गली बनारस की -37

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की… -37

साजन का दिमाग चकराया  हुआ था,  क्या कोई आदमी ऐसा भी हो सकता है.. इतनी तालाबंदी में अपनी बीवी को रखना, किसी से मिलने जुलने  नहीं देना ये सब पज़ेसिवनेस नहीं पागलपन है..

“धानी एक बात पूंछे ?”

“पूछिए.. !”

“तुम अभी  लगभग दो ढ़ाई घंटे से अपने घर से बाहर हो, क्या वापस आकर सुयश तुमसे सवाल नहीं करेगा की तुम कहाँ थी.. ?”

“करेंगे ही.. लेकिन हमने अभी आपके घर आने से पहले कैमेरा का एंगल मेन डोर से हटा कर दूसरी तरफ यानी बालकनी की तरफ कर दिया है.. और वो ऐसे किया की कैमेरा में ये दिखा है की हम डस्टिंग कर रहे है.. मतलब ये की डस्टिंग के दौरान कैमेरा पोंछने में गलती से उसका एंगल बदल गया…
  असल में एक बार पहले साफ सफाई के दौरान हम से ऐसा हो चुका है तब घर आने के बाद सुयश ने उसे ठीक कर दिया था.. बस आज वही बात दिमाग में आ गयीं.. और वैसे भी वो बनारस के काम के बाद दिल्ली निकल गए हैं.. अब कल तक वापस आएंगे.. वहाँ ज्यादा काम रहने से वो कैमेरा चेक नहीं कर पाते…
खैर !अब बहुत देर भी हो गयीं है.. हम चलते हैं.. बस आपसे यही विनती थी की हो सके तो बिक्रम का केस लड़ लीजिये… उसे बचा लीजिये वरना ये लोग उसे जेल के पीछे सड़ा देंगे.. !”

आँसू भरी आँखों से धानी ने हाथ जोड़ दिये.. साजन ऐसा भावुक हो रहा था की एकबारगी लगा धानी के हाथ थाम ले पर दूसरे ही पल सुयश का ख्याल आ गया और उसने अपने जज्बात काबू कर लिए…

“ठीक है धानी,  हम बिक्रम का केस लड़ेंगे..  क्या तुम उसके पुराने वकील का नंबर या अड्रेस दे सकती हो…

धानी ने उस वकील का नंबर लिख कर साजन को दिया और अपने घर जाने के लिए उठ गयीं…

साजन धानी के जाने के बाद लैपटॉप खोल कर आज से तीन साल पहले हुए पन्ना चौधरी मर्डर के बारे में छ्पी हर खबर को बारीकी से पढ़ने लगा..
   उसी वक़्त साजन का फ़ोन बजने लगा…
उसकी माँ का फ़ोन था…

“कैसे हो बेटा, आजकल तो तुम फ़ोन ही नहीं करते . तुम्हें याद भी है की तुम्हारा एक परिवार भी है.. !”

“,हाँ माँ !कैसी बात कर रही है आप.. बस कुछ बिज़ी हो गए थे काम में.. !

“अच्छा सुनो साजन, वो बरेली वाली बुआ जी हैं ना उनकी देवरानी की बेटी…

“माँ !! पहले भी कई बार कह चुके है की हमें शादी ब्याह के बारे में अभी नहीं सोचना है और आप एक बार फिर शुरू हो गयीं..

“अरे बात तो सुनो.. हम ये कह रहीं थीं की..

“अभी कुछ नहीं सुन पाएंगे.. हम फ़ोन रख रहे हैं.. राधे राधे !”

