गली बनारस की -17

गली बनारस की by aparna

तू बन जा गली बनारस की…-17

    “देखते ही देखते हीरक की हल्दी का दिन आ गया , माँ जाने सुबह से  किन तैयारियों में लगी थी… हमारी समझ के बाहर था कि माँ कितना भी कुछ भी कर ले उन राजा भोज के सामने वैसे भी हमारी कोई औकात नहीं थी…
माँ ने अपनी सबसे महंगी सिल्क की साड़ी निकाली  ..  पीली साड़ी और मरून बॉर्डर….
   माँ चाहती थी हम भी उनकी पीली बांधनी पहन लें लेकिन हमारा साड़ी पहनने का बिल्कुल मन नहीं था , लेकिन माँ का मन रखने के लिए पहन ली…..”

” साड़ी में तो अच्छी ही लग रही होंगी..!”

उफ्फ हमें भी क्या हो गया है…हम एक पर एक बेवक़ूफाना बातेँ क्यों बोले चले जा रहे थे …लेकिन धानी हमारी बात सुन मुस्करा उठी… हालांकि हमारी बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया …. और आगे की बात बतानी शुरू कर दी….

   ******

  धानी अपनी माँ के साथ गेट के बाहर खड़ी थी उसके पिता अपना स्कूटर निकाल रहे थे कि बाइक में बिक्रम आकर उनके पास खड़ा हो गया..

” कहीं जाने की तैयारी है क्या आंटी जी..?”

धानी की माँ बिक्रम को देख खिल उठी….

” हवेली जा रहे थे बेटा,  आज हीरक बाबु की हल्दी है ना ..?

बिक्रम को याद आ गया उसे भी तो बुलाया था पन्ना चौधरी ने …उसके कार्ड देकर जाने के अगले दिन जब वो ऑफिस में था तब चौधरी का फोन भी आया था ..जाना तो उसे  भी था ….

” हाँ, हम भी उसी तरफ जा रहे थे, आप चाहें तो हमारे साथ चलिए … “

धानी की अम्मा के चेहरे पर मुस्कान चली आयी… उन्होंने प्यार से बिक्रम को देखा और हाँ बोल दिया ..उतनी देर में उसके पिता भी स्कूटर निकाल कर बाहर ले आए…

” धानी आपके साथ बैठ जाएगी,  हम बिक्रम की गाड़ी में बैठ जातें हैं…”
लेकिन बिक्रम की गाड़ी की पिछली सीट की ऊंचाई देख उन्होंने हथियार डाल दिए…

” बेटा हम तो इस पर ना बैठ पाएँगी…धानी ऐसा करों तुम बैठ जाओ बिक्रम के साथ और हम तुम्हारे पापा के साथ स्कूटर मे ही जा रहे …”

धानी या बिक्रम कुछ कहते उसके पहले वो स्कूटर की तरफ आगे बढ़ गई…
बिक्रम ने धानी की तरफ देखा.. धानी ने अपने रुमाल से पिछली सीट पर हाथ मारा और बैठने को हुई कि बिक्रम बोल पड़ा…

” अब जब आप पोंछ ही रही हैं तो पूरी गाड़ी पर पोंछा मार दीजिए…

” हम कोई पोंछा नहीं मार रहे..बस धूल झाड़ रहे थे ..!”

” हाँ मुझे वहीं लगा कि आपको झाड़ू पोंछा करना बहुत पसंद है…शायद आपका रोज का काम होगा ना …मेरी गाड़ी भी रोज साफ कर दिया कीजिए , उसके बदले में मुफ्त में आपको हफ्ते में एक दिन कॉलेज छोड़ आया करूंगा !”

” अरे इतनी मेहरबानी की क्या जरूरत..? वैसे भी हमारी करी सफाई के बाद मालूम नहीं आपकी ये कबाड़ा गाड़ी किसी कबाड़ी को देने लायक भी बचेगी या नहीं ..?

” अरे वाह!! आपको इन बातों का भी ज्ञान है…कबाड़ से भी आपका पुराना परिचय लगता है ,  तभी तो गाड़ी को देखते ही झट समझ गईं की कबाड़ में इसकी कीमत क्या होगी..?

