
तू बन जा गली बनारस की -19
बिक्रम धानी को साथ लिए घर के लिए निकल गया…..
उन्हें जाते देख पन्ना भी वहां से निकलने लगी…
” पन्ना कहाँ जा रही हो ? वो भी इस वक्त?”
हीरक के सवाल पर पन्ना ने उसे एक नजर घूर कर देखा और वहाँ से निकल गई …
” जाने दो हीरा, जाने दो..हमारी बिटिया कभी कुछ गलत नहीं करेगी…अभी इतना गुस्सा में हैं उसको रोकना सही नहीं होगा ,नहीं यहीं ज्वालामुखी फ़ूट जाएगा …
इन सब को खुद में व्यस्त देख बिक्रम के माता-पिता चुपचाप वहाँ से निकल रहे थे कि चौधरी की नजर उन पर पड़ गई…..
“अरे परिहार बाबु आप कहां निकल लिए ..? तनिक ठहरिये..आप हमरे मेहमान है औ उ का कहते हैं अतिथि देवो भवा ! आप को तो अब हीरक के ब्याह तक यहीं ठहरना होगा ..”
” चौधरी साहब आप कष्ट क्यों कर रहे हैं..हमारे बेटे का कमरा भी है यहां, हम वहीं रुक लेंगे , और वैसे भी परसों सुबह ही निकलना है…
” ऐसे कैसे , परसों तो बाबु का ब्याह है ..अब तो नैकी दूलहीन घर आ जाए तब जाइएगा..अब कोनों बहाना नहीं चली , ए रतन मेहमानों का रुकने का बंदोबस्त करो..”
चौधरी के लठैत बिक्रम के अभिभावकों के आजू बाजू आकर खड़े हो गए और उन लोगों को समझ में आ गया कि अब यहाँ से इन लोगों की मर्जी के बिना निकल पाना मुश्किल है…
तेज बारिश में पन्ना तेजी से गाड़ी भगाती चली जा रही थी..रास्ते में उसे बिक्रम और धानी कहीं नज़र नहीं आ रहे थे …..
कि तभी कुछ सोचकर उसने गाड़ी घाट की तरफ मोड़ ली…
कुछ दूर आगे बढ़ने पर उसे घाट के किनारे विक्रम की बाइक रखी हुई नजर आ गई…पन्ना ने वहीं दूसरी तरफ अपनी गाड़ी खड़ी की और गाड़ी से उतरकर घाट की सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगी…
… जैसे-जैसे आगे बढ़ती जा रही थी उसका दिल भी जोर जोर से धड़कता जा रहा था..
सीढ़ियों पर सबसे ऊपर खड़े उसने ध्यान से नीचे देखा काफी नीचे की सीढ़ियों पर उसे बिक्रम और धानी साथ बैठे नजर आ गये । बिक्रम के हाथों में धानी का हाथ था। पन्ना धीमे कदमों से सीढ़ियां उतरने लगी और उतरते उतरते ही बिक्रम और धानी के काफी करीब पहुंच गई, वहीं एक तरफ एक ऊंचे से खंबे के पीछे उसने आड़ ले ली….
” हाथ तो ऐसे पकड़ रखा है जैसे बहुत बड़े ज्योतिषी हैं आप ..!”
” हां तो? हूं मैं ज्योतिषी! तुमसे किसने कहा कि मैं ज्योतिषी नहीं हूं?”
” आपकी शक्ल ने!”
” शकल पर मत जाओ, दिमाग बहुत तेज है मेरा ..लाओ अभी बता देता हूं तुम्हारे हाथ में क्या क्या लिखा है..!”
” सच्ची!! मतलब आप सच में हाथ पढ़ लेते हैं..?”
” हां भई! तुम्हें विश्वास ही नहीं हो रहा । देखो तुम्हारी यह जो रेखा है ना इससे यहां पर कटती है, और साथ में यह तुम्हारी सूर्य रेखा से जुड़ती है इसका मतलब क्या होता है जानती हो?”
धानी ने ना में सिर हिला दिया..
“इसका मतलब है कि बहुत जल्द तुम्हारी शादी हो जाएगी..”
विक्रम की बात सुन धानी मुस्कुराने लगी… उसे भी समझ में आ रहा था कि यह उसका हाथ पकड़े रहने का बिक्रम का बहाना है लेकिन उसे भी इस खेल में मजा रहा था ..
