
तू बन जा गली बनारस की… -44
साजन तिवारी जी के साथ बिक्रम से मिलने पहुँच गया…
बिक्रम को उसी तरह बेड़ियों में जकड कर लाया गया.. बिक्रम उन लोगों को नमस्कार करके वहीँ बैठ गया…
“आपने बड़ी जल्दी डायरी ख़त्म कर ली.. ?”
मुस्कुरा कर साजन ने उसकी डायरी उसे वापस कर दी….
“इसमे मर्डर के बाद का कुछ भी नहीं मिला.. ?”
“ज़ाहिर है… इस डायरी में इसके बाद का कुछ लिख ही नहीं पाया था… दरअसल उस रात जब मैं बार में बैठा ये डायरी लिख रहा था, तब असन भी वहाँ चला आया.. काफी देर तक हम दोनों वहाँ साथ बैठें बातें करते रहे, फिर मुझे लगा की देर हो गयी है पन्ना शायद इंतज़ार करती सो ना गयी हो, और इसलिए मैं असन से बिदा लेकर अपने रूम की तरफ बढ़ गया…..
मैं कमरे में पहुँच कर बेल बजाने वाला था की मुझे लगा कहीं पन्ना की नींद ना ख़राब हो जायें.. लेकिन मैं कीज़ लेकर जाना भूल गया था..
इधर उधर देखते मैं अंदर जाने की सोच रहा था की मेरा हाथ दरवाजे के हैंडल पर गया और मैंने देखा दरवाजा खुला था… एक झटके से दरवाजा खुल गया, और मैं भीतर चला गया…
लिविंग एरिया पार कर के मैं बैडरूम की तरफ बढ़ गया… मैंने सोचा अगर पन्ना सो चुकी होगी तो मैं चुपचाप लिविंग एरिया में सो जाऊंगा..
लेकिन बैडरूम में मैंने जो देखा की मेरी साँस ही रुक गई…
बिस्तर पर पड़ी पन्ना खून से लथपथ छटपटा रही थी.. उसे देखते ही मैं भाग कर उस तक पहुँच गया.. वो आधे अधूरे शब्दों में कुछ बताना चाह रही थी… उसने एक तरफ इशारा किया मैंने बिस्तर पर देखा एक गन पड़ी थी.. हड़बड़ी में मैंने वो गन उठा ली…
…और तभी दरवाजे से तेज कदमो से दौड़ते हुए किसी के आने की आहट हुई.. मैंने देखा हीरक उसकी पत्नी और एक होटल स्टाफ वहाँ भागता हुआ चला आया …
..मैंने हीरक को देखते ही उसे मदद के लिए पुकारा..
“जल्दी करो हीरक !पन्ना को इसी वक़्त हॉस्पिटल लें जाना होगा.. !”
हीरक मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूरने के बाद मेरे पास आया और मुझे एक थप्पड़ रसीद कर गया..
“कमीने !!हमारी बहन की जान लेने के बाद अब झूठा नाटक रच रहे हो.. !
मैंने तुरंत पलट कर देखा की पन्ना अपने भाई को कोई इशारा दे सके.. लेकिन तब तक पन्ना ने हमेशा के किये अपनी ऑंखें मूँद ली थी.. ये सब देख कर हीरक की पत्नी वहीँ बेहोश हो गई.. और मेरे बार बार चीख चीख कर अपनी बेगुनाही बताने के बावजूद मुझे आनन फानन वहाँ की पुलिस पकड़ कर लें गई….
ना वहाँ किसी ने मेरी बात सुनी और ना ही समझी.. वो तो बाद में समझ में आया की शायद ये लोग पहले ही मुझे इस सब में फंसाने का सोचे बैठें थे… “
“बिक्रम ! आपने असन से मदद क्यों नहीं मांगी.. वो तो आपकी बेगुनाही का सबसे बड़ा सबूत था.. “
“कैसे मांगता.. ? जब मुझे वहाँ कुछ पलों के लिए भी रुकने ही नहीं दिया गया.. तुरंत ही वहाँ की पुलिस ने पन्ना की बॉडी को कब्ज़े में लिया और फॉरेंसिक वालों के पास भेज दिया.. मुझे तुरंत ही थाने लें गए… वहाँ इतनी ढ़ेर सारी पूछताछ के बावजूद कोई मेरी बात सुनने को तैयार नहीं था…..