” आप लेकर चल रहे या मैं जाऊँ वापस ..?”

” आप बैठेंगी तभी तो लेकर जाऊँगा ..आप तो बस मुझे देखते ही मुझसे गप्पे मारने में लग जाती हैं…”

अब की बार धानी बिना कुछ कहे ही उसके पीछे बैठ गयी…

    पीछे की सीट की ऊंचाई के कारण बार बार धानी का संतुलन बिगड़ने को होता और वो बिक्रम के कंधों पर हाथ रख लेती..और फिर तुरंत हटा भी देती…

” आप चाहें तो मुझ पर हाथ रख सकती हैं..कांटे नहीं लगे हैं मुझ में …!” बिक्रम ने धीमे से कहा

  बिक्रम की बात सुन धानी के चेहरे पर एक भीनी सी मुस्कान चली आयी..हालांकि उसने कोई जवाब नहीं दिया …
    गाड़ी के कांच में पीछे बैठी मुस्कराती धानी का चेहरा देखता बिक्रम भी धीमे से मुस्करा उठा …

  चलते चलते उसने अचानक गाड़ी रोक दी…

” अब क्या हुआ ? हवेली तो पहुंचे नहीं अब तक..?”

” ये मटके वालीं कुल्फी देख मैं खुद को रोक नहीं पाया… मुझे अभी खानी है ….. आप लेंगी..?”

धानी ने ना में सिर हिला दिया ..हालांकि मटके वालीं कुल्फी में उसकी भी जान बसती थी , लेकिन ऐसे कैसे खा ले यही सोच कर चुप खड़ी रही…

बिक्रम ने दो कुल्फी ली और एक उसकी ओर बढ़ दी..

” कुल्फी के लिए ना नहीं बोलते वरना पाप लगता है ..!”

  दोनों चुपचाप खड़े कुल्फी खा रहे थे कि धानी ने ही धीरे से बोलना शुरू किया ….

” बचपन से पन्ना और हम साथ साथ खेले पढ़े बड़े हुए और न जाने कब उसके मन में हमारे लिए इतनी जलन पैदा हो गई..
  बचपन में बाबा यानी पन्ना के बाबुजी हम दोनों के लिए एक सी गुड़िया लेकर आते थे …तब अक्सर पहले अपने लिए गुड़िया चुनने के बाद भी हमारी गुड़िया के साथ वो कोई न कोई बदमाशी कर बैठती..कभी उसके बाल काट देती तो कभी ड्रेस फाड़ देती.. हमें बहुत बुरा लगता , इतना की हम अक्सर रोने लगते ..लेकिन बाबा हमें समझा बुझा देते और हम मान जाया करते…
   एक बार की होली में जब हम हवेली पहुंचे तो पन्ना ही सबसे पहले हमारे पास आई और अपने पास रखा लाल रंग हमारे पूरे चेहरे पर पोत दिया और अपनी सहेली के साथ भाग गई..
   रंग लगते ही तेज जलन से हम कराह उठे..  आँखें और नाक ऐसे जल उठे की लगा रंग नहीं मिर्च का पावडर है… और वो मिर्च ही थी।
   हम रोते रोते घर जाने लगे कि उसने हमारे ऊपर बाल्टी भर पानी उड़ेल दिया…..
ये सब कर के वो अक्सर बाबा के डर से छुप जाया करती थी हालांकि बाबा ने तो आज तक फूलों की छड़ी से भी उसे नहीं छुआ होगा…
  और हम भी जाने कैसे बेवक़ूफ़ थे,  कि उसके इतना सब करने पर भी कभी बाबा से उसकी शिकायत नहीं की….
  उस दिन भी उसने रंग में मिर्च मिला रखी थी ये हम बाबा को नहीं बता पाए हालांकि अपनी माँ को बता कर हम खूब रोये…
  
” इसी कारण उसे इतनी शह मिलती गई है…तुम्हें शुरू से उसका विरोध करना चाहिए था धानी..!”

