
तू बन जा गली बनारस की -38
तिवारी जी से मिलने के बाद साजन को एक बात की संतुष्टि थी की बिक्रम कातिल नहीं था.. और इसलिए अब वो पुरे मन से उसके पक्ष मे लड़ने को अपना मन बना चुका था…
आख़िर दो दिन बाद की बिक्रम से मिलने की तारीख़ उसे मिल गयीं… और यही खुशखबरी बताने के लिए उसने अगली शाम धानी के घर का दरवाजा खटका दिया…
धानी ने दरवाजा खोला और सामने साजन को खड़ा पाया तो चौंक गयीं..
“आप यहाँ कैसे ?”
“तुम्हें बताने आये हैं की कल बिक्रम से मिलने जाने वाले हैं… और उसके बाद केस की अगली तारिख के लिए अपील भी लगाने वाले हैं.. क्योंकि तिवारी जी की अस्वस्थता के कारण केस पेंडिंग हो रखा है.. “
हाँ में सर हिला कर उसने यूँ इशारा किया जैसे वो सब समझ गयीं और अब साजन को चले जाना चाहिए…
लेकिन साजन वहीँ मुस्कुराता खड़ा रहा…
“एक कप चाय मिलेगी.. “
धीरे से ना में सर हिला कर धानी कहने लगी..
“आप वापस जाइये साजन ! केस से जुडी बाकी बातें करने हम ही किसी वक़्त समय निकाल कर आ जायेंगे.. लेकिन अभी आप यहाँ ज्यादा देर खड़े रहे तो सुयश को जवाब देना मुश्किल हो जायेगा की हम इतनी देर किससे दरवाजे पर खड़े बात कर रहे थे.. “
“कह देना पड़ोसी था.. !”
“हमारी जान ले लेंगे वो.. !”
“तो मर जाना एक ही बार में.. यूँ घुट घुट कर रोज मरने से एक बार मरना कहीं आसान है धानी.. !बिलीव मी !”
धानी उसे देखती रह गयीं और वो मुस्कुरा कर पलट कर अपने फ़्लैट में चला गया…
“कौन था दरवाजे पर.. किसके साथ गुटरगूं चल रही थी.. ?”
धानी सुयश की तेज आवाज़ सुन कर समझ गयीं की सीसीटीवी में देख कर ही सुयश बाहर आया है.. शुक्र था की दरवाजे पर खड़े इंसान की शक्ल पर कैमेरा एंगल नहीं था…
डर के मारे धानी पसीने से सराबोर हो गयीं.. एकबारगी उसे लगा, आज तो सुबह सुबह ही सुयश उसकी आरती उतार देगा.. इधर तीन सालों में सुयश जैसे जंगली का हाथ भी धानी पर बहुत खुल गया था…
खाना पसंद नहीं आया तो धानी पर थाली फेंक देना.. शर्ट ठीक से आयरन नहीं है तो धानी को थप्पड़ लगा देना जैसी बातें आम हो गयीं थी.. और जाने किस मज़बूरी में धानी इन सारी बातों को अपनी किस्मत मान कर सहती चली जा रही थी…
उसके पास इस घर से बाहर कोई सहारा भी तो नहीं बचा था.. उसे अब भी अच्छे से याद थे शादी के वो शुरुवाती दिन जब कानपुर आने के बाद उसने पगफेरे के लिए अपने घर जाने की इच्छा जताई थी..
“हाँ ठीक है हमारा भी बनारस में काम है, तुम्हें भी लिए चलेंगे.. तुम अपने घर चली जाना.. ! वैसे भी वहाँ तुम्हारे लिए एक सरप्राइज़ है !”