बहुत कठिन गुज़ारे मैंने वो चार दिन.. उधर पन्ना की मौत का कारण जांचने के लिए उसकी बॉडी की ऑटोप्सी हुई..
और इधर पुलिस वालों ने मुझे मार मार कर मेरी हालत ख़राब कर दी… बहुत कुछ झेलने के बाद मुझे इंडियन पुलिस के हवाले कर दिया गया.. उसी बीच पन्ना की बॉडी को भी इण्डिया लाया गया…
मै उसके अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहता था… क्योंकि भले ही कैसी भी परिस्थितियों में हमारी शादी हुई हो, भले ही मुझे उससे मुहब्बत ना हुई हो लेकिन साथ रह कर एक हमदर्दी तो पनप ही गई थी.. उस पर जब उसने मुझे बताया की उसके भाई ही उसे मरना चाह रहे हैं, और उसके बाद वो मर भी गई तब ऐसे में उसे इंसाफ दिलाने की भी एक चाह मन में जग गई थी…
.. लेकिन वहाँ हवेली पर अलग ही माहौल था… मै पुलिस वालों से ज़िद कर के मजिस्ट्रेट की इजाज़त से हवेली पहुंचा भी लेकिन वहाँ हीरक और रत्न की आँखों में मुझे देखते ही खून उतर आया…
वो दोनों ही मुझ पर झपट पड़े और पुलिस वालों के सामने ही मुझ पर लात घूंसे बरसाने लगे…पुलिस भी चुप खड़ी यूँ देख रही थी जैसे वो इस सब का हिस्सा है..अपने मन की सारी भड़ास निकलने के बाद उन्होंने मुझे उठा कर बाहर फेंक दिया..
.. मुझे उन लोगों की सोच से फर्क भी नहीं पड़ता था, क्योंकि जो लोग अपनी बहन के सुख का नहीं सोच सके और उसे मौत के घाट उतार दिया वो मेरे लिए क्या सोचते..?
मै बस चौधरी साहब को अपनी बेगुनाही का यक़ीन दिलाना चाहता था पर उनकी उस वक़्त हालात बहुत ख़राब थी..
सारी हवेली में कोई दिल से दुखी था, तो वो थे चौधरी साहब.. पन्ना के मर जाने से उनके प्रेम की आखिरी निशानी भी हमेशा के लिए चली गई थी.. मुझे उस बूढ़े बाप पर तरस आने लगा था लेकिन उनसे कहीं ज्यादा तरस अब मुझे खुद पर आने लगा था..
पुलिस जब मुझे पकड़ कर लें जाने लगी तो सुयश मेरे सामने आ गया….
“देख लिया ! हम चौधरीज़ और राणा क्या कर सकते हैं.. ?
मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा और वो मुस्कुरा दिया..
साजन दुःख से भारी आँखों से बिक्रम को देखने लगा..
“आपसे इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई बिक्रमादित्य.. हमें लगा था खुद को बचाने आप कुछ तो करोगे.. ? पर आप तो बिलकुल ही बेवकूफ़ निकलें… आपको पन्ना ने अपनी मौत की प्लानिंग के बारे में भी बता रखा था बावजूद आप उसे अकेली छोड़ बार में चले गए… “
“गलती तो वाकई बहुत बड़ी हो गई मुझसे.. और अब बैठ कर पश्चाताप करने के अलावा चारा ही क्या बचा है.. जिन लोगों ने पन्ना की जान ली है, वो लोग खुलेआम घूम रहे, उल्टा मुझ पर इल्जाम लगा दिया गया… .
बल्कि मुझे यह भी लगता है कि इन लोगों का शुरू से यही प्लान रहा होगा कि पन्ना को मार कर उसका इल्जाम मुझ पर डाल दिया जायें.. “
साजन अब साथ बैठें तिवारी जी को देखने लगा..
“आपने जब बिक्रम कि तरफ से केस लिया तो अब तक में कोर्ट में क्या क्या हुआ.. केस कहाँ तक बढ़ा है… ?”
“अरे का केस आगे बढ़ा.. कुल जमा तीन हियरिंग हुई रहीं… अब पहली हियरिंग में तो वादी के वकील ने वाद दायर करने में पूरा वक़्त निकाल दिया.. दूसरी दफा जब हम इनकी तरफ से बोलने को हुए तब उन्होंने इन पर आरोप लगा कर सबूत पेश करने शुरू कर दिये…
तीसरी हियरिंग भी बस यूँ ही निकल गई… और उसके बाद हमारा एक्सीडेंट हो गया.. !”
