
तू बन जा गली बनारस की..-5
हम जैसे तैसे ऑफ़िस पहुंचे और सीधा साहिब के कमरे में घुस गए , वहाँ वो छोटा चौधरी हमारा ही इन्तजार कर रहा था ..
हमने साहिब के बाद उसे भी सलाम ठोंका और उसके पेपर्स की फाइल उसे सौंप दी..
“अरे ऐसे पटक देने से खाली काम नहीं चलेगा साजन ,रत्न कुमार जी को थोड़ा लीगल फॉरमेलिटी भी समझा दो “
हाँ मेँ सिर हिला कर वहीं बैठ गए और चौधरियो का हिसाब किताब उन्हें ही समझाने लगे …
कुछ दस मिनट हमारी बात सुनाने के बाद वो एकदम से खड़ा हो गया ….
“हो गया हम समझ गए , इससे अधिक समझाईएगा तो हमारा दिमाग फट जाएगा “
उसके खड़े होते ही हम भी खड़े हो गए..और उसके जाते ही पूरे ऑफ़िस ने चैन की साँस ली ….
” अबे ठीक ही तो है , तुम तो ख़ामख्वाह डरा रहे थे , दिखने में भी अच्छा खासा है , एकदम ऊंचा पूरा ..हमें तो अरबी घोड़े जैसा लग रह था !”
” हाँ बेटा अभी ऐसा बोल रहे हो , वैसे खून के प्यासे हैं ये चौधरी..
अभी इनका दामाद इनकी बेटी का खून कर गया है तबसे ये लोग और भी ज्यादा बौखला गए हैं..”
हमे एकदम से धानी की सारी बातेँ याद आ गई..हीरक चौधरी, रत्न चौधरी, पन्ना और इन सबका बाप माणिक चौधरी…
” क्यों किया दामाद ने मर्डर ? कुछ जानते हो ?”
” हम नहीं जानते यार , बस सुनी सुनाई बातें हैं सब.. कोई कहता है इनके दामाद ने इनके पैसों के लालच में ही उनकी बेटी से शादी की थी और बाद में उसका खून करवा दिया!”
” सच्चाई क्या है ?”
” हमें क्या मालूम ? और वैसे भी यह लोग खतरनाक लोग है , तो वैसा ही दामाद भी मिला होगा !
” हम्म !!दामाद का केस कौन लड़ रहा है ?”
“पागलखाने से आए हो का? कौन होगा जो सीधा मौत के कुँए में छलांग लगाएगा? चौधरीयों के खिलाफ खड़े होना मतलब साक्षात मौत को गले लगाना है समझें.. हमे नहीं लगता वहाँ बनारस के किसी भी वकील में इतना जिगरा है कि इनके दामाद का केस लड़े ..”
” और अगर हम कहें, कि हम लड़ना चाहते हैं, तो ?”
” अच्छे खासे दिखते हो , कमा भी लेते हो, उम्र भी कम है फिर काहे आत्महत्या करना चाहते हो बे?”
” नहीं बस पूछ रहें हैं ?”
” अबे पूछना क्या, सोचना भी नहीं ..
अनुराग हमारी बात से कुछ ज्यादा ही खौफजदा लग रहा था ,और जब तक धानी हमें सारी बात ना बता दे हम भी उसे कुछ बताने की हालत में नहीं थे..
वो वापस कैंटीन की कचौडी पेले पड़ा था और हम चाय सुड़कते हुए धानी और चौधरी के दामाद के बारे में सोच रहे थे ..
आज शाम घर पहुंच कर सबसे पहले उसी के घर जाएंगे , और सारा किस्सा सुनकर रहेंगे ..
दिन आज कुछ ज्यादा ही लंबा गुजरा था , जैसे तैसे शाम हुई और हम घर की तरफ़ भाग चले…
” अबे किधर चल दिये? चलो आज हमारे कमरें में बैठते हैं , जरा महफिल सजाई जाए..हम खाना मंगवा लेंगे तुम दारू मंगवा लेना “
” आज नहीं अनुराग , आज हमें कुछ काम है !”
बड़ी मुश्किल से उससे पीछा छुड़ाया और हम घर भागे …
फटाफट नहा धोकर हम तैयार बैठे थे कि अब धानी आयेगी और सुबह का अधूरा किस्सा हमें सुनाएगी पर यूँ ही वक़्त बीत गया और वो नहीं आयी…
हमने चाय बनाई और चाय लिए बालकनी में चले आए …
हमारे साथ हमारा तंबुरा भी था जो बज रहा था ..
