
तू बन जा गली बनारस की..-18
तेरी काली अंखियों से जिंद मेरी जागे
धड़कन से तेज दौड़े, सपनों से आगे
अब जां लुट जाए ,यह जहां छूट जाए
संग प्यार रहे मैं रहूं ना रहूं..सजदा तेरा सजदा..
शामियाने में गाना चल रहा था और धानी बिक्रम को मुग्ध नज़रों से जाते हुए देख रही थी…
पन्ना ने बिक्रम को आते देखा और चहक कर उसके पास पहुंच गई…..
” आपके लिए एक सरप्राइज है इंजीनियर साहब !”
बिक्रम सोच में डूबा था कि अब कौन सा सरप्राइज उसे मिलने वाला है कि पन्ना उसे साथ लिए अपनी हवेली कि और बढ़ गई..
राजा महाराजाओं के पुराने किलों सी बड़ी विशाल हवेली अपने आप में बेहद खूबसूरत थी..उसकी खूबसूरती निहारते बिक्रम को देख पन्ना अपनी मुस्कान छिपा नहीं सकीं..
” लगता है हवेली कुछ ज्यादा ही पसंद आ रही है आपको!
” हाँ बहुत खूबसूरत है..!”
” और हवेली के लोग ?”
” हाँ वो सब भी , खास कर आप बहुत खूबसूरत हैं..!”
बिक्रम की बात पर पन्ना मुस्करा कर रह गई ..
चलते चलते वो दोनों पहली मंजिल में बने एक कमरें के सामने पहुंच गए …
कमरें के दरवाजे को जोर से धकेल कर वो भीतर दाखिल हो गई..उसके पीछे धीरे से बिक्रम भी अंदर चला गया …
” अरे आप दोनों कब आए..? और वो भी मुझे बताया तक नहीं ..?”
अपने माता पिता को समाने बैठे देख आश्चर्य मिश्रित खुशी से बिक्रम चहक उठा ..
उसकी बात सुनकर वो दोनों भी मुस्कुराते हुए खड़े हो गए …
बिक्रम ने आगे बढ़ कर अपने माता पिता के पैर छुए और पन्ना को उनसे मिलवाने लगा .
” ये मेरी मॉम है और ये पापा..!”
” हम जानते हैं, और पहले ही मिल चुके हैं..!”
चौधरी जी ने उन सब को बैठने का इशारा किया और मुस्करा कर बिक्रम के पिता की ओर देखने लगे..
” बहुत हुसयार है आपका लड़का..हम तो उ का कहते हैं पहली ही भेंट में इम्फ्रेस हो गए एकदम!
” बाबुजी “इम्प्रेस” कहते हैं… पन्ना ने उन्हें सुधारने की नाकाम सी कोशिश की..
” हाँ एक ही बात है…लाओ भाई तनिक कुच्छ खाने पीने का समान तो लाओ, ए रतन कहाँ भटक रहे हो…
रत्न जो अब तक एक किनारे मुस्कराते खड़ा था तुरंत आंखों के इशारे से नौकरों को काम में लगा गया। उसी की जिद पर चौधरी साहब ने बिक्रम के खानदान की कुंडली निकलवाई थी और उन लोगों को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि बिक्रम के पिता सीबीआई के बहुत बड़े अधिकारी थे..
उनकी पद प्रतिष्ठा के बारे में पता चलते ही चौधरी ने अपने दोनों लड़कों को बुलाकर तुरंत उन लोगों से मंत्रणा शुरू कर दी उनकी बात सुन हीरक पहले पहल तो डर गया…
” बाप पुलिस में है तभी लौंडा इतना फड़फड़ा रहा है। लेकिन अब इसे यहां से जितनी जल्दी हो भगा दीजिए बाबुजी!”
” तुम बॉडम हो बैल बुद्धि कहीं के ! हम का सोच रहे और तुम कहां अटके पड़े हो ? “
हीरक की बात सुन चौधरी उसे डपट रहे थे कि रत्न बोल उठा ..
” बाबुजी हम क्या सोच रहे थे कि अगर कुछ कर करा के इन ठाकुरों से ठीक समबन्ध हो जाए तो हमारे लिए अच्छा हो जाएगा, नहीं?”
