
तू बन जा गली बनारस की – 24
तू बन जा गली बनारस की…..
घाट पर धानी की आवाज में खोए हजारों विद्यार्थियों के साथ एक तरफ़ जहां बिक्रम धानी की आवाज में मगन था वहीं दुसरी तरफ़ घाट के दुसरी और बैठा साजन भी उस आवाज़ में घुला हुआ खुद को भुला बैठा था …..
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वर्तमान:-
धानी शायद इस हिस्से को बताती हुई उसी शाम और उसी घाट पर पहुंच चुकी थी…..
इस वक़्त हमसे ज्यादा उसकी हालत और कौन समझ सकता था ..जैसा हम उसके लिए सोचा करते थे लगभग वैसा ही कुछ तो वो भी बिक्रम के लिए सोचती बैठी थी….
सच कहें धानी तो तुम्हारी पागल सी प्रेम कहानी सुन तुम पर और भी प्यार आ रहा है..हाँ बिक्रम से जलन जरूर हो रही लेकिन उसके लिए मन एक उदासी से भी भरा जा रहा , जाने क्यों यूँ लग रहा जैसे इस पन्ना की बच्ची ने तुम दोनों की जिंदगी में प्यार के फूल खिलने नहीं दिए …
” धानी तुमसे एक सवाल पूछ सकते हैं..?”
” हाँ पूछिये!”
” क्या बिक्रम ही जेल में हैं..?”
धानी ने धीमे से हाँ में सर हिला दिया …
” क्या हम बिक्रम से मिल पाएंगे ?”
” अगर आप उनका केस लड़ने की मंजूरी देंगे तो आपको उनसे मिलने तो मिलेगा ही…!”
” वैसे अब तक की कहानी से हमें इतना तो समझ में आ ही गया है कि बिक्रम किसी का खून नहीं कर सकता , इसलिए हम उसका केस लड़ने को तैयार हैं…”
हमारे इतना कहते ही खुशी से धानी ने हमारे दोनों हाथो पर अपना हाथ रख दिया …. और हम सिहर उठे…
उफ्फ धानी ऐसे आभार जताने की क्या जरूरत थी…..तुम्हारा ये मासूम सा तरीका हमें सात आसमान के ऊपर ले गया….अपने मन की गुदगुदी छुपाये हुए हम वापस धानी की तरफ़ देखने लगे…
” बिक्रम इस वक़्त कहाँ की जेल में है..कुछ मालूम है तुम्हें ?”
उसने मासूमियत से हाँ में सिर हिला दिया और हम उसकी मासूमियत पर फिर दिल हार गए…शाम ढल चुकी थी और दिन भर से हम दोनों ने कुछ नहीं खाया था …..
” हमें तो अब बहुत जोरों की भूख लग रही है..कुछ खाओगी धानी!”
उसने हाँ में सिर हिला दिया..
” खाएंगे लेकिन बनाएंगे भी हम !”
” तुम क्यों ? तुम बैठो हम बना कर खिलते हैं ना … और हम उठ कर रसोई की तरफ़ बढ़ गए..हमारे पीछे कब वो आकर रसोई के दरवाजे पर खड़ी हो गई पता ही नहीं चला…
” क्या बना रहें है आप ?”
उसके सवाल पर प्याज पर छुरी चलाते हमारे हाथ रुक गए ..हमने पलट कर देखा वो हमारे दरवाजे पर बाजू बांधे खड़ी थी…..
” कुछ नहीं , बस सोचा मसाले वाले चावल बना लेते हैं…
” लाइये हम बना देते है….आप प्याज काट रहे हैं?..क्या आप प्याज खाते हैं…?
हम उसके भोले सवाल पर मुस्करा दिए ..
” मारवाड़ी है ना , हमारे घर पर प्याज लहसून नहीं खाया जाता , पर हमे लगा तुम तो खाती होंगी..”