” अच्छा और क्या लिखा है बताइए?”
” और तुम्हारा होने वाला पति कैसा होगा इसके बारे में भी लिखा है?”
” कैसा होगा ..?”
” खडूस होगा बहुत ज्यादा! एक नंबर का सनकी, गुस्सैल, रूड और बदतमीज होगा!”
” बस बस आप तो हमारे पति की बुराई में ही लग गए, हम अपने होने वाले पति की इतनी बुराई नहीं सुन सकते।”
” फिर और क्या सुन सकती हो?”
” कोई अच्छी सी बात, जैसे हमारे पति का बचपन कैसा बीता होगा? उन्होंने कहां से पढ़ाई की होगी? उन्हें खाने में क्या पसंद है ?उनका पसंदीदा रंग कौन सा है ?उन्हें क्या करना अच्छा लगता है क्या नहीं…?”
” ओहो तो होने वाले पति का बायोडाटा चाहिए मैडम को..!”
धानी ने मुस्कुराकर हां में सिर हिला दिया…
” ठीक है वह भी बता देते हैं लेकिन उसके लिए जरा करीब आना होगा..!”
“करीब ही तो है और कितना करीब आए?”
” इतना की तुम्हारी सांसे मुझे महसूस होने लगें, इतना की तुम्हारी त्वचा पर ये जो हरी सी नस दिखाई देती है ना, उसमें से होकर गुजरता लहू नजर आ सके..इतना की तुम्हारी धड़कन साफ़ साफ़ सुन सकूँ, तुम्हें महसूस कर सकूँ….”
बढ़ते बढ़ते बिक्रम धानी के चेहरे के एकदम करीब आ चुका था ,कि उसी वक़्त पन्ना ने वहीं पड़ा एक पत्थर उठा कर पूरी ताकत लगा कर नदी की ओर उछाल दिया …
पत्थर के पानी में गिरते ही एक जोर की आवाज हुई और बिक्रम और धानी चौंक कर इधर उधर देखने लगे…
” लगता है यहां कोई है…” धानी के चेहरे पर घबराहट देख उसका चेहरा बिक्रम ने अपनी दोनों हथेलियों में थाम लिया …
” पिद्दी सा कलेजा है तुम्हारा ,,तुरंत डर जाती हो..!”
” सच में हमे डर लग रहा है, चलिए यहाँ से ..!”
” किस से डर लग रहा है , मुझसे ?”
” आप समझिए ना बिक्रम, हमें लग रहा जैसे यहां कोई है जो हमें छुप कर देख रहा हो ..!”
धानी ने फिर बिक्रम कि किसी बात पर ध्यान नहीं दिया और खड़ी हो गई……
उसे मनाने की कोशिश जाया होते देख बिक्रम भी उसके साथ उठ गया…
धानी को अपने बाजुओं के घेरे में लिए वो घाट से ऊपर की तरफ बढ़ गया …..
और उस पत्थर के पीछे छिपी खड़ी पन्ना की आंखों में खून उतर आया…
उसका बस चलता तो उसी वक्त धानी का गला दबाकर उसे गंगा नदी में धक्का मार देती ,लेकिन मन मसोसकर वह चुपचाप अपनी गाड़ी में जा बैठी…
बिक्रम और धानी को घर की तरफ बढ़ते देख उसने गाड़ी में छिपा रखी अपनी छोटी सी गन निकाल ली , वो गाड़ी आगे बढ़ाने जा रही थी लेकिन तभी उसके फोन पर रत्न का फोन आने लगा..
” कहां हो पन्ना?”
” क्यों क्या हुआ?”
” इसी वक्त घर पहुंचो?”
” क्यों ऐसा क्या हो गया?”
“फिलहाल जो कह रहे हैं, वह मान जाओ। तुम्हारे बड़े भाई हैं कभी तो मान रख लिया करो।”
गन को गुस्से में वापस रख पन्ना ने बड़ी बेदर्दी से गाड़ी को वापस घर की तरफ घुमा लिया…
घर पहुंच कर तमतमाते हुए पन्ना सबसे पहले रत्न के पास जा पहुंची ..
” क्या हुआ क्यों बुला रहे थे हमें? दो पल का चैन नहीं आपको..?