” जे बात ! अब बोला है हमार लड़का हमरी मन की बात, यही तो हम सोच रहे हैं…बुलाओ यार रतन, बिक्रमादित्य के खानदान को बुला लो .. अगर हमरी पन्ना को भा गया है तो बात आगे बढ़ाते हैं…
ऐसे लोगों से रिस्तेदारी जुड़ना हमरे लिया फायदे का सौदा है..”
” जी बाबुजी!” कह कर रत्न वहां से चला गया था और बैल बुद्धि हीरक वहीं बैठा बैठा यह सोचने में लगा था कि भले ही वो पुलिस के अधिकारी हमारे रिश्तेदार बन जाए पर क्या बस यही एक बात इस बात की गारन्टी हो जाती है कि वो हम लोगों को बचा लेंगे..?
और अखिर हीरक की हल्दी के दिन तक में चौधरी के गुर्गे परिहार जी को पकड़ कर ले ही आए…
बाहर गाने बजाने की धूम मची थी और अंदर बिक्रम को सही सलामत देख उसके माता पिता खुश थे, उन्हें खुश देख वहां मौजूद बाकी लोग भी खुश थे …
” लगवाओ रत्न खाना पीना लगवाओ ..!” चौधरी के ऐसा कहते ही वहां मौजूद नौकरों में हलचल सी मच गई…
बिक्रम भी खुश तो था लेकिन उसकी समझ से बाहर था कि ऐसे वो लोग अचानक चले कैसे आए…
उसने धीरे से अपनी माँ से पूछ ही लिया ..
” मॉम ऐसे अचानक कैसे प्लान कर लिया ? मुझे बताया तक नहीं ..?”
” मुझे भी कहाँ पता था , वो तो कल यहां से किसी का फोन आया था तुम्हारे डैड के पास , कि तुम्हें उनकी कुछ जरूरत है…बस फिर तुरंत आज की फ्लाइट पकड़ हम लोग चलें आए..
वहां एयरपोर्ट पर बाहर इनके नाम की तख्ती लिए एक आदमी को खड़े देख हम लोग उस तक पहुंच गए..हमें लगा तूने भेजा होगा..और बस वो हमें यहां ले आया ….”
” कम से कम एक फोन तो कर देते आप लोग ? “
” फोन लग ही नहीं रहा था, इसलिए तो और चिंता हो गई थी…
फोन मिल जाता और तुझसे बात हो जाती फिर इतनी चिंता थोड़े ना होती….”
हाँ में सिर हिला कर बिक्रम अपनी माँ से बातों में लगा था ..बाहर ठंडी ठंडी हवा चल रही थी जो धीरे धीरे बादल बिज़ली में बदलती तेज़ बारिश में बदल गई…..
..अंधेरा घिर चुका था , बाहर से आए मेहमान लौटने लगे थे …
धानी की माँ ने भी इधर उधर देखा और जब धानी कहीं नजर नहीं आयी तो उसे फोन लगा लिया ..
” कहाँ हो धनिया..?”
” यहीं हैं हवेली के पीछे की तरफ ..क्यों क्या हुआ ?”
” हम घर निकल रहे थे, तुम्हारे पापा के साथ.. तो बस यही पूछने किए रहे की तुम बिक्रम के साथ आ जाओगी या फिर..
” आ जाएंगे , हम बिक्रम के ही साथ आ जाएंगे, आप घबराए नहीं..हम समय से घर पहुंच जाएंगे..!”
धानी की माँ उसके पापा के साथ निकल गई , और धीमी सी बूंदाबादी बढ़ते हुए तेज बारिश में बदल गई…
बारिश बढ़ते देख धानी तुरंत अपनी जगह से उठ गई लेकिन फिर उसे लगा कि अगर वो यहां से चली जाएगी और उसके बाद बिक्रम आया तो वो उसे कहाँ ढूंढेंगा ,यही सोच कर धानी वापस वहीं बैठ गयी….
अन्दर सारे लोग एक साथ खाने पीने में लगे हुए थे …अपनी माँ के साथ बैठा बिक्रम उन लोगों के आ जाने से इतना मगन था कि उसके दिमाग से यह निकल गया कि, बाहर धानी इंतजार कर रही है..
पन्ना भी मुस्कुराते हुए बिक्रम के सामने बैठी उसे निहारते हुए खा रही थी…वेटर इधर-उधर घूमते हुए परोस रहे थे …
” सर आप और कुछ लेंगे ..? ये ग्रीन चटनी लेंगे सर धनिया पुदीना की..?”