वो मुस्करा कर आयी और हमारे हाथ से छुरी ले ली…उसने फ्रिज खोल कर देखा , उसे उसमें दही मिल गया…उसने प्याज को उठा कर एक किनारे किया और फिर आलू टमाटर काटती इधर से उधर हमारी ही रसोई के डिब्बों की तलाशी लेती एकदम परफेक्ट गृहणी सी बन गई..हम अपने बाजू लपेटे खड़े उसे देखते रहे…
ये सारा सब आंखों को कितना सुकून दे रहा था, हमारा घर, हमारी रसोई, हम और …वो…
हम जानते हैं वो हमारी नहीं लेकिन हमारे ख़यालों पर भी तो हमारा बस नहीं….
कुछ देर में ही उसने छौंक लगायी और मेथी के साथ हींग की खुशबु पूरी रसोई में फैल गई….
कुछ देर में उसने कुछ कुछ बना कर हमे देखा और हमें भी एक काम पर लगा दिया …..
” आप पानी लेकर चलिए , हम खाना ले आते हैं…”
हम उस वक़्त कितने खुश थे तुमसे कैसे कहते, इतना सब तो हमने सपने में भी नहीं सोचा था …तुम हमारे सामने हमारे लिए खाना परोस रही हो…और बहुत प्यारी लग रही हो…
हालांकि अब तो हम ये भी जानते हैं कि तुम्हारा प्यार बिक्रम है…और तुमसे वादा करते हैं धानी कि अगर वो वाकई निर्दोष है तो उसे हम छुड़वा कर रहेंगे..!
उसने हमारे सामने कढ़ी चावल परोस दिए…हमें तो खाने के पहले ही पता था कि खाना बहुत स्वादिष्ट बना होगा अखिर तुमने जो बनाया था…पर पहला निवाला मुहँ में रखते ही यूँ लगा जैसे अमृत चख लिया हो…. हमें नहीं मालूम था कि तुम खाना भी इतना अच्छा बना लेती हो…..
हमें अचानक कढ़ी देख कर अपनी माँ की याद आ गयी…घर पर जब भी कढ़ी बनती हम कभी नहीं खाया करते थे, हमें इस संसार की सबसे खराब चीज शायद यही लगती थी…लेकिन आज ये तुम्हारे हाथों का जादू था या हमें इतनी जोर की भूख लगी थी कि हम सारा खाना चटपट खत्म कर गए…और तुम हमारे सामने बैठी बस अपने चम्मच से खेलती रही….
हमें यूँ लगा कि तुम हमारे जल्दी से खाना खत्म करने का ही इंतजार कर रही हो…
खाना खत्म हो चुका था और इसी के साथ हमारी कल्पनाओं का सुखद संसार भी….
अब एक बार फिर हमें वापस लौटना था धानी और बिक्रम की दुनिया में जहां पन्ना जैसी विषबेल बैठी थी जो बिक्रम से लिपट कर उसे लील लेना चाहती थी….
एक बार फिर हम दोनों हमारे सोफ़े में बैठे थे…..
” फिर आगे क्या हुआ धानी ?”
” आगे…..
चौधरियों के दिमाग में एक बार में चारों तरफ़ के काम चला करते थे..वो भले एक जगह उपस्थित हो पर उनकी आँखें जैसे सारे शहर में बिछी रहती थी….चौधरी साहब ने हमारे पापा को मिलने के लिए बुलावा लिया और उसी के साथ वो बिक्रम के माता पिता से भी मिलने चलें गए ….
” कैसे हैं परिहार बाबु ? कोनों कष्ट तो नहीं है हियां हमार कुटिया में..!”
” नहीं नहीं…कैसी बातेँ कर रहेंगे हैं आप चौधरी साहब … हम दोनों तो मजे में हैं..बस बिक्रम से मुलाकात नहीं हो पायी है…
” बिक्रम बाबु तो अब सांझ में ही आयेंगे , लग रहा ..!
अच्छा आप लोगों से एक बिसेस बात करना रहा ..आप तो देख ही रहे घर पर शुभ कारज हो रहा है…ये ब्याह सादी सब ऊपर वाले की माया है, जब जहां होना है वहीं का संजोग बना देता है..अब देखिए ना आप लोगों से कैसे अचानक मिलना हुआ ..हम तो कभू जानते भी नहीं रहे की कौन परिहार जी कहाँ के परिहार जी..पर सुभ संजोग जुड़ा और आपसे मिलना हो गया…
बिक्रम बाबु बड़े ही सुलझे हुए हैं…हमारा लड़का लोगों को तो देखे ही हैं आप .. लबार है साले ..एक को बस चाकू कट्टा की बोली समझ आती है और दूजा किसी और ही दुनिया का रहवासी है…हमें पन्ना के लिए एक सुलझे और समझदार लड़का की ही तलाश थी जो ये हमार राजपाट सब सम्भाल ले…आप समझ रहे हैं ना परिहार बाबु..