फ़ोन रखने के बाद साजन ने धानी के दिये नंबर पर कॉल किया और उस आदमी से मिलने की इच्छा  जताई..
उस आदमी ने जगह और समय साजन को बता कर बुला लिया…
  अनुराग को फ़ोन कर साजन घर से निकल गया.. शाम हो चुकी थी… साजन नीचे पहुँच कर जब सोसाइटी के मेन गेट की तरफ बढ़ रहा था तब उसकी नज़र वापस धानी की बालकनी की तरफ उठ गयीं.. घर के अंदर रौशनी नज़र आ रही थी,  सुयश तो घर पर था नहीं पता नहीं वो बेचारी क्या कर रही होगी.. साजन अपने ख्यालों में खोया था की बालकनी का दरवाजा खोल कर धानी हाथ में जलता हुआ दिया लिए बाहर चली आई…
  उसके सर पर रखा आंचल हवा से  लहरा रहा था.. उसने वहीँ रखें तुलसी चौरे पर दीपक रखा और हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयीं…
उसे देखते हुए साजन सोच में डूब किया कि औरत की जिंदगी कितनी कठिन होती  है….
हालातों के भंवर में फंसी औरत किस कदर अपने आप को समेटकर समझौता करने लगती है यह कोई धानी को देखकर समझ सकता है….

     चुलबुली अल्हड़ सी लड़की जब से शादी हुई अपने आप को इस कदर बदल चुकी है कि इसे देखकर यह वही धानी है यह पहचानना कितना कठिन हो गया है? बात बात पर हंसने  खिलखिलाने वाली, गाने बजाने वाली लड़की आज इतनी गुमसुम और शांत हो गई है, कि उसके आस पास बैठो तो उसकी सांसो की आवाज भी साफ-साफ सुनाई देती है… ऐसा लगता है जैसे वह किसी गहरे सन्नाटे में डूबी हुई है! किसी अंधेरे कुएं के अंदर बैठी अपनी किस्मत को रो रही है!
     और विधि की कैसी विडंबना है कि अपने जीवन के ऐसे नरक हो जाने के बाद भी वह उस ऊपर वाले के ऊपर विश्वास करके उसके सामने दिया जला रही है… और हाथ जोड़कर जाने उस से क्या मांग रही है…
     साजन वाकई यह सोचने लगा कि धानी जाने इस वक्त क्या मांग रही है…
      पता नहीं धानी हाथ जोड़कर अभी अपने पति की लंबी उम्र मांग रही है या पूर्व प्रेमी की रिहाई..?
पर भगवान आप से यही प्रार्थना है कि धानी इस वक़्त जो भी मांग रही हो उसे दे देना…!

साजन अपनी सोच में गुम मेन गेट पर खड़ा अनुराग का इंतजार कर रहा था कि  अनुराग अपनी बाइक ले वही पहुंच गया उसके पीछे बैठकर साजन ने अनुराग को उस आदमी से मिलने वाली जगह का पता बताया और अनुराग ने गाड़ी भगा दी….

     रास्ते  में अनुराग को साजन ने धानी से जुड़ी कुछ जरूरी बातें बताई, और उससे बिक्रम का केस लड़ने की इच्छा जाहिर कर दी… यह सुनते ही अनुराग अचंभे में आ गया क्योंकि यह बात पहले ही जानता था कि बिक्रम चौधरियों का दामाद है और उसी ने अपनी पत्नी पन्ना का खून किया है….
अनुराग और साजन जिस फर्म के लिए काम करते थे वहां पर चौधरियों का भी काम हुआ करता था! इसीलिए चौधरियों से जुड़ी काफी सारी बातें अनुराग को पहले से ही मालूम थी, उसने साजन पर जोर देना शुरू किया कि वह इस केस को ना लें लेकिन साजन भी अपनी बात का और उसूलों का पक्का था….

     नेतराम की दुकान के सामने अनुराग ने गाड़ी रोकी और जगह को देखकर मुंह बनाने लगा…

तुम्हें उस वकील ने मिलने के लिए यहां बुलाया है? वाह बड़ी एलीगेंट और क्लासी जगह खोजी है उसने… “

  अनुराग को एक नजर देख कर साजन उस छोटी सी गुमटी के भीतर घुस गया वह गुमटी बाहर से दिखने में जितनी छोटी थी अंदर उतनी ही गहरी थी बहुत ज्यादा रोशनी वहां नहीं थी… और लगभग 20-25 अलग-अलग कुर्सी टेबल लगे हुए थे !जहां पर शुद्ध देसी स्टाइल में  वेटर कचोरी और आलू की सब्जी परोस रहे थे….

