
तू बन जा गली बनारस की -35
“एक्सक्यूज़ मी !आप इस तरह मुझे मार नहीं सकते, मैं आपको कोर्ट लेकर जा…. बाकी की बात उसके गले में रह गयीं और सुयश की गोली की आवाज़ सारे परिसर में गूंज गयीं….
सुयश ने गन निकाल कर एक हवाई फायर किया और उस लड़के की बोलती बंद हो गयी….
“अब बोलो, इस तरह नहीं मर सकते तो किस तरह मर सकते हो .. ?नहीं अपनी चॉइस बता दो, किस तरह मरना है बे.. ?”
उसी वक़्त कैटरिंग का मैनेजर भागता हुआ आया और उस लड़के को अपने पीछे किये हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया…
“साहब माफ़ कर दीजिये, नया लड़का है, इसी से गलती हो गयीं.. जानता नहीं था हुज़ूर आप सब को.. “
“नए लड़को की भर्ती करते साथ उन्हेँ सबसे पहले तहजीब सिखाया कीजिये मैनेजर साहब.. हम लखनऊ से पढ़े हैं इसलिए तहजीब और अदब हममे कुछ ज्यादा ही है.. !”
“,जी ज़रूर !” वो अपने साथ उस लड़के को खींचता लें गया.. लड़के के होंठ के पास से खून छलक आया था |
गुस्से में जाते जाते वो सुयश को एक भद्दी गली दें गया, वो तो अच्छा था उसकी गाली सुयश के कान तक नहीं पहुंची थी वरना जाने उसका क्या होता…
“समझता क्या है ये सुयश सिंह राणा खुद को ! साला पागल आदमी, इसे तो मैं छोडूंगा नहीं.. !”
उस लड़के के साथी उसे समझाने बुझाने लगे..
“जाने दें यार, वो वाकई पागल है.. तू अभी उसे ठीक से समझा नहीं है… कतई सनकी और पागल है वो.. जिस पर उसका दिमाग सटक गया उसे फ़िर छोड़ता नहीं है, एक तो इसका हत्यारा दिमाग उस पर ये वकील भी है.. लोगों को मार भी डालता है और वो भी बिलकुल ऐसे की मालूम ही ना चले की इसने हत्या की है…. सब कुछ लीगल तरीके से.. “
“लेकिन मैं इसे मारूंगा बिलकुल इलीगल तरीके से.. देख लेना तुम सब…. “
अपने चेहरे से बहते खून को पोंछता वो वहाँ से बहुत गुस्से में बाहर चला गया…
इधर रत्न सुयश के पास चला आया….
“क्या हुआ सुयश, बाबूजी कह रहे थे तुम घूमने नहीं जा रहे हो, यहाँ से सीधे कानपूर निकाल रहे हो.. !”
“हाँ !इस वक़्त घूमने फिरने का वक़्त किसके पास है.. खूब काम पड़ा है.. !”
“अरे नई नई बीवी है, जरा घूमो फिरो एन्जॉय करो.. “
“बीवी के साथ एन्जॉय करने के लिए बाहर घूमने की क्या जरूरत है, उसमें तो हमारा समय ही बर्बाद होना है.. ” सुयश की बात सुन रत्न हंस पड़ा
“तुम नहीं जा रहे हो तो फ़िर वहाँ की सारी व्यवस्था.. !”
“व्यवस्था की चिंता मत करो, वो सब हो चुका है.. इन लोगों को जाने दो घूमने, कहीं किसी तरह की कमी की गुंजाईश नहीं है… सब बात मैंने कर ली है.. “
धानी इतनी देर में एक तरफ खाली कुर्सी देख बैठ गयीं थी.. उसका मन था की उसकी सास भी उसके साथ जाये… उसे सुयश के साथ अकेले जाने में अजीब सा डर लग रहा था…
उसने इधर उधर देखा, आख़िर एक जगह कुछ औरतों के साथ बैठी सुयश की माँ उसे दिख गयीं और वो तुरंत उनके पास पहुँच गयीं..