तुझ संग बैर लगाया ऐसा
रहा न मैं फिर अपने जैसा
मेरा नाम इश्क तेरा नाम इश्क
ये लाल इश्क, ये मलाल इश्क....
उसी वक्त उसकी बाल्कनी खुल गई और वो कुछ सुखाने बाहर चली आईं… कुछ देर रेलिंग पर हाथ रखे वो नीचे खेलते बच्चों को देखती रही , फिर धीमे से आंसू पोंछ कर अंदर चली गई…और बाल्कनी का दरवाजा कस कर बंद कर लिया…
हम अपनी चाय पीते वही खड़े रहे ….कुछ देर बाद यूँ लगा जैसे कॉरिडोर में कुछ आहट सुनाई दे रही है, हम तुरंत अपने दरवाजे पर पहुंच गये ,झांक कर देखा तो ऐसा लगा धानी कॉरिडोर पर है और हमने तुरंत दरवाजा खोल दिया।
लिफ्ट का इंतजार करते एक आदमी खड़ा था और उससे कुछ दूर धानी झुक कर अपनी सैंडल ठीक कर रही थी ।लाल रंग की साड़ी जिस पर बहुत खूबसूरत गुलाबों की बनी हुई लेस लगी थी उसमें धानी खुद भी खिला हुआ गुलाब नजर आ रही थी…
… इतनी खूबसूरत लग रही थी कि हम पलक झपकना छोड़कर उसे ही देखते रहे। शायद ही यूं ही देखते रहते की एक तीखी सी आवाज हमारे कानों में पड़ी और हमारा ध्यान भंग हो गया।
” थोड़ा जल्दी कर लो, लिफ्ट दोबारा ना चली जाए! ऐसे उटपटांग सैंडल पहनती क्यों हो कि उसी में पैर फंस जाए। तुम से सौ बार कहा है ढंग की चीजें लिया करो, लेकिन तुम्हारे दिमाग में तो भूसा भरा है जो कभी तुम्हें हमारी बात समझ आए!”
उस आदमी की आवाज सुनते हुए धानी चुपचाप जाकर उसके पास खड़ी हो गई और उसने बहुत ही भद्दे तरीके से धानी का हाथ खींच कर झटक दिया….
“तमीज से रहा करो हमारे साथ! हमने कहा है ना हमें देरी बर्दाश्त नहीं होती, और तुम जानती हो कि हमें बदतमीजी भी सहन नहीं होती।”
धानी जैसे खड़ी थी उसने हमारी तरफ नहीं देखा था हम उसकी पीठ की तरफ जो खड़े थे, लेकिन उस आदमी की नजर हम पर अचानक पड़ गई और वो वही लिफ्ट के सामने खड़े खड़े हम पर आग बरसाने लगा…
” क्यों साहब कौन है आप? और इधर मियां बीवी के बीच क्या ताकाझांकी कर रहे हैं? चलो निकलो अंदर!”
उसका ध्यान हम पर भी जा सकता है यह हमने सोचा ही नहीं था , हम तुरंत घर के अंदर आ गए और अपना दरवाजा बंद कर लिया लेकिन मैजिक आई से सटकर हम लिफ्ट के सामने खड़ी धानी को देखते रहे। उस आदमी ने धानी के कंधे पर हाथ रख कर उसे जबरदस्ती अपने पास खींच कर खड़ा कर लिया और कुछ देर में ही लिफ्ट का दरवाजा खुलते ही वो दोनों लिफ्ट में दाखिल हो गए….
हमने एक गहरी सांस ली और सोफे पर जाकर पसर गये। हम अब तक सदमे में थे कि धानी शादीशुदा है। दो बार देखने पर भी मालूम नहीं चला कि वह शादीशुदा है; और उसने कुछ बताया भी नहीं। हालांकि अब तक इतनी बातें भी तो नहीं हुई थी…
वो आदमी पहली नजर में ही हमें जल्लाद लग रहा था… देखने सुनने में ठीक ही था लेकिन आवाज से भयंकर कर्कश और गुस्से वाला था? लेकिन क्यों?
जिसे धानी जैसी लड़की पत्नी के रूप में मिली हो उस आदमी के लिए तो उसके जीवन की सबसे बड़ी खुशी की वज़ह यही होनी चाहिए..