वहां पहुंचकर  साजन ने उस आदमी के फोन पर रिंग किया…. सबसे अंधेरे कोने में बैठे एक आदमी ने फ़ोन को सुनकर फोन उठा लिया और उसे देखते ही साजन उसकी तरफ बढ़ गया…

” तिवारी जी आप ही हैं..?”

” जी हम ही हैं !आप साजन खंडेलवाल?”

हां में सर हिला कर साजन उनके सामने की कुर्सी खींच कर बैठ गया… अनुराग भी साजन के बगल में बैठ गया कि उसी वक्त वेटर आया और उनकी टेबल पर एक बार झाड़न मार कर पानी का जग और तीन गिलास रखकर चला गया……

” क्या लेंगे आप खंडेलवाल जी?”

” आपका कीमती वक्त और बेहद जरूरी जानकारियां !”

“किस से जुड़ी..?”

” पन्ना मर्डर केस से जुड़ी सारी जानकारियां हमें चाहिए..!”

” क्या क्या जानना चाहते हैं आप?”

” वह सब कुछ जो आपको पता है,  और जो सच्चाई है..! एक बात और जानना चाहते हैं कि आपने इस केस को छोड़ क्यों दिया..?”

” बड़ी लंबी कहानी है लेकिन हम आपको सब कुछ बता देंगे…. हमने केस छोड़ क्यों दिया, उसके पहले तो आपको यह सवाल करना चाहिए था कि चौधरियों के खिलाफ हम बिक्रम की तरफ से खड़े कैसे हुए..
    बात यह है कि बिक्रम के एक मामा जी हैं, जो अमेरिका में रहते हैं… उनके बहुत खास और करीबी दोस्त के हम छोटे भाई हैं..
अपने बड़े भैया के कहने पर ही हमने यह केस हाथ में लिया था… हम सच्चाई के काफी करीब पहुंच चुके थे…. कुछ सबूत हम जुटा चुके थे,कुछ जुटाने  बाकी थे… लेकिन उसी वक्त हमारा एक्सीडेंट हो गया… उस एक्सीडेंट में मरते मरते बचे हैं हम! एक तरह  से भगवान ने हमें दूसरा जीवन दिया,  बस उसके बाद हमारी बीवी ने हमें अपनी कसम खिला दी कि अब इस केस से हाथ हटा लो…
      उसे लगता है कि हमें किसी ने मारने की कोशिश की थी, और वैसे बात भी सही है हम खुद भी जानते हैं कि चौधरियों ने हमें जानबूझकर रास्ते से हटाने के लिए ही ट्रक से हमारा एक्सीडेंट करवाया था…..
.. हम एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार के आदमी हैं! दो छोटे बच्चे हैं एक बीवी  है… अगर हमें कुछ हो गया तो उन तीनों का क्या होगा..? यही सोचकर हम हिम्मत हार गए और हमने अपने बड़े भाई से माफी मांग ली.. “

” मतलब उन  चौधरियों ने आप को मारने की कोशिश की..? आपने कहा कि आपने सबूत जुटा लिए थे? किसके खिलाफ आपने सबूत जुटाए थे? हमारा मतलब है कि..

  साजन की बात आधे में ही काट कर तिवारी जी वापस बोल पड़े….

” हमने बिक्रम की बेगुनाही के सबूत जुटा लिए थे…. और हम बस वह सबूत कोर्ट में पेश करने वाले थे कि हमारे साथ इतना बड़ा हादसा हो गया..!

” इसका मतलब बिक्रम ने खून नहीं किया है?”