“क्या सबूत पेश किये थे वकील ने.. !”
“उनके पास सबूत ही सबूत थे.. हीरक उसकी पत्नी होटल स्टाफ सभी ने बिक्रम के हाथ में गन देखी थी.. इसके अलावा गन पर बिक्रम के हाथों के निशान थे..
पन्ना कि फॉरेंसिक रिपोर्ट में भी ये बात साबित हुई कि उसके शरीर पर भी बिक्रम के हाथों उँगलियों के निशान पाए गए हैं… “
साजन अपने माथे पर उँगलियाँ फिराते कुछ सोच में पड़ गया….
“आपने बिक्रम कि लिखी ये डायरी वहाँ पेश कि थी.. ?”
“वो किसलिए.. !”
“अरे इसमे साफ लिखा है कि बिक्रम से पन्ना ने अपनी मौत के प्लान का ज़िक्र किया था…
अच्छा एक बात और, क्या आपने असन और अतिया से बात की.. ? “
“नहीं.. ! पहला तो ये डायरी वहाँ उड़ा दी जाएगी क्योंकि उनके अनुसार ये कातिल के हाथों लिखी डायरी है.. जिसे वो बाद में भी जेल दाखिल होने के बाद भी लिख सकता है और पेश कर सकता है.. इसका वहाँ कोई रोल नहीं माना जायेगा.. बाकी बची असन और उसकी बीवी, तो उनका हमारे पास कोई कॉन्टेक्ट नंबर था नहीं.. उन्हीं को ढूंढने हम जा रहे थे तभी हमारा एक्सीडेंट हुआ था.. “
“इसका मतलब उनसे मिलने से आपको रोका जा रहा था…. खैर..
ये बताइये की अगली हियरिंग के लिए आपने अप्लीकेशन लगायी थी उसका क्या हुआ.. ?”
“आज शाम तक जवाब आ जाना चाहिए… असल में जज श्रीपति बाजपेयी जी की बेंच पर ये केस लगा है.. उनकी डेट जिस दिन की मिल जाएगी उसी दिन केस शुरू हो जायेगा… “
“जज साहब स्वभाव से कैसे हैं…. मतलब हाथ कैसे हैं उनके.. “
साजन की बात तिवारी जी की समझ में आ गई.. और वो मुस्कुरा उठे..
“हाथ बिलकुल सुथरे निखरे हैं उनके.. टेबल के नीचे से कोई काम करना वो पसंद नहीं करते… ईमानदारी में वो सच्चा सोना है.. अगर उन्हीं के सामने केस पूरा हो पाया तो जीत की संभावना बनती है.. पर एक दिक़्क़त ये है की उनका रिटायरमेंट नजदीक है… सिर्फ सात महीने बचे है उनको रिटायर होने में.. बस उसी बीच इस केस को दौड़ाना होगा… “
“हम्म ! बिक्रम अपनी वो डायरी हमें वापस देना.. कुछ काम पड़ेगा इससे.. !”
बिक्रम ने उस डायरी के साथ ही एक और डायरी भी साजन के हाथ रख दी…
साजन ने सवालिया नज़रों से बिक्रम को देखा..
” मुझे जब जेल लाया गया तब कुछ दो दिन बाद यहाँ के जेलर साहब मुझसे मिलने आये… वो मेरे डैड के पूर्व परिचित थे.. पहले दिल्ली ही रहा करते थे.. उन्होंने जब पहली बार मुझे यहाँ देखा तभी उन्हें झटका सा लगा था, मै तो खैर उस वक़्त आपने आपे में ही नहीं था इसलिए मेरा ध्यान उन पर नहीं गया.. मुझे दाखिल करने के बाद उन्होंने मेरे केस को पढ़ा, लोगों से पूछताछ की और फिर मुझसे मिलने चले आये……..
उन्हें मुझसे सहानुभूति थी….. उन्होंने सारी बात जाननी चाही लेकिन उस वक़्त मै कुछ कहने की हालत में ही नहीं था..
तबियत बिगड़ सी गई थी… फिर उसी रात तेज़ बुखार चढ़ आया.. कुछ दिन की तिमारदारी के बाद शरीर तो स्वस्थ हुआ पर मन घायल ही रह गया..