” जी चौधरी जी..!”
” भाभी जी ..पन्ना कैसी लगती है आपको…!”
विक्रम के माता-पिता ने सोचा नहीं था कि ऐसे इतनी जल्दी चौधरी साहब उनके पास पहुंच जाएंगे…
” बहुत प्यारी बच्ची है चौधरी साहब! लाखों में एक है आपकी पन्ना! जैसा रूप वैसा गुण! कोई ढूंढ कर भी एक गलती नहीं निकाल सकता बच्ची में..”
चौधरी जी ने दोनों हाथ जोड़कर ऊपर उठा दिया और मुस्कुराने लगे…
” महादेव की कृपा है सब! हमें हमारी पन्ना हमारे दोनों लड़कों से कहीं ज्यादा प्यारी है.. बस जैसी वो प्यारी है वैसा ही एक अच्छा घर उसे मिल जाए तो हम गंगा नहा ले.. भाभी जी हमारी बात का मतलब तो आप समझ रही होंगी! देखिए हमारा इसी बात पर विश्वास है कि जोड़ियां ऊपर वाला बना कर भेजता है, बस हमें उन जोड़ियों को ढूंढ कर गठबंधन में बांधना होता है..
” सही कह रहे हैं आप चौधरी साहब! अगर पन्ना और बिक्रम का ब्याह महादेव ने लिख रखा है तो होकर ही रहेगा..!”
” काहे आपको अभी भी कोई संशय है का? इन दोनों का ब्याह होना ही है, दोनों की जोड़ी ऊपरे से बन कर आयी है भाभी जी! हमारा बस यही कहना था कि अगर आज शाम को शुभ मुहूर्त में आप पन्ना की ओली भर दें तो हफ्ते भर के अंदर अच्छा मुहूर्त है, उसमें पन्ना और बिक्रम का भी ब्याह हो जाएगा….!”
परिहार दंपति एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे… झिझकते हुए परिहार जी ने धीमे से कहा ..
” एक बार बिक्रम से भी बात हो जाती तो अच्छा रहता ..!”
चौधरी के चेहरे पर हल्की सी नाराजगी आते आते रह गई….
” जी हम ने कब मना किया ..आपका लड़का है बिना उससे पूछे आप कैसे कुछ कर सकते हैं…. देखा जाए तो उसी की तो चलेगी, हमारी औकात ही क्या है..अगर दूल्हा राजी नहीं भवा तो फेरे ज़बरदस्ती तो नहीं करवा देंगे ना !”
” नहीं नहीं चौधरी जी ये बात नहीं है ..पर आप भी समझते हैं, ये आजकल के बच्चे हमारे लोगों जैसे तो हैं नहीं की बिना चेहरा देखे बस अपने माता-पिता की बात रखने को शादी कर लें… !”
” सही कह रहें हैं परिहार बाबु..पन्ना तो हमें अपने मन की बात बता ही चुकी है। एकसाथ दोनों हंसते खिलखिलाते हुए बड़े अच्छे भी लगते है…. खुस दिखते हैं…अब तस्वीरे देख कर तो यही लगता है कि बिक्रम बाबु भी तैयार ही है..पर फिर भी आपको कोई शंका है तो एक बार पूछ लीजिए… अब फोन भी लगा ही लीजिए..
बिक्रम के पिता ने बिक्रम के फोन पर कॉल लगा लिया.. घाट पर बैठे बिक्रम ने अपनी जेब से फोन निकाला कि तभी उसका ध्यान उसके बाजू में बैठी पन्ना पर चला गया, उसने आश्चर्य से पन्ना की तरफ देखा और पन्ना उसकी तरफ देख कर मुस्कुराने लगी..
“क्या इस जगह पर किसी और का नाम लिखा था, जो हमें बैठा देखकर आपको इतना आश्चर्य हो रहा है?”