” हमें चैन नहीं है या तुम्हें चैन नहीं है? उस बिक्रम के मां बाप को आखिर बाबूजी ने यहां क्यों बुलाया है ? हम सब सही ढंग से करना चाहते हैं और तुम फिजूल में चरस बो दोगी ? बाबूजी चाह रहे हैं कि बिक्रम और तुम्हारा ब्याह हो जाए और इसके लिए उसके अम्मा बाबूजी को यहां बुलाया गया है… अब कम से कम उनके सामने तो थोड़ा तमीज से रहो…
थोड़ा लड़कियों जैसी हरकतें करो , तब तो उन्हें भी अच्छा लगेगा कि एक बड़े घर की अच्छी लड़की से ब्याह हो रहा है..
आधी आधी रात तक ऐसे बाहर डोलती फिरोगी , तो उन्हें क्या लगेगा? क्या सोचेंगे भला वो?”
पन्ना का इस वक्त कुछ भी कहने का इरादा नहीं था। रत्न की बातें चुपचाप सुनने के बाद वह पलट कर वहां से जाने लगी कि रत्न ने उसे वापस टोक दिया..
“बाबूजी की गन किसके पास है पन्ना…?”
जाते जाते पन्ना के कदम ठिठक गए। बिना मुड़े ही उसने जवाब दे दिया…
” हमें नहीं मालूम..!”
” लेकिन हमें मालूम है। कल सुबह सबसे पहले गन हमारे हवाले कर देना ।”
अपने गुस्से को बड़ी मुश्किल से रोकती पन्ना पैर पटकते हुए वहां से अपने कमरे में चली गई….
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अगली सुबह धानी की माँ ने धानी के हाथ में चाय का कप पकड़ा दिया..
” जा बेटा जरा बिक्रम को चाय दे आ…”
” हम क्यों जाएं..?”
” तो क्या इस बुढौती में हम सीढियां चढ़े? इस लड़की से कोई सीधी बात बोलो, उल्टा ही जवाब देगी ..जा ना दे आ! बिक्रम के माँ बाप भी आए हैं..लगता है चौधरी साहब ने उन्हें भी बुलाया है …अच्छी बात है , बड़े लोग है ..बड़े लोगों के घर ही तो रुकेंगे ,आयेंगे जाएंगे, संबंध रखेंगे..”
” माँ एक बात बताओ ? ये बिक्रम तो मासी की नंद का रिश्तेदार है ना तो आप पहले कभी इसके माँ बाप से मिली नहीं ?”
” नहीं ! कभी मौका ही नहीं लगा ..? लेकिन सुना है कि बहुत अच्छे लोग हैं..अब इसी लड़के को देख लो..कित्ता शरीफ है ..घर में जवान लकड़ी है पर मजाल जो आँख उठा कर देख भी ले ..!
और धानी को पिछली गुलाबी सी शाम याद आ गयी , जब बिक्रम उसके बेहद करीब पहुंच गया था और वो बात याद आते ही उसकी आँखें शर्म से झुक गईं…
” अब जाएगी भी, वर्ना चाय वापस गरम करनी पड़ेगी..
धानी चाय का कप लिए मुस्कराते हुए सीढियां चढ़ गई…
” धानी हम नहाने जा रहीं हैं..तुम्हारे पापा सुबह सुबह ही हवेली निकल गए हैं..आकर तुम भी अपनी चाय पी लेना ..”
लेकिन अपनी माँ की बात सुनने के लिए धानी वहाँ कहाँ मौजूद थी…वो तो अब तक सीढियां चढ़ ऊपर पहुंच चुकी थी…
और जब वो बिक्रम के दरवाजे पर दस्तक दे रही थी , नीचे गेट पर खड़ी पन्ना ने धानी की माँ की बात सुन ली थी..
अपने पर्स में गन छुपाये वो भी धीमे कदमों से ऊपर जाने लगी ..
वो नीचे ही थी कि उसने देखा बिक्रम ने दरवाज़ा खोला और झट धानी को पकड़ कर अंदर खिंच लिया …
” अभी चाय गिर जानी थी हम पर !”
” ऐसे कैसे तुम पर गिर जाने देता , मेरे अलावा तुम्हें कोई और छुए ये बिल्कुल बर्दाश्त नहीं है बिक्रमादित्य परिहार को!”