बिक्रम ने मुस्करा कर ना में सिर हिला दिया और तभी धनिया की चटनी सुन उसके दिमाग की घंटी बजने लगी..वो अपनी जगह पर तुरंत खड़ा हो गया …
” मैं अभी आया…!”
बाहर निकलते हुए वो अचानक रुक गया ..
” मॉम आप लोग मेरे घर तक आयेंगे कैसे..? आप टैक्सी ले लीजियेगा..अभी मैं निकलता हूं, कुछ बहुत जरूरी काम याद आ गया ..!”
उसकी माँ ने हाँ में सिर हिला दिया …
” अरे भटकने से बढ़िया हिंयां रुकिए, ई हवेली मा जगह कम है क्या? क्यों परिहार बाबु?”
चौधरी ने बिक्रम के पिता से पूछा और वो मुस्करा कर रह गए , उतनी देर में बिक्रम वहां से बाहर निकल चुका था …
वो एक तरह से भागते हुए हवेली के पिछली तरफ निकल गया …पन्ना भी अपनी जगह से उठी लेकिन रत्न ने उसे तुरंत कुछ काम बता कर टोक दिया और उसे अपनी जगह पर बैठे रहने को मजबूर कर दिया …
बिक्रम के इस तरह अचानक उठ कर चले जाने से पन्ना भी सोच में पड़ गई थी और वो उसके पीछे जाकर देखना चाहती थी…
इधर तेज बारिश में बिक्रम भागता हुआ उसी जगह पहुंचा और सामने भीगती बैठी धानी को देख चौंक गया…
” तुम अब तक यहां बैठी हो ..?”
” आपने ही तो कहा था, मेरा इंतजार करना धानी मैं बस यूँ गया और यूँ आया !”
बिक्रम अपने बालों पर हाथ फेरते धानी को देखता रह गया … ” ऐसा कौन करता है भला..? और सोचो अगर मैं नहीं आता तो..?”
” मुझे पता था आप वापस जरूर आयेंगे..!”
” इतना भरोसा करने का कारण ?”
” कारण आप नहीं जानते?” धानी की बात सुन बिक्रम मुस्कुराने लगा…
बिक्रम ने धीरे से आगे बढ़ कर धानी के हाथ थाम लिए …
” मेरे मम्मी-पापा आए हुए हैं…धानी मैं तुम्हें उन से मिलवाना चाहता हूं..मेरी माँ बहुत प्यारी है, दुनिया की सबसे सुंदर और निराली माँ। मेरी कहीं कोई बात नहीं टालती..वो जितनी प्यारी माँ हैं उतनी ही अच्छी सास भी बनेंगी..
मेरी माँ की बहु बनना चाहोगी..?”
बिक्रम ने बड़े अजीब ढंग से धानी से अपने मन की बात कह दी और वो शर्म से उसकी तरफ आँखें उठा कर भी नहीं देख पायी..
” बोलो ना धानी! तुम हाँ कहो तब तो मैं मेरे घर पर बात कर पाउंगा ना !”
धीरे से गरदन हिला कर धानी ने हाँ कह दी और बिक्रम ने तुरंत उसे सीने से लगा लिया …
दो प्यार में भीगते दिल एक दूसरे के दिल की धड़कन सुनने और समझने की कोशिश करते रहे और दूर हवेली की पहली मंजिल पर कांच की खिड़की के पीछे खड़ी पन्ना उन दोनों को घूरती रही….
शामियाने मे अब भी गाने बज रहे थे …
मेरी आँखों की सिआही, पिया देती है गवाही
मैं प्यासी थी निरासी, तू पानी की सुराही…
मेरी आँखों की सिआही…
तुझे देखा तो खिला हूँ, तेरी चाहत में धुला हूँ
मिले मंदिर में खुदा जो , मैं तो तुझ में यु मिला हूँ..
भीगी सी भागी सी मेरे बाजुओं में समायी
जोगी सी जागी सी कोई राम धुन वो सुनाये…….
” बंद करो अब ये गाना बजाना..!”
जोर से दहाड़ कर पन्ना पैर पटकते हुए अपने कमरें की ओर चली गई..चौधरी साहब घबरा कर रत्न की तरफ देखने लग गए कि अखिर किस बात पर उनकी राजकुमारी का मूड उखड़ गया..
और इधर उन सब को व्यस्त देख बिक्रम के माता-पिता वहाँ से चुपचाप निकलने लगे….
क्रमशः
aparna

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