
तू बन जा गली बनारस की.. -41
“तुमसे एक बात बतायें… हीरक और रत्न ने मिलकर हमारा मर्डर करने का प्लान किया है, वो भी यहाँ.. !”
मेरी ऑंखें आश्चर्य से चौड़ी होती चली गयीं.. ये पन्ना क्या कह रही थी.. वो भाई जो अपनी इकलौती बहन पर जान छिड़कते थे, वो पन्ना का खून कर देना चाहते है.. लेकिन क्यों…. ?
“ये तुम क्या कह रही हो पन्ना.. तुम होश में नहीं हो इस वक़्त.. !”
“हम तो उसी दिन होश में आ गए थे, जिस दिन हमें अपने जन्म की हकीकत मालूम चली थी, दादी से.. वो भी बस कुछ दिन पहले ?”
“कैसी हकीकत.. ?”
“तुम्हें हवेली में जो नज़र आती है ना, हमारी माँ… वो दरअसल हमारी माँ नहीं है.. !”
“फिर.. ?”
“लोगों को लगता है कि चौधरी साहब ने पहली बीवी के मरने के बाद दूसरी शादी की और उस दूसरी शादी से हम पैदा हुए.. पर यह सही नहीं है… दरअसल हमारे बाबूजी की एक दोस्त थी, दूसरी जात की… उनसे बाबूजी के गहरे संबंध थे, और उन्हीं संबंधो की परिणति हम हैं…
. जब हमारी माँ को पता चला की हम पैदा होने वाले है, तो वो हमसे छुटकारा पाने की कोशिश में लग गयीं.. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, उनका चौथा महीना लग चुका था और डॉक्टर ने कुछ भी मदद से इंकार कर दिया….
तब बाबूजी ने उनसे शादी कर लेने की इच्छा जाहिर की लेकिन हमारे दादा बिलकुल तैयार नहीं हुए… उस वक़्त बाबूजी घर छोड़ कर चले गए, और हमारी माँ के साथ रहने लगे… उस वक़्त हीरक सात आठ साल का था और रत्न चार पांच साल का….
फिर हम पैदा हुए, लेकिन हमारे पैदा होने मैं काफी सारी कॉम्प्लिकेशंस थी और इसलिए हमारी माँ को बचाया नहीं जा सका….
हमें गोद में लिए बाबूजी हमें प्यार से देख भी नहीं पाए थे की हमारी माँ के न रहने की खबर मिली.. माँ की खबर से थोड़ा उबरे की दादा जी के ना रहने की खबर चली आई….
बाबूजी हमें गोद में लिए अपने घर वापस लौट गए.. अब वो घर में सबसे बड़े थे, उनके खिलाफ जाने की किसी की हिम्मत नहीं थी.. बड़ी माँ ने उनका विरोध करना चाहा लेकिन बाबूजी ने कब किसकी सुनी थी.. और आख़िर दिल ही दिल में बिसूरति वो भी हम सब को छोड़ गयीं…
यानी हमारे छैः महीने के होते होते हमारे घर पर तीन लोग मारे जा चुके थे..
सोच कर देखिये हम कितने बड़े मनहूस थे….
बाबूजी की जगह कोई और होता तो हमारे ऊपर मनहूस का ठप्पा लगाकर हमे इतनी दूर फेंक आता जहाँ से वापसी की कोई गुंजाईश ना होती….
लेकिन वो बाबूजी थे हमारे, जिन्हें हम जान से ज्यादा प्यारे थे..
वैसे भी चौधरी परिवार में लड़कियों की पैदाइश अच्छी नहीं मानी जाती थी… इस घर को तो अपना खानदान चलाने के लिए सिर्फ और सिर्फ लड़कों की जरूरत थी, और बाबूजी के पास दो लड़के पहले ही मौजूद थे!
लेकिन हमारी नीली आंखों में जाने ऐसा क्या था जो बाबू जी ने हमें अपने सीने से लगा लिया और पलकों पर बैठाकर पाला पोसा….
…. किसी छोटे दूध पीते बच्चे से आखिर कोई कितने दिन तक नाराज रह सकता है..? यही हाल दादी का भी हुआ….
हम सिर्फ 6 माह के तो थे, हमें पालने पोसने के लिए दादी ने बाबूजी के ऊपर जोर डाला और उनकी दूसरी शादी करवा दी….