एक छोटी सी राहत महसूस कर धानी खुश हो गयीं थी… लेकिन जब बनारस में उसे सुयश ने उसके घर के सामने उतार कर अपनी गाड़ी चौधरियों के घर की तरफ मोड़ी तो पहली बार धानी को महसूस हुआ था की किसी कैद से छूटना क्या होता है……
उसने औपचारिकता के लिए भी सुयश को अंदर नहीं बुलाया…
और भाग कर अपने घर के भीतर चली गयीं… उसे अचानक आया देख उसकी माँ ख़ुशी से चीख उठी.. उन्होंने दौड़ कर धानी को गले से लगा लिया…
“आज सुबह से हमें लग रहा था की आज कुछ अच्छा होने वाला है.. आज तुम्हारे पापा का भी खीर खाने का मन था इसलिए खीर भी बनायीं और देखो तुम आ गयीं.. !”
धानी को अपने घर में उस समय जो ख़ुशी और सकून मिल रहा था वो बेशकीमती था.. दुनिया की हर लड़की ससुराल से पहली बार मायके आने पर जो महसूस करती है उसका वाकई कोई मुकाबला नहीं…
स्वर्ग की सारी ज़मींदारी एक तरफ और ससुराली लड़कियों के लिए मायके का सुख एक तरफ !!
कहाँ जा सकता है की इस वक़्त धानी को कोई स्वर्ग का लालच दे तो वो उसे भी आसानी से ठुकरा जाती…
अपनी माँ की रसोई जहाँ झांकना उसे क़भी भी पसंद नहीं था, वहीँ आज एक एक डब्बे को हाथ में लेकर प्यार से सहला कर रखती जा रही थी धानी.. हॉल में टंगी वो तस्वीर जो क़भी पेंटिंग क्लास में उसने बनायीं थी और जो पेंटिंग का उस वक़्त का सबसे खराब नमूना थी, को भी उसके माता पिता ने शान से फ्रेम करवा कर रखा था.. सब पर ममता से हाथ फेरती धानी अपने बचपन में लौट गयीं थी…
अपने माता पिता की तस्वीर को हाथ में लिए वो देख रही थी की उसकी माँ ने उसे आवाज़ लगा दी…
“जा धनिया ये चाय आपने पापा को दे आ, अपने कमरे में ही है.. !”
“पापा तो जरुरत पड़ने पर भी छुट्टी नहीं लेते, फिर आज गुरुवार के दिन घर पर कैसे.. ?”
धानी को बड़ा आश्चर्य हुआ की आज उसके पापा घर पर कैसे हैं.. ?
“चल पहले मिल तो ले.. हम दोनों की चाय और तेरी पसंद की पापड़ी हम लेकर आते है.. !”
धानी एक हाथ में कप थामे अपने पापा के कमरे में गयीं तो उन्हें बिस्तर पर लेटे हुए कुछ पढ़ते देखा और मुस्कुरा कर उनके गले से लग गयीं..
“आज छुट्टी वाले दिन आप घर पर कैसे.. ? मालूम चल गया था क्या की हम आने वाले है.. !”
“अब हम कहाँ ऑफिस जाते हैं धनिया.. ! घर से ही थोड़ा बहुत बही खाता जो देखना होता है चौधरी जी भेज देते हैं.. वही काम निपटा कर दे देते हैं.. काम बहुत कम हो गया है हमारा, पर चौधरी जी का बड़प्पन है, तनख्वाह अब भी पूरी दे रहे है.. !”
“पर क्यों.. ?”
आश्चर्य से धानी की ऑंखें चौड़ी हो गयीं थी की धानी के पिता ने अपने पैरो पर पड़ी चादर पलट दी.. उनके घुटने से नीचे के पैर नहीं थे और धानी के मुहँ से चीख निकल गयीं..
उसकी चीख सुन उसकी माँ भी वहीँ चली आई…
“तेरी शादी से लौट रहे थे तब हमारा जबरदस्त एक्सीडेंट हो गया था धनिया.. बस ये कहो की भोलेनाथ की कृपा से जीवन बच गया.. पर जैसा एक्सीडेंट था हम लोगों का बचना मुश्किल ही था…. “
“हमसे कुछ कहा क्यों नहीं.. ?एक फ़ोन तक नहीं..