ना मेरा किसी से बात करने का मन होता ना मिलने का… जेल में मुझे जो काम दिया जाता उसे चुपचाप पूरा करता और फिर एक कोने में पड़ा रहता.. जेलर साहब को मेरा ये रूप सुहा नहीं रहा था.. उन्होने मुझे बचपन से देखा था.. वो मेरा ज़िंदादिल स्वभाव जानते थे.. आख़िर एक दिन उन्होंने मुझे बैठा कर पूछा की मेरे शौक क्या हैं और वो कौन सी चीज़ है जो ला देने पर मै खुश हो रहूँगा..
मैंने उनकी तरफ देखा और अपनी पुरानी डायरी मांग ली…
उन्होने उसी दिन वापस लौट कर जेल अलमीरा में रखें मेरे ज़ब्त किये सामान के साथ रखी डायरी निकाली और अगले दिन उसे लिए मेरे पास पहुँच गए…
उन्होंने उस डायरी को मेरे हाथ में रखते हुए इसके साथ ये दूसरी वाली भी मुझे थमा दी ये कह कर की उस पुरानी डायरी में अब पन्ने भी ज्यादा बाकी नहीं है तो नयी डायरी में मै चाहूँ तो वापस लिखना शुरू कर दूँ..
मेरे लिए डायरी लिखना साँस लेने जैसा था.. और मैंने इसे वापस लिखना शुरू कर दिया……
बस उसी डायरी को आपको दे रहा हूँ वकील साहब, हो सकता है इसमे भी आपके हाथ कुछ लग जायें… “
साजन ने हाँ में सर हिला कर कर वो दोनों डायरी अपने कब्ज़े में ली और बिक्रम से बिदा लेकर तिवारी जी के साथ बाहर निकल गया… …
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दो दिन बाद ही साजन जब ऑफिस में बैठा किसी ऑफिस के काम को निपटा रहा था उसी वक़्त तिवारी जी का फोन आ गया की अगले हफ्ते केस सुनवाई की डेट मिल गई है…
ये सुनते ही साजन के चेहरे पर मुस्कान चली आई…
मुस्कुरा कर अपनी टेबल पर रखा कॉफ़ी का कप उठा कर उसने अपने होंठो से लगा लिया… की उसी वक़्त उसका फ़ोन बज उठा..
तू बन जा गली बनारस की,
मै शाम तलक भटकूँ तुझ में…..
रिंग टोन सुनते ही उसने फ़ोन उठाया.. फ़ोन अनुराग का था…
” अबे किस कब्र में सो रहे हो.. ?”
“हम किसी कब्र में सोएं, तुम मुर्गा बने बाँग दे दे कर उठा ही मानोगे.. !”
“हाँ फिर.. ? इतना महत्वपूर्ण दिन है और तुम ऑफिस में बैठें ज़ाया कर रहे हो, कोई क्या कहेगा.. एक हम हैं जो तुम्हारे जैसे को झेल रहे, वरना तुम तो दोस्ती के नाम पर वरुण धवन की पिक्चर से भी बड़े कलंक हो… “
“अब क्या कर दिए हम जो ऐसे उबल पड़े हो.. ?”
“अबे यार तुम्हारे चक्कर में दस दिन से ड्राई डे हुआ पड़ा है… गले में ऐसा सूखा पड़ गया है की हमको आजकल लगने लगा है थार का मरुस्थल हमारे ही अंदर फल फूल रहा है.. आज साला अगर बियर नहीं मिली ना तो कसम से कह रहे है…
अनुराग की बात आधे में काट साजन चहक उठा…
“क्या दारू छोड़ दोगे.. ?”
“साले तुम्हें छोड़ देंगे हम… लेकिन दारू छोड़ने का पाप हमसे कतई न हो पायेगा.. तो अब आज की रात हम तुम्हारे फ़्लैट पर पहुँच रहे हैं… हम ओल्ड मार्टीनी लेकर आ रहे हैं..
तुम बढ़िया चिली पनीर बना कर तैयार रहना.. “
“अरे सुनो तो अनुराग.. “
“मर गया अनुराग !अब हम जब तक पिएंगे नहीं, तुमसे कोई बात भी करेंगे नहीं.. तुरंत ऑफिस से घर निकलो हम भी निकल रहे…
क्रमशः
aparna……