और इस तरह हमारी नई मां हवेली में चली आई… हमारे बाबूजी का डर ऐसा सब पर काबिज़ था कि वह कभी हमारे साथ कुछ गलत नहीं कर पाई….
और वह कहते हैं ना, साथ रहते रहते तो घर के जानवरों से भी प्यार हो जाता है.. बस वैसे ही कुछ हमारी छोटी मां के साथ भी हुआ ! उन्हें भी हमसे प्यार ना सही सांत्वना तो हो ही गयीं….
एक-एक करके हवेली के पुराने नौकर चाकर माली रसोईया सब रिटायर होते गए और घर छोड़ते गए | धीरे-धीरे नया स्टाफ आने लगा और किसी को यह मालूम नहीं चल सका कि हम छोटी मां की बेटी नहीं है….
… हवेली के लोगों ने भी यह बात किसी को नहीं बताई… इस हवेली के नौकर चाकरों और बाहर घर परिवार के अधिकतर लोगों को यही लगता है कि हम छोटी मां की बेटी है…
हमारी एक ही इकलौती बुआ थी जो काफी ऊँचे और रईस खानदान में ब्याही गई थी.. वह भी बहुत ऊंचे राजपूतों के यहाँ |
और उनसे हमारे जन्म की कथा छिपानी थी, इसलिए हमारी दादी ने उनके घर भी हमारी जन्म की कथा छुपा ली और उन लोगों को भी यही लगा जो बाकी दुनिया को लगता था…..
घर में बस एक पुराना रसोईया अब भी बाकी है जिन्हें सारी सच्चाई मालूम है….
एक दिन वही रसोईया दादी से कुछ बातें कर रहा था, जिसमें कुछ पुरानी बातें निकल आई, और यह सारी बातें हीरक और रत्न ने सुन ली…
हीरक उस वक़्त पंद्रह सोलह साल का हो चुका था| वह तुरंत बाबूजी के पास लड़ने के लिए पहुंच गया…. लेकिन रत्न शुरू से ही समझदार था, बहुत तेज दिमाग का शातिर लड़का…
वो चुपचाप कमरे के बाहर से बाबूजी और हीरक की बातचीत सुनने लगा…. बाबूजी ने जब हीरक के मुंह से हमारे लिए ऊटपटांग बातें सुनी तो उन्होंने हीरक के मुहँ पर तमाचा जड़ दिया और साफ साफ कह दिया कि इस हवेली और बाबूजी की बाकी वसीयत पर जितना हक हीरक और रत्न का है उतना ही हक हमारा होगा….
और बस यहीं से हीरक और रत्न के दिमाग में एक क़भी ना खत्म होने वाली जंग छिड़ गयी…
उस वक्त तो हीरक वहां से बाहर निकल गया… लेकिन उसके दिमाग में यह बात बैठ गई की हम चौधरियों का खून नहीं है… हम ठाकुरों का खून नहीं है| और इसलिए कायदे से हमें कुछ भी नहीं मिलना चाहिए….|
… वैसे हमारे खानदान की बात की जाए तो, हमारे यहां लड़कियों को वसीयत का हिस्सा दिया भी नहीं जाता | बुआ जी की भी शादी बहुत अच्छी की गई थी, लेकिन उन्हें वसीयत में से कोई हिस्सा नहीं दिया गया था | हालांकि यह और बात थी कि अपने पति के गुजर जाने पर वह अपने इकलौते बेटे को लेकर हमारे घर ही रहने चले आई, और बाबू जी ने उन्हें पूरी इज्जत और सम्मान के साथ अपने घर पर आसरा दिया |
बावजूद वह अब भी दादाजी की मिल्कियत की हिस्सेदार नहीं थी…
जवान होने के बाद जब हीरक और रत्न ने बाबू जी के काम को संभाला तब उन लोगों ने वापस एक बार बाबूजी से इसी बारे में बात की…
… उन लोगों ने बुआ जी के बारे में भी उन से कहा कि जब दादाजी की वसीयत से बुआ जी को कोई हिस्सा नहीं दिया गया तो फिर उनकी उसी वसीयत की हिस्सेदार हम कैसे हो गए… ?