” माँ आपसे कुछ कहना चाहते थे.. !”
“बोलो बहुरानी !”
” आप भी हमारे साथ चलिए ना कल !”
धानी की आँखों का डर उसकी सास को भी दिखाई दें रहा था… उन्होंने उसे अपने पास बैठा लिया..
“अभी तो हम नहीं जा सकेंगे लेकिन जल्दी ही तुम्हारे पास आ जायेंगे.. वैसे तुम्हें अकेलापन नहीं लगेगा.. पास पड़ोस अच्छा है वहाँ का.. घर के काम काज के लिए एक लड़का आता है, जतिन ! घर के सारे काम के साथ अब तक सुयश का खाना भी वही बनाता था.. अभी भी तुम्हारी मदद कर देगा.. तुम घबराओ मत, सभी लड़कियां ऐसे ही तो अपनी गृहस्थी चलाया करती हैं ना बहुरानी !”
धानी कैसे कहती की वो सुयश से क्यों परेशान थी… उसके सामने एक वेटर खाने की प्लेट रख गया.. लेकिन उसके गले से एक निवाला नहीं उतर रहा था…
कैसी अजीब कश्मकश से भर गयीं थी उसकी जिंदगी… जिसके साथ गुजारना चाहा था वो वहीँ आसपास था पर अब उसे देखने का हक भी वो खो चुकी थी… और जिसके बारे में क़भी सोचा तक नहीं था उसी की लम्बी जिंदगी के लिए उसके नाम का सिंदूर माथे पर सजाये बैठी थी……
वो जरूर बिक्रम को नहीं देख रही थी पर एक अँधेरे कोने में बैठा बिक्रम बस उसे ही देख रहा था….
कुछ देर बाद ही सुयश उसके पास चला आया..
“चलो धानी, कल हमें वापस भी निकलना है.. !तुम्हें अब आराम करना चाहिए.. !”
धानी उसकी बात सुन कर चुपचाप खड़ी हो गयीं और उसकी बांह थामे वो उसे कमरे में लें गया…
कमरे में पहुँचते ही सुयश का रौद्र रूप एक बार फ़िर बाहर आ गया… उसने झटके से धानी के सर पर रखा आँचल खींच कर नीचे गिरा दिया… धानी को एकाएक कुछ समझ नहीं आया और सुयश ने उसे पलट कर उसके बैकलेस ब्लाउज़ की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी…
” वहाँ सबके सामने कितनी मुश्किल से हम चुप बैठें थे क्या कहें तुमसे.. !क्या जरूरत थी इतना गहरा गला पहनने की.. पीछे ब्लाउज़ में दो अंगुल मात्र कपड़ा है.. इतना ही खुद को दिखाने का शौक है तो बिना इसे पहने ही निकल जाती…..
किसने रोका है.. ? ये पहने घूम रही थी तभी तो सारे वेटर लार टपकाते आगे पीछे घूम रहे थे.. अक्ल नाम की चीज है या नहीं.. या सब बेच खायी हो ! वहाँ तो ऐसा दिमाग खराब हुआ था हमारा की लगा जो गन उस वेटर को डराने निकाली है उस से तुम्हे गोली मार दें… इतने वाहियात कपड़े पहनने की तुमने सोची भी कैसे.. ?”
“ये साड़ी और ब्लाउज़ आपके घर से ही चढ़ाव में आया था.. ब्लाउज़ रेडीमेड था इसलिए इतना गहरा गला था.. !”
“तो इसका मतलब ? हमारे घर से आया मतलब तुम्हें पहनने की इजाजत मिल गयीं…. “
“हमने सर से पल्लू लें तो रखा था.. !”
धानी भी खुद को जवाब देने से रोक नहीं पा रही थी, और सुयश का गुस्सा और बढ़ता जा रहा था…
“तुम्हारी साड़ी का कपडा इतना झीना था की तुम्हारी सारी पीठ नज़र आ रही थी.. आइंदा ऐसे बकवास कपड़ों में तुम्हें देखा ना तो हमसे बुरा कोई नहीं होगा..