” बाबा हमें इतना प्यार करते थे कि उनके सामने उनकी बेटी की शिकायत करने की कभी हिम्मत ही नहीं हुई….
  हमें नीचा दिखाने का कोई बहाना वो हाथ से नहीं जाने देती …
  अपने पुराने कपड़े ,जूते, बैग किताबे सब हमारे लिए भेज दिया करती..उसे लगता कि हम पहनते होंगे पर हमें उस पर इतना गुस्सा आता कि हम सब उठा कर फेंक देते …
  मानते हैं हमारे पास हवेली वालों के जैसे ढ़ेर सारा रुपया नहीं था पर हमारे पापा इतना तो कमा ही लेते थे कि एक सम्मान भरी जिंदगी हम जी सकते थे ….
     जब छोटे थे तब ये सब उसका बचपना लगता था जो अब उसकी जिद में बदलता जा रहा है…
    इसलिए हमने हवेली जाना पूरी तरह से बंद कर दिया …
आज लगभग चार साल बाद हम हवेली में कदम रखेंगे…

दोनों बातेँ करते हवेली पहुंच गए…गाड़ी को एक किनारे खड़ी करने के बाद बिक्रम ने धानी को देखा …

” मैं आसपास ही रहूँगा , कुछ भी ऐसा लगे जो सही नहीं है मुझे तुरंत इशारा कर दीजियेगा …!”

धानी मुस्करा उठी…” ऐसी कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं करती है वो..बस छिटपुट चीजे हमें सताने भर के लिए……

” फिर भी….मैं आसपास ही रहूँगा ..”

धानी अपनी माँ को ढूंढ़ते हुए आगे बढ़ गई…और पन्ना बिक्रम को ढूंढती उस तक चली आई…

” आप यहां खड़े हैं इंजिनीयर साहब! चलिए उधर गार्डन में हल्दी शुरू होने वालीं है…”

  पीले लहंगे में बिना बांहों के ब्लाऊस के साथ उसने गहरे गुलाबी रंग का दुपट्टा ले रखा था और खुले बालों के साथ अपनी नीली आँखें चमकाती वो सुन्दर दिख रही थी…

  हवेली का गार्डन बहुत बड़ा था जहां पीली सफेद चुन्नियों से शानदार शामियाना सजा था…हर किसी ने वहां पीले कपड़े ही पहन रखे थे , घर के नौकर सफेद लिबास में घूम रहे थे ….
  वो इधर से उधर ड्रिंक्स और स्नैक्स सर्व कर रहे थे…
हवेली की औरतें यहां से वहां रेशमी कपड़ों में सरसराती फिर रही थीं….
    पन्ना ने एक ग्लास उठा कर बिक्रम के हाथ में थमा दिया…

” अब ये मत कहिएगा की आप पीते नहीं हैं..!”

” हार्ड ड्रिंक्स तो नहीं ही लेता हूं मैं..!”

” आपको देख कर हमें लगा ही था , घबराए मत ये सादा सा ज्यूस है…

बिक्रम ने मुस्करा कर गिलास थाम लिया ..उसी समय कुछ ल़डकियों के साथ हंसती खिलखिलाती धानी भी वहाँ चली आयी…

   रिश्तों की बहनों और भाभियों के साथ हीरक को भी लाकर वहाँ बने सुन्दर से स्टेज पर बैठा दिया गया…
   औरतों ने मंगल गीत गाने शुरू किए और हीरक की हल्दी शुरू हो गई….
  पन्ना के मामा की लड़की  भाग कर माइक पन्ना के पास ले आयी…

” जिज्जी अब आपको कुछ गाना होगा अखिर दादा (बड़े भाई) की हल्दी है..!”

पन्ना ने मुस्करा कर माइक थाम लिया…एक बार सामने खड़े बिक्रम को भर नजर  देखने के बाद उसने माइक पर गाना शुरू कर दिया ….

तुम्हें हम अपने जिस्म ओ जान में कुछ ऐसे बसा लेंगे
तेरी खुशबू अपने जिस्म की खुशबू बना लेंगे,
खुदा से भी ना जो टूटे वो रिश्ता जोड़ लेंगे हम
अगर तुम मिल जाओ , ज़माना छोड़ देंगे हम….
तुम्हें पा कर ज़माने भर से रिश्ता तोड़ देंगे हम….