हालांकि हीरक और रत्न ने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि इन सारी बातों का असर वह हमारे और अपने रिश्ते पर नहीं पड़ने देते थे…
हीरक तो फिर भी हमारे साथ सामान्य रहा करता था लेकिन रत्न का व्यवहार हमारे साथ ऐसा था कि लगता, जैसे हम पर वो जान छिड़कता है और हमें अपनी छोटी बहन नहीं बल्कि बेटी मानता है…
… हम खुद इस मुगालते में जी रहे थे कि हमारे दोनों भाई हमको बाबूजी के बराबर ही प्यार करते हैं….
… लेकिन जिस वक्त तुमसे हमारी शादी की बात चल रही थी, उसी वक्त एक रात दादी ने हमें बुलाकर हमारे जन्म की सारी असलियत हमारे सामने रख दी.. और साथ ही हमें आगाह भी किया की हीरक और रत्न शायद इसी बात के इंतजार में है कि हमारी शादी हो और हम इस हवेली से हमेशा हमेशा के लिए दफा हो जाएं….
तब हमें समझ में आया कि, इसीलिए शायद जब हमने बाबूजी के सामने आपसे शादी करने की इच्छा जाहिर की थी इंजीनियर साहब, तब क्यों रत्न और हीरक भी इस शादी के लिए इतने ज्यादा उतावले हुए पड़े थे…
.. हमें आश्चर्य भी हुआ कि एक ऐसा घर परिवार जो किसी भी तरीके से हम चौधरियों की बराबरी में खड़ा नहीं हो सकता था, उसके लिए परिवार में सब के सब लोग इतनी आसानी से मान कैसे गए..?
पर उस वक्त हमने इस बात पर ध्यान नहीं दिया…. क्योंकि हम अपनी शादी से बेहद खुश थे | दादी ने भी हमें सिर्फ इतना ही कहा था कि हीरक और रत्न हमारी शादी करवा कर हमारी जिम्मेदारी से जल्द से जल्द मुक्त होना चाहते हैं… हमें इस हवेली से दूर करना चाहते हैं !
हमें यह बात इतनी बुरी लगी भी नहीं….. लेकिन फिर जिस दिन शादी के बाद हनीमून पर जाने का पैकेज सुयश बुक कर रहा था उस समय उसने हमें फोन करके बुलाया.. हालाँकि सुयश बेहद नशे में था, और शायद उसी नशे कि पिनक में या हमारी बाँधी राखी कि लाज रखने उसने हमें कुछ ऐसा बताया जिसे सुनकर हमारे रोंगटे खड़े हो गए…
और उसके बाद उसने हमसे जो कहा वह सुनकर हमारे होश उड़ गए | उसने हमें साफ तौर पर यह बताया कि हीरक और रत्न का प्लान है कि इस टूर से हम जिंदा वापस ना लौट सके….
सुयश ने हमें आगाह करते हुए कहा कि हम मॉरिशस घूमने जाने से मना कर दें और आप को साथ लेकर कहीं और निकल जाए लेकिन हम भी अपनी ज़िद के पक्के थे,|
हमने भी सुयश से कह दिया कि अगर हमारे भाई हमें मारना चाहते हैं तो ठीक है वह भी आजमा लें कि हम क्या चीज हैं…?
आखिर हमारे भाइयों ने यह कैसे सोच लिया कि हम में ठाकुरों का खून नहीं है….
… मां हमारी चाहे कोई और रही हो… लेकिन हममें और हीरक रत्न में एक ही बाप का खून बह रहा है ! ठाकुर माणिक चौधरी का !”
अगर उनका खून उबाले मार सकता है तो हमारे खून में कैसे ठंडक रहेगी…?
हम तो फिर भी औरत हैं.. और हर एक किस्म, हर एक प्रजाति में औरतें ही बदला लेने के लिए मशहूर रही है….
हमने उसी रात ठान लिया कि…. “
पन्ना की बातें सुनते मेरी धड़कने बढ़ती जा रही थी.. आखिर मुझसे नहीं रहा गया… और मैंने उसे टोक दिया…
” सुयश जैसे इंसान पर तुमने भरोसा कर लिया पन्ना.. ? मुझे तो वह आदमी हीरक और रत्न से भी कहीं ज्यादा गया बीता लगता है..!”
