरू की लेकिन साजन ने वापस आते में ही सारे टैब बंद कर दिए थे जिससे कि हिस्ट्री में सुयश को कुछ भी नहीं मिला…
सुयश का सर दर्द बढ़ता ही जा रहा था और केस भी लंबा खींच रहा था.. अब सुयश की हिम्मत नहीं थी कि वह उस कमरे में कुछ पल और बैठे.. रॉकी का पेशी नामा शुरू होने के पहले ही सुयश ने खड़े होकर जज साहब को अपनी खराब तबियत का हवाला देकर अगली डेट की मांग कर दी….
जज साहब अभी अगली तारीख देने वाले थे कि साजन अपनी जगह पर खड़ा हो गया…
साजन -” माननीय जज महोदय हमें अगली पिछली किसी भी तारीख से कोई ऑब्जेक्शन नहीं है लेकिन हम एक छोटी सी गुजारिश करना चाहते हैं ! जैसा कि आप जानते ही हैं पिछले 3 साल से यह केस चल रहा है और अगर अब भी ऐसे ही तारीख है मिलती रही तो जाने कब तक यही चलता रहेगा | इन तारीखों में सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि हम सब तो अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो जाते हैं लेकिन वह आदमी जो सीखचों के पीछे अकेला बैठा उदास नजरों से अपनी रिहाई का एक छोटा सा सपना देखता होता है, अपने कैद खाने के रोशनदान से आती एक नन्ही किरण में ही अपने भविष्य के उज्जवल स्वप्न को देख पाता है उसके लिए एक-एक दिन इंतजार की घड़ियों में काटना बेहद मुश्किल होता है….
… जज महोदय आप एक अगली तारीख देंगे इससे आपकी दैनिक दिनचर्या में कोई फर्क नहीं पड़ेगा, ना मेरी दिनचर्या में फर्क पड़ेगा और ना ही हमारे काबिल दोस्त सुयश सिंह जी को कोई फर्क पड़ेगा… लेकिन इससे पूरी अदालत में अगर किसी को फर्क पड़ेगा तो वह अकेला बिक्रम है…
बिना कोई गुनाह किए जो आदमी पिछले 3 साल से रात दिन एक एक पल ऐसी सजा काट रहा है, जिसके बाद अब उसने बाहर निकलने का मन ही छोड़ दिया है….
हमारे मुवक्किल की हालत क्या हो चुकी है उसकी लिखी डायरी से आप जान सकते हैं | आपको हमने पहली डायरी पढ़ने दी थी | यह विक्रम की दूसरी डायरी है जिसमें आप पढ़कर उसके लिखने का अंतर बखूबी समझ सकते हैं | पहली डायरी की शुरुआत में एक नवयुवक की लेखनी है जो अपनी जिंदगी से बहुत खुश है जिसकी जिंदगी जिंदादिली का दूसरा नाम है, जो अपने जीवन के हर एक पल को पूरी खुशी और सुकून से जीना चाहता है वही लड़का आज 3 साल बाद जब अपनी डायरी लिख रहा है तो उसमें आमूलचूल परिवर्तन हो चुका है….
… न्यायाधीश महोदय बिक्रम धीरे-धीरे अवसाद की तरफ बढ़ रहा है…
उसकी डायरी में लिखे एक एक शब्द भी गहरे डिप्रेशन की तरफ इशारा कर रहे हैं | अब उसे अपनी कालकोठरी के अंधेरों से ही प्यार हो गया है, उसे पत्थरों को तोड़ना लकड़ी को काटकर फर्नीचर बनाना, दो रोटी और दाल के लिए लाइन में लगकर अपना खाना लेना फिर किसी एक अंधेरे से कोने में बैठ कर अपना खाना खत्म करना यही सब जिंदगी लगने लग गई है…
अब बाहर की दुनिया से पूरी तरह अलग हो चुका है वो | उसे लगता ही नहीं कि जेल के बाहर भी कोई दुनिया है | अपने माता पिता से भी अब उसे मिलने की कोई आस कोई उम्मीद नहीं है | उनकी सुरक्षा के लिए उसने खुद अपनी कसम देकर उन्हें इंडिया आने से रोका हुआ है, क्योंकि उसके दिल में यह डर इस कदर बैठ चुका है कि अगर उसके माता-पिता इंडिया आए तो चौधरी परिवार के लोग उन्हें मार डालेंगे….
.. आप सोचिये एक बेटे की मन की तड़प का क्या हिसाब होगा, जो बेटा अपने सबसे कठिन समय में भी अपने माता-पिता से मिल नहीं पा रहा | अपनी मां की गोद में सर रखकर पल भर को चैन की सांस नहीं ले पा रहा | आखिर अब बिक्रम की जिंदगी में बचा ही क्या है ? कुछ भी नहीं, इस इसीलिए वह पल पल अपनी सांसो को गिनता है और हर एक बीते दिन के साथ यही सोचता है कि चलो जिंदगी का 1 दिन और कट गया !