“क्या करेंगे आप, बोलिये क्या करेंगे.. मारेंगे हमें.. !”
धानी का भी धैर्य चूक गया था… इतने दिन से उसके गले में अटका सब बाहर आने को था, की तभी सुयश का एक ज़ोर का तमाचा उसे वापस यथार्थ की उसी ज़मीन पर पटक गया जिसके बारे में धानी ने सोचा नहीं था की वो इतनी पथरीली निकलेगी…
” हमारे साथ रहना है तो कायदे में रहना सीखो.. ढंग के तमीजदार कपड़े पहना करो.. इधर उधर से बदन दिखाऊ कपड़े हमें पसंद नहीं है… सूयश सिंह राणा की बीवी हो तुम… कोई फ़िल्मी तारिका नहीं हो की अपने ही शरीर का प्रदर्शन करते घूमना पड़े…
हीरोइन वैसे कपड़े पहनती हैं क्योंकि उसका पैसा मिलता है उन्हेँ… पर आजकल की लड़कियों को जाने क्या शौक चढ़ा है? अपने आप को दिखाते हुए घूमने का!
लेकिन सुन लो धानी! हमारे साथ रहना है तो ढंग से रहना होगा हमें यह सब पसंद नहीं है.. !”
वह कैसे कहती कि वह तो सुयश के साथ रहना ही नहीं चाहती, किसी कीमत पर नहीं !
धानी को लगा था उसके शरीर के लिए सुयश का हद से ज्यादा ऑब्सेशन उसके प्यार का ही एक रूप है.. और वो क़भी उस पर हाथ नहीं उठा सकता लेकिन आज धानी का वो भरम भी चकनाचूर हो गया…
” जाओ जाकर उस खिड़की को बंद कर दो.. बाहर की पार्टी का शोर यहाँ तक सुनाई पड़ रहा है.. !”
सुयश की बात पर ज़मीन पर गिरी पड़ी धानी टस से मस ना हुई.. उसे लगा अगर आज उसने अपना मान नहीं दिखाया तो सुयश का हाथ ऐसे ही उस पर खुल जायेगा.. वो चुपचाप ज़मीन पर ही उससे रूठी बैठी रही…
“सुनाई दिया या नहीं.. जाओ खिड़की बंद करो.. !”
धानी ने फ़िर सुनी अनसुनी कर दी.. और चुप बैठी रही… सुयश ने गुस्से में जाकर खिड़की का पल्ला बंद किया और कपड़े बदल कर सो गया…
उसे सोते देख धानी को इस बात की राहत मिली की आज रात वो उससे बच गयीं…
आधी रात के वक़्त उसे लगा जैसे किसी ने उठा कर उसे पलंग पर रखा और कुछ ही देर में उसके शरीर पर सुयश की उँगलियाँ फिरने लगी….
धानी की आँखों से आँसू बहने लगे.. कैसी लाचारगी थी की वो कुछ कर नहीं पा रही थी…
..अब उसके पास अपनी इस नर्क सी जिंदगी से बचने का एक ही उपाय बचा था आत्महत्या.. !”
उसे अच्छे से समझ में आ गया था कि इस नरक से उसे कोई नहीं बचा सकता ना बिक्रम ना उसके खुद के माता पिता….
…. अपने माता-पिता के बारे में याद आते ही उसे लगा एक प्रयास तो वह कर ही सकती है ! बिक्रम से तो अब उसे कोई उम्मीद नहीं रह गई थी क्योंकि वह खुद बेचारा पन्ना के चंगुल में फंसा हुआ था! लेकिन पग फेरे के लिए जब उसे मायके जाने का मौका मिलेगा तब तो वहां अपनी मां को सब कुछ बता कर अपने मायके में रुक सकती थी वह…
…एक उम्मीद की किरण उसे दिखाई दी और उसी के सहारे उसे नींद आ गयीं….