बिक्रम को पन्ना की बात समझ में आ रही थी , लेकिन वो भी उसे उसी के तरीके मे जवाब देना चाहता था… वो कुछ सोच रहा था कि  उसी सब के बीच पन्ना माईक लिए बिक्रम के पास चली आयी…

” इंजिनीयर साहब ! अब आप भी कुछ सुना दीजिए..! हमारे लिए प्लीज!”

बिक्रम शायद इसी मौक़े की तलाश में था ..उस ने माईक हाथ में लिया , उसकी नजर सामने खड़ी धानी पर चली गई और वो मुस्करा कर गाने लगा…

   कितनी हसीं ये मुलाक़ातें है
   उनसे भी प्यारी तेरी बातें है
   बातों में तेरी जो खो जातें हें
    रहूँ ना होश में मैं कभी..
   सुन मेरे हमसफ़र…
क्या तुझे इतनी सी भी खबर
की तेरी साँसें चलती जिधर
रहूँगा बस वहीँ उम्र भर…..

   पन्ना के चेहरे का रंग उतर गया….धानी की तरफ देख कर गाते बिक्रम की आंखों के नशे में डूबती खड़ी धानी उसकी आंखों से छिपी नहीं रह सकीं…

   उसी समय किसी ने आकर उसे बताया की चौधरी साहब उसे याद कर रहे हैं और वो वहाँ से चली गई …

  कुछ देर बाद हवेली की पिछली तरफ खुले मैदान में एक तरफ रखे बड़े बड़े पत्थरों पर बिक्रम और धानी  साथ बैठे थे ….
… बिक्रम की जान पहचान का वहाँ कोई नहीं था , और इसलिए हाथ में ज्यूस का गिलास थामे वो वहाँ से निकला जा रहा था कि धानी भी भागती पीछे चली आयी थी..और फिर वहीं पत्थरों पर दूर दूर दोनों बैठ गए…

” एक बात पूछें?”

” मना करूंगा तो नहीं पूछोगी?”

  धानी का चेहरा उतर गया…” जाइए नहीं पूछना!’

” अरे मैं मज़ाक कर रहा था ..बोलो क्या पूछना है ?”

” हमने विक्रम नाम तो सुना था पर आपका नाम बिक्रम है किसने रखा..?”

बिक्रम के चेहरे पर हंसी खेल गई…

” नाम तो मेरा विक्रमादित्य रखा गया था … विक्रमादित्य सिंह परिहार!! लेकिन मेरे घर परिवार वाले एक गुरु जी को बहुत मानते हैं उन्होंने कहा कि वी की जगह बी कर देने से मेरी कुंडली चमक उठेगी…मेरा खूब नाम होगा और मैं मेरे घर वालों का भी नाम रोशन करूंगा ….बस इसलिए विक्रमादित्य की जगह बिक्रम हो गया….

धानी मुस्कुरा उठी…और बिक्रम का फोन बजने लगा….
  फोन पन्ना का था जो उसे कोई सरप्राइज देने की बात कर गार्डन में बुला रही थी…

” धानी!! मैं बस यूँ गया और यूँ आया ..मेरा इंतजार करना ..!”

धानी ने हाँ में सिर हिला दिया ,और बिक्रम उठ कर अपनी पैंट झाड़ते हुए गार्डन की तरफ बढ़ गया…
गार्डन की तरफ से गाने बजाने की आवाज धानी तक आ रही थी……

रोम-रोम तेरा नाम पुकारे
एक हुए दिन रैन हमारे
हम से हम ही छीन गए हैं
जब से देखे नैन तिहारे
सजदा..

तेरी काली अंखियों से जींद मेरी जागे
धड़कन से तेज़ दौडू, सपनों से आगे
अब जां लुट जाए, ये जहां छुट जाए
संग प्यार रहे, मैं रहूँ ना रहूँ…..

क्रमशः

aparna …..

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