फ़ोन की बात कहते ही उसे याद आ गया की सुयश ने उस रात जब उसने बिक्रम का फ़ोन नंबर ब्लॉक कर दिया था और सुयश को अपना फ़ोन दिया था तब तो सुयश ने कॉल लिस्ट चेक कर के उसे फ़ोन वापस कर दिया पर अगले दिन सुबह ही उसके फ़ोन पर जब किसी अनजान नम्बर से किसी लड़के ने फ़ोन किया तब गुस्से में सुयश ने उसका फ़ोन ज़मीन पर पटक कर तोड़ दिया था… उसके बाद शादी को आज दस दिन बीत चुके थे पर उसके पास फ़ोन नहीं था…
“माँ हमारा फ़ोन नहीं लग रहा था, तो कम से कम इनके नंबर पे हमें कॉल करके बता देती.. ?हम मिलने तो आते.. ?” धानी की आवाज़ कांपने लगी थी.. ऐसा लगा वो अपनी रुलाई जबरदस्ती रोकने की कोशिश कर रही है…
“बताया तो था धानी.. ! तुम्हारा फ़ोन न लगने पर सुयश बाबू को ही फ़ोन किया था | हमें लगा उन्होंने तुम्हें बताया होगा, पर नयी नवेली गृहस्थी की झंझट में तुम आ नहीं पा रही हो.. !”
धानी ने अपना सर पीट लिया …
और उसे उस वक़्त पूरा यक़ीन हो गया था की उसके माँ पापा के एक्सीडेंट के पीछे सुयश का ही हाथ है…
रोती हुई धानी को उसकी माँ ने अपने गले से लगा लिया था…
“तू रो मत धानी… बेटा चौधरी जी को जैसे ही इस एक्सीडेंट का पता चला उन्होंने इन्हे घर से ही काम करने की सलाह दे दी.. और सारा काम घर ही भेजने लगे… एक्सीडेंट के लगभग चार पांच दिन बाद हम लोग अस्पताल से घर वापस आ पाए थे… उसके बाद एक शाम कुंवर सा घर आये थे.. “
“कुंवर सा मतलब सुयश.. ?” धानी की आंखें चौड़ी हो गयीं…
” हाँ ! और अपना एक आदमी यहाँ छोड़ गए.. कहा की कोई भी जरूरत हो ये आदमी पूरा कर देगा… !”
धानी को समझ आ गया था की सुयश ने अपना कोई गुंडा ही यहाँ रख छोड़ा होगा…
उसने एक बार बाहर झांक कर देखा और उस गुंडे के पास रखी गन भी धानी को दिख गयीं…
वो क्या क्या सोच कर आई थी..
उसे लगा था, अपने मन की पीर वो अपनी माँ से कह सकेगी, लेकिन यहाँ की स्थिति देख उसे समझ आ गया था की, ये सुयश की घेराबंदी इसीलिए है की धानी उसकी कोई शिकायत अपने घर पर ना कर सके…
जो आदमी उसके पिता का एक्सीडेंट करवा सकता है, कल को वो उन्हें मरवा भी तो सकता है.. !
यही सब सोच कर धानी फिर अपनी माँ से कुछ नहीं कह पायी थी…
अपनी माँ की गोद में सर रखें धानी खुद को अपने असुरक्षित भविष्य के लिए तैयार करती रही थी.. और शाम को सुयश के आते ही चुपचाप उसके साथ बैठ कर वापस चली गयीं थी…
माँ ने कितने मन से खाना बनाया था की पहली बार बेटी और दामाद आये हैं तो खा कर आज की रात यही रुक जायें.. पर किसी और जगह रात रुकना तो सुयश को क़भी गवारा ही ना था.. माँ बार बार गुरुवार के दिन बेटी घर से नहीं जाती है का अलाप लगाए रखी, पर उनकी बात अनसुनी कर सुयश उसे लेकर निकल ही गया था…
और शायद इसी सरप्राइज़ के बारे में उसने सुबह उसे कहा था…
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“क्या हुआ जवाब दोगी या आज फिर मौनव्रत रख लिया है.. ” सुयश की तेज आवाज़ सुन धानी एकदम से वर्तमान में वापस लौट आई.. उसे साजन की कही बात याद आ गयीं… ‘यूँ घुट घुट कर रोज मरने से एक बार मे मरना कहीं आसान है.. ‘
और धानी ने पलट कर जवाब दे दिया..