” बड़े आए बिक्रमादित्य! चाय पी लीजिए वर्ना ठंडी हो जाएगी..!”
” नहीं होगी…तुम लेकर आयी हो ना …गरम ही होगी..!”
” आप सारा वक़्त ऐसी ही बकवास करते हैं….”
” नहीं और भी बहुत कुछ कर लेता हूं..पास आओ तो बताऊँ..!”
” फिर शुरू हो गए ..!”
” अब तक तुमने शुरू होने दिया ही कहाँ है ..?”
” सुनिए बिक्रम हमें ऐसी बातों से डर लगता है ?”
” कैसी बातों से ..?”
” यही प्यार वालीं..!”
” पर ल़डकियों को तो प्यार मुहब्बत की बातेँ पसंद होती हैं..”
” प्यार मुहब्बत की बातेँ पसंद है पर ऐसी वालीं नहीं ..
” कैसी वाली..?”
बिक्रम को सब समझ मे आ रहा था पर उसे धानी को जानबूझकर छेड़ने मे मजा आ रहा था..
” किस वाली..? बहुत शर्मा कर धानी बोल पायी और बिक्रम के चेहरे पर हंसी खेल गई…
” पर मुझे तो पसंद है…बहुत पसंद है..और मेरे साथ रहते रहते तुम्हें भी पसंद आने लगेंगी..!”
” छी.. कैसी बातेँ बोलते हैं आप ..जरा भी शर्म नहीं आती..!”
” देखा दो ही दिन में कितने अच्छे से जान गई मुझे…मुझे सच्ची शर्म नहीं आती..
” जाइए हम आप से बात नहीं करेंगे..!”
” मत करो , पर किस तो दे दो ..!”
धानी ने शर्मा कर अपना चेहरा अपने ही हाथों से ढक लिया …
बिक्रम मुस्करा कर उसके पास चला आया उसने धीरे से धानी के हाथों को पकड़ कर उसके चेहरे से हटा दिया …
” तुम्हें कुछ नहीं करना है ..बस चुपचाप खड़ी रहना, मैं सब कर लूंगा..
वो उसके चेहरे पर झुक रहा था कि खिड़की से होती एक गोली चली और धानी के कान के पास से होकर गुजर गई…पीछे की दीवार पर लगे आइने से टकरा कर आईना चकनाचूर कर गोली गायब हो गई…
चौंक कर बिक्रम और धानी इधर उधर देखने लगे.. धानी को जल्दी से टेबल के पीछे छुपा कर बिक्रम भाग कर खिड़की पर पहुंच गया.उसने झाँक कर देखा , बाहर कोई नहीं था …
वो तुरन्त भाग कर दरवाजे पर पहुंचा और उस ने दरवाज़ा खोल दिया ….
बाहर पन्ना खड़ी थी… बिक्रम को देखते ही चौंकने का नाटक करती हुई वो आगे बढ़ उसके गले से लग गई…
“महादेव रक्षा करें, आपको सही सलामत देख कर जान में जान आयी है हमारे ।”
” लेकिन आप इस वक़्त यहां कैसे ? और गोली किसने चलायी..?
” मालूम नहीं..हम तो आपको लेने आए है..हम सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे कि हमने आपकी खिड़की के बाहर से किसी को आप पर गोली चलाते देखा ..हम जब तक भाग कर ऊपर पहुंचे वो बालकनी के रास्ते भागकर गायब हो गया ..!”
” कौन था वो ? आपने चेहरा देखा ?”
ना में सिर हिलाती पन्ना बिक्रम की बाहें थामे अंदर चली आयी..इस सब में धानी ने पन्ना की आवाज सुन ली थी और वो पहले ही छुप गई थी….
पन्ना घबराने का नाटक कर ही रही थी कि बिक्रम ने उसके सामने पानी की बोतल खोल दी..
” लीजिए पानी पी लीजिए ..”
पन्ना एक बार फिर बिक्रम के गले से लग गई….
” अच्छा हुआ आपको कुछ नहीं हुआ इंजिनीयर साहब! वर्ना हम जीते जी मर जाते..
नकली आँसू बहाती वो बिक्रम के सीने से चिपकी खड़ी रही और बिक्रम उसकी बाहों के घेरे में खड़ा धानी को इधर उधर ढूंढने का प्रयास करता रहा …
क्रमशः
aparna