अगली सुबह नाश्ता करने के बाद अपनी ही गाड़ी में अपना और धानी का सामान डाल कर सुयश निकलने को था की उसकी माँ ने उसे टोक दिया…
“बेटा ड्राइवर तो लें जा साथ में.. !”
“नहीं माँ, ड्राइवर के रहने पर हमें प्रिवेसी नहीं लगती.. और आप जानती हैं हमें गाड़ी चलाना बहुत पसंद है.. !”
सुयश की माँ जानती थी उनका जिद्दी लड़का उनकी नहीं सुनेगा.. वो आज तक किसी की बात सुना है जो आज सुनेगा.. !
सुयश धानी की बिदाई के लिए सारा चौधरी खानदान वहाँ जमा था, बस बिक्रम अपने कमरे की बालकनी में खड़ा सूनी आँखों से धानी को सुयश के साथ जाते देख रहा था…
धानी को लेकर वहाँ से निकल भागने की आखिरी उम्मीद भी अब उसकी जाती रही थी…
सुयश की गाड़ी आगे निकल गयीं और बिक्रम की आंख से आँसू बरस पड़े…
उसने कितना कम आंक लिया था इन चौधरियों को और उसकी इसी बेवकूफी का खामियाजा आज धानी को भुगतना पड़ रहा था..!
सारे रास्ते भर धानी ने सुयश से कोई बात नहीं की लेकिन सुयश भी अपनी ही मौज में था.. गाने सुनते गाते वह चला जा रहा था… रास्ते में एक जगह ढाबे पर उसने खाने पीने के लिए गाड़ी रोकी और वहां भी बैठते उठते धानी ने अपने दुपट्टे को अपने चारों तरफ अच्छे से शॉल की तरह लपेट रखा था.. उसे इस तरह देख सुयश के चेहरे पर मुस्कान चली आई… उसे लगा कि वो जीत गया और धानी को डराने में कामयाब हो गया…. उसे नहीं पता था कि धानी यह इसलिए कर रही थी क्योंकि उसे खुद के लिए तो कोई डर नहीं था, लेकिन वो अपने आप के कारण और किसी और कि ज़िन्दगी जोखिम में नहीं डालना चाहती थी..
वो लोग कानपुर पहुंच गए ! गाड़ी नीचे पार्किंग में डालकर सुयश ने सारे सामान को गार्ड को सौंपकर धानी का हाथ पकड़ा और लिफ्ट में दाखिल हो गया…
अपने फ़्लैट का दरवाजा खोलें वो अंदर दाखिल हुआ और अपने बेडरूम की तरफ बढ़ गया..
ना धानी को घर दिखाने की औपचारिकता कि उसने ना उससे किसी तरह की कोई प्यार भरी बात की …
धानी दरवाजे पर ठगी से खड़ी देखती रह गई फिर धीमे कदमों से खुद ही भीतर चली आई….
उसके कुछ देर बाद ही गार्ड सामान लिए चला आया…
” भाभी जी यह सामान कहां रख दें बता दीजिए?”
धानी अभी कोई जवाब दे पाती उससे पहले ही सुयश गार्ड की आवाज सुन बाहर निकल आया…
” बस यहीं रख दो, और जाओ.. !”
“जी साहब !नयी शादी हुई लगता है.. नमस्ते भाभी जी.. हम गुरु चरण हैं यही नीचे बैठते हैं, कोई जरूरत हो आप इंटरकॉम पर रिंग कर लीजियेगा, हम घर पहुँचा देंगे.. साहब नहीं भी रहे तो भी आपकी जरूरत का सामान घर पहुँच जायेगा.. “
उसकी बात सुन धानी ने धीरे से हाँ में सर हिलाया कि सुयश ने गार्ड को पकड़ घर से बाहर निकाल दिया…
“उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए हम हैं, आपको कष्ट उठाने कि जरूरत नहीं है.. !”
उसे एक तरह से धक्का मार कर सुयश ने बाहर निकाला ही था कि घर कि घंटी फ़िर एक बार बज गयीं…..
….
क्रमशः..
aparna….