ना में सिर हिलाकर बिक्रम ने फोन उठाया और अपने कान से लगा लिया ..
“जी पापा कहिए कैसे फोन किया? और आप लोग कैसे हैं?”
“हम दोनों तो ठीक हैं , तुम यह बताओ कि तुम अभी कहां पर हो?”
“पापा मैं यूथ फेस्टिवल में आया हुआ था, घाट पर बैठा हूं अभी!”
“आज ऑफिस नहीं गए..?”
“आज की छुट्टी डाल दी थी, चौधरी साहब के यहां शादी है ना! इसलिए आज और कल की छुट्टी ले रखी है..!”
“घाट पर क्या अकेले ही बैठे हो?”
बिक्रम ने एक नजर साथ बैठी पन्ना की तरफ़ देखा और धीरे से कहा “नहीं पन्ना भी साथ है!”
बिक्रम के पिता के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई…
“अच्छा सुनो बिक्रम तुमसे एक जरूरी बात करनी थी! हम और तुम्हारी मम्मी सोच रहे हैं , कि जब बनारस आए ही हैं तो तुम्हारी भी शादी तय करके जाते हैं…
. इतनी दूर से बार बार आना जाना तो हो नहीं पाता तो कम से कम शादी तय तो कर ही दे…
बिक्रम की नजर सामने मंच से उतर कर उसकी तरफ आती धानी पर थी। और वह उसे देखते हुए मुस्कुरा रहा था उसके भी मन में यही बात चल रही थी जो उसके पिता ने कहीं और उसने झट हामी भर दी..
“पापा मैं तो खुद भी यही सोच रहा था कि आज शाम को आपसे और मम्मी से बात करूंगा…!”
“क्या बात है बेटा, कोई ढूंढ रखी है क्या?”
“जी पापा!! ऐसा ही कुछ समझ लीजिए… यहां घाट पर मेरे साथ ही है.. आज शाम को उससे आपको और मम्मी से मिलवाने वाला था, पर उससे पहले आपने ही यह बात छेड़ दी…”
बिक्रम के पिता ने मुस्कुराकर चौधरी जी की तरफ देखा और हां में सर हिला दिया उनकी पत्नी भी चेहरे से प्रसन्न नजर आ रही थी..
“चलो फिर तो अच्छी बात है, तुम शाम को आ जाओ फिर आज ही सब तय कर लेते हैं..!”
“जी बाबा वैसे एक बात पूछनी थी, आप लोग वहां अच्छे से तो है ना? मैं आप दोनों को बहुत मिस कर रहा था..!”
“अरे कल रात ही तो तुम हमसे मिल कर निकले हो ..फिर किस बात की चिंता? ..चौधरी जी और उनका परिवार अच्छा है..अच्छे लोग हैं ये… !
. चलो शाम तो गहराने लग गई है, तुम जल्दी आओ फिर आगे की बातचीत कर लेते हैं…!”
“जी पापा मैं आता हूं!”
फोन पर बात करते समय बिक्रम अपनी जगह से उठकर कुछ सीढ़ियां नीचे उतर गया था, इसलिए पन्ना से दूर जाकर ही वह यह सारी बातें कर रहा था। लेकिन फोन पर दूसरी तरफ बैठे उसके पिता उसके मन की बात नहीं समझ पाए, उन्हें यही लगता रहा कि वह पन्ना के बारे में बात कर रहा है, जबकि बिक्रम धानी के बारे में उन्हें बताना चाहता था..
बिक्रम जब तक अपनी जगह में वापस लौट कर आया पन्ना वहां से उठकर जा चुकी थी, बिक्रम ने चैन की सांस ली और सामने से आती धानी की तरफ देखने लगा…. धानी भाग कर आयी और उसके पास वाली जगह पर बैठ गई…..
” कुछ देर पहले यहां वहीं चुड़ैल बैठी थी ना ?”
” तुमने देख लिया था ?”
” हाँ इसलिए तो गाना खत्म कर तुरंत भागती हुई चली आयी..
बिक्रम ने प्यार से धानी को अपने बाजुओं के घेरे में ले लिया …
” अरे क्या कर रहे हैं आप..? लोग क्या सोचेंगे?”