” नहीं बिक्रम ने पन्ना का मर्डर नहीं किया है… उस मर्डर के पीछे की कहानी इतनी लंबी चौड़ी है कि अगर सुनने बैठोगे तो चकरा जाओगे..!”

” पर हम सुनना चाहते हैं, जानना चाहते हैं वह सब कुछ, जो बिक्रम को बेगुनाह साबित कर दें!  हम आप के बाद बिक्रम का केस लड़ना चाहते हैं..!

” एक बार अच्छी तरह से सोच लीजिए खंडेलवाल साहब, क्योंकि आप भी बिक्रम का साथ देकर जिन लोगों के खिलाफ खड़े होने वाले हैं, वह लोग आसान लोग नहीं हैं! लोगों की जान ले लेना, लोगों को तबाह कर देना, बर्बाद कर देना उन लोगों के लिए चुटकियों  का काम है…
    उनके लिए आम इंसान, इंसान नहीं मक्खी मच्छर है जिन्हें वह अपनी सुविधा अनुसार मसल कर फेंक देते हैं….

“वो सब जानते हैं हम.. हम ये जानना चाहते हैं कि क्या हम बिक्रम से एक बार मिल सकते हैं.. !”

“जी बिलकुल… हम जेलर साहब के पास आवेदन  लगा देंगे, और जैसे ही बिक्रम से मिलने कि तारिख मिली आपको इत्तिला कर देंगे… “

“ज़रा जल्दी कीजियेगा तिवारी जी… वैसे भी बिक्रम के केस में बहुत देर हो चुकी हैं.. !”

“जी पूरी कोशिश रहेगी कि परसों कि तारीख़ मिल जायें.. वैसे तो अब तक हम उसके वकील हैं, इसलिए अर्जेन्ट अपील लगा सकते हैं लेकिन तब मिलने का समय बहुत कम मुकर्रर किया जाता हैं.. !”

“नहीं हमें तो जरा ढंग से मिलना हैं.. कॉफी सारा वक़्त चाहिए.. इत्मीनान से सुनना चाहते हैं बिक्रम को भी..
“!

“जी जैसी आपकी मर्जी.. !”

  इसके बाद तिवारी से विदा लेकर अनुराग और साजन वहाँ से निकल गए…

“इस सारे मसले में हमारे दिमाग का दही हो गया हैं साजन चलो कैफेटरिया में बैठ कर कॉफी पी ली जायें जिससे थोड़ा दिमाग भी फ्रेश हो जायेगा.. !”

साजन भी उसकी बात मान कर आगे बढ़ गया…

कैफेटेरिया में एक तरफ कि टेबल पर वो दोनों जा बैठें.. पानी पीने के बाद साजन ने टिशू उठाया तो उसे लगा जैसे उस टिश्यू पर कुछ लिखा था…
साजन ने ध्यान से देखा उस पर एक शेर लिखा था…

      मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
       किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी….

साजन उस शेर को पढ़ मुस्कुरा उठा,  उसने अपनी जेब से पेन निकाला और उसी शेर के नीचे एक दूसरा शेर लिखा दिया….

     आज नागाह हम किसी से मिले
       बाद मुद्दत के ज़िंदगी से मिले….

उसे लिखते देख अनुराग ध्यान से उसके लिखे को पढ़ने लगा…

“ये क्या चल रहा हैं साजन भाई ?”

“कुछ नहीं दोस्त.. किसी हम जैसे दिलजले ने यहाँ एक शेर अता फ़रमाया था, हमने नीचे दूसरे शेर से जवाब लिख दिया…

अपनी कॉफ़ी ख़त्म कर साजन उठ कर बाहर निकल गया और उसके पीछे ही अनुराग भी भाग पड़ा….

उन दोनों के उठ कर जाते ही एक नाजुक सा चूड़ियों से खनकता हाथ उस टिश्यू तक पहुंचा और उसे उठा कर रख लिया गया…

क्रमशः

aparna…









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