उसके खुश रहने का और कोई कारण लाजिमी नहीं है। फिर भी वह इतना कड़वा क्यों था और सिर्फ कुछ सेकेंड में ही उसने इतना सारा जहर कैसे उगल दिया था?
क्या धानी जैसी हमें दिखाई देती थी, वैसी नहीं थी या फिर हमारी भोली सी धानी किसी घटिया आदमी के साथ रिश्ते में बंध चुकी थी…
… अब जो भी सच्चाई थी वो हमें धानी से ही पता चल सकती थी…
आज खाना खाने का भी दिल नहीं कर रहा है… हम चुपचाप उसी सोफ़े पर लेट के छत को देखते हुए यह सोचते रहे कि यह वही धानी है, जिसे स्कूल में कोई कुछ भी नहीं कह सकता था.. आज वही धानी इतनी गुमसुम सी चुपचाप सी किसी आदमी की डांट खाए जा रही थी।
बड़ा अजीब लग रहा था हमें ये सब देखते हुए…..
…. और उसी के ख़यालों में गुम हम सो गए, सुबह कुछ तेज़ आवाजों से नींद खुली यूं लगा जैसे कॉरिडोर में कोई बहुत तेजी से सूटकेस सरकाते हुए ले जा रहा है..
रात हम धानी के बारे में सोचते हुए हॉल के सोफे पर सो गए थे इसीलिए कॉरिडोर की आवाज इतनी साफ सुनाई दे रही थी हमने दरवाजे के भीतर से झांक कर देखा..
… वही रात वाला आदमी हाथ में एक सूटकेस लिए लिफ्ट की तरफ़ चला जा रहा था लिफ्ट के पास पहुंच कर उसने एक बार अपने फ्लैट की तरफ देखा शायद धानी दरवाजे पर खड़ी थी, उसने घूर कर उसे देखने के बाद इशारे में ही कुछ कहा और लिफ्ट में घुस गया…
हमने उसके जाते ही तुरंत अपना दरवाजा खोल दिया लेकिन तब तक धानी का दरवाजा बंद हो चुका था और ऐसे उसके घर की बेल बजाने की हमारी हिम्मत नहीं हुई हम आपस अपने फ्लैट में चले गए..
उसके बारे में सोचते सोचते ही हम ऑफिस के लिए तैयार होने लगे… जाने वह क्या बताना चाह रही थी और जाने कब वह सारी बात बताएगी हम सोच ही रहे थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई हमने जाकर दरवाजा खोला सामने धानी खड़ी थी…
… गुलाबी गहरे गले के कुर्ते में गीले गीले बालों के साथ वो बहुत खूबसूरत लग रही थी…
ना चाहते हुए भी हमारी नजर उसके कान से नीचे फिसलते हुए उसकी गर्दन पर पड़ गई जहां लाल नीला सा निशान बना हुआ था…
शायद उसने भी हमारी आंखों को देख लिया था और यह देख कर हम झेप कर दूसरी तरफ देखने लगे..
” आपको ऑफिस जाने के लिए लेट तो नहीं हो जाएगा!”
धत्त तेरे की कल तो यह तुम पर उतर आई थी आज फिर उसी फॉर्मेलिटी के भंवर में घिरी हुई आप बुला रही है चलो कोई बात नहीं देखा जाएगा..
” नहीं हमें लेट नहीं होगा हम अपने दोस्त को इन्फॉर्म कर देंगे तुम आराम से बैठो तुम चाय या कॉफी कुछ लोगी?”
” हम चाय ले लेंगे लेकिन आप बैठे हम बना देते हैं!”
” नहीं हमें आदत है अपने काम खुद करने की हमारी शादी नहीं हुई है ना!”
हम जाने क्यों उस पर नाराज हुए बैठे थे जबकि यह भी एक सच था कि उसने तो अपनी शादी के बारे में कभी हमसे कोई झूठ कहा ही नहीं जब ऐसी कोई बात ही नहीं निकली तो वह हमें पहली मुलाकात में कैसे बता देती कि वह शादीशुदा है..
” आप कुछ परेशान लग रहे है, हम बाद में आ जाते हैं!”
अब हम तुमसे क्या कहें धानी तुम्हारी गर्दन का वो निशान हमारे अंदर कैसी आग भड़का रहा है..