” लोग क्यों कुछ सोचेंगे ? हम तो अपनी होने वाली बीवी के साथ इश्क लड़ा रहे हैं, अभी कुछ देर पहले पापा का फोन आया था और जानती हो पापा क्या कह रहे थे?”
“क्या?”
“कह रहे थे कि इतनी दूर बार बार आया नहीं जाता, इसलिए अब आए हैं तो तुम्हारी सगाई करके जाएंगे मैंने भी हां कह दिया..!”
“अरे!! पर अचानक अंकल ऐसे तुम्हारी सगाई की बात क्यों करने लगे? क्या तुमने उन्हें हमारे बारे में कुछ भी बताया था..?”
“नहीं अब तक तो नहीं बताया था , लेकिन माँ बाप हैं मेरे… मेरी रग रग से वाकिफ है। हो सकता मेरी आंखों में तुम्हारे लिए प्यार दिख गया हो मां को..?”
“चौधरियों के घर पर है तुम्हारे माता-पिता! यह भी तो हो सकता है कि उन लोगों ने तुम्हारे और पन्ना की सगाई के बारे में सोचा हो..?”
“ये सब क्या क्या फिजूल सोच रही हो? पन्ना बीच में कहां से आ गई?”
“पन्ना ही तो हमारे बीच में आ रही है बिक्रम! तुम्हें समझ में नहीं आता कि वह किस हद तक जा कर तुम्हें पाने का जुनून रखती है। हमे तो उसकी आंखों में तुम्हारे लिए हद से ज्यादा पागलपन दिखाई देने लगा है… हम वहां मंच पर गाना गा रहे थे और तुम हमें देख रहे थे…. उस सारे वक्त पन्ना सिर्फ तुम्हें देख रही थी..”
“धानी यार प्लीज इन सब बकवास बातों पर ध्यान मत दो! आज के आज मैं अपने पापा से तुम्हारे और मेरे लिए बात करने वाला हूं! बस उसके बाद हम चटपट शादी कर लेंगे.. उसके बाद मुझे अपना ये प्रोजेक्ट भी तो खत्म करना है…
तुम यह सब ऊलजलूल सोच कर अपना मन छोटा मत करो। शादी तो मेरी और तुम्हारी ही होगी अगर तुम्हें विश्वास नहीं है तो आओ मेरे साथ..!”
बिक्रम खड़ा हुआ और धानी का हाथ पकड़कर सीढ़ियों के ऊपर चढ़ने लगा..
घाट की सीढ़ियां पार कर वो मंदिर की चौखट पर पहुंच गया, वही एक तरफ रखी आरती की थाली में सिंदूर रखा था, जहां से उसने चुटकी भर सिंदूर उठाया और धानी के माथे पर एक छोटी बिंदी लगाकर उसकी मांग में सिंदूर डाल दिया…
“अरे!! यह क्या किया बिक्रम आपने? शादी ब्याह कोई हंसी खेल थोड़ी होता है, जो आपने बस सिंदूर उठाया और हमें लगा दिया…!”
“हंसी खेल नहीं होता इसलिए तो यह सिंदूर लगाया है, वह भी महादेव के सामने…
महादेव और पार्वती इस सृष्टि का सबसे परफेक्ट कपल है! इसलिए तो तुम्हारी जैसी कुंवारी लड़कियां महादेव को पाना चाहती हैं, तो इसीलिए उन्हें साक्षी बनाकर मैंने भी उनके सामने अपनी प्रियतमा के माथे पर सिंदूर लगा दिया… अब तुम सिर्फ मेरी हो और मैं सिर्फ तुम्हारा ।
मुझे तुमसे कोई नहीं छीन सकता और सच कह रहा हूं धानी अगर किसी ने मुझे तुमसे, या तुम्हें मुझ से अलग करने की कोशिश की तो मैं उसकी जान ले लूंगा…..!”
बिक्रम अपनी बात पूरी कर धानी के होंठो पर झुक गया….और शर्माते हुए धानी बिक्रम की बाहों में सिमट गई…
घाट पर के ऊंचे चौड़े स्तम्भ के पीछे खड़ी पन्ना ने गुस्से में जलती अपनी आंखों से बहते आंसुओं को पोछा और पलट कर अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गई…
क्रमशः
aparna