हम सब जहां सुबह उठकर भगवान को धन्यवाद देते हैं, कि हमें एक खूबसूरत दिन और दिया, वही वह सुबह उठकर यह सोचता है कि चलो जिंदगी का एक दिन और कम हुआ और मौत की तरफ एक कदम और आगे बढ़ा | आप विश्वास नहीं करेंगे लेकिन जैसे बाकी के मुवक्किल होते हैं कि अपने वकील से प्रार्थना करते हैं कि किसी भी तरह हमारी बेगुनाही साबित कर दीजिए और हमें बचा लीजिए उसकी जगह बिक्रम ने हर बार मिलने पर हम से यही प्रार्थना की कि किसी तरीके से हम उसे फांसी की सजा दिलवा दें जिससे रोज-रोज तिल तिल मरने से बेहतर है कि वह एक झटके में इस संसार को विदा करके निकल जाए…
इससे ज्यादा एक जवान लड़के की बेबसी की क्या हद होगी न्यायधीश महोदय कि वह अपने आप में इतना टूट चुका है कि अब उसे किसी से कोई लेना देना नहीं है! ना अब उसकी जिंदगी के अच्छे पलों को याद दिलाने से उसे कोई एहसास महसूस होता है, और ना ही बुरे पलों से | ना अब उसे किसी से प्यार रह गया है और ना किसी से नफरत….
पूरी तरह से निरुद्देश्य निरर्थक जिंदगी को जीता बिक्रम अब बस सांसे ले रहा है जीवन तो उसमें अब बचा ही नहीं….|
हमारी आपसे बस इतनी ही इल्तजा है, न्यायाधीश महोदय की एक नौजवान की जिंदगी बिखरने से पहले समेट लेने का काम ही न्याय होगा…|
आज मेरे काबिल दोस्त सर दर्द से तड़प रहे हैं इसलिए उन्हें अगली तारीख चाहिए, लेकिन आपके और भी कोर्ट केसेस मौजूद है जिसके कारण हमें बहुत करीब की तारीख़ मुहैया हो यह मुमकिन नहीं हो सकता है| अगले किसी तारीख पर वापस वकील साहब के पैरों में दर्द हो जाए, वो भी मुमकिन है कि उसके अगली तारीख पर इन्हें पेट में दर्द हो जाए | यह भी मुमकिन है जज साहब के उसके अगले तारीख तक हम जिंदा ही ना रहे.. फिर क्या होगा ?
आपके भरोसे आपके हाथ में हमने आप की अदालत में यह केस लगाया है….
यहां मौजूद हर एक व्यक्ति जानता है कि अगले 7 महीनों में आप सेवानिवृत्त हो रहे हैं और सच कहें तो हम दिल से चाहते हैं कि आप की बेंच में ही इस केस का परिणाम सामने आए..|
न्याय के लिए खड़े होना लड़ना और न्याय के लिए लड़ते रहना दोनों बहुत अलग-अलग बातें हैं | आज हम जो जोश में न्याय के लिए लड़ने के लिए खड़े तो हो गए हैं लेकिन इस तरह की आती जाती तारीखों से हम कब तक न्याय के लिए लड़ते रहने के लिए मजबूत रहेंगे? यह कहा नहीं जा सकता हो सकता है, कल को हमारी जिंदगी में भी कुछ ऐसे बदलाव आ जाए कि हम खुद इस केस की तरफ से उदासीन हो जाए और ध्यान ना दे पाए लेकिन इस सब में गलत किसके साथ होगा उस आदमी के साथ जो पूरी तरह से निर्दोष होते हुए भी उन चारदीवारी में कैद होकर रह गया है…
इतनी लंबी चौड़ी दलीले देने का एकमात्र कारण बस यह है कि अगर कोर्ट का समय अभी बाकी है तो हमारे काबिल दोस्त एक दर्द की गोली खाकर भी कोर्ट का सहयोग कर सकते हैं…
बाकी अगर उनकी तबीयत कुछ अधिक ही नासाज़ है, तो हम इस बारे में और कुछ नहीं कहेंगे बाकी आगे का निर्णय न्यायाधीश महोदय स्वयं लेंगे…..|”
” साजन खंडेलवाल जी आपकी कहीं सारी बातें शत शत प्रतिशत सही है… न्यायालयीन कार्यों में न्याय, पक्ष को साबित करने में अक्सर लंबा वक्त लग जाता है | लेकिन यह भी एक आवश्यक प्रक्रिया है क्योंकि जिस तरह आप अपने मुवक्किल की तरफ से बार-बार यह कह रहे हैं कि वह निर्दोष है और आप इस बात को साबित करना चाहते हैं, वहीं इस केस का दूसरा पक्ष यह है कि एक युवती का खून हुआ है, उसे अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा है| अब ऐसे में उसके साथ यह जघन्य हत्याकांड किसने किया है? इस पर भी न्यायालय को भी ध्यान देना है | तो हम पूरी तरह से यह चाहते हैं कि न्यायालय इस केस में निष्पक्ष निर्णय दे…. निष्पक्ष निर्णय के लिए वादी और प्रतिवादी दोनों ही पक्षों के वकीलों का पूरी तरह से स्वस्थ होकर न्यायालय में अपनी उपस्थिति देना अति आवश्यक है! इसीलिए आप दोनों को ही हम यह निर्देश देते हैं कि केस की अगली सुनवाई पर आप लोग अपने स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखते हुए सारे सबूतों और गवाहों के साथ अपनी बात को प्रस्तुत करें…
अदालत अगली तारीख तक के लिए मुल्तवी की जाती है, अगली तारीख भी कोई बहुत दूर की नहीं है.. परसो ही न्यायालय के प्रातः सत्र में ये केस देख लिया जायेगा… “
साजन और सुयश ने झुककर न्यायाधीश महोदय को आभार प्रकट किया और अपने अपने पेपर संभालने लगे….
क्रमशः
aparna……