अपना गुस्सा कम करने के लिए ही हम उठकर रसोई में चले गए और जल्दी ही दो कप चाय बना कर वापस चले आए तब तक धानी ने अपनी पूरी गर्दन को अपने दुपट्टे से लपेट लिया था। वह चुपचाप बैठी खुली खिड़की से बाहर देख रही थी कितनी सूनी नजर आ रही थी उसकी काजल भरी आंखें…
उसकी आंखों की उदासी देख हम एक बार फिर उस पर सब कुछ हार गए।अपना गुस्सा, अपनी बदतमीजीया , अपनी जलन अपनी कुढ़न और अपना सब कुछ…
” क्या सोचती बैठी हो धानी?
“यही सोच रहे हैं कि भगवान ने जाने किस कलम से हमारी किस्मत लिखी है। इस केस में आपको उलझा कर कहीं हम आपकी जिंदगी भी संकट में ना डाल दें? देखिए आप पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, कि आप इस केस को लड़ते हैं या नहीं। सिर्फ बचपन की जान पहचान के कारण इस केस को हाथ में मत लीजिएगा…
अब तो दुनिया इधर की उधर हो जाए धानी लेकिन तुम्हारे लिए हम ये केस लड़ कर रहेंगे…
मन में सोचते तो हम बहुत कुछ थे लेकिन उसके सामने सब कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी उसके सामने बस यही कहा..
“तुम जल्द से जल्द हमें सारा किस्सा सुनाओ!”
वो सिर नीचे किए बैठी रही जैसे अपनी हिम्मत बटोर रही हो….
और फिर उसने धीमे से कहना शुरू किया …
” कल रात आपने हमारे साथ जिन्हें देखा था, वो हमारे पति हैं , सुयश सिंह राणा!”
छन की आवाज हुई और यूँ लगा हमारे भीतर कुछ दरक गया ..
” किचन में कुछ गिरा क्या , ऐसा लगा जैसे कुछ टूटने की आवाज सुनाई दी..!”
कितने आश्चर्य की बात है धानी कि तुमने हमारे दिल के टूटने की आवाज तक सुन ली लेकिन कभी हमारी आंखों में अपने लिए प्यार नहीं देख पाई….
हमने चाय का कप उठाकर उसकी तरफ बढ़ा दिया उसने अपना हाथ आगे बढ़ाकर वह चाय का कप थाम लिया और अनजाने में ही उसकी नाजुक उंगलियां हमारी उंगलियों से टकरा गई और पूरे 440 वोल्ट का करंट हमारे शरीर में दौड़ गया….
हमने इतने झटके से अपना हाथ हटाया कि तुम भी हमारे उतावलेपन पर मुस्कुरा उठी…
कभी-कभी तो लगता है जैसे तुम सब कुछ जानती हो और कभी लगता है, जैसे तुम कितनी भोली हो कितनी नासमझ…
चाय का कप होठों से लगाने के बाद तुमने नीचे रखा और कहना शुरू किया।
” हमारे दादा जी चौधरीयों के यहां काम किया करते थे बस उसी काम की वसीयत हमारे पापा को मिल गई। पापा भी चौधरियों के यहां मुनीम हो गए…
बचपन में अक्सर हम अपने पापा की उंगली पकड़े चौधरियों के घर बेरोकटोक चले जाया करते थे। उनके तीनों बच्चे हमसे बड़े थे..
उनके दोनों बेटे तो हमसे काफी बड़े थे लेकिन पन्ना हम से सिर्फ एक डेढ़ साल ही बड़ी थी और इसलिए अक्सर हम और वो एक संग खेला करते थे…
पन्ना के बाबा भी हमसे खूब लाड लड़ाया करते थे अक्सर जब हम और पन्ना एक साथ खेलते, तब वह आकर हम दोनों ही बच्चियों के सर पर हाथ रखकर हम दोनों के हाथ में चॉकलेट थमा दिया करते थे। अब क्योंकि हम पन्ना से भी छोटे थे इसलिए कभी कभार वह हमें गोद में उठाकर दुलार लिया करते थे और यह बात पन्ना को पसंद नहीं आती थी….
….. लेकिन हमें नहीं मालूम था कि बचपन से उसके दिमाग में धीमे धीमे घुलती ये कड़वाहट आगे जाकर इस कदर जहरीली हो जाएगी…
क्रमशः
aparna