“बगल वाला पड़ोसी था.. !”
“,क्यों वो क्या करने आया था.. ?”
” दूध वाले और पेपर वाले का नंबर मांग रहा था.. !”
“क्या बोला तुमने.. ?”
“हमने कह दिया कि दूध वाले का हिसाब हमारे पति रखते हैं इसलिए हमारे पस नंबर नहीं है | और अख़बार भी शाम में घर वापस आते हुए वो ही लेकर आते हैं…. |”
सुयश ने तीखी नज़र से धानी को देखा और वापस अपनी स्टडी कि तरफ मुड़ गया.. उसे कल ही शाम मालूम चला था कि बिक्रम का केस लेने के लिए कोई नया वकील इच्छुक है.. और इसलिए वो उस केस कि फाइल वापस निकाल कर देख रहा था……
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अगली दोपहर साजन तिवारी के साथ जेल में बिक्रम से मिलने पहुँच गया….
वेटिंग रूम में वो बैठें इंतज़ार कर रहे थे कि एक तरफ का मजबूत लोहे का दरवाजा खुला और दोनों हाथो में हथकड़ियां डाले एक पुलिस वाला बिक्रम को लिए वहाँ हाजिर हो गया…
छै फुट दो इंच लम्बे बिक्रम के कसरती बदन और घनी दाढ़ी मूंछ के बीच भी उसकी घनी पलकों वाली बड़ी बड़ी गहरी आँखों को देख साजन कुछ पलों के लिए उसे देखता रह गया…
..वो असल मायनों में धानी के लिए परफेक्ट था…
अपनी नज़रों के सामने अपने पहले प्यार के प्यार को देख कर भी साजन के सीने पे सांप लोटने कि जगह एक मीठी सी कसक जग रही थी…
उसे लगा अगर धानी और बिक्रम एक हो पाते तो ये दुनिया कि सबसे सुन्दर जोड़ी होती…
बिक्रम चुपचाप आकर उनके सामने कि कुर्सी पर बैठ गया…
“हम साजन हैं.. साजन खंडेलवाल ! आपका केस अब हम लड़ने वाले हैं.. !”
” क्यों शहीद होना चाहते हैं वकील बाबू?”
बिक्रम की गहरी सी आवाज साजन के कानों में कौंध गयीं…
” इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया..
वरना हम भी आदमी थे काम के…
सुना ही होगा आपने.. बस उसी इश्क़ के इश्क़ के लिए लड़ना चाहते हैं… “!
“बड़े शायराना मालूम होते हैं आप ? वैसे मैंने आज से पहले आपको कभी देखा नहीं ? मैं आपको पहचानता नहीं? फिर आपको मुझसे इश्क कब हुआ?”
इतनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद बिक्रम के चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी.. आज बहुत समय बाद उसका मजाकिया स्वभाव बाहर आया था…
उसकी मजाक भरी बात सुनकर साजन के होठों पर भी हंसी चली आई……
” आपको तो हम बचा कर रहेंगे बिक्रम बाबू ! इसके लिए चाहे हमें हमारी जान क्यों ना देनी पड़ जाए?”
“मुझसे इतनी मुहब्बत ना करना ऐ दोस्त,
सुना है मुझसे इश्क़ करने वाले फ़ना हो जाते है.. “
बिक्रम की बातों से उसकी हताशा साफ झलक रही थी लेकिन साजन भी अब ज़िद पर आ चुका था, की वो अपनी धानी को उसका प्यार दिलवा कर रहेगा….
क्रमशः
aparna…..