” आप सही कह रहे हैं इंजीनियर साहब ! वह है भी ! लेकिन उसके साथ एक बड़ी बात है कि वह अपने पेशे के लिए ईमानदार है… हम जानते हैं कि वह चौधरियों के लिए मन में कुछ बहुत खास अच्छी फीलिंग नहीं रखता क्योंकि उसके मन में हमेशा से यही था कि उसकी मां को ना ही उसके मायके वालों ने और ना ससुराल वालों ने किसी ने भी उनका हक नहीं दिया | और इसीलिए उसे अपने आप को साबित करने के लिए बहुत बड़ी जंग लड़नी पड़ी | एक तरह से देखा जाए तो सुयश पूरी तरह से सेल्फमेड इंसान है | उसने बचपन से लेकर अब तक बहुत ही ज्यादा स्ट्रगल देखा था.. और शायद इसी कारण ही वो कुछ अलग मिज़ाज का भी है..!
खैर!! वह हम सब चौधरियों को एक ही स्केल से नापता था.. लेकिन साथ काम करते करते उसका और रत्न का रिश्ता काफी करीबी हो गया..
दोनों में भाइयों से ज्यादा दोस्ती का रिश्ता कायम हुआ और आप तो जानते ही हैं कि दोस्ती के रिश्ते से बढ़कर कुछ भी नहीं..!
रत्न को जब जहां कोई भी दिक्कत आती, सुयश उसके सामने ढाल बनकर खड़ा हो जाता! इसी विश्वास के बूते पर रत्ना ने एक दिन सुयश को हमारी मौत का प्लान बता दिया…
सुयश ने हम से राखी बंधवाई थी, और उसी राखी की लाज रखने के लिए वो थोड़ा जज्बाती हो गया.. और अपनी शादी कि अगली रात जब वो कुछ ज्यादा ही पी चुका था तब अपने कमरे में जाने से पहले हमारे पास आकर एक साँस में सब बक गया…
उसकी बेहोशी ने हमारी ऑंखें खोल दी…
और तभी हमने सोच लिया कि हमें मारने से पहले हम हमें मारने वालों को ही मार देंगे…..
” यह क्या कह रही हो पन्ना? तुम पागल तो नहीं हो गई हो?”
” अगर सामने वाला हमें मारना चाहे तब उस वक़्त आपको हमारे ऊपर तरस आने लगा था! है ना !
लेकिन जैसे ही हमने यह कहा कि, हमने यह सोचा है कि हम उन्हें मार दें तुरंत ही आपकी नजर में हम विलन बन गए…
जी ये आपकी गलती नहीं है इंजीनियर साहब!! हम इंसानों का दिमाग हमेशा ही जजमेंटल होता है!
जब आपने हमें खुद के लिए दीवानगी से भरा देखा तो आप हमसे दूर भागने लगे…. जब हमने ढेर सारी कोशिश करके आपको अपना लिया तब आपको हमसे नफरत होने लगी!
और आज जब हमने अपनी कहानी सुनाई तो कुछ पलों के लिए ही सही आपकी आंखों में हमारे लिए एक दया, एक तरह की तरस कि भावना नजर आने लगी…. लेकिन जैसे ही अगले पल हम ने यह कहा कि हम उन लोगों से बदला लेकर रहेंगे और उन्हें ही उनकी मौत मारेंगे तब हम वही पन्ना नजर आने लगे जिससे आपको नफरत थी…”
” यह बात नहीं है पन्ना लेकिन,….. अच्छा एक बात बताओ हीरक सुबह से नजर नहीं आया कहीं तुमने उसे मरवा तो नहीं दिया…!”
” नहीं अब तक नहीं मरवाया, लेकिन आज की रात वो मारा जाएगा…!”
मैं बता नहीं सकता था कि उस वक्त मेरे दिल दिमाग में क्या चल रहा था….
आज की सुबह से लेकर आज की शाम तक जो लड़की मेरे दिल पर धीरे-धीरे काबिज होने लगी थी…. अचानक से एक झटके में दिल से कहीं दूर जा गिरी थी ! मुझे यकीन नहीं था कि पन्ना इतनी शातिर हो सकती है कि अपने ही भाइयों के मर्डर का प्लान बना ले… लेकिन इस सबके साथ एक बात और थी कि अगर वह उन्हें नहीं मारती तो वह लोग उसे मार देते….
यह इन भाई बहनों की एक ऐसी जंग थी जहां पर जीतने वाले को ही जिंदा रहने का हक था और हारने वाले की मौत तय थी..
एक तरफ से स्कूल में पढ़ा डार्विन का प्रिंसिपल “सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट “ मुझे आज सही मायनों में समझ आया था…..
क्रमशः
aparna…..
